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हम सभी अपने जीवन में कभी न कभी अकेलापन जरूर महसूस करते हैं। अकेलापन जो अस्थायी होता है या कुछ समय बाद अपने आप गुजर जाता है वह कुछ परिस्थितियों में ऐसा होता है जिसे टाला नहीं जा सकता है, उदाहरण के लिए- जीवनसाथी या पार्टनर की मृत्यु के बाद। हालांकि, लंबे समय तक रहने वाला अकेलापन जिसका आपकी सेहत पर बुरा असर पड़ने लगे उसे दूर करने के लिए कई बार चिकित्सीय मदद की जरूरत पड़ती है।

यह बात तो हम सभी जानते हैं कि जीवित रहने और बेहतर तरीके से पनपने के लिए हमें एक समुदाय में रहने की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से आज की इस अत्यधिक प्रसारित नेटवर्क वाली दुनिया में, सफलता पाने और बेहतर करने के लिए आपको दूसरों के साथ कनेक्शन बनाने की जरूरत पड़ती है। लेकिन इस आधुनिक दुनिया की विडंबना यही है कि जैसे-जैसे दुनियाभर के लोग एक दूसरे से जुड़ते जा रहे हैं, वैसे-वैसे अधिक से अधिक लोग अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं।

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बहुत से लोगों का यही मानना है कि इस अकेलेपन के पीछे सोशल मीडिया की भूमिका है। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि 2004 से पहले कोई फेसबुक नहीं था, 2006 से पहले कोई ट्विटर नहीं था और अक्टूबर 2010 तक कोई इंस्टाग्राम भी नहीं था। इन सबसे पहले भी लोग अकेलापन महसूस करते थे। 1980 के दशक में, अमेरिका के कई मनोवैज्ञानिकों डैनियल रसेल, लेटेटिया ए, पेपलौ और कैरोलिन ई कटरोना ने मिलकर अकेलेपन को मापने के लिए एक पैमाना विकसित किया। इसके लिए 20 बहुविकल्प वाले प्रश्नों का जवाब देना था, जैसे "आपको कितनी बार ऐसा महसूस होता है कि आप अपने आसपास के लोगों के साथ सामंजस्य बिठा पाते हैं?" और "आपको कितनी बार ऐसा महसूस होता है कि आपके आसपास ऐसा कोई नहीं है जिसके पास आप अपनी समस्याएं लेकर जा सकते हैं?"

निस्संदेह, इनमें से प्रत्येक प्रश्न- अब भी अकेलेपन को मापने के लिए उपयोग किए जाते हैं- जिसमें यही वाक्यांश शामिल होता है "आपको कैसा महसूस होता है"। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि अकेलापन एक नकारात्मक भावना है जो इस धारणा से उत्पन्न होती है कि कोई व्यक्ति सिर्फ शारीरिक रूप से अकेला नहीं है बल्कि वास्तविकता में अकेला और अलग-थलग है। दोस्तों और परिवार से घिरे होने के बाद भी कुछ लोग अकेलापन महसूस कर सकते हैं।

वैज्ञानिकों को इस बात के कई प्रमाण मिल रहे हैं जिससे पता चलता है कि अकेलेपन का हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। उदाहरण के लिए, शोध से पता चला है कि दीर्घकालिक अकेलापन, सूजन-जलन (इन्फ्लेमेशन) की समस्या को बढ़ा सकता है और संक्रमणों के प्रति हमारी इम्यून प्रतिक्रिया को कम कर सकता है। शोधकर्ताओं ने सामाजिक अलगाव (वास्तविक और कथित) को भी समय से पहले मृत्यु के उच्च जोखिम से जोड़ा है।

इस आर्टिकल में हम अकेलेपन के बारे में हो रही लेटेस्ट रिसर्च और अकेलापन का हमारी सेहत पर क्या असर होता है इस बारे में बता रहे हैं। ऐसे में यह जानने के लिए आगे पढ़ें कि आखिर अकेलापन क्या है, अकेलेपन के संकेत क्या-क्या होते हैं, यह हमारे स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है और अकेलेपन के बारे में हम क्या कर सकते हैं। 

  1. अकेलापन क्या है?
  2. अकेलापन के प्रकार
  3. अकेलेपन के लक्षण
  4. अकेलेपन का कारण और इससे जुड़े जोखिम कारक
  5. अकेलेपन का सेहत पर असर
  6. अकेलेपन का इलाज
  7. और आखिर में इन बातों को याद रखें
  8. अकेलापन के डॉक्टर

