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किलेशन थेरेपी व्यक्ति के शरीर से अतिरिक्त भारी धातुओं को हटाने और भारी धातु से होने वाली विषाक्तता के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली प्रक्रिया है। इस थेरेपी में, मरीजों को कुछ रासायनिक यौगिक दिए जाते हैं जिन्हें किलेटर्स कहा जाता है जो शरीर में मौजूद भारी धातुओं से खुद को बांध लेते हैं और मूत्र के साथ ही इन धातुओं को भी शरीर से उन्हें बाहर निकालने में मदद करते हैं। किलेशन (chelation)शब्द का अर्थ है "झपटना या हड़पना"।

हृदय रोग, अल्जाइमर्स रोग और ऑटिज्म जैसी बीमारियों के इलाज में किलेशन थेरेपी को कारगर माना जाता है। लेकिन इस तरह के उपचार के पक्ष में ज्यादा सबूत मौजूद नहीं है। अमेरिका के फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने सभी उपभोक्ताओं को चेतावनी दी है कि किलेशन थेरेपी केवल किसी अनुभवी चिकित्सक के मार्गदर्शन में ही ली जानी चाहिए क्योंकि इस थेरेपी के कई साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं जैसे- विषाक्तता, अतालता (अनियमित दिल की धड़कन) और यहां तक ​​कि मृत्यु भी।

  1. भारी धातु विषाक्तता का इलाज
  2. किलेशन थेरेपी उपयोग
  3. किलेशन थेरेपी प्रक्रिया
  4. किलेशन थेरेपी के दुष्प्रभाव
  5. किलेशन थेरेपी के डॉक्टर

किलेटर्स या किलेटिंग एजेंट्स या तो जैविक (ऑर्गैनिक) या अजैविक (इनऑर्गैनिक) कम्पाउंड्स होते हैं जो धातुओं के साथ खुद को बांध लेते हैं और गोल रिंग जैसी संरचना बना लेते हैं जिन्हें किलेट्स कहते हैं। एक आदर्श किलेटिंग एजेंट में निम्नलिखित गुण होने चाहिए:

  • कम विषाक्तता
  • पानी में अत्यधिक घुलनशील
  • कोशिका झिल्लियों को पार करने की क्षमता
  • शरीर के तरल पदार्थों के पीएच से प्रभावित न होना
  • धातु के समान ही वितरण करना (ताकि यह उन सभी स्थानों तक पहुंच सके जहां धातु है)
  • धातु के प्रति उच्च घनिष्ठ संबंध (ताकि यह जल्दी से धातु के साथ बंध जाए और किसी भी प्रतियोगिता को समाप्त कर सके)
  • ऐसे किलेट्स बनाने की क्षमता जो धातु से कम विषाक्त हो

यहां आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ किलेटर्स के बारे में बताया जा रहा है:
1. बीएएल (ब्रिटिश एंटी ल्यूविसाइट) या 2,3-डिमेरकैप्रोल : यह सबसे पुराने किलेटिंग एजेंट्स में से एक है जिसका इस्तेमाल सीसा विषाक्तता, सोना और पारा विषाक्तता और आर्सेनिक विषाक्तता जैसी समस्याओं के इलाज में किया जाता है। बीएएल सलूशन तैलीय लेकिन साफ होता है और इसमें तीखी गंध होती है। इसकी तैलीय प्रकृति के कारण, बीएएल को एक गहरे इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन के जरिए दिया जाता है। इस यौगिक के कुछ साइड इफेक्ट्स भी हैं:

बीएएल किलेटर की निम्नलिखित कमियां भी हैं:

  • एक तीखी सड़े हुए अंडे जैसी गंध
  • इसे मौखिक रूप से नहीं दिया जा सकता और मांसपेशियों में दिया जाने वाला इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन दर्दनाक होता है और कुछ लोगों में इससे एलर्जी भी हो सकती है
  • चिकित्सीय सूचकांक इसका कम है (थोड़ी सी भी डोज अधिक हो जाए तो यह विषाक्तता का कारण बन सकता है)
  • ब्रेन और टेस्टिस में आर्सेनिक को जमा करने का कारण बन सकता है

2. डीएमएसए/सकीमर या मेसो 2,3-डिमरकैप्टोसुक्किनिक एसिड : डीएमएसए बीएएल का एक एनालॉग है जो मुख्य रूप से सीसा विषाक्तता का इलाज करने के लिए उपयोग किया जाता है। इसके अलावा पारा या आर्सेनिक विषाक्तता के इलाज के लिए में भी इसे यूज किया जा सकता है। बीएएल के विपरीत, डीएमएसए को मौखिक रूप से दिया जा सकता है क्योंकि यह पाचन तंत्र में अवशोषित हो सकता है। इसके अतिरिक्त, बीएएल की तुलना में इसका चिकित्सीय इस्तेमाल अधिक होता है और यह बहुत अधिक विषाक्त नहीं है।

