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एफआईसीसीआई और अर्न्स्ट एंड यंग की एक रिपोर्ट ‘एक्सपैंडिंग कैंसर केयर फाॅर वुमेन इन इंडिया 2017’ के अनुसार भारत में हर वर्ष 1 से 14 लाख महिलाओं में कैंसर के मामले सामने आते हैं। इसी रिपोर्ट में 2015 में कहा गया था कि महिलाओं में कैंसर के कुल 40 प्रतिशत मामलों में ब्रेस्ट कैंसर (19 प्रतिशत), सर्विक्स यूटेरी (14 प्रतिशत) और ओवेरियन कैंसर (7 प्रतिशत) था।

मौजूदा समय में यू.एस.ए और चीन के बाद कैंसर सबसे ज्यादा भारतीय महिलाओं को अपना शिकार बना रहा है। इसके साथ ही इस मामले में भारत विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है। यहां हम आपको उन प्रमुख कैंसर के प्रकारों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनसे महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं।

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ब्रेस्ट कैंसर

जब स्तन में अनियंत्रित या असामान्य तरीके से कोशिकाओं का विकास होने लगता है तब ब्रेस्ट कैंसर उत्पन्न होता है। यह महिलओं में होने वाला सबसे आम कैंसर है। 'द इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर)' ने 2016 की अपनी रिपोर्ट ‘काॅनसेंस मैनेजमेंट फाॅर ब्रेस्ट कैंसर’ में कहा था कि हर साल 1,44,000 महिलाओं में कैंसर की बीमारी का पता चलता है। डाॅक्टरों का कहना है कि इस रोग से पीड़ित प्रत्येक दो महिलाओं में से एक महिला की मृत्यु हो जाती है।

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सर्वाइकल कैंसर

सर्वाइकल कैंसर सर्विक्स यानी गर्भाशय ग्रीवा से शुरू होता है। सर्विक्स गर्भाशय का निचला और संकीर्ण हिस्सा होता है। यूं तो औसतन 38 साल की उम्र में सर्वाइकल कैंसर के मामले ज्यादा सामने आते हैं, लेकिन 15 साल की उम्र में भी यह बीमारी हो सकती है।

'द नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर प्रीवेंशन एंड रिसर्च' की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर आठ मिनट में सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित एक महिला की मृत्यु हो जाती है। सर्वाइकल कैंसर एचपीवी वायरस (ह्यूमन पेपिलोमा वायरस) की वजह से होता है और यह वायरस सेक्स करने पर पार्टनर में भी संचारित हो सकता है।

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ओवेरियन कैंसर

ओवरी महिलाओं का वह अंग है, जो अंडे बनाता है। ओवेरियन कैंसर के लक्षणों का आसानी से पता नहीं चल पाता है इस बीमारी का पता बहुत देर से चलता है। शुरूआती स्तर पर महिलाएं इसे नजरअंदाज कर देती हैं और इसे पेट फूलना, पेट के निचले हिस्से में भारीपन महसूस होने जैसी अन्य बीमारियों का संकेत समझ बैठती हैं। ओवेरियन कैंसर के देरी से पता लगने पर महिलाओं में प्रजनन क्षमता की कमी हो सकती है और इन मामलों में जीवित रहने की संभावना भी कम हो जाती है।

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गर्भाशय कैंसर

जब गर्भाशय की आंतरिक परत में कोशिकाएं अधिक बढ़ने लगती हैं, तब गर्भाशय कैंसर होता है। गर्भाशय में ट्यूमर होने पर महिला को असामान्य ब्लीडिंग होती है, जिस वजह से शुरूआती स्तर पर ही इस बीमारी का पता चल जाता है। डाॅक्टरों का कहना है कि पहले चरण में कैंसर किसी एक जगह पर होता है। इसी चरण में अगर इस बीमारी का पता चल जाए तो सर्जरी की मदद से गर्भाशय को निकालकर कैंसर को बढ़ने से रोका जा सकता है और पीड़ित के 5 साल तक जीवित रहने की संभावना 95 फीसदी तक बढ़ जाती है।

