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जब हम प्लास्टिक सर्जरी का नाम सुनते हैं तो ज्यादातर लोगों को लगता है कि ये एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति के बाहरी रंग-रूप और बनावट को बेहतर बनाया जाता है। उदाहरण के लिए- नोज जॉब (नाक की सर्जरी), ब्रेस्ट ऑगमेंटेशन (स्तन की वृद्धि), टमी टक (पेट कम करवाना) आदि। ये सभी कॉस्मेटिक सर्जरी हैं जो प्लास्टिक सर्जरी का एक अहम हिस्सा हैं लेकिन प्लास्टिक सर्जरी का मतलब सिर्फ इस तरह की सर्जरी ही नहीं है। 

प्लास्टिक सर्जरी में रीकंस्ट्रक्टिव यानी पुनर्निर्माण सर्जरी भी शामिल होती है। इन सर्जरियों के माध्यम से चेहरे और शरीर पर दिखने वाली कई तरह की त्रुटियों का समाधान किया जा सकता है। (केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से जुड़ी त्रुटियों को छोड़कर) उदाहरण के लिए- जन्मजात दोष जैसे- कटे-फटे होंठ, हथेली में अतिरिक्त उंगली या फिर शरीर पर जलने के निशान, कैंसर या टोसिस (ptosis) जैसी समस्याओं के लिए की जाने वाली सर्जरी। 

कई बार प्लास्टिक सर्जरी की मदद से शरीर की कई क्रियाओं को भी फिर से पहले जैसा करने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए- अगर दुर्घटना के बाद हाथ या पैर में कोई विकृति या विकलांगता आ जाए तो प्लास्टिक सर्जरी की मदद से उस विकृति को दूर कर शरीर के उस हिस्से के कार्य करने के तरीके को फिर से पहले जैसा किया जा सकता है। 

प्लास्टिक सर्जरी यह शब्द यूनानी भाषा (ग्रीक शब्द) प्लास्टिकोज से आया है जिसका अर्थ है सांचे में ढालना या आकार देना। जब जैसी जरूरत हो उसके हिसाब से सभी उम्र और समुदाय के लोग प्लास्टिक सर्जरी करवा सकते हैं। वर्ल्ड प्लास्टिक सर्जरी डे के मौके पर हम आपके लिए सम्मिलत जानकारी लेकर आए हैं कि आखिर प्लास्टिक सर्जरी क्या है और अगर आप इसे करवाने की सोच रहे हैं तो किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

  1. प्लास्टिक सर्जरी के प्रकार
  2. प्लास्टिक सर्जरी से जुड़ी प्रक्रियाएं
  3. प्लास्टिक सर्जरी से पहले और बाद में इन बातों का ध्यान रखें
  4. प्लास्टिक सर्जरी के डॉक्टर
  5. प्लास्टिक सर्जरी डे 2020: पेट कम करवाना और स्तन प्रत्यारोपण के अलावा प्लास्टिक और पुनर्निर्माण सर्जरी किस बारे में है, जानें

सर्जरी करवाने का उद्देश्य क्या है इसके आधार पर प्लास्टिक सर्जरी 2 तरह की होती है:
1. पुनर्निर्माण सर्जरी
पुनर्निर्माण या रीकंस्ट्रक्टिव सर्जरी इसलिए की जाती है ताकि चेहरे या शरीर के किसी क्षतिग्रस्त हिस्से की मरम्मत कर उसकी कार्य करने की क्षमता को जहां तक संभव हो फिर से पहले की तरह बनाया जा सके। आपको जानकर हैरानी होगी कि पुनर्निर्माण सर्जरी किसी भी कॉस्मेटिक प्रक्रिया से कहीं ज्यादा कॉमन है। हालांकि यह भी सच है कि पुनर्निर्माण सर्जरी के माध्यम से भी व्यक्ति का बाहरी रंग-रूप बेहतर हो जाता है। ब्रिटिश एसोसिएशन ऑफ प्लास्टिक रीकंस्ट्रक्टिव एंड एस्थेटिक सर्जन्स के मुताबिक, निम्नलिखित परिस्थितियों को पुनर्निर्माण सर्जरी के माध्यम से दोबारा संशोधित किया जा सकता है:

  • जन्मजात समस्याएं (जिनके साथ व्यक्ति का जन्म होता है) जैसे- कटा हुआ तालू, कटा-फटा होंठ, जन्मचिन्ह (बर्थमार्क) को हटवाना, कान से जुड़ी त्रुटियों को सही करना, चेहरे से जुड़ी त्रुटियां और हाथ से जुड़ी विकृतियां जिसमें बच्चा अतिरिक्त उंगली या अतिरिक्त अंग के साथ पैदा होता है।
  • अधिग्रहित समस्याएं (जिसे व्यक्ति अपने जीवन के दौरान प्राप्त करता है) जैसे- किसी तरह की चोट या जख्म, स्किन का जलना, किसी तरह का गंभीर संक्रमण, कैंसर या ट्यूमर हटवाना, आर्थराइटिस या गैंगलिऑन जैसी स्थितियों का प्रबंधन।

2. कॉस्मेटिक सर्जरी
कॉस्मेटिक सर्जरी मुख्य रूप से व्यक्ति के सौंदर्य और आकर्षण को बेहतर बनाने के लिए की जाती है। इसमें कई तरह की प्रक्रियाएं शामिल हैं जैसे- नाक को पुनःआकार देना, स्तन में वृद्धि करना, स्तन के साइज को कम करना, किसी निश्चित जगह से अनचाहे बालों को हटवाना और शरीर के किसी हिस्से से अतिरिक्त फैट को हटवाना (लिपोसक्शन के जरिए)। कॉस्मेटिक सर्जरी में शरीर के किसी हिस्से को इस तरह से पुनःआकार दिया जाता है ताकि व्यक्ति को खुद में अच्छा महसूस हो और उसका आत्मविश्वास बढ़े।

(और पढ़ें : ब्रेस्ट का आकार कम करने के उपाय, तरीके)

विभिन्न कार्यपद्धतियों का इस्तेमाल कर प्लास्टिक सर्जरी की जाती है। इनमें से कई प्रक्रियाएं तो ऐसी हैं जिनका लंबे समय से इस्तेमाल हो रहा है जबकि कुछ प्रक्रियाएं बिलकुल नई भी हैं। हर प्रक्रिया के अपने फायदे और जोखिम कारक होते हैं। प्लास्टिक सर्जरी से जुड़ी इन सभी प्रक्रियाओं के बारे में यहां जानें:

  1. स्किन ग्राफ्ट प्लास्टिक सर्जरी की एक प्रक्रिया है
  2. प्लास्टिक सर्जरी में उत्तकों का विस्तार
  3. फ्लैप सर्जरी
  4. लेजर सर्जरी
  5. इंडोस्कोपिक सर्जरी

स्किन ग्राफ्ट प्लास्टिक सर्जरी की एक प्रक्रिया है

स्किन ग्राफ्ट जिसे साधारण शब्दों में कहें तो त्वचा पर पैबंद लगाना हुआ और यह प्रक्रिया प्लास्टिक सर्जरी की सबसे फेमस प्रक्रियाओं में से एक है। इस प्रक्रिया में शरीर के एक हिस्से से त्वचा का एक टुकड़ा लिया जाता है और फिर किसी दूसरे क्षतिग्रस्त हिस्से को कवर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। शरीर के जिस हिस्से से स्किन का टुकड़ा लिया जाता है उसे डोनर एरिया कहते हैं। स्किन ग्राफ्टिंग की प्रक्रिया आमतौर पर त्वचा पर हुए किसी घाव को सही करने के लिए की जाती है, जैसे- जलने से हुआ घाव, किसी तरह की चोट या दुर्घटना के निशान या कैंसर आदि। डायबिटीक अल्सर या  दबाव अल्सर (शय्यावरण त्वचा) जैसी समस्याओं का इलाज करने में भी स्किन ग्राफ्टिंग का इस्तेमाल होता है।

यह ग्राफ्ट इनमें से किसी एक तरह का हो सकता है:

  • ऑटोग्राफ्ट : इस तरह की प्रक्रिया में शरीर के एक हिस्से से ग्राफ्ट लेकर शरीर के दूसरे हिस्से की मरम्मत की जाती है।
  • आईसोग्राफ्ट : इसमें आनुवांशिक रूप से समरूप व्यक्ति से ग्राफ्ट लिया जाता है जैसे- एक जैसे दिखने वाले जुड़वां व्यक्ति।
  • ऐलोग्राफ्ट : इसमें जिस व्यक्ति से ग्राफ्ट लिया जाता है वह मरीज का आनुवांशिक समरूप नहीं होता। अगर कोई व्यक्ति गंभीर रूप से जल जाए तो उसमें इस तरह के ग्राफ्ट का इस्तेमाल कर अस्थायी इलाज किया जाता है। हालांकि ऐलोग्राफ्ट को अक्सर मरीज का इम्यून सिस्टम अस्वीकार कर देता है।
  • जेनोग्राफ्ट : इसमें ग्राफ्ट को किसी दूसरे जीवाणु से लिया जाता है जो किसी और प्रजाति या नस्ल का होता है, आमतौर पर सूअर लेकिन मवेशी- गाय-बैल या घोड़ा या कई बार मछली भी। ये ग्राफ्ट भी ऐलोग्राफ्ट की ही तरह अस्थायी होता है इसलिए नीचे की स्किन को भरने में कुछ समय लगता है।
  • सिंथेटिक ग्राफ्ट : कई तरह के सिंथेटिक या कृत्रिम सब्सिटिट्यूट मौजूद हैं जिनका इस्तेमाल ग्राफ्ट की तरह किया जा सकता है। हालांकि इनका स्ट्रक्चर आमतौर पर व्यक्ति की त्वचा के सदृश्य नहीं होता है। कृत्रिम ग्राफ्ट का आमतौर पर जले हुए घाव पर ड्रेसिंग करने के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।

स्किन के किस हिस्से पर ग्राफ्टिंग की जानी है इसके आधार पर स्किन ग्राफ्टिंग की प्रक्रिया 3 तरह की होती है:

  • फुल-थिकनेस स्किन ग्राफ्ट : इस तरह के ग्राफ्ट में एपिडर्मिस (स्किन की सबसे ऊपर सतह) और डर्मिस (एपिडर्मिस के ठीक नीचे वाली स्किन की सतह) दोनों शामिल होते हैं। इस तरह के ग्राफ्ट को सबसे बेस्ट माना जाता है क्योंकि इसमें किसी तरह का कोई निशान नहीं रहता है। इसका इस्तेमाल 1 सेंटीमीटर से कम के छोटे-छोटे हिस्सों की मरम्मत के लिए किया जाता है जिनमें रक्त धमनियां नहीं होतीं और बड़े क्षेत्र जिसमें गहरे घाव होते हैं जिनमें रक्त धमनियां भी होती हैं।
  • स्प्लिट थिकनेस स्किन ग्राफ्ट : इस तरह के ग्राफ्ट में एपिडर्मिस और डर्मिस की ऊपरी सतह शामिल होती है। आमतौर पर ग्राफ्ट का रंग आसपास की त्वचा की रंग से अलग होता है, किसी तरह की चोट या जख्म के प्रति अतिसंवेदनशील होता है और साथ में अवकुंचन (कॉन्ट्रैक्चर) से भी जुड़ा होता है। इस तरह के स्किन ग्राफ्ट का इस्तेमाल बिना खून की सप्लाई वाले बड़े क्षेत्रों की मरम्मत करने के लिए किया जाता है जहां पर फुल-थिकनेस ग्राफ्ट असरदार नहीं होता है। सामान्यतौर पर स्प्लिट थिकनेस ग्राफ्ट का इस्तेमाल स्किन के आसपास के हिस्सों का इलाज करने के लिए जैसे- जलने पर होने वाली समस्या को दूर करने के लिए किया जाता है।
  • कॉम्पोजिट ग्राफ्ट : कॉम्पोजिट ग्राफ्ट में स्किन के अलावा बाकी टीशूज भी शामिल होते हैं जैसे- कार्टिलेज (नरम हड्डी) और फैट। इस तरह का ग्राफ्ट आमतौर पर नाक या कान में इस्तेमाल होता है जहां पर कार्टिलेज ग्राफ्ट की जरूरत होती है।

स्किन ग्राफ्टिंग के अंतर्विरोध
स्किन ग्राफ्टिंग आमतौर पर इंफेक्शन वाली जगह पर या जहां नियंत्रित ब्लीडिंग होती है वहां पर नहीं किया जाता। जो लोग धूम्रपान करते हैं, कुपोषित हैं जिनमें रक्तस्त्राव से जुड़ी कोई बीमारी हो या फिर जो लोग स्कन्दनरोधी दवाइयों का सेवन कर रहे हों उनमें स्किन ग्राफ्टिंग की यह प्रक्रिया पूरी सतर्कता के साथ की जाती है। 

स्किन ग्राफ्टिंग से जुड़े जोखिम
स्किन ग्राफ्टिंग से जुड़े सबसे सामान्य जोखिम निम्नलिखित हैं:

ग्राफ्ट की असफलता या खराबी
स्किन ग्राफ्टिंग प्रक्रिया से जुड़ा सबसे कॉमन रिस्क है ग्राफ्ट की असफलता या खराबी। ग्राफ्ट को निचली स्किन से बहुत ढीले से संलग्न किया जाता है इसलिए अगर उस अंग या उस हिस्से में किसी भी तरह की गतिविधि हो तो ग्राफ्ट के अपने पूर्व स्थान से हटने की संभावना बनी रहती है। इसके अलावा कई और कारणों से ग्राफ्ट असफल हो सकता है जैसे- हेमोटोमा, सेरोमा (स्किन के नीचे तरल पदार्थों का भर जाना), इंफेक्शन, रक्त धमनियों का उसमें न उगना या फिर कोई और टेक्निकल खराबी।

अगर प्रक्रिया करवाने के एक या दो हफ्ते बाद ग्राफ्ट सफेद या काला दिखने लगे तो इसका मतलब है कि ग्राफ्ट के ऊपरी सतह में खराबी आ गई है। इस तरह के मामलों में सिर्फ प्रभावित हिस्से को ही हटाया जाता है। हालांकि अगर पूरा का पूरा ग्राफ्ट ही असफल हो जाता है तो फिर सर्जरी को दोबारा करने की जरूरत पड़ती है।

ग्राफ्ट की अस्वीकृति 
ग्राफ्ट की अस्वीकृति की घटना तब होती है जब ऐलोग्राफ्ट या जेनोग्राफ्ट किया जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन ग्राफ्ट्स के टीशूज को किसी दूसरे व्यक्ति से या जानवरों से लिया जाता है। ऐसे में व्यक्ति का इम्यून सिस्टम ग्राफ्ट को बाहरी तत्व मानकर हानिकारक समझने लगता है और इसलिए ग्राफ्ट के खिलाफ एंटीबॉडीज का निर्माण करने लगता है। ऐसा होने पर शरीर ग्राफ्ट को अस्वीकार कर देता है।

प्लास्टिक सर्जरी में उत्तकों का विस्तार

टीशू एक्सपैन्शन या उत्तकों का विस्तार एक प्रक्रिया है जिसके जरिए प्लास्टिक सर्जन आपके शरीर में अतिरिक्त त्वचा को उत्पन्न करने लगते हैं जिसे बाद में किसी दूसरे क्षेत्र में ट्रांसप्लांट किया जाता है। इस प्रक्रिया में त्वचा की सबसे मूलभूत प्रॉपर्टी का इस्तेमाल किया जाता है ताकि दबाव में आने पर वह हिस्सा फैल सके। इसके लिए, सर्जन स्किन के नीचे क्षतिग्रस्त हिस्से के पास ही छोटा सा टीशू एक्सपैंडर डाल देते हैं। इस एक्सपैंडर में एक थैली होती है जिसे डॉक्टर धीरे-धीरे सलाइन सलूशन से भरते जाते हैं ताकि मरीज की स्किन स्ट्रेच होती रहे। थैली से जुड़े एक ट्यूब से उसे भरा जाता है।

टीशू एक्सपैंडर का निर्माण इस तरह से किया जाता है कि वह उस हिस्से पर परफेक्टली फिट हो जाए। ज्यादातर एक्सपैंडर में 200मिलिलीटर तक सलाइन को भरा जा सकता है। अगर ज्यादा स्किन की जरूरत होती है तो वहां पर एक से ज्यादा एक्सपैंडर को भी इंसर्ट किया जाता है। एक्सपैंडर का साइज इस बात पर निर्भर करता है कि घाव का साइज क्या है, डोनर साइट का साइज क्या है, टीशू का बढ़ने वाला संभावित साइज क्या होगा। कुछ एक्सपर्ट्स कहते हैं कि एक्सपैंडर का साइज घाव के क्षेत्र के साइज के बराबर होना चाहिए। इस तरह से जब एक्सपैंडर स्किन टीशू को डबल कर देता है तो इसका इस्तेमाल घाव के पूरे हिस्से के साथ ही डोनर हिस्से को भी कवर करने में किया जाता है। बाकी एक्सपर्ट्स सुझाव देते हैं कि एक्सपैंडर का बेस घाव के साइज से दोगुना या तीन गुना होना चाहिए।

स्तन पुनर्निर्माण, टीशू एक्सपैंशन सर्जरी का सबसे कॉमन प्रकार है। इस प्रक्रिया का इस्तेमाल बहुत अधिक जले हुए हिस्से के इलाज के लिए भी किया जाता है। टीशू एक्सपैंशन की प्रक्रिया मुश्किल होती है इसलिए आमतौर पर स्किन के मोटे हिस्से में जैसे- पीठ या धड़ में इसका सुझाव नहीं दिया जाता। मरीज के शरीर के जिस हिस्से में एक्सपैंडर लगाया जाता है वहां पर अस्थायी रूप से कुरूपता या भद्दापन आ जाता है। 

