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क्या आपने कभी इस वाक्यांश का उपयोग किया है- "लगता है वह आज बिस्तर के गलत तरफ से सोकर उठा है?" बोलचाल की भाषा में इसका अर्थ इस बात को इंगित करने के लिए किया जाता है कि किसी व्यक्ति का मूड खराब है या फिर वह बुरे मूड में है। लिहाजा इससे यह बात भी पता चलती है कि खराब नींद व्यक्ति के मूड को भी प्रभावित कर सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह नींद और मानसिक स्वास्थ्य के बीच मौजूद जटिल लिंक का संकेत देता है। 

हालांकि कई लोग यह समझ नहीं पाते हैं कि यह लिंक दोनों तरीकों से काम करता है और नींद से जुड़ी समस्याएं, मानसिक सेहत से जुड़े मुद्दों का कारण भी हैं और परिणाम भी। एक तरफ जहां नींद की खराब गुणवत्ता या नींद की कमी नकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य परिणामों का कारण बन सकती है वहीं दूसरी तरफ मानसिक स्वास्थ्य समस्या से पीड़ित होने के कारण नींद से जुड़ी बीमारी हो सकती है।

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यह संबंध इतना जटिल है कि दशकों के अनुसंधान के बावजूद इसके बारे में बहुत कुछ जानकारी नहीं मिल पायी है। हालांकि, नींद और मानसिक स्वास्थ्य दोनों का वर्तमान ज्ञान विशेषज्ञों और हेल्थकेयर प्रफेशनल्स को यह समझने में मदद करता है कि वह अपने मरीज में नींद से संबंधित समस्याओं और मनोवैज्ञानिक मुद्दों को कैसे कम कर सकते हैं। साथ ही यह भी निर्धारित करने में मदद कर सकता है कि मरीज और आम जनता की नींद की बीमारी और मानसिक स्वास्थ्य दोनों मुद्दों से बचाने के लिए कौन सा इलाज सही है।

चूंकि यह मुद्दा द्विदिशी यानी बाइडाइरेक्शनल है, इसलिए दोनों तरफ से देखने पर ही आपको बेहतर तस्वीर मिल सकती है कि आखिर नींद मानसिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करती है और मानसिक स्वास्थ्य नींद को कैसे प्रभावित करता है। यह लेख आपको यह समझने में मदद करने के लिए दृष्टिकोण प्रदान करता है कि नींद, नींद की कमी और नींद संबंधी विकार मानसिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर, यह भी बताता है कि न्यूरोसाइकोलॉजिकल मुद्दे जैसे- ऑटिज्म और मानसिक बीमारियां जैसे डिप्रेशन और बाइपोलर डिसऑर्डर कैसे नींद के पैटर्न को प्रभावित करते हैं।

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इसके अलावा यह लेख आपको नींद और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को बेहतर बनाने के लिए उपयोग किए जा सकने वाले सुझाव भी प्रदान करता है। ऐसे में नींद और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में सब कुछ जानने के लिए इस लेख को पढ़ें।

  1. मानसिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करती है नींद?
  2. मानसिक स्वास्थ्य नींद को कैसे प्रभावित करता है?
  3. नींद और मानसिक सेहत का इलाज
  4. नींद का मानसिक सेहत पर क्या असर पड़ता है? के डॉक्टर

आपके सोने और जागने का चक्र शरीर की आंतरिक घड़ी की लय द्वारा निर्धारित होता है। नींद के दो अलग-अलग चरण होते हैं जिनमें अलग-अलग शारीरिक और न्यूरोकेमिकल विशेषताएं होती हैं:

नॉन-रैपिड आई मूवमेंट नींद के दौरान, आपके शरीर का तापमान गिरने लगता है, मांसपेशियां रिलैक्स हो जाती हैं, हृदय गति और श्वास की गति धीमी हो जाती है और आप तेजी से गहरी नींद के चार उप-चरणों से गुजरते हैं- इन चरणों में से सबसे गहरी नींद इम्यून सिस्टम को बढ़ावा देने में मदद करती है।