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन ने अकेलेपन की परिभाषा देते हुए बताया है कि, "अकेला होना या खुद को अकेला मानते हुए भावात्मक या उत्तेजित करने वाला और संज्ञानात्मक असहजता या बेचैनी महसूस होना"। अकेलेपन को सामाजिक अलगाव के तौर पर माना जाता है- इसका अर्थ है कि आप अकेले हैं या आपके कोई भी करीबी दोस्त नहीं हैं। अकेलेपन से पीड़ित व्यक्ति को ऐसा महसूस होता है कि उसके वर्तमान सामाजिक जीवन और जैसा वे चाहते हैं कि उनका सामाजिक जीवन और सामाजिक संबंध हो उसके बीच एक बड़ा अंतर है। यह अंतर कई कारणों से उत्पन्न हो सकता है; उदाहरण के लिए, अन्य लोगों के सोशल मीडिया के जीवन को देखकर अपने लिए अवास्तविक अपेक्षाएं निर्धारित करना।

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अकेलापन, एकांत स्थान में रहने या एकाकीपन से अलग है क्योंकि इस तरह का अकेलापन अवांछित है जो व्यक्ति के लिए दर्द या दुख का कारण बनता है। किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जो अकेला है, उसे भीड़ के बीच या शुभचिंतकों से घिरे रहने के दौरान भी अकेलापन या अलगाव का ही अनुभव होता है। इस अर्थ में, अकेलापन एक भावना है। यह आमतौर पर नकारात्मक भावनाओं से जुड़ा होता है जो हमारे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है।

अनुसंधान से पता चलता है कि अकेलापन हृदय रोग, फेफड़े की बीमारी, उच्च रक्तचाप, एथेरोस्क्लेरोसिस, स्ट्रोक जैसी दीर्घकालिक स्थितियों और डायबिटीज और मोटापे जैसी मेटाबॉलिक बीमारियों के कारण भी हो सकता है और इन बीमारियों का कारण भी बन सकता है। अकेलापन "विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याओं जैसे- डिप्रेशन, मनोवैज्ञानिक तनाव और चिंता का पूर्वानुमानक है... (और) वयस्क आबादी में समग्र अस्वस्थता और मृत्यु दर से भी जुड़ा हुआ है।" 

वयस्क विकास से जुड़ी हार्वर्ड की एक स्टडी जो अब भी जारी है- इसे 1939 में शुरू किया गया था और शायद यह अब तक की सबसे लंबे समय तक चलने वाली स्टडी है- इस बारे में है कि वह कौन सी चीज है जो लोगों को अपने जीवन से खुश और संतुष्ट बनाती है- स्टडी में यह दर्शाया गया है कि वे लोग जो समुदाय में शामिल हैं और जिनका अपने परिवार, दोस्तों या पति-पत्नी के साथ घनिष्ठ संबंध है, उन लोगों के बुढ़ापे में भी स्वस्थ और खुश रहने की संभावना अधिक है।

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इसका विपरीत भी सच है: ऐसे लोग जो अकेले हैं या बुरे रिश्तों में फंसे हैं, जहां बहुत झगड़ा होता है या जहां उन्हें लगता है कि वे अपने साथी पर भरोसा नहीं कर सकते हैं या उन पर पूरी तरह से निर्भर नहीं कर सकते हैं, उन लोगों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में गिरावट का अनुभव होता है।

1970 के दशक में, यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचूसेट्स के समाजशास्त्री रॉबर्ट एस वीस ने भावनात्मक अकेलापन और सामाजिक अकेलापन के बारे में लिखा था।

  • भावनात्मक अकेलापन किसी व्यक्ति को तब महसूस होता है जब आप यह सोचने लगें कि आपके जीवन में ऐसा कोई नहीं है जो "पालनकर्ता विश्वासपात्र के रूप में कार्य करता हो, जो आपके अस्तित्व की पुष्टि करता हो"। यह किसी ऐसे व्यक्ति को खोने से भी पैदा हो सकता है जिसे आप प्यार करते हों या जिसके साथ आप भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हों।
  • सामाजिक अकेलापन व्यक्ति के संबंधों और रिश्तों की गुणवत्ता के बारे में है। आप अपने करीबी दोस्तों और परिवार के सदस्यों से कितनी बार मुलाकात करते हैं और उनके साथ आपका रिश्ता कैसा है, यह इस बात का संकेत हो सकता है कि आप अकेलापन महसूस करते हैं या नहीं। सामाजिक अकेलापन संबंधपरक होता है यानी दूसरों के संबंध में। कुछ परिस्थितियां जैसे- किसी नए शहर या स्कूल या नई जगह रहने के लिए जाना जहां आप किसी को नहीं जानते और जहां आपका कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं है वहां भी छोटी अवधि के लिए सामाजिक अकेलापन महसूस हो सकता है।
  • अवस्थापरिवर्तन से जुड़े अकेलेपन के मामले में, लक्षण (जैसे-उदासी) स्वास्थ्य पर स्थायी प्रभाव डाले बिना कुछ ही दिनों में गुजर सकता है। हालांकि, अगर यही स्थिति दीर्घकालिक यानी लंबे समय तक चलने वाले अकेलेपन में बदल जाए तो यह कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।