जब प्लास्टिक सर्जन को लगता है कि मरीज की स्किन पर्याप्त रूप से बढ़ गई है तो वे उस थैली में सलाइन डालना बंद कर देते हैं और फिर उसे 14 दिन तक उसी तरह रहने देते हैं ताकि स्किन स्ट्रेच हो जाए। इसके बाद विस्तृत हिस्से को हटाया जाता है और बढ़ी हुई स्किन को क्षतिग्रस्त हिस्से के ऊपर एक तरफ से घुमाया जाता है ताकि प्रभावित स्किन को रिप्लेस किया जा सके। स्तन पुनर्निर्माण के केस में ब्रेस्ट इम्प्लांट को बढ़ी हुई विस्तृत त्वचा के नीचे रखा जाता है।

टीशू एक्सपैंशन से जुड़े जोखिम और जटिलताएं
टीशू एक्सपैंशन या उत्तकों के विस्तार की प्रक्रिया से निम्नलिखित जोखिम या जटिलाताएं जुड़ी होती हैं:
मामूली जोखिम: इसमें हीमेटोमा, अपर्याप्त उत्तक विस्तार, सेरोमा आदि शामिल है।
प्रमुख जोखिम

  • बलून से हवा निकलना : बलून से हवा निकलने की प्रक्रिया एक्सपैंडर्स के पहले के वर्जन में ज्यादा देखने को मिलती थी जहां पर सलाइन भरने के लिए ट्यूब की जगह पर एक्सपैंडर के ठीक ऊपर एक्सपैंशन का एक पोर्ट होता था। ऐसे में सलाइन डालते वक्त सुई से लगने वाली चोट से उसकी हवा निकल जाती थी। आधुनिक एक्सपैंडर्स में हवा निकलने की घटना तब हो सकती है जब इंजेक्टर पोर्ट मेन एक्सपैंडर से अलग हो जाता है और उसमें से सलाइन लीक होने लगता है।
  • बलून के ऊपर स्किन का मृत होना : अगर बेहद पतली या कमजोर स्किन के नीचे एक्सपैंडर डाला जाता है तो एक्सपैंडिंग टीशू या उत्तक मृत हो जाता है। इससे बचने के लिए सर्जन आमतौर पर टीशू एक्सपैंशन, दर्द और स्किन की ब्लांचिंग को एक्सपैंशन के अंतिम पॉइंट के तौर पर रखते हैं। 
  • सेलुलाइटिस या इंफेक्शन : यह पोर्ट से हो सकता है या फिर स्किन में फोड़े या फॉलिकुलाइटिस की वजह से हो सकता है। इंफेक्शन की वजह से स्किन हार्ड हो जाती है। इस वजह से स्किन का विस्तार होना मुश्किल हो जाता है। बलून का एक्सपोजर तब होता है जब एक्सपैंडर के ऊपर की स्किन मजबूत नहीं होती और ऐसे में अगर चीरा या टांका फट जाता है या फिर अगर किसी कारण से इम्प्लांट के ऊपर की स्किन कट जाती है। 
  • नसों की दुष्क्रिया : ऐसा तब होता है जब एक्सपैंडर को शरीर के किसी बहुत बड़ी नस के पास रखा जाता है और तब वह मोटर इशूज, सुन्नता, मस्तिष्क या संवेदिका संबंधित समस्याएं जो उस नस से जुड़ी होती हैं, वे देखने को मिलती हैं। हालांकि अगर समय पर उसकी पहचान कर ली जाए तो समस्या को जल्दी सुलझाया जा सकता है।
  • हड्डी का अवशोषण : यह आमतौर पर बुजुर्गों में या बच्चों में तब होता है जब एक्सपैंडर बलून को स्कैल्प में रखा जाता है। बलून के नीचे मौजूद हड्डी अवशोषित होने लगती है और बलून के आसपास के हिस्से में नई हड्डी का निर्माण होने लगता है। हालांकि ये सभी चीजें अस्थायी हैं और बलून हटाए जाने के 3 से 6 महीने के अंदर पूरी तरह से ठीक हो जाती हैं।