रैपिड आई मूवमेंट (REM) चरण के दौरान, आपके शरीर का तापमान, रक्तचाप, हृदय गति और सांस लेने की गति तेज हो जाती है और आप सपने देखते हैं। आरईएम नींद स्मृति, सीखने और भावनात्मक स्वास्थ्य की वृद्धि से जुड़ी है। हालांकि जिस सटीक तंत्र के माध्यम से ये परिवर्तन होते हैं, वह अभी तक पूरी तरह से समझ में नहीं आया है।

REM और गैर-REM नींद के दोनों चरण जटिल परिवर्तनों के साथ होते हैं। नींद के दौरान तंत्रिका की जो गतिविधि होती है वह न्यूरोट्रांसमीटर्स के रिलीज होने से जुड़ी है जो बदले में आगे और पीछे के हाइपोथैलेमस से इन हार्मोन्स के रिलीज को नियमित करती है:

  • हिस्टामाइन, स्थानीय प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को शुरू करने और इन्फ्लेमेशन पैदा करने के लिए महत्वपूर्ण है
  • सेरोटोनिन, जिसे हैपी हार्मोन के रूप में भी जाना जाता है
  • कोर्टिसोल, जिसे तनाव हार्मोन के रूप में भी जाना जाता है
  • एसिटाइलकोलाइन, मांसपेशियों में ऐंठन के लिए महत्वपूर्ण है, रक्त वाहिकाओं को पतला करता है और भी बहुत कुछ

शरीर में इन हार्मोन्स का पर्याप्त स्तर न केवल आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली या अंतःस्रावी (हार्मोन) प्रणाली को प्रभावित करता है बल्कि आपके मूड और मानसिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाने में मदद करता है। नींद में किसी भी तरह का व्यवधान या नींद की बीमारी, इन तंत्रों के माध्यम से आपके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

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नींद की कमी और मानसिक सेहत

नींद की कमी आपकी जीवनशैली की आदतों के आधार पर छिटपुट (कभी-कभार होने वाली) हो सकती है या क्रॉनिक (लगातार) हो सकती है। रातभर बैठकर अपने पसंदीदा शो को देखना, देर रात तक बैठकर पढ़ाई करना या फिर अगले दिन होने वाली किसी परीक्षा को लेकर तनाव की स्थिति में रहने के कारण भी आप उतना ही ज्यादा नींद से वंचित रह सकते हैं, जितना आप लगातार मिलने वाली डेडलाइन्स के कारण या किसी व्यक्तिगत या पेशेवर जीवन की समस्या के कारण नींद से वंचित रहते हैं। नींद की कमी का कारण चाहे जो हो, नींद की कमी आपके मस्तिष्क के दो हिस्सों को प्रभावित करती है- अमिग्डला और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स।

अध्ययनों से पता चला है कि जब आप नींद से वंचित होते हैं, तो अमिग्डला (डर की प्रतिक्रिया में शामिल) अत्यधिक सक्रिय हो जाता है और 60% अधिक भावनात्मक रूप से रीऐक्टिव हो जाता है। इस कारण अगली सुबह आपको चिड़चिड़ापन, अत्यधिक संवेदनशीलता, गुस्सा, उदासी या आवेग महसूस होता है। दूसरी ओर, नींद की हानि, मस्तिष्क में मौजूद प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स के कामकाज को भी धीमा कर देती है। यह मस्तिष्क का वह हिस्सा है जो व्यवहार, बोलना और तर्क करने की क्षमता को नियंत्रित करता है। नींद की कमी के कारण प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स की कार्यात्मक हानि की वजह से मूड स्विंग्स, अनियमित व्यवहार, निर्णय लेने में चूक और निर्णय लेने में असमर्थता जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।

नींद की कमी के कारण मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस क्षेत्र द्वारा नियमित हार्मोन में असंतुलन हो जाता है। इस कारण हिस्टामाइन और कोर्टिसोल हार्मोन के स्तर में वृद्धि होती है, जो बदले में, तनाव और इन्फ्लेमेशन में वृद्धि का कारण बन सकता है और सेरोटोनिन के स्तर में कमी आती है जो मूड और यौन इच्छा को नियंत्रित करता है। इसलिए, नींद की कमी- फिर चाहे वह कभी-कभार हो या लंबे समय तक बनी रहने वाली समस्या- यह आपके मानसिक स्वास्थ्य के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित कर सकती है।

