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प्रेसबायोपिया - Presbyopia in Hindi

Dr. Ajay Mohan (AIIMS)MBBS

November 09, 2020

November 09, 2020

प्रेसबायोपिया
प्रेसबायोपिया

प्रेसबायोपिया, उम्र से संबंधित आंखों की एक स्थिति है जिसमें आंखों का लेंस धीरे-धीरे अपना लचीलापन और नजदीक की चीजों पर फोकस करने की अपनी क्षमता को खोने लगती है। यह स्थिति आमतौर पर 40 साल की उम्र के आसपास नजर आती है, हालांकि कुछ लोगों में यह परेशानी 30 साल की उम्र में भी शुरू हो सकती है। 

जिन लोगों को हृदय रोग और डायबिटीज की बीमारी होती है उन लोगों में कम उम्र में ही प्रेसबायोपिया होने का खतरा अधिक होता है। प्रेसबायोपिया को एक साधारण से नेत्र परीक्षण के जरिए डायग्नोज किया जा सकता है। हालांकि इस स्थिति का कोई निश्चित इलाज नहीं है। डॉक्टर आमतौर पर मरीज को प्रिस्क्रिप्शन चश्मे इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं ताकि मरीज को सही तरीके से देखने में मदद मिल सके और उनकी इस प्रवर्तक त्रुटि (refractive error) को सही किया जा सके। इसके अलावा प्रेसबायोपिया को सर्जरी के जरिए भी ठीक किया जा सकता है जिसमें फोटोरिफ्रैक्टिव केराटेक्टमी और एलएएसआईके (लैसिक) शामिल है।

(और पढ़ें - चश्मा कैसे हटाएं, घरेलू उपाय और तरीके)

प्रेसबायोपिया क्या है? - What is Presbyopia in Hindi

जब कोई व्यक्ति नजदीक की चीजों को देखने की अपनी क्षमता को धीरे-धीरे खोने लगता है तो इसका संबंध प्रेसबायोपिया से होता है। यह स्थिति आमतौर पर 40 की उम्र में शुरू होती है और पढ़ने में दिक्कत के तौर पर इसके पहले संकेत रिपोर्ट किए जाते हैं। हालांकि, 35 या 36 साल की उम्र के आसपास प्रीमैच्योर प्रेसबायोपिया शुरू हो सकता है। प्रेसबायोपिया के मरीज को अगर साथ-साथ निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) की समस्या नहीं है तो उन्हें दूर की चीजों को देखने में कोई मुश्किल नहीं होगी।

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प्रेसबायोपिया के लक्षण - Presbyopia Symptoms in Hindi

प्रेसबायोपिया के सबसे कॉमन लक्षणों में ये चीजें शामिल हैं:

  • पढ़ने में मु्श्किल आना खासकर छोटे प्रिंट में लिखी हुई चीजों को पढ़ना। किसी चीज को पढ़ने के लिए आपको उसे अपनी आंखों से दूर रखने की जरूरत पड़ती है।
  • अपना मोबाइल फोन चेक करने में दिक्कत महसूस होना, तस्वीरों में लोगों को देखने और पहचानने में मुश्किल आना।
  • पढ़ने के लिए ज्यादा चमकदार रोशनी की जरूरत पड़ना।
  • कोई ऐसा काम जिसमें महीन या बारीक काम करना हो उसे करने में मुश्किल आना।
  • दृष्टि के धीरे-धीरे धुंधला पड़ने की वजह से लंबे समय तक पढ़ने में दिक्कत महसूस होना।
  • कुछ देर पढ़ने के बाद, आंखों को तिरछा करके देखना या भेंगापन आना, आंखों की थकान और भारीपन और सिरदर्द होना।

जब व्यक्ति थका हुआ होता है तो ये लक्षण और भी ज्यादा स्पष्ट तौर पर नजर आने लगते हैं।

अगर किसी व्यक्ति को प्रेसबायोपिया की समस्या है तो उन्होंने ध्यान दिया होगा कि सुबह उठते के साथ सबसे पहले उन्हें धुंधली दृष्टि दिखायी देती है जो कुछ मिनटों के अंदर ठीक हो जाती है। लेकिन दिन के बाद के समय में फिर से दृष्टि कई बार धुंधली होने लगती है।