फ्लैप सर्जरी

फ्लैप सर्जरी में स्किन के किसी एक हिस्से से त्वचा की एक पट्टी को काटा जाता है और उसे शरीर के किसी दूसरे हिस्से में रीप्लांट किया जाता है जिसमें मांसपेशियों, फैट या स्किन की कमी हो जाती है। कटी हुई स्किन में अपनी खून की सप्लाई होती है और यही चीज इसे स्किन ग्राफ्ट से अलग करती है जिसमें अपनी कोई रक्त धमनी नहीं होती। इसलिए स्किन ग्राफ्ट जिसे जीवित रहने के लिए स्किन के नीचे मौजूद रक्त धमनियों के साथ संपर्क बनाने की जरूरत होती है वहीं, फ्लैप खुद से जीवित रह सकता है क्योंकि उसके पास अपनी खून की सप्लाई होती है।

फ्लैप सर्जरी अलग-अलग प्रकार की होती है और यह इस बात पर निर्भर करता है कि फ्लैप को कहां से लिया गया है और उसमें क्या-क्या चीजें शामिल हैं। फ्लैप निम्नलिखित प्रकार के होते हैं:
लोकल फ्लैप : इस तरह के फ्लैप में क्षतिग्रस्त हिस्से के पास के टीशू को लेकर प्रभावित हिस्से को कवर करने में इस्तेमाल किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान फ्लैप रक्त धमनियों की वजह से अपने बेस से जुड़ा रहता है। चेहरे पर हुए किसी जख्म या क्षति को ठीक करने के लिए आमतौर पर लोकल फ्लैप का इस्तेमाल होता है। लोकल फ्लैप निम्नलिखित प्रकार का होता है:

  • रोटेशनल फ्लैप : इस फ्लैप को किसी निश्चित पॉइंट पर घुमाया जाता है ताकि उसे क्षतिग्रस्त हिस्से के बगल में लगाया जा सके।
  • अडवांसमेंट फ्लैप : इस फ्लैप का इस्तेमाल डोनर साइट से थोड़े आगे के हिस्से को कवर करने के लिए किया जाता है।
  • ट्रांसपोजिशन फ्लैप : यह फ्लैप डोनर साइट से तिरछा होकर आगे बढ़ता है।
  • इंटरपोलेशन फ्लैप : यह फ्लैप केंद्रीय बिंदू से आगे बढ़ता है ताकि वह आसपास के साइट पर प्लेट हो सके जो डोनर साइट से पूरी तरह से जुड़ा हुआ नहीं होता।

रीजनल फ्लैप : फ्लैप को ऐसे हिस्से से प्राप्त किया जाता है जो क्षतिग्रस्त हिस्से से बिलुकल नजदीक होता है। उदाहरण के लिए- नाक की समस्या के लिए माथे से लिया गया फ्लैप।

डिस्टेंट फ्लैप : इसमें क्षतिग्रस्त हिस्से से बहुत दूर मौजूद हिस्से से फ्लैप को प्राप्त किया जाता है। डिस्टेंट फ्लैप 2 तरह के होते हैं-

माइक्रोवस्कुलर फ्री फ्लैप : यह फ्लैप क्षतिग्रस्त हिस्से के बहुत दूर के हिस्से से काटकर प्राप्त किया जाता है और फिर माइक्रोसर्जरी के जरिए इसकी रक्त धमनियों को दोबारा से अटैच किया जाता है।

पिडकल्ड (डंडी) फ्लैप : फ्लैप अपनी रक्त धमनियों से जुड़ा ही रहता है और उसे सिर्फ घुमा दिया जाता है ताकि वह क्षतिग्रस्त हिस्से को ढक ले। उदाहरण के लिए- स्तन के पुनर्निर्माण के लिए पेट या पीठ से फ्लैप लेना।

मसल या म्यूकोक्युटेनियस फ्लैप : इन फ्लैप्स में मांसपेशियां और स्किन दोनों होते हैं। स्तन की वृद्धि (ब्रेस्ट ऑगमेंटेशन) में इस्तेमाल होने वाला फ्लैप सबसे कॉमन मसल फ्लैप है।

हड्डी और मुलायम टीशू का फ्लैप : जब हड्डी के साथ ही किसी मुलायम टीशू को भी किसी दूसरी जगह पर रीप्लांट करने की जरूरत होती है तब इस फ्लैप का इस्तेमाल किया जाता है।

फ्लैप सर्जरी से जुड़े जोखिम और जटिलताएं
बाकी की प्रक्रियाओं की ही तरह फ्लैप सर्जरी की भी अपनी जोखिम और जटिलताएं हैं। फ्री फ्लैप सर्जरी का सबसे कॉमन जोखिम फ्लैप की हानि है। जब तक फ्लैप में पर्याप्त खून की आपूर्ति होती रहेगी वह जीवित रहेगा हालांकि आइस्केमिया (खून और ऑक्सीजन की सप्लाई की कमी) के संकेत मिलने पर फ्लैप क्षतिग्रस्त हो जाता है। बाकी के जोखिम में इंफेक्शन का खतरा और घाव का बहुत धीरे-धीरे भरना शामिल है।