अनिद्रा और मानसिक स्वास्थ्य

अनिद्रा (इन्सॉम्निया) नींद से जुड़ी सामान्य बीमारी है जिसमें नींद आने में दिक्कत होती है, एक बार सो जाने पर देर तक सोते रहने में दिक्कत होती है और एक बार नींद खुल जाए तो दोबारा नींद आना भी मुश्किल हो जाता है, फिर चाहे आपकी नींद बीच रात में खुली हो या अहले सुबह। अनिद्रा के रोगियों में लंबे समय से नींद की कमी की समस्या होती है, यही कारण है कि वे न केवल नींद के अभाव के सभी लक्षणों और प्रभावों का सामना करते हैं, बल्कि उनमें कोई गंभीर मानसिक स्वास्थ्य विकार भी डायग्नोज हो सकता है।

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चिंता (ऐंग्जाइटी) विकार, डिप्रेशन, बाइपोलर डिस्ऑर्डर, सिज़ोफ्रेनिया और एडीएचडी विकार, अनिद्रा से जुड़े प्रमुख मानसिक स्वास्थ्य विकार हैं। यदि आप या आपका कोई परिचित कुछ समय के लिए भी अनिद्रा से पीड़ित हो तो तुरंत किसी डॉक्टर, मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक से परामर्श करें, इससे पहले कि आपकी समस्या किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या में परिवर्तित हो जाए। जीवनशैली में बदलाव, स्लीप थेरेपी और संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी के संयोजन से अनिद्रा के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने में मदद मिल सकती है।

मानसिक स्वास्थ्य विकार के कारण अच्छी नींद आना मुश्किल हो जाता है- जीवन में एक बार भी तनावपूर्ण दौर से गुजरने वाले व्यक्ति ने भी इसका अनुभव जरूर किया होता है। नींद और मानसिक स्वास्थ्य के बीच मौजूद दोतरफा लिंक को समझने से पहले, लोगों को यही लगता था कि नींद की समस्या केवल किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या के लक्षणों में से एक है। इस अर्थ में, नींद में गड़बड़ी, नींद की कमी, और संबंधित नींद की समस्याएं विभिन्न प्रकार के मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों से विशिष्ट तरीकों से जुड़ी हुई हैं।

इसके अलावा, चूंकि मस्तिष्क और इंडोक्राइन सिस्टम का फंक्शन नींद और मानसिक स्वास्थ्य विनियमन में बहुत अधिक शामिल है, इसलिए इन दोनों का संबंध न्यूरोडेवल्पमेंटल समस्याएं जैसे- ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार और एडीएचडी से भी जुड़ा हुआ है। यहां हम आपको मानसिक स्वास्थ्य विकार और न्यूरोडेवल्पमेंटल विकार के बारे में बता रहे हैं और वह किस तरह से नींद को प्रभावित करते हैं और किस तरह से नींद का इन समस्याओं पर प्रभाव पड़ता है:

चिंता (एंग्जाइटी) का नींद पर प्रभाव

एंग्जाइटी या चिंता विकार का नींद की समस्याओं के साथ सबसे मजबूत संभावित संबंध है। एंग्जाइटी विकार में जनरलाइज्ड या सामान्य एंग्जाइटी डिसऑर्डर (जीएडी), सोशल या सामाजिक चिंता विकार, पैनिक या घबराहट से जुड़ा विकार, पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी), ऑब्सेसिव-कम्प्लसिव विकार (ओसीडी) और कुछ खास तरह के फोबिया शामिल हैं। इन विकारों के कारण डर और चिंता की अधिकता पैदा होती है जो अक्सर बेकाबू और दुर्बल हो सकता है।

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डर और चिंता अतिउत्तेजना की स्थिति पैदा करते हैं, जिसके कारण आपका मन हर वक्त विचलित रहता है और इस कारण चिंता विकार इस ग्रस्त व्यक्ति के लिए नींद आना और सोना लगभग असंभव हो जाता है। चिंता विकार के कारण आमतौर पर अनिद्रा की समस्या होती है और नींद का यह विकार तनाव को और ज्यादा बढ़ाता है जिससे एंग्जाइटी या चिंता और बढ़ती है और झपकी लेना या नींद आना और भी मुश्किल हो जाता है।