कोलोरेक्टल कैंसर

यह कैंसर मलाशय और आंत में विकसित होता है। ये दोनों ही अंग पाचन तंत्र के हिस्से हैं। कोलोरेक्टर कैंसर के लिए पर्यावरणीय और आनुवांशिक कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। वैसे तो आनुवांशिक कारण इसके जोखिम कारकों में सबसे आम माने जाते हैं लेकिन डाॅक्टरों का कहना है कि कोलोरेक्टल कैंसर के ज्यादातर मामले आनुवांशिक कारकों की वजह से नहीं होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों का तीसरा सबसे आम कारण कोलोरेक्टल कैंसर है।

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कैंसर का पता लगाने के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट:

महिलाएं नियिमत स्क्रीनिंग करवा कर लक्षणों के सामने आने से पहले ही उसका पता लगा सकती हैं। इससे कैंसर का समय पर इलाज कर उसे बढ़ने से रोका जा सकता है।

ब्रेस्ट कैंसर की जांच

  • 20 और इससे अधिक उम्र की महिलाएं खुद अपने स्तनों की जांच करें।
  • 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए शुरूआती स्क्रीनिंग प्रोटोकाॅल इस प्रकार हैं-
    • किसी प्रशिक्षित और पेशेवर चिकित्सक द्वारा हर साल जांच करवाएं।
    • 40 से 50 साल तक की महिलाओं को हर साल मैमोग्राफी करवाने का सुझाव दिया जाता है।
    • 50 साल से ऊपर की महिलाएं साल में दो बार मैमोग्राफी करवा सकती हैं।
    • जिन महिलाओं के परिवार में कैंसर का इतिहास, मोटापा, हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी और अन्य चिकित्सकीय स्थिति रही है, उन्हें स्क्रीनिंग के लिए डाॅक्टर के निर्देश मानने चाहिए। (और पढ़ें - महिलाओं के लिए सबसे जरूरी लैब टेस्ट)

ओवेरियन कैंसर की जांच

  • 30 साल और इससे ज्यादा उम्र की महिलाओं को ट्रांसवेजाइनल अल्ट्रासाउंड करवाना चाहिए।
  • 30 साल और इससे ज्यादा उम्र की महिलाओं को सीए 125 टेस्ट से इस बीमारी का पता चल सकता है।

किन महिलाओं को ओवेरियन कैंसर के लिए स्क्रीनिंग करवानी चाहिए?

यह स्पष्ट नहीं है कि किन्हें ओवेरियन कैंसर के लिए स्क्रीनिंग करवानी चाहिए। फिलहाल विशेषज्ञ इस पर सहमत हैं कि-

जिन महिलाओं को ओवेरियन कैंसर का सबसे ज्यादा जोखिम है, उन्हें स्क्रीनिंग करवानी चाहिए, उनके परीक्षण निम्न चीजों को दिखाते हैंः

  • जिनमें ‘बीआरसीए’ नाम का जीन्स होता है। ये जींस ट्यूमर पैदा करता है।
  • जिन्हें लिंच सिंड्रोम हो। इसे वंशानुगत नॉन-पोलिपोसिस कोलोरेक्टल कैंसर या ‘एचएनपीसीसी’ भी कहा जाता है।
  • अगर आपको ओवेरियन कैंसर की फैमिली हिस्ट्री (परिवार में किसी सदस्य को ओवेरियन कैंसर होना) रही है या आपमें ओवेरियन कैंसर का जोखिम बढ़ाने वाले जींस हैं तो आपको स्क्रीनिंग जरूर करवानी चाहिए।
  • जिन महिलाओं को ओवेरियन कैंसर का जोखिम कम होता है, उन्हें स्क्रीनिंग करवाने की जरूरत नहीं है। इनमें वो महिलाएं शामिल होती हैं जिनके परिवार में ओवेरियन कैंसर का इतिहास नहीं है या जीन टेस्टिंग से सुनिश्चित करवा चुकी हैं कि उनके शरीर में कैंसर जीन्स नहीं हैं।