डीएमएसए की एक बड़ी कमी ये है कि यह कोशिका झिल्लियों को पार नहीं कर सकता है। इस यौगिक के कुछ साइड इफेक्ट्स इस प्रकार हैं:

  • यह सीरम एमिनोट्रांस्फरेज के स्तर को बढ़ा सकता है, जो लिवर विषाक्तता का संकेत देता है। हालांकि, अब तक क्लिनिकल सेटिंग में लिवर पर कोई बड़ा दुष्प्रभाव नहीं दिखा है।
  • यह शरीर में तांबे के मेटाबॉलिज्म को बदल सकता है
  • सांस की तकलीफ
  • आंख में जलन और खुजली
  • प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है और भ्रूण को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है

3. कैल्शियम डिसोडियम एडेटेट (सीएएनए2ईडीटीए) : CaNa2EDTA,EDTA (एथिलीनडायमिनेटेट्राएसेटिक एसिड) नामक किलेटिंग एजेंट से उत्पन्न यौगिक है और भारी धातु विषाक्तता के उपचार के लिए इस्तेमाल होने वाला सबसे कॉमन किलेटर है, विशेष रूप से सीसा विषाक्तता में। यह रक्त वाहिकाओं से पट्टिका (प्लाक) को हटाने और रक्त वाहिका की सूजन को कम करने के लिए भी फायदेमंद कहा जाता है। CaNa2EDTA ​​सफेद क्रिस्टल पाउडर की तरह दिखता है। यह पानी और जैविक सॉल्वेंट्स में घुल जाता है लेकिन आंत में ठीक से अवशोषित नहीं होता। इसलिए इस किलेटर को इंट्राविनस रूट के जरिए मरीज को दिया जाता है। CaNa2EDTA की कुछ कमियां निम्नलिखित हैं:

  • यह कोशिका झिल्लियों को पार नहीं कर सकता इसलिए शरीर की कोशिकाओं के अंदर भारी धातुओं को किलेट करने में असमर्थ होता है।
  • CaNa2EDTA का इंजेक्शन दर्दनाक हो सकता है।
  • यह मस्तिष्क के अन्य ऊतकों से सीसा के पुनर्वितरण को बढ़ावा देता है।

CaNa2EDTA का उपयोग निम्नलिखित जोखिमों और दुष्प्रभावों से जुड़ा है:

CaNa2EDTA के साथ दीर्घकालिक उपचार शरीर में मैग्नीज, तांबा और जिंक के भंडार को समाप्त कर सकता है।

4. डी-पेनिसिलामिन या डीपीए: DPA पेनिसिलिन का एक अवक्रमण उत्पाद है। यह आसानी से आंत में अवशोषित हो जाता है और इसलिए इसे मौखिक रूप से या इंट्राविनिस दोनों ही तरीकों से दिया जा सकता है। दवा में कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया नहीं होती हालांकि थ्रोम्बोसाइटोपेनिया, अप्लास्टिक एनीमिया और ल्यूकोसाइटोपेनिया जैसे लक्षण हो सकते हैं। थ्रोम्बोसाइटोपेनिया कम प्लेटलेट काउंट से जुड़ा है। अप्लास्टिक एनीमिया एक प्रकार का एनीमिया है जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में लाल रक्त कोशिकाएं नहीं बनाता है। ल्यूकोसाइटोपेनिया सामान्य सफेद रक्त कोशिकाओं की तुलना में कम होता है। लंबे समय तक डीपीए के उपयोग से मतली, उल्टी और एनोरेक्सिया हो सकता है। डीपीए के कुछ अन्य विषाक्त प्रभावों में शामिल है:

जिन लोगों को पेनिसिलिन से एलर्जी होती है, उन्हें डीपीए देने पर एलर्जी की प्रतिक्रिया विकसित हो सकती है। गंभीर मामलों में, डीपीए ल्यूपस एरिथेमाटोसस, झिल्लीदार ग्लोमेरुलोपैथी (बीमारी जो किडनी की फिल्टर करने की क्षमता को प्रभावित करती है) और अतिसंवेदनशील न्यूमोनिटिस (फेफड़ों में सूजन और जलन) को जन्म दे सकती है।