डिप्रेशन का नींद पर प्रभाव

डिप्रेशन मूड डिसऑर्डर है जिसमें उदासी और निराशा की भावनाएं होती हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि करीब 75 प्रतिशत लोग जिनमें डिप्रेशन डायग्नोज होता है उनमें अनिद्रा की समस्या भी होती है। डिप्रेशन से पीड़ित लोग दिन के समय अधिक सोना और अत्यधिक सोना (हाइपरसॉम्निया) से भी पीड़ित हो सकते हैं- ये दोनों ही समस्याएं शरीर की आंतरिक घड़ी के लय में रुकावट का संकेत हैं और इसलिए, मस्तिष्क और इंडोक्राइन फंक्शन में भी समस्याएं हो सकती हैं। पुराने शोध से भले ही यह संकेत मिलता हो कि डिप्रेशन नींद की समस्याओं का कारण बनता है, लेकिन बढ़ते सबूत इस बात की ओर भी इशारा करते हैं कि डिप्रेशन और नींद से जुड़े मुद्दे परस्पर एक दूसरे से जुड़े हैं। इसका मतलब ये हुआ कि इन स्थितियों में से कोई भी दूसरे के लक्षण को बढ़ाता है।

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यह एक नकारात्मक प्रतिक्रिया को बनाता है क्योंकि एक स्थिति का अस्तित्व दूसरी स्थिति के विकसित होने के जोखिम को बढ़ाता है- यदि मरीज को पहले से ही दोनों समस्याएं हों तो बिगड़ती नींद डिप्रेशन की गंभीरता को बढ़ा सकती है और डिप्रेशन की बिगड़ती स्थिति नींद को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है। इसका एक ब्राइट साइड ये है कि डिप्रेशन और नींद की समस्याओं के बीच की यह कड़ी बताती है कि इनमें से किसी एक समस्या का भी इलाज करवाने से दोनों के लक्षणों में सुधार हो सकता है।

सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर नींद को कैसे प्रभावित करता है?

सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर (SAD) डिप्रेशन का ही एक उपप्रकार है और आमतौर पर शरद ऋतु और सर्दियों के दौरान लोगों को प्रभावित करता है। एसएडी दिन की रोशनी के कम घंटों से जुड़ा हुआ है, जो शरीर की आंतरिक घड़ी (सर्कैडियन) की लय को प्रभावित करता है और इससे नींद प्रभावित होती है। SAD से पीड़ित लोग या तो बहुत कम सोते हैं या बहुत ज्यादा सोते हैं। SAD अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करता है।

नींद पर एसएडी के प्रभाव को उचित दिनचर्या का पालन करके या जीवनशैली में बदलाव लाकर नियंत्रित किया जा सकता है। आउटडोर एक्सरसाइज अधिक करना, ऊर्जा बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थों के साथ एक स्वस्थ आहार का सेवन करना और सामाजिक गतिविधियों या संपर्कों को बढ़ाने से एसएडी के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है और इससे नींद की समस्याओं का खतरा भी कम होता है। हालांकि दुर्लभ मामलों में, SAD गर्मी के महीनों में भी हो सकता है क्योंकि बहुत अधिक सूर्य के प्रकाश के संपर्क के कारण मेलेनिन उत्पादन बाधित हो सकता है। शरीर की आंतरिक घड़ी (सर्कैडियन) की लय को बनाए रखने के लिए मेलेनिन महत्वपूर्ण है, इसलिए यह नींद को प्रभावित कर सकता है।

बाइपोलर बीमारी नींद को कैसे प्रभावित करती है?