सर्वाइकल कैंसर की जांच

उम्र जांच अन्य जांच

21 साल तक

इस समय आपको किसी जांच की जरूरत नहीं है।  

21 से 29 साल

हर तीन साल में कीटोलोग्य (रोगों का पता लगाने और इलाज के लिए कोशिकाओं की जांच की जाती है) करवाना चाहिए। सर्वाइकल कैंसर के लिए कीटोलोग्य में पैप स्मीयर सबसे आम कीटोलोग्य आधारित स्क्रीनिंग है।  
30 से 65 साल हर पांच साल में कीटोलोग्य और को-टेस्टिंग एच.पी.वी करवाएं।  
65 साल से ज्यादा अगर लगातार तीन बार कीटोलोग्य टेस्ट नेगेटिव आता है या फिर दस साल के अंदर, खासकर हाल के पांच सालों में दो नेगेटिव कीटोलोग्य और एच.पी.वी टेस्ट होने पर स्क्रीनिंग करवाना बंद कर सकते हैं। जिन महिलाओं को सर्वाइकल इंट्राएपिथेलियल नियोप्लाजिया (सीआईएन) 2, सीआईएन 3 और एडेनोकार्सिनोमा की हिस्ट्री है, उन्हें कम से कम 20 साल तक एज-बेस्ड (उम्र आधारित) स्क्रीनिंग करवाते रहना चाहिए।

हिस्टेरेक्टॉमी (बच्चेदानी निकलवाना) के बाद 

किसी जांच की जरूरत नहीं है उन महिलाओं पर यह बात लागू होती जिन महिलाओं का गर्भाशय निकाला जा चुका है और जिनका सीआईएन 2, सीआईएन 3 का इतिहास नहीं है और जिनके परिवार में पिछले 20 सालों में किसी को कैंसर नहीं हुआ है।
एचपीवी वैक्सीनेशन के बाद वैक्सीनेशन न लगवाने वाली महिलाओं की ही तरह आपको भी उम्र से संबंधित टेस्ट करवाने की सलाह दी जाती है।   


गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की जांच

गर्भाशय ग्रीवा कैंसर से बचाव और स्क्रीनिंग के लिए निम्न कार्य किए जाते हैं-

  • एंडोमेट्रियल सैम्पलिंग
  • गर्भाशय से संबंधित जोखिम को कम करना
  • हालांकि ज्यादातर महिलाओं को एंडोमेट्रियल कार्सिनोमा के लिए रूटीन चेकअप का सुझाव नहीं दिया जाता। लिंच सिंड्रोम से ग्रस्त महिलाओं को सामान्य आबादी की तुलना में आजीवन 27 से 71 फीसदी तक एंडोमेट्रियल कैंसर होने की आशंका रहती है, इसलिए उन्हें इसकी जांच जरूर करवानी चाहिए।

कोलोरेक्टल कैंसर

जिन महिलाओं को कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम है, उन्हें 50 साल की उम्र में इसकी स्क्रीनिंग करवानी चाहिए। निम्नलिखित में से कोई एक स्क्रीनिंग करवाने का सुझाव दिया जाता है-

  • हर दस साल में कोलोनोस्कोपी
  • हर पांच साल में कम्प्यूटिड टोमोग्राफी कोलोनोग्राफी
  • हर पांच साल में इम्यूनो केमिकल स्टूल टेस्ट के साथ या इसके बिना फ्लेक्सिबल सिग्मोइडोस्कोपी
  • हर साल स्टूल टेस्ट करवाएं।
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