5. डेफेरोक्सामिन : डेफेरोक्सामिन का किसी अन्य भारी धातु की तुलना में आयरन के साथ अधिक घनिष्ठ संबंध होता है और इसलिए इसका उपयोग थैलेसीमिया मेजर जैसी आयरन से संबंधित बीमारियों को मैनेज करने के लिए किया जाता है। यह डायलिसिस रोगियों में और खून चढ़ाए जाने वाले मरीजों में होने वाले एल्यूमीनियम संचय को कम करने के लिए भी उपयोग किया जाता है। हालांकि, डेफेरोक्सामिन हीमोग्लोबिन या ट्रांसफरिन (प्रोटीन जो शरीर में लोहे का परिवहन करता है) में लोहे से नहीं बंधता है। एक बार जब यह लोहे के साथ बंधता है तो डेफेरोक्सामिन किडनी और मल के माध्यम से शरीर से बाहर निकल जाता है। डेफेरोक्सामिन के कुछ दुष्प्रभावों में शामिल है:

  • सुनने (कान) और नेत्र (आंख) संबंधी विषाक्तता
  • एलर्जी
  • त्वचा की जलन
  • संक्रमण
  • किडनी, फेफड़े और मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव

आयरन विषाक्तता के कम गंभीर मामलों में डेफेरोक्सामिन का इस्तेमाल करने से बचा जाता है क्योंकि इसका शरीर पर काफी दुष्प्रभाव भी होता है।

यहां किलेशन थेरेपी के कुछ स्वीकृत और अस्वीकृत उपयोग के बारे में बताया जा रहा है:

शरीर से भारी धातुओं को निकालना : भारी धातु विषाक्तता के इलाज के लिए किलेशन थेरेपी का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है- यानी, कोमल ऊतकों में सीसा, आर्सेनिक, मर्क्यूरी, आयरन, कॉपर और मैंगनीज जैसे भारी धातुओं के संचय के कारण होने वाली विषाक्तता।
जिंक, आयरन, तांबा और मैंगनीज सहित कुछ भारी धातुएं शरीर के कार्यों के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे केवल थोड़ी मात्रा में आवश्यक हैं। अधिक शरीर में भारी धातुओं की अधिकता हो जाए तो ये विभिन्न लक्षणों को जन्म देती हैं जो धातु के अनुसार भिन्न होती हैं। उदाहरण के लिए, मैंगनीज विषाक्तता तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकती है और निमोनिया का कारण भी बन सकती है, जबकि सीसा के ओवरएक्सपोजर के कारण उच्च रक्तचाप, रक्त में उच्च प्रोटीन स्तर, गतिभंग (अटैक्सिया गतिविधि विकार) और प्रजनन अंगों को नुकसान हो सकता है।

भारी धातु विषाक्तता व्यावसायिक संपर्क के कारण हो सकता है जैसे- पेंट या ग्लास निर्माण के दौरान आर्सेनिक के संपर्क में आना और थर्मामीटर निर्माण संयंत्रों में पारा के संपर्क में आना, कीटनाशकों को सांस के जरिए शरीर के अंदर लेना, जड़ी-बूटियों या कवकनाशी या खाद्य पदार्थों या पानी का भारी धातुओं के उच्च स्तर के साथ दूषित होना।

डायलिसिस के मरीजों के शरीर में अक्सर अतिरिक्त एल्यूमीनियम की मात्रा जमा हो जाती है और थैलेसीमिया वाले लोगों में आयरन का स्तर अधिक होता है। विल्सन रोग एक वंशानुगत बीमारी है जो जिसके कारण शरीर में कुछ क्षेत्रों में तांबे जमा होने लगता है मुख्य रूप से लिवर, आंख और मस्तिष्क में।

किलेशन थेरेपी के अस्वीकृत उपयोग
किलेशन थेरेपी के अस्वीकृत उपयोग निम्नलिखित हैं:

हृदय रोग उपचार : रक्त वाहिकाओं में बने प्लाक को तोड़ने और कोरोनरी धमनी बाइपास ग्राफ्ट थेरेपी को रोकने में किलेशन थेरेपी को प्रभावी माना जाता है। अधिकतर मामलों में, CaNa2EDTA प्लाक में मौजूद कैल्शियम को किलेट करने या कुछ हार्मोन्स के रिलीज को बढ़ावा देने में मदद करता है जो कैल्शियम को हटाने को बढ़ावा देते हैं और शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करते हैं। EDTA को एक एंटीऑक्सिडेंट और एंटी-इन्फ्लेमेटरी एजेंट भी माना जाता है और इसलिए रक्त वाहिका की सूजन को कम करने में प्रभावी है।