प्रेसबायोपिया बनाम हाइपरओपिया या हाइपरमेट्रोपिया
प्रेसबायोपिया और हाइपरओपिया- इन दोनों की विशेषता करीब-करीब एक जैसी होती है और इन दोनों ही समस्याओं में नजदीक की चीजों को साफ-साफ देखने में मुश्किल होती है। हालांकि, ये दोनों ही स्थितियां एक दूसरे से कुछ बातों में अलग भी हैं :

  • प्रेसबायोपिया की समस्या तब होती है जब उम्र बढ़ने की वजह से आंखों के लेंस का लचीलापन कम होने लगता है तो वहीं हाइपरओपिया की समस्या तब होती है जब किसी वस्तु की तस्वीर कॉर्निया के पीछे बनने लगती है।
  • जिन लोगों को प्रेसबायोपिया होता है उन्हें नजदीक की चीजें देखने में दिक्कत होती है लेकिन हाइपरओपिया वालों को दूर की चीजें देखने में भी मुश्किल होती है। हाइपरओपिक व्यक्ति को 20 फीट की दूरी से देखने पर कोई भी वस्तु धुंधली नजर आती है।
  • प्रेसबायोपिया के मरीज, सामान्य दूरी से ज्यादा दूरी पर चीजों को रखकर पढ़ते है जबकी हाइपरओपिया वाले लोग सामान्य रीडिंग डिस्टेंस पर रखकर ही पढ़ने का काम करते हैं।
  • हाइपरओपिया वाले लोग सामान्य रोशनी में भी पढ़ सकते हैं लेकिन प्रेसबायोपिया के मरीज को पढ़ने के लिए रूम की सामान्य रोशनी से ज्यादा चमकीली रोशनी की जरूरत होती है।

(और पढ़ें - जब बात हो आंखों की देखभाल की तो इन बातों का रखें ध्यान)

प्रेसबायोपिया के कारण - Presbyopia Causes in Hindi

सामान्य तौर पर हमारी आंखों का लेंस नजदीक की चीजों और दूर की चीजों पर फोकस करके उन्हें देखने के लिए अपना आकार बदलता है। जो चीजें दूर हैं उन्हें देखने में आपकी मदद करने के लिए लेंस पतला और फ्लैट हो जाता है तो वहीं नजदीक की चीजों को देखने के लिए लेंस मोटा और घुमावदार हो जाता है। आंखों की मांसपेशियां लेंस को अपना आकार बदलने में मदद करती हैं। 

हालांकि, उम्र बढ़ने के साथ आंखों के लेंस का यह लचीलापन खोने लगता है और लेंस सख्त होने लगता है और आंखों की मांसपेशियां भी कमजोर होने लगती हैं। नतीजतन, आंखों का लेंस अपना आकार उतने असरदार तरीके से नहीं बदल पाता और व्यक्ति को नजदीक की चीजें देखने में मुश्किल होने लगती है। हालांकि अगर व्यक्ति को निकट दृष्टि दोष की समस्या न हो तो उसे दूर की चीजें स्पष्ट दिख सकती हैं। 

बढ़ती उम्र, प्रेसबायोपिया के एक अहम जोखिम कारक है। 40 की उम्र का होते-होते लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी लेवल के प्रेसबायोपिया का सामना अवश्य करते हैं। कई और कारण जो प्रेसबायोपिया के आपके जोखिम को बढ़ा सकते हैं, वे हैं:

  • डायबिटीज
  • हृदय रोग
  • मायोपिया या हाइपरओपिया का सही न होना
  • पोषण की कमी
  • कम्प्यूटर पर काम करने की वजह से नजदीक की नजर का ज्यादा इस्तेमाल करना
  • आंखों की बीमारी या आंखों में चोट लगना
  • अल्कोहल का ज्यादा सेवन करना
  • धूम्रपान करना
  • एंटीएंग्जाइटी, एंटीसाइकोटिक और एंटीडिप्रेसेंट जैसी दवाइयों का साइड इफेक्ट होना
  • महिलाओं में पुरुषों की तुलना में जल्दी प्रेसबायोपिया की समस्या विकसित हो जाती है, एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि इसका कारण मेनोपॉज भी हो सकता है
  • शरीर में अगर लंबे समय तक अमीनो एसिड की कमी बनी रहे
  • एनीमिया
  • वातावरण का औसत तापमान अगर अधिक हो
  • विषैले तत्व जैसे- हेयर डाई के संपर्क में आना
  • सूरज की रोशनी और पैराबैंगनी किरणों के संपर्क में अधिक रहना

प्रेसबायोपिया से बचाव के उपाय - Prevention of Presbyopia in Hindi

प्रेसबायोपिया को होने से रोकना या बचने का कोई निश्चित उपाय नहीं है। हालांकि, अगर आप अपनी आंखों को स्वस्थ बनाए रखें तो प्रेसबायोपिया की इस स्थिति को जल्दी होने से रोका जा सकता है। इसके लिए इन चीजों का ध्यान रखें:

  • नियमित रूप से आंखों की जांच करवाएं ताकि दृष्टि में होने वाले किसी भी बदलाव की तुरंत जानकारी मिल जाए। इससे डॉक्टर को भी आपकी आंखों से जुड़ी बीमारियों की पहचान करने में आसानी होगी।
  • स्वस्थ और संतुलित आहार का सेवन करें। अपनी डेली डाइट में खूब सारी हरी पत्तेदार सब्जियां और ताजे फलों को शामिल करें। इसके अलावा विटामिन ए और एंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर चीजें खाएं ताकि आखों की सेहत बनी रहे।
  • अगर आपको पहले से डायबिटीज या हृदय रोग की समस्या है तो अपनी इस बीमारी को कंट्रोल में रखने की कोशिश करें।
  • नियमित रूप से एक्सरसाइज और वर्कआउट करें।
  • धूम्रपान की आदत छोड़ें और अल्कोहल के सेवन को भी कम से कम करें।
  • शरीर में पानी की कमी न होने दें।
  • जब भी घर से बाहर निकलें तो धूप वाले चश्मे का इस्तेमाल करें, खासकर तब जब आपको ज्यादा देर तक धूप में रहना हो।
  • आंखों पर जोर न पड़े इसके लिए पर्याप्त रोशनी में ही पढ़ाई करें।
  • घर की सफाई में इस्तेमाल होने वाले क्लीनर जिसमें केमिकल हो उन्हें इस्तेमाल करते वक्त और कुछ निश्चित खेल खेलते वक्त सुरक्षात्मक चश्मे जरूर पहनें।
  • अगर दृष्टि धुंधली होने लगे, दोहरी दृष्टि की समस्या हो, देखते वक्त आंखों के आगे चकाचौंध हो जाए, काले धब्बे बनने लगें, आंखों में दर्द या एक आंख में दृष्टि की हानि जैसे लक्षण दिखने लगे तो देर करने की बजाए तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करें। (और पढ़ें - आंखों में दर्द दूर करने के घरेलू उपाय)

प्रेसबायोपिया का निदान - Diagnosis of Presbyopia in Hindi

बहुत से लोग तो प्रेसबायोपिया की समस्या खुद ही नोटिस कर लेते हैं जब उन्हें पढने में मुश्किल महसूस होने लगती है। वैसे आमतौर पर आंखों का परीक्षण करके प्रेसबायोपिया को डायग्नोज किया जाता है। डॉक्टर आपसे कुछ शब्दों या अक्षरों को पढ़ने के लिए कह सकते हैं जो आपसे पर्याप्त दूरी पर रखे हों। इसके बाद डॉक्टर आपको दोषनिवारक (करेक्टिव) लेंस के जरिए देखने और पढ़ने के लिए कहेंगे ताकि आपकी प्रवर्तक त्रुटि (रिफ्रैक्टिव एरर) का पता लगाकर आपको उचित पावर का चश्मा प्रिस्क्राइब किया जा सके।

