स्टूल कल्चर टेस्ट (Stool culture) या स्टूल टेस्ट की मदद से उन बैक्टीरिया का पता लगाया जाता है, जो पाचन तंत्र के निचले हिस्से में संक्रमण पैदा करते हैं। इस टेस्ट की मदद से बैक्टीरिया के उन प्रकारों में अंतर का पता लगाया जाता है, जो रोग का कारण बनते हैं (Pathogenic) और जो सामान्य रूप से पाचन तंत्र प्रणाली में पाए जाते हैं (Normal flora)। अगर जठरांत्र संबंधी लक्षणों (Gastroenteritis) का कारण पैथोजेनिक बैक्टीरिया ही हैं, तो स्टूल टेस्ट की मदद से इसको निर्धारित किया जाता है।

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  1. स्टूल टेस्ट कब करवाना चाहिए - When to get Stool Test in Hindi
  2. स्टूल टेस्ट क्या होता है? - What is Stool Test in Hindi?
  3. स्टूल टेस्ट क्यों किया जाता है - What is the purpose of Stool Test in Hindi
  4. स्टूल टेस्ट से पहले - Before Stool Test in Hindi
  5. स्टूल टेस्ट के दौरान - During Stool Test in Hindi
  6. स्टूल टेस्ट के बाद - After Stool Test in Hindi
  7. स्टूल टेस्ट के क्या जोखिम होते हैं - What are the risks of Stool Test in Hindi
  8. स्टूल टेस्ट के परिणाम का क्या मतलब होता है - What do the results of Stool Test mean in Hindi

स्टूल टेस्ट कब करवाना चाहिए?

स्टूल टेस्ट तब किया जाता है, जब किसी व्यक्ति के पेट में संक्रमण से जुड़े संकेत व लक्षण महसूस होने लगें, जैसे:

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स्टूल टेस्ट क्या होता है?

स्टूल टेस्ट एक लेबोरेटरी टेस्ट होता है, जिसके द्वारा उन बैक्टीरिया की उपस्थिति का पता लगाया जाता है, जो संक्रमण का कारण बनते हैं। इस टेस्ट की मदद से जठरांत्र पथ (Gastrointestinal tract) में संक्रमण का भी पता लगाया जाता है।

दूषित खाद्य या पेय पदार्थ का सेवन करने (फूड पाइज़निंग) से पैथाजेनिक बैक्टीरिया शरीर के अंदर घुस जाते हैं और पाचन तंत्र को संक्रमित कर देते हैं। दूषित खाद्य पदार्थों के स्रोत जैसे कच्चे या अधपके अंडे, मुर्गी या बीफ, अनपॉश्चराइज्ड दूध और झीलों, नदियों या कभी-कभी वाटर स्पलाई से आया बिना साफ किया हुआ पानी का प्रयोग।

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स्टूल टेस्ट क्यों किया जाता है?