उदाहरण के लिए- जो लोग अकेले हैं, एकाकी हैं उनके खून में सुबह के समय स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल का लेवल बहुत अधिक होता है। यह सुनिश्चित करने के लिए, हम आपको बता दें कि जब आप सुबह उठते हैं तब आमतौर पर आपका कोर्टिसोल सामान्य से अधिक होता है (अगर आपकी रात की नौकरी है जिस स्थिति में दिन-रात का चक्र उलट जाता है)। लेकिन अकेलापन स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल में असामान्य वृद्धि का कारण बनता है जो आपके रक्तचाप, नब्ज, मेटाबॉलिज्म और समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

हर व्यक्ति को किसी न किसी समय अकेलापन महसूस होता है। हालांकि, दीर्घकालिक अकेलापन या हर किसी से पूरी तरह से अलग होने जाने की भावना हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। वैसे तो अकेलेपन को किसी मानसिक बीमारी के रूप में नहीं जाना जाता है, बावजूद इसके कुछ सामान्य लक्षण और संकेत हैं जिनकी आपको अनदेखी नहीं करनी चाहिए:

  • भीड़ में रहने या दोस्तों, परिवार के लोग और सहकर्मियों से घिरा होने के बावजूद अकेलापन महसूस करना
  • लोगों के साथ गहराई में उतरकर संबंध बनाने में अक्षमता महसूस होना या दूसरों के साथ संपर्क स्थापित करने की कोशिश में थकान महसूस होना
  • खुद पर संदेह होना और अयोग्यता महसूस होना
  • चिंता या बेचैनी की भावना
  • बहुत कम या बहुत अधिक सोना या नींद में बार-बार बाधा आना
  • शरीर में ऊर्जा और उत्साह की कमी
  • भूख न लगना
  • शरीर में दर्द
  • अधिक शॉपिंग करना या फिल्में और शोज बहुत ज्यादा देखना
  • ऐसा महसूस होना कि आपका किसी के साथ कोई संबंध नहीं है

अधिक उम्र वाले और बुजुर्ग लोगों में अकेलापन होने का जोखिम सबसे अधिक होता है। हालांकि यह मानना भी ​​गलत है कि केवल बुजुर्ग ही अकेलेपन से पीड़ित होते हैं। नवजात शिशुओं को गले लगाने और आराम से प्यार दिखाकर माता-पिता के साथ विश्वास का एक बंधन विकसित करने की आवश्यकता होती है ताकि जब वे बड़े हों तो अलगाव के बारे में उनका एक स्वस्थ दृष्टिकोण बन पाए।

बच्चे और युवा वयस्कों को भी अकेलापन महसूस हो सकता है। डराने-धमकाने (बुलिंग) जैसी जीवन की घटनाएं, स्कूल या पारिवारिक कलह में खुद को उपयुक्त न समझने के कारण भी बच्चे अलग-थलग महसूस कर सकते हैं। अनुसंधान से पता चलता है कि बचपन में होने वाली प्रतिकूल घटनाओं का जीवनभर समग्र कल्याण पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

इसके अलावा खराब रिश्ते में होना, बुरी तरह से ब्रेकअप होना या पार्टनर की मौत जैसे कई कारक भी लोगों को कम उम्र में ही अकेलापन महसूस करवा सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालने वाले सामाजिक-आर्थिक कारक भी अकेलापन महसूस करने के लिए अतिसंवेदनशील बना सकते हैं। इन कारकों में निम्न आय या वित्तीय कठिनाइयां, बेरोजगार होना या शिक्षा का निम्न स्तर भी शामिल है।

