हाइपोवेंटिलेशन - Hypoventilation in Hindi

Dr. Ayush PandeyMBBS,PG Diploma

August 02, 2022

August 02, 2022

हाइपोवेंटिलेशन
हाइपोवेंटिलेशन

हाइपोवेंटिलेशन को रेस्पिरेटरी डिप्रेशन या हाइपोवेंटिलेटरी सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता है. यह एक प्रकार का ब्रीदिंग डिसऑर्डर है. इसमें सांस लेने की गति धीमी हो जाती है. जो मेडिकल कंडीशंस ब्रेन और सेंट्रल नर्व्स सिस्टम को प्रभावित करती है, हाइपोवेंटिलेशन का कारण बन सकती हैं. स्ट्रोक या स्लीप एपनिया जैसी मेडिकल कंडीशन भी हाइपोवेंटिलेशन का कारण बन सकती हैं. थकान, सांस लेने में कठिनाई और डिप्रेशन इसके लक्षण हैं. हाइपोवेंटिलेशन के लिए ब्रीदिंग को सपोर्ट करने के लिए ऑक्सीजन थेरेपी दी जा सकती है या सोते समय सीपीएपी या बाइपीएपी मशीन का इस्तेमाल किया जा सकता है.

आज इस लेख में आप हाइपोवेंटिलेशन के लक्षण, कारण व इलाज के बारे में जानेंगे -

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हाइपोवेंटिलेशन क्या है? - What is Hypoventilation in Hindi

सामान्य रूप से सांस लेने पर ऑक्सीजन फेफड़ों में जाती है और वहां से खून के जरिए पूरे शरीर में फैलती है और सभी टिश्यू तक पहुंची है. इसके बाद खून कार्बन डाइऑक्साइड को वेस्ट प्रोडक्ट के रूप में फेफड़ों को देता है और फेफड़े इसे शरीर से बाहर निकाल देते हैं.

वहीं, हाइपोवेंटिलेशन होने पर शरीर कार्बन डाइऑक्साइड को पूरी तरह से शरीर से बाहर नहीं निकाल पाता. इसके कारण फेफड़े ऑक्सीजन का सही तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाते. इसकी वजह से शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और कार्बन डाई ऑक्साइड बढ़ जाती है.

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हाइपोवेंटिलेशन के लक्षण - Hypoventilation Symptoms in Hindi

हाइपोवेंटिलेशन के हल्के और गंभीर दो तरह के लक्षण देखे जा सकते हैं. थकान, दिन में नींद आना और डिप्रेशन इसके हल्के लक्षण हैं. वहीं, कन्फ्यूज होना, जी मिचलाना और सिरदर्द होना इसके गंभीर लक्षण हैं. आइए, इसके लक्षणों के बारे में विस्तार से जानते हैं -

हल्के लक्षण

हाइपोवेंटिलेशन के हल्के लक्षणों में थकान होना, दिन में नींद आना, सांस लेने में कठिनाई होना, स्लो या सांस का उखड़ना, डिप्रेशन होनासुस्ती आना और चक्कर आना शामिल है.

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कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ने पर होने वाले गंभीर लक्षण

शरीर में जैसे-जैसे कार्बन डाइऑक्साइड का लेवल बढ़ता है, तो कई गंभीर लक्षण दिखने लगते हैं. ये लक्षण हैं - होंठ या हाथ-पैरों की उंगलियों का नीला पड़ना, अटैक पड़ना, कन्फ्यूजन में रहना, सिरदर्द होनादिखने में समस्या होना, एक्टिविटी या इंएक्टिविटी के दौरान सांस लेने में तकलीफ होना, दिनभर नींद आना या नींद पूरी होने के बाद भी ज्यादा थकान होना, रात को सोने में दिक्कत होना, ब्रीदिंग के दौरान लॉन्ग पॉज होना जिसे स्लीप एपनिया कहते हैं, जी मिचलाना इत्यादि.

समय पर ट्रीटमेंट न मिलने पर दिखने वाले गंभीर लक्षण

कई बार समय पर ट्रीटमेंट न करवाने के कारण भी हाइपोवेंटिलेशन के गंभीर लक्षण दिखने लगते हैं. इसमें सांस का रुक जाना या अटैक पड़ना, उल्टियां होना, ब्लड प्रेशर कम या ज्यादा होना, हार्ट अटैक होनाब्रेन डैमेज होनाकोमा या डेथ, हार्ट रेट कम या ज्यादा होना, कंपकंपी होना और सांस लेते समय आवाजें आना इत्यादि.