स्टूल टेस्ट का उपयोग निम्न स्थितियों की जांच करने के लिए किया जाता है।

  • गैस्ट्रोइंटेस्टिनल ट्रैक्ट (Gastrointestinal tract) के अंदर खून का बहना, (और पढ़ें - गैस्ट्रोएन्टराइटिस का इलाज)
  • संक्रमण (जो बैक्टीरिया, वायरस या पैरासाइटिस के कारण होता है), (और पढ़ें - हर्पीस के उपचार)
  • पाचन तंत्र संबंधी समस्याएं (जैसे कुछ प्रकार के शुगर, वसा और पोषक तत्त्वों का कुअवशोषण), (और पढ़ें - शुगर के उपाय)
  • पैरासाइटिस (परजीवी) का पता लगाने के लिए, (और पढ़ें - परजीवी संक्रमण का इलाज)
  • कोलोरेक्टल कैंसर की जांच करने के लिए स्टूल टेस्ट किया जाता है, जिसमें मल में खून की जांच की जाती है।
  • पाचन तंत्र, लिवर, और अग्न्याशय के रोगों की पहचान करने में मदद करने के लिए। मल में कुछ प्रकार के एंजाइमों का मूल्यांकन किया जाता है, जिससे यह जानने में मदद मिलती है कि अग्न्याशय कितने अच्छे से काम कर पा रहा है। (और पढ़ें - लिवर फंक्शन टेस्ट)
  • पाचन तंत्र को प्रभावित करने वाले लक्षणों के कारणों को ढूंढने के लिए जिनमें लंबे समय के दस्त, खूनी दस्त, गैस बनना, उल्टी और मतली भूख कम लगना, पेट फूलना, पेट में दर्द व ऐठन और बुखार आदि शामिल है।
  • पाचन तंत्र द्वारा पोषक तत्वों के खराब अवशोषण (Malabsorption syndrome) की जांच करने के लिए। इस टेस्ट के लिए 72 घंटे तक के मल को एकत्रित कर लिया जाता है और उसमें वसा की जांच की जाती है (और कभी कभी मीट फाइबर की)। इस टेस्ट को 72 घंटे की मल संग्रह या क्वांटिएटिव फिकल फैट टेस्ट (Quantitative fecal fat test) के नाम से भी जाना जाता है।

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स्टूल टेस्ट से पहले क्या किया जाता है?

ऐसी कई प्रकार की दवाएं हैं, जो स्टूल टेस्ट के रिजल्ट में बदलाव ला सकती है। यदि आप कुछ प्रकार की दवाओं का सेवन करते हैं, तो टेस्ट करवाने से पहले आपको उनमें से कई दवाएं छोड़नी पड़ सकती है, हालांकि यह स्टूल टेस्ट के प्रकार पर निर्भर करता है। आपको निम्न दवाओं का सेवन करना बंद करना पड़ सकता है:

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  • एंटासिड्स (Antacids)
  • दस्त को रोकने की दवाएं (Antidiarrheal)
  • एंटीपैरासाइट दवाएं (Antiparasite)
  • एंटीबायोटिक
  • लेक्सेटिव (Laxatives)
  • नॉन स्टेरॉयडल एंटी इन्फ्लामेट्री दवाएं (NSAIDs)

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टेस्ट होने से 1 या 2 हफ्ते पहले अपने डॉक्टर को सभी उन दवाओं के बारे में बता दें जो आप लेते हैं। जब टेस्ट के लिए मल एकत्रित किया जाता है, उससे 2 या 3 दिन पहले आपको कुछ प्रकार के खाद्य पदार्थों का सेवन भी बंद करना पड़ सकता है। यह इस पर निर्भर करता है कि किस प्रकार का स्टूल टेस्ट किया जा रहा है। मासिक धर्म के दिनों के दौरान या अगर बवासीर के कारण खून बह रहा है, तो उस समय टेस्ट नहीं करवाना चाहिए। अगर आपको टेस्ट से जुड़ी किसी भी प्रकार की जानकारी चाहिए तो टेस्ट होने से पहले ही डॉक्टर से बात कर लें।

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स्टूल टेस्ट के दौरान क्या किया जाता है?

स्टूल टेस्ट करने के लिए डॉक्टर को मल का सैम्पल एकत्रित करने की जरूरत पड़ती है। आमतौर पर आपको एक कंटेनर प्रदान किया जाएगा, जिसमें सैम्पल के रूप में मल एकत्रित करना होता है। यह कंटेनर आमतौर पर साफ, सूखा, चौडे मुंह वाला और वायुरोधी ढक्कन के साथ आता है। कुछ लेबोरेटरी में मल का सैम्पल एकत्रित करने के लिए एक विशेष प्रकार के टॉयलेट पेपर का इस्तेमाल किया जाता है। डॉक्टर आपको खुद सैम्पल के लिए एक कंटेनर लाने के लिए भी बोल सकते हैं।

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स्टूल टेस्ट के बाद क्या किया जाता है?