इसके अतिरिक्त, कोई पुरानी बीमारी या स्थिति जो किसी व्यक्ति को बाहर जाने या बाहर खाने से रोकती है या जो चीजें उनके दोस्त कर रहे हैं लेकिन वे नहीं कर पा रहे उन्हें करने की चाहत भी उन्हें अकेला महसूस करवा सकती है। मल्टीपल स्केलेरोसिस जैसी पुरानी या प्रगतिशील बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की देखभाल करने वालों को भी अकेलापन महसूस होने का जोखिम अधिक होता है। 

रिसर्च में यह बात भी सामने आयी है कि जो लोग वास्तविक जीवन में लोगों के साथ घुलने मिलने और समय बिताने की बजाए ऑनलाइन बहुत ज्यादा समय बिताते हैं उन्हें भी अकेलापन और कई दूसरी सेहत से जुड़ी समस्याएं होने का खतरा अधिक होता है। रिसर्च के मुताबिक, अकेलेपन के संभावित कारण निम्नलिखित हैं:

  • आनुवंशिकी या पैतृक संवेदनशीलता अकेलेपन के प्रति
  • बचपन का माहौल
  • सांस्कृतिक मानदंड
  • सामाजिक जरूरतें
  • शारीरिक विकलांगता
  • वास्तविक और वांछित संबंधों के बीच विसंगतियां

जो लोग अकेलापन महसूस करते हैं, वे अपनी परिस्थितियों के बारे में अधिक नकारात्मक दृष्टिकोण अपना लेते हैं। उदाहरण के लिए- ऐसे लोगों के लिए कोई स्थिति ज्यादा तनावपूर्ण हो सकती है उन लोगों की तुलना में जिनके पास एक मजबूत समर्थन तंत्र और सामाजिक कनेक्शन होता है। तनाव का, जैसा कि हम जानते हैं, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ा कई पहलू होता है। अकेलापन कई बार बुरी जीवनशैली के विकल्पों से भी जुड़ा हो सकता है, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि अकेलेपन के कारण व्यक्ति बुरे विकल्पों का चुनाव करता है या नहीं, जैसे- धूम्रपान या शारीरिक गतिविधि में कमी आदि या फिर क्या इन बुरे विकल्पों की वजह से व्यक्ति को अकेलेपन की समस्या होती है।

यहां अकेलेपन के विज्ञान समर्थित प्रभावों पर एक नजर डालते हैं:

  1. मरीजों में लक्षणों का बिगड़ना : जिन लोगों में लंबे समय तक सेहत से जुड़ी कोई समस्या होती है, उन लोगों में अकेलापन उनके मौजूदा लक्षणों को बढ़ा सकता है। उदाहरण के लिए, दीर्घकालिक दर्द के मरीजों को अकेलेपन के कारण दर्द में वृद्धि का अनुभव हो सकता है। यह एक दुष्चक्र की तरह है जिसमें, दर्द उनके अकेलेपन को बढ़ा सकता है, क्योंकि वे सामाजिक रूप से अधिक अनिच्छुक हो सकते हैं या दर्द होने पर बाहर नहीं जा सकते हैं।
  2. देखभाल करने वालों का दर्द और थकान बढ़ सकती है : डिमेंशिया जैसी क्रमिक या लगातातर बढ़ने वाली बीमारी या कैंसर जैसी तनावपूर्ण डायग्नोसिस वाली बीमारी से पीड़ित मरीजों की देखभाल करने वालों को अकेलेपन के परिणामस्वरूप अधिक थकान, दर्द और यहां तक ​​कि डिप्रेशन का भी अनुभव हो सकता है।
  3. संचालन संबंधी कार्यों में कमजोरी विशेष रूप से बुजुर्गों में : अकेलेपन से जूझ रहे लोगों द्वारा अकेले बाहर जाने और वर्कआउट करने के लिए प्रेरित होने की संभावना कम होती है। समय के साथ, शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण दर्द अधिक होता है संचालन संबंधी क्षमता कम हो जाती है। अध्ययन ने अकेलेपन को मोटर फंक्शन यानी संचालन संबंधी कार्यों में गिरावट से जोड़ा है जो दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों जैसे स्नान और कपड़े पहनने को बुजुर्गों के लिए कठिन बना देता है।
  4. मस्तिष्क के कार्य और मानसिक कल्याण पर प्रभाव : अकेलापन मस्तिष्क के कार्यों और मानसिक स्वास्थ्य को सभी उम्र के लोगों में प्रभावित करता है:
  • बच्चों और किशोरों में, यह खराब ध्यान, नींद की खराब गुणवत्ता और खुद को नियंत्रित करने में कठिनाई के रूप में नजर आ सकता है। अकेलापन भावनात्मक विकृति और खाने के विकारों जैसे जरूरत से ज्यादा खाना और बुलिमिया नर्वोसा के बीच एक कड़ी भी बन सकता है।
  • अधिक उम्र वाले बुजुर्गों में, अकेलेपन को अल्जाइमर्स रोग और संज्ञानात्मक गिरावट के साथ जोड़ा गया है। (समस्या ये है कि संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट से अधिक अकेलापन हो सकता है, क्योंकि व्यक्ति सामाजिक संपर्क से दूर हो सकता है और शर्मिंदा महसूस कर सकता है क्योंकि वह सभी के साथ सामाजिक रूप से भाग लेने में असमर्थ होता है।)
  • अकेलापन डिप्रेशन, तनाव और चिंता जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं के लिए भी बेहद खतरनाक हो सकता है। वास्तव में, अकेलापन और डिप्रेशन आपस में जुड़े हुए हैं: एक तरफ जहां अवसादग्रस्तता की स्थिति, मनोदशा संबंधी विकार और मानसिक विकारों से पीड़ित लोगों को अकेलापन महसूस होने की संभावना है वहीं दूसरी तरफ जो अकेले हैं उन्हें डिप्रेशन होने का जोखिम अधिक है।
  • अध्ययनों से पता चलता है कि जो लोग अकेले हैं, उनके द्वारा गैर-अकेले लोगों की तुलना में साइकोऐक्टिव पदार्थों का उपयोग करने की अधिक आशंका होती है जो बदले में खराब मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक जोखिम कारक है।
  • शोध से पता चलता है कि जो लोग अकेले हैं उन्हें गैर-अकेले लोगों की तुलना में ऐसा महसूस होता है कि उनके रिश्ते में कुछ गलत होने की आशंका है। यह नकारात्मक दृष्टिकोण रिश्तों को बनाए रखने या उनमें खुश रहने की उनकी क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है। जॉन टी कैसियोपो और लुईस सी हॉकले ने "पर्सीव्ड सोशल आइसोलेशन एंड कॉग्निशन" में लिखा है, "अकेलापन बुरे सामाजिक परिणामों से बचने के लिए और प्रेरणाओं की मजबूत अपेक्षाओं और कमजोर सामाजिक उम्मीदों और कमजोर उम्मीदों से संबंधित है।" (ट्रेंड्स इन कॉग्निटिव साइंसेज में साल 2009 में प्रकाशित)।
  • 6. शारीरिक सेहत पर प्रभाव : अनुसंधान ने अकेलेपन को कई स्वास्थ्य समस्याओं के साथ जोड़ा है जैसे:
  • हृदय रोग
  • फेफड़ों की बीमारी
  • उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन)
  • एथेरोस्क्लेरोसिस या रक्त वाहिकाओं में कोलेस्ट्रॉल पट्टी का निर्माण
  • आघात
  • मोटापा जैसी चयापचय संबंधी बीमारी
  • मधुमेह जैसी चयापचय संबंधी बीमारी
  • मौत

अकेलेपन का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि अकेलेपन का अंतर्निहित कारण क्या है। इस स्थिति को संबोधित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले दृष्टिकोण निम्नलिखित हैं:

  • संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी : यह एक प्रकार की टॉक थेरेपी है जिसमें एक प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक, मरीज के दृष्टिकोण को बदलने में मदद करने के लिए उन्हें खुद को, उनके रिश्तों को और उनके जीवन को अधिक सकारात्मक दृष्टि से देखने में उनकी मदद करता है। संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी का सभी उम्र के लोगों पर सकारात्मक असर होता है।
  • ड्रग थेरेपी : अगर आपके अकेलेपन का कारण अवसाद जैसी कोई चिकित्सीय स्थिति है, तो चिकित्सक एंटीडिप्रेसेंट या एंटीसाइकोटिक दवाइयां प्रिस्क्राइब करते हैं।
  • जीवनशैली में बदलाव : डॉक्टर आपको अपने खानपान और वर्कआउट रूटीन में भी बदलाव करने की सलाह दे सकते हैं। रिसर्च से पता चलता है कि जो लोग अकेलापन महसूस करते हैं वे कम वर्कआउट करते हैं। एक्सरसाइज करने से फील-गुड हार्मोन (एन्डोर्फिन) रिलीज होता है इसलिए अकेलेपन का शिकार लोगों की रूटीन में अगर एक्सरसाइज को शामिल किया जाए तो इससे उनकी काफी मदद हो सकती है।