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हाइपोवेंटिलेशन के कारण - Hypoventilation Causes in Hindi

ऐसी कई स्वास्थ्य समस्याए हैं, जो ब्रीदिंग रेट को प्रभावित करती हैं. जब भी ऐसा होता है, तो फेफड़े पूरी तरह से वेंटीलेट नहीं हो पाते. ये स्थिति हाइपोवेंटिलेशन का कारण बनती हैं. इन हेल्थ कंडीशंस में शामिल हैं न्यूरोमस्कुलर डिसऑर्डर, मोटापा, ब्रेन इंजरी, स्लीप एपनिया और कुछ दवाएं इत्यादि. आइए, हाइपोवेंटिलेशन के कारणों के बारे में विस्तार से जानते हैं -

न्यूरोमस्कुलर डिसऑर्डर

जिन लोगों को न्यूरोमस्कुलर डिसऑर्डर होता है, वो रेस्पिरेटरी मसल्स कमजोर और खराब होने के कारण रैपिड और शैलो ब्रीदिंग पैटर्न डेवलप कर सकते हैं. हालांकि इस दौरान न्यूरोलॉजिकल ब्रीदिंग इम्पल्स रहती हैं. न्यूरोमस्कुलर डिसऑर्डर के दौरान नींद में वेंटिलेशन कम हो जाता है, खासकर आरईएम स्लीप (rapid eye movement sleep) के दौरान, इससे हाइपोवेंटिलेशन और बिगड़ जाता है.

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चेस्ट वॉल डिफॉर्मिटीज

काइफोस्कोलियोसिस (Kyphoscoliosis) और फाइब्रोथोरैक्स (Fibrothorax) जैसी चेस्‍ट वॉल डिफॉर्मिटीज से जूझ रहे लोगों को नॉर्मल रेस्पिरेशन रेट और लंग्स फंक्शन में समस्या आने लगती है, क्योंकि इस दौरान फिजिकल एक्टिविटीज कम होती हैं. ये स्थितियां हाइपोवेंटिलेशन का कारण बन सकती हैं.

मोटापा

मोटापे की समस्या से जूझ रहे लोगों को हाइपोवेंटिलेशन की समस्या हो सकती है, जिसे मेडिकल टर्म में ओबेसिटी-हाइपोवेंटिलेशन सिंड्रोम कहा जाता है. गर्दन, पेट और चेस्ट वॉल के आसपास वेट अधिक होने से बॉडी को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है. ये ब्रेन के ब्रीदिंग इम्पल्स को प्रभावित करता है. इस कारण ब्लड में कार्बन डाइऑक्साइड अधिक हो जाती है और ऑक्सीजन की मात्रा कम रहती है.

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ब्रेन इंजरी

ब्रेन इंजरी होने से ब्रेन के काम करने की क्षमताएं जैसे ब्रीदिंग को कंट्रोल करना, प्रभावित हो सकती हैं. ब्रेन इंजरी के बाद इंपेयर्ड ब्रेनस्टेम रिफ्लेक्सिस और कॉन्शसनेस हाइपोवेंटिलेशन का कारण बन सकता है.

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स्लीप एपनिया

जो लोग ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया से पीड़ि‍त होते हैं, उन्हें सांस लेने में दिक्क्त हो सकती है, क्योंकि उनके एयरवेज ब्लॉक हो जाते हैं, जो हाइपोवेंटिलेशन का कारण बन सकते हैं. सेंट्रल स्लीप एपनिया से पीड़ि‍त लोगों का एयरवेज ब्लॉक नहीं होता, लेकिन ब्रीदिंग के दौरान लॉन्ग पॉज आने लगते हैं या उनके फेफड़ों में अकड़न आ सकती है, जो हाइपोवेंटिलेशन का कारण बन सकती है.

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क्रोनिक लंग डिजीज

क्रोनिक लंग डिजीज जैसे क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज और सिस्टिक फाइब्रोसिस एयरवेज के ब्लॉक होने का कारण बनता है, जोकि गंभीर ऑब्सट्रक्शन और हाइपोवेंटिलेशन का कारण बन सकता है.

न्यूरोलॉजिकल डिजीज

न्यूरोलॉजिकल डिजीज जैसे ट्रॉमा, हेड इंजरी, टिश्यूज की एब्नॉर्मल ग्रोथ और सेरेब्रल वैस्कुलर एक्सिडेंट हाइपोवेंटिलेशन का कारण बन सकता है. इसे सेंट्रल ऐल्वीअलर हाइपोवेंटिलेशन (central alveolar hypoventilation) कहा जाता है, जो सेंट्रल नर्व्स सिस्टम के ब्रीदिंग फंक्शन को प्रभावित करता है.

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अमोनिया का अधिक स्तर

जेनेटिक प्रॉब्लम्स या लिवर डिजीज जैसे लिवर सिरोसिस लिवर के फंक्शन को डिस्टर्ब करते हैं. इससे ब्लड में अमोनिया लेवल बढ़ सकता है. इसे हाइपरमोनमिया कहा जाता है. यह रेस्पिरेशन को इफेक्ट करता है और रेस्पिरेटरी डिप्रेशन का कारण बनता है.

