नेफ्रोपेक्सी एक सर्जरी प्रोसीजर है, जिसका उपयोग नेफ्रोप्टोसिस का इलाज करने के लिए किया जाता है। नेफ्रोप्टोसिस को “फ्लोटिंग किडनी” भी कहा जाता है, जिसमें आपके खड़े होने की अवस्था में आपके गुर्दे नीचे की तरफ चले जाते हैं। नेफ्रोप्टोसिस की समस्या पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक देखा जाता है।

नेफ्रोपेक्सी के दौरान सर्जन गुर्दे को पेट की अंदरूनी सतह से जोड़कर स्थिर बना देते हैं, जिससे फ्लोटिंग किडनी की समस्या ठीक हो जाती है। नेफ्रोपेक्सी सर्जरी को सिर्फ तब ही किया जाता है, जब आप में नेफ्रोप्टोसिस के लक्षण दिख रहे हों। नेफ्रोपेक्सी निर्धारित करने से पहले डॉक्टर आपको कुछ टेस्ट करवाने के लिए कह सकते हैं, जैसे अल्ट्रासाउंड और डॉप्लर स्कैन आदि। इन परीक्षणात्मक टेस्टों की मदद से यह सुनिश्चित किया जाता है कि आपको नेफ्रोप्टोसिस है या नहीं। सर्जरी से कुछ घंटे पहले आपको कुछ भी न खाने या पीने की सलाह दी जाती है, ताकि सर्जरी के दौरान आप खाली पेट रहें।

नेफ्रोपेक्सी को जनरल एनेस्थीसिया का इंजेक्शन लगाकर किया जाता है, जिससे आप सर्जरी के दौरान गहरी नींद में सो जाते हैं और आपको दर्द का पता नहीं चलता है। सर्जरी होने के बाद कई बार डॉक्टर आपको थोड़े-थोड़े अंतराल में बुला सकते हैं, जैसे सर्जरी के 10 दिन बाद फिर एक, तीन और छह महीने बाद। कुछ मामलों में आपको एक साल बाद भी बुलाया जा सकता है, ताकि आपके गुर्दे के स्वास्थ्य और कार्यक्षमता का पता लगाया जा सके।

(और पढ़ें - गुर्दे की बीमारी का इलाज)

  1. नेफ्रोपेक्सी क्या है - What is Nephropexy in Hindi
  2. नेफ्रोपेक्सी किसलिए की जाती है - Why is Nephropexy done in Hindi
  3. नेफ्रोपेक्सी से पहले - Before Nephropexy in Hindi
  4. नेफ्रोपेक्सी के दौरान - During Nephropexy in Hindi
  5. नेफ्रोपेक्सी के बाद - After Nephropexy in Hindi
  6. नेफ्रोपेक्सी की जटिलाएं - Complications of Nephropexy in Hindi
  7. नेफ्रोपेक्सी के डॉक्टर

नेफ्रोपेक्सी किसे कहते हैं?

नेफ्रोपेक्सी में अस्थिर गुर्दे को पेट की अंदरूनी दीवार से जोड़कर स्थिर बना दिया जाता है। यह सर्जरी आमतौर पर नेफ्रोप्टोसिस या फ्लोटिंग किडनी (अस्थिर गुर्दे) के मरीजों की ही की जाती है।

(और पढ़ें - गुर्दे के संक्रमण का इलाज)

मानव शरीर में दो गुर्दे होते हैं, जो पेट में रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ मौजूद होते हैं। ये अपशिष्ट पदार्थों को अलग निकालकर रक्त को साफ करने और पेशाब बनाने जैसे महत्वपूर्ण शारीरिक कार्य करते हैं।

फ्लोटिंग किडनी या नेफ्रोप्टोसिस ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति के लेटे हुए स्थिति से खड़े होने पर उसके गुर्दे अस्थिर होकर हिलने लग जाते हैं। कई बार गुर्दे हिल-ढुलकर वापस अपनी स्थिति में आ जाते हैं। हालांकि, हर बार ऐसा नहीं होता है। फ्लोटिंग किडनी की समस्या आमतौर पर तब होती है, जब कम उम्र वाले और पतले लोगों में गुर्दे के आसपास वसायुक्त ऊतक पर्याप्त सहारा न दे पाएं।

कई बार नेफ्रोप्टोसिस के कोई लक्षण नहीं दिखते हैं और इस कारण से इसका इलाज करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती है। हालांकि, यदि लक्षण होते हैं, तो नेफ्रोपेक्सी सर्जरी करने की आवश्यकता पड़ सकती है।

(और पढ़ें - किडनी रोग में क्या खाना चाहिए)

नेफ्रोपेक्सी क्यों की जाती है?