कई अध्ययनों से संकेत मिलता है कि CaNa2EDTA कोरोनरी धमनी की बीमारी के खिलाफ प्रभावी हो सकता है। हालांकि, 1 हजार से अधिक लोगों पर TACT (ट्रायल टू असेस किलेशन थेरेपी) नाम से बड़े पैमाने पर एक अध्ययन किया गया जिसमें यह पाया गया कि किलेशन थेरेपी केवल हृदय की स्थिति में मध्यम प्रभाव दिखाती है और वह भी केवल डायबिटीज के लोगों में। TACT2 नामक एक और विशाल अध्ययन अब मधुमेह रोगियों के हृदय स्वास्थ्य पर किलेशन थेरेपी के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए किया जा रहा है।

ऑटिज्म : अमेरिका स्थित एनजीओ, नैशनल कैपिटल पॉइज़न सेंटर के अनुसार, ऑटिज़्म के लिए किलेशन थेरेपी का उपयोग इस धारणा से आता है कि मर्क्यूरी एक्सपोज़र से ऑटिज़्म होता है। मान्यता यह है कि टीकों में मौजूद थाइमेरोसल नामक मर्क्यूरी कंपाउंड आत्मकेंद्रित होता है। कई बार मां के गर्भ में भी भ्रूण मर्क्यूरी के संपर्क में आ सकता है अगर गर्भवती महिला कुछ दवाइयां खाए या कोई ऐसा भोजन खाए जिसमें मर्क्यूरी मौजूद हो जैसे कुछ प्रकार की मछली या किसी तरह से मर्क्यूरी को सांस के जरिए शरीर के अंदर ले। वास्तव में, ऑटिज्म और मर्क्यूरी विषाक्तता के बहुत सारे लक्षण ओवरलैप होते हैं। उदाहरण के लिए, बौद्धिक विकास में देरी।

हालांकि, मर्क्यूरी एक्सपोजर और ऑटिज्म के बीच किसी भी लिंक को साबित करने के लिए मजबूत सबूत मौजूद नहीं है। ऑटिज्म स्पेक्ट्रम विकार वाले 256 बच्चों में की गई केस-कंट्रोल स्टडी ने सुझाव दिया कि प्रीनेटल या जन्म के तुरंत बाद थिमेरोसल का एक्सपोजर के कारण ऑटिज्म नहीं होता। इटली में किए गए एक अन्य अध्ययन ने संकेत दिया कि ऑटिस्टिक मरीजों में मर्क्यूरी के स्तर में कोई अंतर नहीं है। कुछ अध्ययनों में मर्क्यूरी के बजाय ऑटिज्म रोगियों में उच्च स्तर का सीसा पाया गया है। इसके अतिरिक्त, एक सिद्धांत बताता है कि ऑटिज्म खून में मर्क्यूरी के बजाय इंट्रासेल्युलर मर्क्यूरी के उच्च स्तर के कारण होता है। लेकिन यह परिकल्पना अभी तक सिद्ध नहीं हुई है।

अल्जाइमर्स : अल्जाइमर्स एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है जिसका कोई ज्ञात कारण और उपचार मौजूद नहीं है। सुझावों की मानें तो, अल्जाइमर रोगियों के मस्तिष्क में पाए जाने वाले एमिलॉयड प्लाक जो जमा किए हुए बीटा-एमिलॉयड पेप्टाइड्स होते हैं, वह इस बीमारी का संभावित कारण हो सकते हैं। हालांकि, कुछ लोगों का यही भी कहना है कि केवल एमिलॉयड पेप्टाइड संचय अल्जाइमर का कारण नहीं हो सकता। इसके बजाय, मस्तिष्क में जिंक, आयरन और तांबा जैसे भारी धातुओं का असामान्य स्तर बीटा-एमिलॉयड प्रोटीन का एक असामान्य रूप बनाता है जो मस्तिष्क में एकत्रित हो जाता है। इसके अलावा, भारी धातु ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस को भी बढ़ाते हैं जिससे बीमारी बढ़ती है। मस्तिष्क में एल्यूमीनियम की उच्च सांद्रता भी अल्जाइमर के साथ जुड़ी हुई है। इसलिए, अल्जाइमर के प्रबंधन में बहुत सारे किलेटिंग एजेंट्स को लाभकारी माना जाता है। हालांकि, अल्जाइमर्स के इलाज में किलेशन थेरेपी के चिकित्सीय फायदों को दिखाने के लिए बहुत सारे सबूत मौजूद नहीं हैं। इसके विपरीत, कई अध्ययनों से संकेत मिलता है कि एल्यूमीनियम एक्सपोज और अल्जाइमर्स के बीच कोई संबंध नहीं है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि वर्तमान में उपयोग किए जाने वाले अधिकांश किलेटर्स ब्लड ब्रेन बैरियर से होकर गुजरने के लिहाज से बहुत बड़े हैं। ब्लड ब्रेन बैरियर मस्तिष्क में रक्त वाहिकाओं के एंडोथेलियल झिल्ली को संदर्भित करने के लिए उपयोग किया जाने वाला शब्द है जो खून और मस्तिष्क के बीच मॉलिक्यूल्स की गतिविधि को नियंत्रित करता है।