बाइपोलर डिसऑर्डर वाले व्यक्ति में एक्स्ट्रीम मूड की घटनाएं होती हैं- वे या तो बहुत अधिक उन्मादी हो सकते हैं या फिर अवसादग्रस्त हो सकते हैं। बाइपोलर वाले व्यक्ति की भावनाएं और लक्षण उनकी वर्तमान स्थिति के आधार पर काफी भिन्न हो सकते हैं। यह अनिवार्य रूप से उनकी नींद के पैटर्न पर भी एक छाप छोड़ता है। उन्मादी चरण के दौरान, बाइपोलर व्यक्ति को सोने की आवश्यकता महसूस नहीं होती और इसलिए वह नींद से वंचित हो सकता है तो वहीं, अवसादग्रस्त चरण के दौरान, वे बहुत अधिक सो सकते हैं।

अध्ययनों से पता चलता है कि नींद में रुकावट की यह समस्या तब भी जारी रह सकती है, जब बाइपोलर व्यक्ति उन्माद और डिप्रेशन के बीच वाले चरण में होता है। कुछ अध्ययनों से यह भी संकेत मिलता है कि बाइपोलर व्यक्ति में किसी प्रकरण की शुरुआत से पहले भी नींद की समस्याओं का अनुभव हो सकता है, जबकि सबूत ये भी बताते हैं कि नींद की कमी उच्च और निम्न दोनों एपिसोड के लक्षणों को खराब कर सकती है। नींद और बाइपोलर डिसऑर्डर के बीच इस दोतरफा संबंध को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सकता है यदि रोगी स्लीप थेरेपी प्राप्त करे।

एडीएचडी नींद को कैसे प्रभावित करता है?

अटेंशन यानी ध्यान की कमी और आवेग का बढ़ना, एडीएचडी की खास विशेषताएं हैं, एडीएचडी एक न्यूरोडेवल्पमेंटल विकार है जो आमतौर पर बच्चों में डायग्नोज होता है लेकिन वयस्क होने पर भी जारी रह सकता है। एडीएचडी वाले लोगों में नींद की समस्याएं बहुत आम हैं, क्योंकि उन्हें सोने में कठिनाई हो सकती है, रात में बार-बार नींद खुल जाती है और दिन के समय अधिक नींद आती है।

(और पढ़ें- बच्चों में एडीएचडी)

एडीएचडी वाले लोगों में प्रतिरोधी स्लीप ऐप्निया (ओएसए) और रेस्टलेस लेग सिंड्रोम की उच्च घटनाएं भी देखने को मिलती हैं। यहां यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि एडीएचडी वाले वयस्कों की बजाय एडीएचडी वाले बच्चों में नींद की समस्याओं के बारे में अधिक अध्ययन किए गए हैं, और यह सुझाव दिया गया है कि उम्र के साथ तनाव में वृद्धि, एडीएचडी और वयस्कों में नींद की समस्याओं को बढ़ा सकता है।

ऑटिज्म कैसे नींद को प्रभावित करता है?

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) कई न्यूरोडेवलपमेंटल स्थितियों को संदर्भित करता है जो किसी व्यक्ति के संचार कौशल और सामाजिक संपर्क स्थापित करने की क्षमता को प्रभावित करता है। एएसडी आमतौर पर बचपन में डायग्नोज होता है और वयस्क होने तक जारी रहता है। एएसडी वाले बच्चों और वयस्कों में नींद की समस्याओं की अधिकता देखने को मिलती है जिसमें अनिद्रा और नींद के विकार से जुड़ी श्वसन समस्या शामिल है।

(और पढ़ें- ऑटिज्म की होम्योपैथिक दवा)

एएसडी वाले लोगों की जीवन की गुणवत्ता कम हो सकती है और नींद की समस्याओं की उपस्थिति के कारण उनकी स्थिति और बिगड़ सकती है। इसलिए, एएसडी से पीड़ित व्यक्ति फिर चाहे किसी भी उम का क्यों न हो उसके लिए बेहद जरूरी है कि वह उचित चिकित्सा और नींद की सहायता प्राप्त करे।

पीटीएसडी कैसे नींद को प्रभावित करता है?