यदि किसी व्यक्ति में निम्न लक्षण देखे जा रहे हैं, तो डॉक्टर नेफ्रोपेक्सी सर्जरी करने पर विचार कर सकते हैं -

नेफ्रोपेक्सी किसे नहीं करवानी चाहिए?

यदि आपके शरीर में नेफ्रोप्टोसिस के लक्षण महसूस नहीं हो रहे हैं, तो डॉक्टर नेफ्रोपेक्सी सर्जरी करवाने की सलाह नहीं देते हैं।

(और पढ़ें - बार-बार संक्रमण होने का कारण)

नेफ्रोपेक्सी सर्जरी से पहले की तैयारी?

नेफ्रोपेक्सी सर्जरी करवाने से पहले आपको कुछ तैयारियां करने की आवश्यकता पड़ सकती है, जिनके बारे में नीचे बताया गया है।

  • सर्जरी शुरू करने से पहले डॉक्टर आपके शरीर की करीब से जांच करेंगे और निम्न टेस्ट करवाने की सलाह देंगे -
    • अल्ट्रासाउंड स्कैन -
      पेट में अस्थिर गुर्दे की तस्वीरें प्राप्त करने के लिए अल्ट्रासाउंड स्कैन किया जा सकता है। (और पढ़ें - स्क्रोटल अल्ट्रासाउंड क्या है)
       
    • डॉपलर स्कैन -
      इस टेस्ट की मदद से गुर्दों में मौजूद रक्त वाहिकाओं की कार्य क्षमता की जांच की जाती है।
       
    • इंट्रावेनस पाइलोग्राफी -
      इसे आईवीपी भी कहा जाता है, जिसकी मदद से गुर्दे की स्थायी तस्वीर ली जाती है।
       
  • सर्जरी शुरू करने से पहले डॉक्टर को आपकी जीवनशैली से संबंधी आदतों के बारे में पता होना चाहिए जैसे धूम्रपान करना या शराब पीना आदि।
  • यदि आप धूम्रपान या शराब का सेवन करते हैं, तो डॉक्टर उन्हें छोड़ने की सलाह दे सकते हैं, ताकि सर्जरी के बाद आप जल्दी स्वस्थ हो पाएं।
  • यदि आप किसी भी प्रकार की कोई दवा, विटामिन, मिनरल, हर्बल उत्पाद या फिर कोई भी सप्लीमेंट ले रहे हैं, तो इसके बारे में डॉक्टर को बता दें।
  • यदि आपकी दवाओं में कोई ब्लड थिनर दवा है, तो डॉक्टर सर्जरी से कुछ समय पहले ही इनका सेवन बंद करने की सलाह दे सकते हैं जैसे एस्पिरिन, वार्फेरिन, विटामिन ई और क्लोपिडोग्रेल आदि।
  • यदि आपको वर्तमान में या फिर पहले कभी स्वास्थ्य संबंधी समस्या रही है, तो फिर इसके बारे में डॉक्टर को बता दें।
  • यदि आपको भोजन, टेप, आयोडीन, लेटेक्स या त्वचा को साफ करने वाले घोल आदि से एलर्जी है, तो इस बारे में डॉक्टर को अवश्य बता दें।
  • सर्जरी से पहले कम से कम आठ घंटे तक डॉक्टर आपको कुछ भी न खाने या पीने की सलाह देते हैं, ताकि सर्जरी के दौरान आप खाली पेट रह सकें।
  • सर्जरी वाले दिन अपने साथ किसी करीबी रिश्तेदार या दोस्त को ले जाएं ताकि वे सर्जरी से पहले आपकी मदद कर सकें और सर्जरी के बाद आपको घर ले जा सकें।

सर्जरी शुरू करने से पहले आपको सहमति पत्र दिया जाता है, जिस पर हस्ताक्षर करके आप सर्जन को सर्जरी करने की अनुमति देते हैं। हालांकि, हस्ताक्षर करने से पहले सहमति पत्र को अच्छे से पढ़ लेना चाहिए।

(और पढ़ें - धूम्रपान छोड़ने के घरेलू तरीके)

नेफ्रोपेक्सी सर्जरी कैसे की जाती है?