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  • सील्ड कंटेनर को अस्पताल या लेबोरेटरी में जितना जल्दी हो सके ले जाएं। आपको कुछ ही समय की अवधि में सैम्पल के कंटेनर को लेबोरेटरी पहुंचाना पड़ सकता है।
  • लेबोरेटरी में विश्लेषण करने के लिए आपके सैम्पल को पैक कर लिया जाता है।

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स्टूल टेस्ट में क्या जोखिम हो सकते हैं?

  • मल का सेंपल लेने के दौरान किसी प्रकार का दर्द नहीं होता। अगर आपको कब्ज है, तो मल निकालने के लिए थोड़ा दर्द हो सकता है। (और पढ़ें - कब्ज के घरेलू उपाय)
  • अगर मल में किसी प्रकार के रोगाणु हैं, तो वे रोग फैला सकते हैं। इसलिए सैम्पल एकत्रित करने के बाद अच्छे से हाथ धोने चाहिए और सैम्पल को ले जाने के दौरान भी सावधानी बरतनी चाहिए।

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स्टूल टेस्ट के रिजल्ट का क्या मतलब होता है?

ऐसी कई स्थितियां हैं, जो आपकी आंतों को प्रभावित करके मल में असामान्यताएं पैदा कर देती है। गेस्ट्रोइंटेस्टिनल संबंधी कई प्रकार के रोगों का परीक्षण करने के लिए, कई विश्लेषण किए जाते हैं, जैसे मल के रंग, स्थिरता व पीएच (pH) में बदलाव का विश्लेषण करना तथा मल बलगम, पित्त, वसा, शुगर, खून, सफेद रक्त कोशिकाओं आदि की उपस्थिति की जांच करना। सामान्य मल भूरे रंग का नरम तथा सामान्य आकार में होता है। इसमें बलगम, खून, खतरनाक बैक्टीरिया, पैरासाइटिस या वायरस आदि नहीं होते।

असामान्य रिजल्ट के कारण निम्न हो सकते हैं:

अन्य महत्वपूर्ण रिजल्ट:

  • मल में वसा का स्तर अधिक होने के कारण कई प्रकार के रोग हो सकते हैं, जैसे अग्नाशयशोथ (Pancreatitis), सीलिएक रोग, सिस्टिक फाइब्रोसिस (Cystic fibrosis) व अन्य विकार जो वसा के अवशोषण को प्रभावित करते हैं।
  • मल में बिना पचा हुआ मीट फाईबर होना, यह अक्सर अग्नाशयशोथ के कारण होता है।
  • पीएच का निम्न स्तर (एसिडिटी) जो कार्बोहाइड्रेट या वसा के खराब अवशोषण के कारण होता है। पीएच का उच्च स्तर जो आंतों में इन्फ्लामेशन (कोलाइटिस), कैंसर या एंटीबायोटिक्स के उपयोग के संकेत दे सकता है।
  • मल में खून आने का कारण पाचन तंत्र में खून बहना भी हो सकता है। मल में खून आने के मुख्य कारण जैसे आंतों में क्षति, अल्सरेटिव कोलाइटिस, गुदा में छिद्र या दरार, बवासीर, कोलोन कैंसर आदि हो सकते हैं। (और पढ़ें - बवासीर के घरेलू उपचार)
  • मल में सफेद रक्त कोशिकाएं आने का कारण आंतों में सूजन व जलन आदि हो सकता है, जैसे अल्सरेटिव कोलाइटिस, या बैक्टीरियल संक्रमण
  • अगर आपको गंभीर दस्त, उल्टी, पेट में ऐंठन, निर्जलीकरण, या इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन जैसी समस्या है तो डॉक्टर स्टूल टेस्ट का ऑर्डर दे सकते हैं। यह टेस्ट बैक्टीरियल संक्रमण का परीक्षण करने के साथ-साथ उसका कारण बनने वाले जीवों (कारक जीव) की पहचान करने में भी मदद करता है। स्टूल टेस्ट का रिजल्ट नेगेटिव या पॉजिटिव हो सकता है। नेगेटिव रिजल्ट का मतलब बैक्टीरिया की अनुपस्थिति और पॉजिटिव का मतलब उपस्थिति होता है।

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