मोटे तौर पर देखें तो पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) एक गंभीर एंग्जाइटी विकार है जो युद्ध, दंगे, यौन हिंसा या किसी प्राकृतिक आपदा जैसे गंभीर और दर्दनाक अनुभवों को दूर करने में असमर्थता के कारण उत्पन्न होता है। शोध में PTSD और नींद की समस्याओं के बीच एक बहुत मजबूत संबंध पाया गया है। 

PTSD वाले लोग जो उन नकारात्मक घटनाओं से गुजर चुके हैं उनके मन में बार-बार उन घटनाओं का फ्लैशबैक आता है। इस कारण व्यक्ति में गंभीर एंग्जाइटी होती है, परिणामस्वरूप व्यक्ति अतिउत्तेजित हो जाता है और अत्यधिक सतर्क भी। पीटीएसडी वाले व्यक्ति न केवल अनिद्रा की समस्या से पीड़ित होते हैं बल्कि उन्हें स्वाभाविक रूप से बुरे सपने भी आते हैं। इन समस्याओं को दूर करने के लिए स्लीप थेरेपी, संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी, उचित देखभाल और लंबे समय तक समर्थन की आवश्यकता होती है।

सिजोफ्रेनिया कैसे नींद को प्रभावित करता है?

सिजोफ्रेनिया एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य विकार है जिसमें व्यक्ति वास्तविक और अवास्तविक चीजों के बीच अंतर नहीं कर पाता है। मनोभ्रंश विकार जैसे पैरानोया और मतिभ्रम, और अव्यवस्थित स्पीच, असामान्य मोटर फ़ंक्शन और गंभीर मनोविकृति ये सारी चीजें सिज़ोफ्रेनिया के लक्षण हैं। सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों में शरीर की आंतरिक घड़ी की लय से संबंधी विकार भी होता है जिसके कारण उन्हें अनिद्रा और नींद की अन्य बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है।

(और पढ़ें- सिजोफ्रेनिया की आयुर्वेदिक दवा और इलाज)

सिज़ोफ्रेनिया और नींद की समस्याएं एक दूसरे से परस्पर संबंधित होती हैं और यही वजह है कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर या स्लीप थेरेपिस्ट से उचित मदद लेना दोनों स्थितियों के लिए महत्वपूर्ण है।

मानसिक स्वास्थ्य की दवाइयां कैसे नींद को प्रभावित करती हैं?

एंटीडिप्रेसेंट, एंटीसाइकोटिक्स, बेंजोडाइजेपिन्स और अन्य उत्तेजक व्यापक रूप से कई मनोरोग विकारों के इलाज के लिए उपयोग किए जाते हैं। इनमें से ज्यादातर दवाएं मोनोअमिन्स (न्यूरोट्रांसमीटर जैसे डोपामाइन जो एक एमिनो एसिड समूह है) और सेरोटोनिन और हिस्टामाइन, आदि के रिसेप्टर्स को संशोधित करके काम करती हैं। इस कारण इन दवाइयों का नींद पर महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकता है। यह प्रभाव रोगी की प्रतिक्रिया और अन्य कारकों के आधार पर लाभकारी भी हो सकता है या प्रतिकूल भी। इन दवाओं को लेने से कुछ लोगों के लिए नींद में सुधार हो सकता है, तो वहीं दूसरों में यह अनिद्रा, परेशान नींद या नींद की समस्या पैदा कर सकता है। इसके अलावा धीरे-धीरे इन दवाओं के उपयोग को रोकना या दवाइयां लेना बंद कर देने के कारण भी नींद की समस्याएं ट्रिगर हो सकती हैं।

मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति नींद की समस्या पैदा कर सकती है और नींद की समस्याओं के कारण मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए अधिकतर मानसिक स्वास्थ्य और नींद विशेषज्ञों द्वारा यही माना जाता है कि:

  • नींद की स्वच्छता (स्लीप हाइजीन) में सुधार न केवल मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों के लक्षणों को कम कर सकता है, बल्कि उन्हें होने से भी रोक सकता है।
  • अगर आप अपने मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें तो इससे यह सुनिश्चित हो सकता है कि नींद के विकार आपसे दूर रहें।

इसे प्राप्त करने के लिए जीवनशैली से जुड़े इन टिप्स को अपनाएं:

  • स्वस्थ और संतुलित आहार का सेवन करें
  • पर्याप्त व्यायाम करें
  • चिंता को कम करने या बचने के लिए डीस्ट्रेस के तरीके अपनाएं
  • नींद की स्वच्छता (स्लीप हाइजीन) बनाकर रखें
  • नियमित रूप से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य जांच करवाएं