लेजर सर्जरी

लेजर प्लास्टिक सर्जरी एक कॉस्मेटिक प्रक्रिया है जिसका इस्तेमाल आमतौर पर झुर्रियां, अनियमित और पिंगमेंटेड स्किन, किसी तरह के निशान, सन स्पॉट, मुंहासे और स्किन में किसी तरह की रक्त-कोष्ठक समस्या आदि के इलाज के लिए किया जाता है। स्किन पर बने टैटू को हटाने के लिए भी लेजर ट्रीटमेंट की मदद ली जाती है। इसमें अलग-अलग तरंगों (वेबलेंथ) के आधार पर अलग-अलग लेजर्स का इस्तेमाल किया जाता है। सेमिनार ऑफ प्लास्टिक सर्जरी में प्रकाशित एक आर्टिकल के मुताबिक, डर्मेटोलॉजिकल लेजर्स 5 तरह के होते हैं:

(और पढ़ें : लेजर हेयर रिमूवल क्या है)

  • ऐब्लेटिव : वैसे लेजर जो स्किन के ऊपरी लेयर को हटा देते हैं ताकि अंदरूनी लेयर में कोलाजन का निर्माण हो सके ताकि वह जल्दी से भर जाए और उसे नया जीवन प्राप्त हो। कोलाजान एक प्रोटीन है जो स्किन की संरचनात्मक सफाई के लिए जिम्मेदार होता है। इस तरह की लेजर सर्जरी झुर्रियों को हटाने के लिए उचित मानी जाती है। कार्बन डाइऑक्साइड लेजर, ऐब्लेटिव लेजर का ही एक प्रकार है।
  • नॉन-ऐब्लेटिव : ये लेजर्स स्किन की उपरी सतह को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। इसकी बजाए वे गर्मी पैदा करते हैं ताकि स्किन कोलाजन का निर्माण कर सके और टाइट होना शुरू हो जाए। नॉन-ऐब्लेटिव लेजर का इस्तेमाल झुर्रियों को हटाने के साथ ही छोटे-मोटे चोट के निशान या धब्बों को हटाने और ब्राउन स्पॉट्स को हटाने में भी किया जाता है।
  • फ्रैक्शेनेटेड लेजर : इस तरह की लेजर सर्जरी, लेजर एनर्जी को माइक्रोबीम में तोड़ देती है ताकि उसे स्किन की सतह पर एक समान रूप से फैलाया जा सके। इस तरह के लेजर ऐब्लेटिव भी हो सकते हैं और नॉन-ऐब्लेटिव भी।
  • अनफ्रैक्शनल लेजर : इस तरह के लेजर पूरी लेजर एनर्जी को एक ही जगह पर इस्तेमाल कर लेते हैं और उसे तोड़ते नहीं हैं।
  • रेडियोफ्रीक्वेंसी सिस्टम : ये असल में लेजर नहीं होते लेकिन वे माइक्रोवेव की तरह हीटिंग सिस्टम होते हैं। रेडियोफ्रिक्वेंसी सिस्टम नॉन-ऐब्लेटिव होते हैं जिनमें बाकी लेजर की तुलना में गहराई तक भेदने की क्षमता होती है और वे तुलनात्मक रूप से कम तापमान का भी इस्तेमाल करते हैं। ये सिस्टम लेजर थेरेपी की तरह ही कार्य करता है जिसमें नए कोलाजन के निर्माण को उत्तेजित किया जाता है और स्किन को टाइट बनाया जाता है।

लेजर सर्जरी के खतरे

  • दाद या खाज का पुनर्उत्प्रेरण (दोबारा सक्रिय होना)
  • स्किन का बदरंग होना जैसे- स्किन का गहरे रंग का हल्के रंग का होना
  • कुछ मरीजों में निशान या धब्बे रह सकते हैं जिन्होंने पहले भी उस क्षेत्र पर रेडियोथेरेपी करवाई हो
  • उस हिस्से में खुजली या लालिमा हो जाना
  • किसी तरह का इंफेक्शन

एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि नॉन-ऐब्लेटिव सर्जरी की तुलना में ऐब्लेटिव लेजर सर्जरी में ज्यादा साइड इफेक्ट्स होते हैं खासकर उन लोगों में जिनकी स्किन का रंग गहरा होता है। वहीं दूसरी तरफ नॉन-ऐब्लेटिव सर्जरी बहुत धीरे-धीरे अपने नतीजे दिखाती है।