(और पढ़ें - आंखों में संक्रमण के लक्षण, कारण)

लेकिन टेस्ट से पहले, डॉक्टर आपको आंखों में आई ड्रॉप्स डालने के लिए कहेंगे ताकि आंखों की पुतलियां थोड़ी फैल जाएं और उनका विस्तार हो जाए (डाइलेट)। ऐसा करने से अस्थायी रोशनी संवेदनशीलता उत्पन्न होती है। आंखों के इस टेस्ट के दौरान परिवार के किसी सदस्य या दोस्त को साथ ले जाना न भूलें क्योंकि अगर डॉक्टर टेस्ट के लिए आंखों में ड्रॉप डालकर उन्हें डाइलेट किया जाएगा तो आप खुद से ड्राइव करके घर वापस नहीं जा पाएंगे।

प्रेसबायोपिया का उपचार - Presbyopia Treatment in Hindi

प्रेसबायोपिया का वैसे तो कोई इलाज नहीं है और डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन चश्मा या कॉन्टैक्ट लेंस लगाने का सुझाव दे सकते हैं। कुछ मामलों में सर्जरी और लेंस इम्प्लांट का भी सुझाव दिया जाता है, हालांकि इन सारी चीजों के अपने-अपने कई साइड इफेक्ट्स हैं। इलाज के इन सभी विकल्पों पर एक-एक करके नजर डालते हैं:

  • आंखों का चश्मा : प्रेसबायोपिया के लिए जो चश्मा दिया जाता है उसे दृष्टि संबंधित दूसरी समस्याओं के दौरान पहन भी सकते हैं और नहीं भी। अगर आपकी दृष्टि बाकी मामलों में सही है तो डॉक्टर से पूछें कि क्या आप ओटीसी चश्मों का इस्तेमाल कर सकते हैं। ओटीसी चश्मे की पावर +1.00 डी और +3.00 डी (डाओप्टर) के बीच होती है। अगर डॉक्टर आपको इनका इस्तेमाल करने की छूट देते हैं तो हर पावर के चश्मे के साथ पढ़ने की कोशिश करें यह देखने के लिए आपके लिए कौन सा बेस्ट है। हालांकि अगर आप ओटीसी चश्मे यूज नहीं करते या फिर किसी और दृष्टि समस्या के लिए पहले से चश्मा यूज कर रहे हैं तो डॉक्टर आपको इनमें से कोई एक प्रिस्क्रिप्शन चश्मा इस्तेमाल करने की सलाह दे सकते हैं:
    • पढ़ने वाला चश्मा : अगर आपको कोई और दृष्टि समस्या नहीं है तो डॉक्टर आपको रीडिंग ग्लास यानी पढ़ने वाला चश्मा दे सकते हैं जिसे आप पढ़ते वक्त या नजदीक से करने वाले बारीक काम को करते वक्त इस्तेमाल कर सकते हैं।
    • द्विफोकसी लेंस : द्विफोकसी या बाइफोकल लेंस में एक ही चश्मे में 2 अलग-अलग पावर होती है। ऊपर के हिस्से में दूर की चीजों को देखने का पावर और नीचे के हिस्से में नजदीक की चीजों को देखने के लिए।
    • ट्राईफोकल लेंस : ट्राईफोकल लेंस में 3 जोन होते हैं: एक में दूर की दृष्टि के लिए, दूसरे में तुरंत की दृष्टि के लिए और तीसरे में नजदीक की दृष्टि के लिए। इन तीनों जोन के बीच में स्पष्ट क्षैतिज रेखा होती है।
    • बहुकेंद्रीय या मल्टीफोकल लेंस : ये लेंस बाइफोकल या ट्राईफोकल लेंस जैसे ही होते हैं लेकिन इनमें जोन्स के बीच स्पष्ट सीमांकन नहीं होता है। जिन लोगों को अलग-अलग जोन के बीच स्पष्ट रेखा खींची हुई पसंद नहीं होती वे इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • कॉन्टैक्ट लेंस : अगर आप पहले से किसी दृष्टि समस्या के लिए कॉन्टैक्ट लेंस यूज कर रहे हैं तो आप विशिष्ट लेंस बनवा सकते हैं जो मौजूदा समस्या के साथ ही प्रेसबायोपिया में भी आपकी मदद करे। आप निम्नलिखित कॉन्टैक्ट लेंस में से कोई एक चुन सकते हैं:
    • बाइफोकल कॉन्टैक्ट लेंस : बाइफोकल चश्मों की ही तरह लेंस में भी 2 फोकल पॉइंट होते हैं जो आपको नजदीक और दूर की चीजों को देखने में मदद करते हैं। 
    • मोनोविजन कॉन्टैक्ट लेंस : इस तरह के सेट में एक लेंस दूर की चीजों को देखने में मदद करता है और दूसरा लेंस नजदीक की चीजों को देखने में। इस तरह के लेंस के साथ अडजस्ट होने में थोड़ा समय लग सकता है।
    • मल्टीफोकल कॉन्टैक्ट लेंस : इसमें 2 से ज्यादा फोकल पॉइंट होता है। उदाहरण के लिए- एक नजदीक की दृष्टि के लिए, एक तुरंत की चीजें देखने के लिए और एक दूर की दृष्टि के लिए।
    • मॉडिफाइड मोनोविजन कॉन्टैक्ट लेंस : इसमें लेंस का जो पेयर होता है उसमें एक आपको दूर की चीजें देखने में मदद करता है और दूसरा लेंस मल्टीफोकल या बाइफोकल होता है जो सभी दूरी की चीजों को देखने में मदद करता है।
    • आप चाहें तो डॉक्टर से बात करके कॉन्टैक्ट लेंस के ऊपर से रीडिंग ग्लास का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • अपवर्तक (रिफ्रैक्टिव) सर्जरी : प्रेसबायोपिया की समस्या को ठीक करने के लिए कई तरह की सर्जरी की जाती है:
    • फोटोरिफ्रैक्टिव केराटेक्टमी (पीआरके): ये एक ऐसी सर्जरी है जिसमें कॉर्निया की सबसे बाहरी सतह (एपिथीलियल) को हटा दिया जाता है। इसके बाद समय के साथ कॉर्निया दोबारा बढ़ जाता है और नई शेप ले लेता है।
    • लेजर : लेजर, पीआरके के संशोधित रूप है जिसमें कॉर्नियल एपिथीलियल को काटकर हटाया नहीं जाता बल्कि, सर्जन इसमें एपिथीलियम का एक फ्लैप बनाते हैं और अंदरूनी सतह को दोबारा आकार देते हैं और फिर फ्लैप को वापस उसकी पुरानी जगह पर रख देते हैं। प्रेसबायोपिया को ठीक करने में इस्तेमाल होने वाले लेजर और पीआरके दोनों प्रक्रियाओं में एक आंख की लेंस को दूर की चीजों को देखने के लिए आकार दिया जाता है जबकी दूसरी लेंस को नजदीक की चीजें देखने के लिए शेप किया जाता है- बिलकुल मोनोविजन कॉन्टैक्ट लेंस की तरह। ये प्रक्रियाएं आपकी स्थानिक दृष्टि को प्रभावित करती हैं और आपका मस्तिष्क कई बार इस बदलाव के साथ ठीक से अडजस्ट नहीं हो पाता।
    • लैसिक (एलएएसआईके): लैसिक, लेजर से मिलता जुलता है फर्क सिर्फ इतना है कि लैसिक में अंदरूनी सतह को काटने और रीशेप करने से पहले फ्लैप को कॉर्निया में गहराई तक डाला जाता है। दृष्टि की गुणवत्ता में कमी, कॉन्ट्रैस्ट संवेदनशीलता में कमी खासकर उच्च फ्रीक्वेंसी में और रात के समय तेजोमंडल (हैलो) नजर आना- ये सारे लैसिक सर्जरी से जुड़ी अहम चिंताएं हैं।
    • इंट्राकोर : इसमें लेजर की मदद से कॉर्निया को दोबारा शेप देने के लिए रिंग्स में काटा जाता है। अध्ययनों से संकेत मिलता है कि इस प्रक्रिया में आंखों की अपवर्तक (रिफ्रैक्टिव) क्षमता में बदलाव नहीं होता और व्यक्ति को फिर भी चश्मे की जरूरत पड़ती है और दूर की चीजें देखने में भी उन्हें मुश्किल हो सकती है। इससे कॉर्निया में चोट लग सकती है और आंखों की दृष्टि भी प्रभावित हो सकती है।