जब आप सर्जरी करवाने के लिए अस्पताल पहुंच जाते हैं, तो आपको हॉस्पिटल गाउन पहनने के लिए दिया जाता है। नेफ्रोपेक्सी सर्जरी करने के लिए एनेस्थीसिया का इंजेक्शन लगाया जाता है, जिससे आपको गहरी नींद आ जाती है। इससे सर्जरी के दौरान कोई दर्द या तकलीफ महसूस नहीं होती है।

नाक के माध्यम से पेट में एक ट्यूब डाली जाती है, जिसकी मदद से आपको आहार व दवाएं दी जाती हैं। एक पतली व लचीली ट्यूब (कैथीटर) को मूत्राशय में डाला जाता है, जिसकी मदद से पेशाब को शरीर से बाहर निकाला जाता है। नेफ्रोपेक्सी सर्जरी को करने के दो अलग-अलग तरीके हैं, जिन्हें ट्रांसपेरिटोनियल और रेट्रोपेरिटोनियल के नाम से जाना जाता है। इन दोनों तरीकों के बारे में नीचे बताया गया है -

ट्रांसपेरिटोनियल नेफ्रोपेक्सी

इसे पेट के अंदरूनी हिस्से की परत के अंदर से किया जाता है, जिस परत को पेरिटोनियम कहा जाता है। ट्रांसपेरिटोनियल नेफ्रोपेक्सी को निम्न तरीके से किया जाता है -

  • आपको ऑपरेशन टेबल पर बाईं करवट लेकर लेटने को कहा जाता है।
  • आपको इंजेक्शन या फिर इंट्रावेनस की मदद से एनेस्थीसिया दी जाएगी, जिससे थोड़ी देर बाद आप गहरी नींद में सो जाएंगे।
  • एनेस्थीसिया का असर शुरू होने के बाद आपके पेट पर नाभि के पास चीरा लगाया जाता है।
  • इस चीरे के अंदर से पेट में एंडोस्कोप भेजा जाता है। एंडोस्कोप में एक पतली ट्यूब होती है, जिसके सिरे पर कैमरा और लाइट लगी होती है। (और पढ़ें - एंडोस्कोपी क्या है)
  • पेरिटोनियम के अंदर से पेट में सुई डाली जाती है।
  • इसके बाद सर्जन आगे एक चीरा लगाते हैं, जिसकी मदद से वे लिवर और बड़ी आंत के बीच में मौजूद रेट्रोपेरिटोनियल स्पेस को देख पाते हैं। पेरिटोनियम के पीछे पाए जाने वाले हिस्से को रेट्रोपेरिटोनियल स्पेस कहा जाता है।
  • इसके बाद गुर्दे को पूरी तरह से अलग कर दिया जाता है। जिससे मूत्र प्रणाली के भाग भी दिखने लगते हैं, जैसे मूत्रवाहिनी (गुर्दे से मूत्राशय तक पेशाब को ले जाने वाली नली) और रिनल पेल्विस (किडनी का वह हिस्सा जो मूत्रवाहिनी में पेशाब भेजने के लिए एक कीप का काम करता है) आदि।
  • इसके बाद सर्जन टांके लगाकर गुर्दे को पेट की अंदरूनी सतह से जोड़ कर स्थिर बना देते हैं। टांकों को एक जगह पर रखने के लिए क्लिप भी लगाए जा सकते हैं। (और पढ़ें - टांके सूखने के उपाय)
  • जब गुर्दे स्थिर हो जाते हैं, तो सर्जन पेट में एक अलग से ड्रेनेज ट्यूब लगा देते हैं। इसकी मदद से सर्जरी वाले स्थान पर बनने वाला द्रव निकलता रहता है।
  • अंत में टांकों की मदद से चीरे को बंद कर दिया जाता है। सर्जरी में लगाए जाने वाले टांके आमतौर पर कुछ समय बाद अपने आप अवशोषित हो जाते हैं।

रेट्रोपेरिटोनियल नेफ्रोपेक्सी

इस सर्जरी प्रोसीजर को पेरिटोनियम के पीछे वाली सतह में किया जाता है, जिसके करने के तरीके निम्न के अनुसार हैं -