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दवाएं

कुछ मेडिसिन या पदार्थों की अधिक डोज लेने से भी रेस्पिरेटरी डिप्रेशन हो सकता है या इसके होने का खतरा रहता है. वहीं, कुछ दवाओं या पदार्थों के साइड इफेक्ट के कारण भी रेस्पिरेटरी डिप्रेशन होता है. कुछ ड्रग्स या पदार्थ ब्रेन फंक्शन को डिस्टर्ब करके और सेंट्रल नर्व्स सिस्टम को डिप्रेस कर देते हैं, जिससे रेस्पिरेटरी ड्राइव स्लो हो जाती है. इन दवाओं और पदार्थों में शामिल हैं -

  • सीडेटिव (Sedatives)
  • नारकोटिक्स (Narcotics)
  • ओपियोड्स (Opioids)
  • शराब (Alcohol)
  • बार्बीचुरेट्स (Barbiturates)
  • बेंजोडायजेपाइन (Benzodiazepines)

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हाइपोवेंटिलेशन का इलाज - Hypoventilation Treatment in Hindi

हाइपोवेंटिलेशन का इलाज कारणों पर निर्भर करता है. यदि नशीले पदार्थों के कारण हाइपोवेंटिलेशन हुआ है, तो नालोक्सोन (नारकन) और मेथाडोन (डोलोफिन) जैसी दवाएं दी जा सकती हैं. इसके अलावा, हाइपोवेंटिलेशन के इलाज के लिए ऑक्सीजन थेरेपी, सर्जरी, वजन कम करना या एयरवेज खुले रखने के लिए सीपीएपी या बाइपीएपी मशीनों का इस्तेमाल किया जा सकता है. आइए, हाइपोवेंटिलेशन के इलाज के बारे में विस्तार से जानते हैं -

ऑक्सीजन थेरेपी

हाइपोवेंटिलेशन डिसऑर्डर को ठीक करने या वेटिलेंशन को इंप्रूव करने के लिए ऑक्सीजन थेरेपी दी जा सकती है. इसे काफी प्रभावी माना जाता है. ये थेरेपी ब्रीदिंग में हेल्प करने के लिए ऑक्सीजन गैस पहुंचाती है.

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सीपीएपी या बाइपीएपी मशीन

सोते समय एयरवेज को खुला रखने के लिए कंटीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर (CPAP) मशीन का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके अलावा, बाइलेवल पॉजिटिव एयरवे प्रेशर (BiPAP) मशीन का इस्तेमाल भी किया जा सकता है.

दवाएं देना या रोकना

यदि ओवरडोज के कारण हाइपोवेंटिलेशन हुआ है, तो डिटॉक्सीफिकेशन जरूरी होता है. इसके लिए डॉक्टर्स ऐसी दवाओं का इस्तेमाल करते हैं, जो एंटी-ओपिओइड होती हैं. जैसे नालोक्सोन (नारकन), मेथाडोन (डोलोफिन) या फिर ब्यूप्रेनोर्फिन और नालोक्सोन (सबॉक्सोन) का कॉम्बिनेशन इत्यादि. इसके अलावा, अगर किसी दवा के रिएक्शन के कारण हाइपोवेंटिलेशन ट्रिगर हुआ है, तो दवा को रोकना सबसे बेहतर विकल्प माना जाता है. इसके साथ ही एयरवेज को खोलने या लंग डिजीज को ठीक करने के लिए इंहेल्ड दवाएं दी जा सकती हैं.

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सर्जरी

चेस्ट डिफॉर्मिटी को ठीक करने के लिए सर्जरी की जा सकती है.

वजन कम करना

वजन कम करने के लिए सर्जरी और दवाओं का सहारा लिया जा सकता है.

अन्य इलाज

हाइपोवेंटिलेशन के इलाज में मैकेनिकल वेंटिलेशन का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. कुछ स्थितियों में डॉक्टर इन्ट्रावेनस या ओरल फ्लूड थेरेपी भी दे सकते हैं.

सारांश – Summary

हाइपोवेंटिलेशन को हाइपोवेंटिलेटरी सिंड्रोम या रेस्पिरेटरी डिप्रेशन भी कहते हैं. इस ब्रीदिंग डिसऑर्डर के दौरान ब्रीदिंग प्रक्रिया धीमी हो जाती है. कई बीमारियां जैसे लंग डिजीज, स्ट्रोक और स्लीप एपनिया हाइपोवेंटिलेशन का कारण बन सकती हैं. इसके लक्षणों में थकान, डिप्रेशन या दिनभर नींद आ सकती है. हाइपोवेंटिलेशन के इलाज के लिए सर्जरी, दवाएं, ऑक्सीजन थेरेपी और सीपीएपी या बाइपीएपी मशीनों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

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