सर्जरी का सुझाव उन लोगों को दिया जाता है जिन्हें प्रेसबायोपिया के साथ ही निकट दृष्टि दोष, दूर दृष्टि दोष और दृष्टिवैषम्य जैसी समस्याएं भी हैं। अगर आपको सिर्फ प्रेसबायोपिया है और आंखों से संबंधित कोई और समस्या नहीं है तो बेहतर यही होगा कि आप सर्जरी न करवाएं।

  • लेंस रिप्लेसमेंट : इस प्रक्रिया में आंखों की प्राकृतिक लेंस को हटाकर सिंथेटिक लेंस लगाया जाता है। ये नया लेंस मोनोफोकल या मल्टीफोकल हो सकता है और सभी तरह की दृष्टि समस्याओं को दूर कर सकता है जैसे- निकट दृष्टि दोष, दूर दृष्टि दोष और दृष्टिवैषम्य और साथ में प्रेसबायोपिया भी। हालांकि यह इम्प्लांट आपको प्राकृतिक दृष्टि की गुणवत्ता नहीं दे सकते इसलिए आपको पढ़ने वाले चश्मे की जरूरत फिर भी हो सकती है। रोशनी के प्रति संवेदनशीलता, दृष्टि में चमक महसूस होना, दृष्टि का धुंधला होना आदि इस सर्जरी से जुड़े कुछ साइड इफेक्ट्स हैं। इसके अलावा मोतियाबिंद, ग्लौकोमा और आंखों के अंदर खून निकलने की समस्या का भी खतरा बढ़ जाता है।
  • कॉर्नियल इन्ले : यह एक तरह का बेहद छोटा उपकरण होता है जिसे कॉर्निया के अंदर लगाया जाता है ताकि प्रेसबायोपिया की समस्या को ठीक किया जा सके। इस उपकरण को सिर्फ एक आंख में ही इम्प्लांट किया जाता है। अगर मरीज को मायोपिया या हाइपरमेट्रोपिया की भी समस्या हो तो कॉर्नियल इन्ले इम्प्लांट के साथ ही सुधारात्मक प्रक्रिया जैसे- लैसिक की भी जरूरत पड़ सकती है। जिन लोगों को मोतियाबिंद या आंखों में सूखेपन की समस्या होती है उनमें कॉर्नियल इन्ले यूज नहीं किया जाता। अमेरिकन अकैडमी ऑफ ऑप्थैलमोलॉजी के मुताबिक, कॉर्नियल इन्ले 2 तरह का होता है:
    • स्मॉल अपर्चर इन्ले : इस तरह का इन्ले रिंग के शेप का होता है और इसका अपर्चर कैमरे की तरह होता है। अपर्चर रोशनी की मात्रा को अडजस्ट करता है जो आंखों में प्रवेश कर दृष्टि के दायरे को संकुचित करने में मदद करता है।
    • रिफ्रैक्टिव कॉर्नियल इन्ले : इस तरह का इन्ले मल्टीफोकल लेंस की तरह काम करता है जिसमें अलग-अलग क्षेत्र होते हैं जो आंखों में अलग-अलग लेवल की वृद्धि प्रदान करने में मदद करते हैं। रिफ्रैक्टिव कॉर्नियल इन्ले को अब तक अमेरिका के एफडीए से स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई है।


संदर्भ

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प्रेसबायोपिया के डॉक्टर

Dr. Meenakshi Pande Dr. Meenakshi Pande ऑपथैल्मोलॉजी
22 वर्षों का अनुभव
Dr. Upasna Dr. Upasna ऑपथैल्मोलॉजी
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