  • सबसे पहले आपको हॉस्पिटल गाउन पहना दिया जाएगा और फिर ऑपरेशन टेबल पर लिटा दिया जाएगा।
  • आपको इंजेक्शन या फिर इंट्रावेनस की मदद से एनेस्थीसिया दी जाएगी, जिससे थोड़ी देर बाद आप गहरी नींद में सो जाएंगे।
  • सर्जन पेट में नाभि के पास एक छोटा सा चीरा लगाते हैं।
  • इसके बाद बलून डिस्सेक्टर नामक एक विशेष उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे रेट्रोपेरिटोनियल भाग में पर्याप्त जगह बन जाती है।
  • गुर्दे के आसपास की सतह को काट दिया जाता है, ताकि गुर्दा ठीक से दिख पाए।
  • जब गुर्दा ठीक से दिखने लगता है, तो सर्जन इसके आसपास के ऊतकों को काट देते हैं, ताकि यह पूरी तरह से अलग हो जाए।
  • इसके बाद चिपकने वाले एक विशेष पदार्थ की मदद से गुर्दे को पेट की अंदरूनी सतह और मांसपेशियों से जोड़ दिया जाता है।
  • सर्जन ऑपरेशन वाले हिस्से में एक ड्रेनेज ट्यूब लगा देते हैं और टांकों की मदद से चीरे को बंद कर देते हैं।

नेफ्रोपेक्सी सर्जरी को पूरा होने में करीब 45 मिनट का समय लगता है और आपको सर्जरी के बाद कम से कम दो दिन तक अस्पताल में रहना पड़ सकता है।

सर्जरी के कुछ दिन बाद ही ड्रेनेज ट्यूब को निकाला जाता है।

डॉक्टर अस्पताल से छुट्टी देने से पहले अल्ट्रासाउंड इंट्रावेनस पाइलोग्राम जैसे कुछ टेस्ट कर सकते हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि सर्जरी के घाव ठीक हो रहे हैं या नहीं।

(और पढ़ें - घाव जल्दी ठीक करने के उपाय)

नेफ्रोपेक्सी के बाद क्या देखभाल की जाती है?

सर्जरी के बाद जब आप घर आ जाते हैं, तो आपको कुछ विशेष देखभाल करने की जरूरत पड़ती है जो निम्न के अनुसार है -

  • घाव की देखभाल
    • आपको सर्जरी के बाद नहाने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन इस दौरान सर्जरी के घाव को ढकना और पानी से बचाना जरूरी है।
    • यदि घाव गीला हो गया है तो किसी सूखे व स्वच्छ कपड़े से हल्के-हल्के साफ कर लें।
    • घाव को गंदा न होने दें।
  • दवाएं
    • सर्जरी के बाद आपको कुछ समय के लिए दर्द हो सकता है, जिसके लिए डॉक्टर आपको विशेष दर्दनिवारक दवाएं देते हैं। इन दवाओं को डॉक्टर द्वारा बताई गई खुराक के अनुसार ही लें।
    • डॉक्टर से पूछे बिना कोई अन्य दर्दनिवारक दवा न लें।

डॉक्टर को कब दिखाएं?

यदि नेफ्रोपेक्सी सर्जरी के बाद आपको निम्न में से कोई भी समस्या महसूस हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर से इस बारे में बात करें -

(और पढ़ें - किडनी में सूजन होने का कारण)

नेफ्रोपेक्सी सर्जरी से क्या जोखिम होते हैं?

नेफ्रोपेक्सी से निम्न जोखिम व जटिलताएं हो सकती हैं -

  • संक्रमण
  • सर्जरी के बाद भी नेफ्रोप्टोसिस ठीक न हो पाना
  • रक्तस्राव होना
  • बांह या टांग में रक्त का थक्का बनना
  • रेट्रोपेरिटोनियल के हिस्से में रक्त का थक्का बनना, जिससे सूजन आ जाती है
  • आंत में चोट लगना या छिद्र होना (और पढ़ें - आंत में सूजन होने के घरेलू उपाय)
  • सर्जरी वाले हिस्से के आसपास की नस क्षतिग्रस्त हो जाना
  • एनेस्थीसिया से एलर्जी होना
  • मांसपेशी में जलन या चुभन जैसी समस्या महसूस होना (और पढ़ें - मांसपेशियों में दर्द का इलाज)
  • नेफ्रोपेक्सी के बाद होने वाले लक्षण ठीक होकर फिर से विकसित हो जाना
  • नेफ्रोप्टोसिस के लक्षण फिर से होना

(और पढ़ें - गुम चोट के लक्षण)

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