पार्किंसन्स रोग : पार्किंसंस एक न्यूरोडीजेनेरेटिव डिसऑर्डर है जिसके कारण संतुलन और समन्वय की कमी, स्मृति में गड़बड़ी और झटके लगना शामिल है। यह बीमारी तंत्रिका क्षति (या मृत्यु) और मस्तिष्क में डोपामाइन (एक न्यूरोट्रांसमीटर) की मात्रा में कमी के कारण होती है। वैसे तो न्यूरॉन की मृत्यु का सही कारण ज्ञात नहीं है, मस्तिष्क में लोहे के संचय को एक संभावित कारण के तौर पर जाना जाता है। वर्तमान में पार्किंसंस रोग के लिए किलेशन थेरेपी के फायदे (यदि कोई है) का अध्ययन करने के लिए अनुसंधान चल रहा है। हालांकि अब तक मौजूद सबूत अनिर्णायक है।

किलेशन थेरेपी की सिफारिश करने से पहले, डॉक्टर आप से शरीर में भारी धातुओं के स्तर की जांच करने के लिए कुछ परीक्षण जैसे मूत्र परीक्षण या रक्त परीक्षण करवाने की सलाह देते हैं। इन परीक्षणों में विभिन्न चीजें शामिल हैं:

आपके शरीर में जो भारी धातु है, उसके आधार पर, डॉक्टर एक किलेटिंग एजेंट का चयन करते हैं और इसे मौखिक रूप से या इंट्राविनिस के जरिए (किलेटर पर निर्भर करता है) मरीज को देते हैं। जब सुई शरीर में डाली जाती है तो थोड़ी असुविधा महसूस हो सकती है। इसके बाद आपको कुछ देर तक क्लिनिक या अस्पताल में रहना पड़ सकता है ताकि चिकित्सक यह पता लगा सकें कि आप पर थेरेपी का कोई दुष्प्रभाव दिख रहा है या नहीं।

आपके शरीर में कितनी मात्रा में भारी धातु मौजूद उस पर निर्भर करता है कि आपको एक निश्चित समय के लिए कितनी सेटिंग्स की आवश्यकता हो सकती है- इसमें कुछ हफ्तों से लेकर कुछ महीनों तक का समय लग सकता है। किलेटिंग एजेंट जिन भारी धातुओं से खुद को बांधते हैं वे लगातार आपके शरीर से निष्कासित होते रहते हैं, आमतौर पर मूत्र के माध्यम से लेकिन कई बार मल के माध्यम से भी। जब थेरेपी चल रही होती है, तो आपको भारी धातु या ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन करने से बचने के लिए कहा जाएगा जिसमें उस धातु की अधिक मात्रा पायी जाती हो।

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, हर किलेटिंग एजेंट के अपने निश्चित साइड इफेक्ट्स होते हैं जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं :

  • बुखार
  • सिरदर्द
  • मतली और उल्टी
  • थकान
  • मांसपेशियों में दर्द
  • लो ब्लड प्रेशर और हाई ब्लड प्रेशर
  • हाइपोकैल्सिमिया
  • अतालता (अनियमित दिल की धड़कन)
  • त्वचा में जलन या चकत्ते
  • किडनी या लिवर को नुकसान

किलेटर्स जो इंट्राविनिस माध्यम से दिए जाते हैं, उनमें संक्रमण का जोखिम भी अधिक होता है अगर उन्हें सही ढंग से न दिए जाए। कुछ किलेटर्स एलर्जी प्रतिक्रिया और अन्य खनिजों की कमी का कारण भी बन सकते हैं। गर्भवती महिलाओं और किडनी फेलियर से जूझ रहे लोगों को किलेशन थेरेपी नहीं लेनी चाहिए। यदि आप धूम्रपान करते हैं, अल्कोहल का सेवन करते हैं या किसी पुरानी बीमारी से ग्रस्त हैं तो किलेशन थेरेपी शुरू करने से पहले अपने चिकित्सक से इसके बारे में बात करें।

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