लेकिन अगर आपको मानसिक स्वास्थ्य विकार या नींद से जुड़ा कोई विकार डायग्नोज हुआ है अगर आप इस बात को लेकर चिंतित हैं कि किसी एक विकार की वजह से दूसरा होने का खतरा हो सकता है तो आप किसी प्रशिक्षित पेशेवर के साथ ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल पर काम करें जो आपको सूट करता हो और लंबे समय तक प्रभावी और टिकाऊ हो।

मानसिक स्वास्थ्य के साथ ही नींद की समस्याओं के संयुक्त उपचार के लिए अधिकतर चिकित्सा पेशेवर निम्नलिखित तरीकों का सुझाव देते हैं:

नींद से जुड़ी साफ-सफाई (स्लीप हाइजीन)

नींद की स्वच्छता से जुड़ी खराबी न केवल नींद की समस्याओं को बढ़ाती है बल्कि मानसिक स्वास्थ्य विकारों के लक्षणों को भी बढ़ाने का काम करती है। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि आप उचित स्लीप हाइजीन को बनाए रखें। सोने और जागने का एक समय निर्धारित करें, और उसका पालन करने की कोशिश करें। आपको अच्छी नींद आए इसके लिए इन चीजों का पालन करें:

  • सोने से पहले कैफीन, डिजिटल उपकरणों और अन्य विकर्षण या डिस्ट्रैक्शन से बचें
  • आप चाहें तो सोने से पहले गर्म पानी से नहाएं, गहरी सांस लेने वाला व्यायाम करें, ध्वनि ध्यान जैसे तकनीकों का उपयोग करें
  • सोने से पहले अपना बेडरूम रेडी करें और हो सके तो कमरे को आरामदेह और ठंडा रखें
  • रोशनी मद्धम रखें

संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी

संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी (कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी सीबीटी), जिसे टॉक थेरेपी या स्लीप थेरेपी के रूप में भी जाना जाता है, नींद से जुड़े विकार और मानसिक स्वास्थ्य विकार दोनों समस्याओं के लिए एक प्रभावी और गैर-औषधीय (बिना दवाइयों वाला) इलाज है। सीबीटी मूल रूप से आपके नकारात्मक विचारों के पैटर्न को कंट्रोल करने पर केंद्रित होता है ताकि जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जा सके।

मुख्य डायग्नोसिस पर ध्यान केंद्रित करने के लिए सीबीटी के कई प्रकार हैं, फिर चाहे वह डिप्रेशन हो या अनिद्रा। यदि आप एक ही समय में कई समस्याओं का सामना कर रहे हों तो इसके लिए चिकित्सक संयुक्त सीबीटी, दवाओं के संयोजन के साथ सीबीटी आदि का उपयोग कर सकते हैं।

वजन वाले कंबल

वजनदार कंबल का उपयोग कभी-कभी नींद के विकार और साथ ही मनोरोग से जुड़े विकारों के उपचार के लिए भी किया जाता है। इन कंबलों को इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि ताकि वे पूरे शरीर पर समान रूप से प्रेशर को वितरित कर पाएं। इस तरह का दबाव और उत्तेजना सुरक्षा और आराम की भावना प्रदान करती है जो किसी व्यक्ति को पकड़ने या गले लगाने से मिलता जुलता होता है, इससे व्यक्ति को बेहतर नींद आने में मदद मिलती है।

अध्ययनों से पता चला है कि वजन वाले कंबल मनोरोग विकार वाले लोगों में नींद की गुणवत्ता में सुधार करते हैं, जिनमें चिंता विकार, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार, प्रमुख अवसादग्रस्तता विकार, सामान्यीकृत चिंता विकार, बाइपोलर विकार और एडीएचडी शामिल है। अनुसंधान से यह भी संकेत मिलता है कि वजन वाले कंबल नींद के विकार जैसे अनिद्रा और रेस्टलेस लेग सिंड्रोम के खिलाफ भी प्रभावी हैं।

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संदर्भ

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