इंडोस्कोपिक सर्जरी

इंडोस्कोपिक सर्जरी में छोटे से ट्यूब जैसे- उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें कैमरा (इंडोस्कोप) अटैच होता है और इसे छोटा सा चीरा लगाकर स्किन के अंदर डाला जाता है। सर्जन कैमरे का इस्तेमाल अंदरूनी उत्तकों को देखने के लिए करता है ताकि प्रक्रिया को सही ढंग से किया जा सके। वैसे तो लंबे समय से इंडोस्कोपी का इस्तेमाल अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है लेकिन प्लास्टिक सर्जरी के फील्ड में इसका इस्तेमाल बिलकुल नया है।

इंडोस्कोपिक सर्जरी को अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया जाता है जिसमें चेहरे और माथे की गहराई से पुनर्सज्जा किया जाना शामिल है। ब्रेस्ट ऑगमेंटेशन यानी स्तन की वृद्धि और ऐब्डोमिनोप्लास्टी यानी पेट कम करने की प्रक्रिया में भी इसका इस्तेमाल होता है। इसके अतिरिक्त, इंडोस्कोप की मदद से मसल फ्लैप को आसानी से उठाकर दूसरी जगह पुनर्स्थापित किया जा सकता है और इसमें स्किन में बड़ा चीरा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।

इंडोस्कोपिक सर्जरी का एक बड़ा फायदा ये है कि ये बाद में कोई बहुत बड़ा निशान या धब्बा नहीं छोड़ता है। ज्यादातर निशान छिप जाते हैं। सर्जरी के क्षेत्र से जुड़े दर्द और सूजन को मैनेज करना भी आसान होता है।

इंडोस्कोपिक सर्जरी से जुड़े जोखिम

बाकी के प्लास्टिक सर्जरी की ही तरह इंडोस्कोपिक सर्जरी के भी अपने कई जोखिम है जिसमें इंफेक्शन, हीमेटोमा, सेरोमा, नसों का रक्त धमनियों का क्षतिग्रस्त होना या आसपास के स्किन में किसी तरह की चोट या आघात लगना शामिल है।

प्लास्टिक सर्जरी करवाने का फैसला करने से पहले इन बातों के बारे में जरूर जान लें:

  • अपने डॉक्टर से बात करें और आप जिस प्रक्रिया से गुजरने वाले हैं उसके बारे में अच्छी तरह से समझ लें। इसमें प्रक्रिया से जुड़े सभी साइड इफेक्ट्स भी शामिल होंगे और अगर आपको प्रक्रिया के बाद किसी खास चीज का ध्यान रखना हो तो उसके बारे में भी पूरी जानकारी हासिल कर लें।
  • अगर आप किसी तरह की दवाई या सप्लिमेंट का सेवन कर रहे हों तो उसके बारे में भी डॉक्टर को बताएं। इसमें डॉक्टर की बताई हुई प्रिस्क्रिप्शन वाली दवाइयां, बिना प्रिसक्रिप्शन वाली दवाइयां और जड़ी बूटियां सभी चीजें शामिल होंगी।
  • अगर आपको सेहत से जुड़ी कोई समस्या है तो उसके बारे में भी डॉक्टर को बताएं। अगर आप धूम्रपान करते हैं, अल्कोहल का सेवन करते हैं या पहले कभी कोई इम्प्लांट हुआ हो।
  • सर्जरी के दिन किसी भी तरह की जूलरी, नेल पेंट या कॉन्टैक्ट लेंस न पहनें।
  • कुछ प्रक्रियाएं तो ऐसी होती हैं जिसके तुरंत बाद घर जा सकते हैं लिहाजा आपके साथ कोई होना चाहिए जो आपको सुरक्षित तरीके से ड्राइव करके घर पहुंचा दे। आपके लिए खुद से ड्राइव करना सेफ नहीं होगा क्योंकि आप ऐनेस्थीसिया के असर में हो सकते हैं।

प्लास्टिक सर्जरी के बाद किस तरह का पोस्टऑपरेटिव केयर करना है यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपकी सर्जरी किस तरह की है और शरीर के किस हिस्से पर हुई है।

Dr. Shabbir Ahemad Ansari

Dr. Shabbir Ahemad Ansari

प्लास्टिक, कॉस्मेटिक और पुनर्निर्माण सर्जन
20 वर्षों का अनुभव

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References

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