कुछ इलाज या हस्तक्षेप ऐसे भी हैं जिन्हें विशिष्ट आयु समूहों की ओर टार्गेट किया जा सकता है:

  • बच्चों के लिए : अनुसंधान से पता चलता है कि बच्चे उन वातावरणों में पनपने में विफल होते हैं, जहां उन्हें माता-पिता के साथ लगाव और सुरक्षा की कमी महसूस होती है, भले ही उनकी बाकी की जरूरतें जैसे- भोजन और गर्मजोशी की पूर्ति हो रही हो। इसीलिए जीवन के शुरुआती वर्षों में हमारे बच्चों के लिए माता-पिता का पूर्वानुमानित और उत्तरदायी होना महत्वपूर्ण है ताकि बच्चे उन्हें अविश्वास के साथ देखने के बजाय रिश्तों को एक स्वस्थ दृष्टिकोण के साथ देखें। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, माता-पिता को उन्हें यह समझाना चाहिए कि कुछ देर अकेले रहना और अकेलापन दोनों एक समान नहीं है। स्कूल जाने वाले बच्चों में अकेलेपन की समस्या को रोकने के लिए साथियों द्वारा सामाजिक स्वीकृति मिलने का अहम रोल है। स्कूल को भी नए बच्चों में सकारात्मक व्यवहार को प्रोत्साहित करना चाहिए और ऐसे बच्चों की तलाश करनी चाहिए जिन्हें दोस्त बनाने में कठिनाई होती है।
  • किशोरों के लिए : किशोरावस्था का समय शरीर और मस्तिष्क में कई बड़े बदलाव का समय होता है। यह वह उम्र भी है जब कई युवा धूम्रपान, शराब, ड्रग्स और सेक्स के साथ प्रयोग करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में किशोरावस्था में ब्रेकअप सदमा पहुंचाने वाला हो सकता है। दोस्ती में विश्वासघात रिश्तों के अंत के समान महसूस होता है। स्कूली छात्रों का सबसे तनाव होता है- बोर्ड एग्जाम लिखना- जिसमें निराशा और अकेलेपन की भावनाएं समाहित होती हैं। और ऊपर से सोशल मीडिया का तनाव अलग। अनुसंधान से पता चलता है कि अकेलापन इस आयु वर्ग में सामाजिक चिंता को आत्महत्या से जोड़ने वाला कारक हो सकता है।
  • ऐसे किशोर बच्चे या युवाओं के लिए माता-पिता, स्कूल काउंसलर और समुदाय के सदस्यों को मिलाकर उचित सहायता प्रणाली का निर्माण करना जरूरी है। अनुसंधान से पता चलता है कि ऐसे कुछ संकेत हैं जिसे माता-पिता, भाई-बहन, शिक्षक और दोस्तों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, जैसे- खाने पर खराब नियंत्रण और खराब नींद की गुणवत्ता, जो किशोरावस्था में अकेलेपन जैसे मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे का संकेत दे सकता है।
  • बुजुर्गों के लिए : सामुदायिक और सामाजिक गतिविधियां बुजुर्गों में अकेलेपन को कम कर सकती हैं। अनुसंधान से पता चलता है कि लोगों के साथ बातचीत करने से "संज्ञानात्मक संचय" बना रहता है जो मस्तिष्क पर उम्र बढ़ने के प्रभावों को धीमा करता है। द हार्वर्ड अडल्ट डेवलपमेंट स्टडी से पता चला है कि 70-80 साल के बुजुर्ग जिनके पास घनिष्ठ मित्रता थी और जो अपने साथी पर भरोसा कर सकते थे उन लोगों की याददाश्त और मस्तिष्क के कार्यों में धीमी गिरावट आई।

अकेलेपन को सामाजिक अलगाव के तौर पर देखा जाता है। यह उस अंतर से उत्पन्न हो सकता है कि हम वास्तविक जीवन में कितने कनेक्शन बनाना चाहते हैं और वास्तव में कितने कनेक्शन हमारे पास हैं (हमारा आदर्श बनाम वास्तविक सामाजिक जीवन)। अकेलापन एक उपयोगी प्रेरणा हो सकता है जो हमें बाहर जाने और अधिक कनेक्शन की तलाश करने के लिए प्रेरित करता है, लेकिन यह एक नकारात्मक भावना भी हो सकती है जिसका हमारी सेहत पर दूरगामी परिणाम होते हैं।

अकेलापन वास्तव में कोई बीमारी नहीं है, लेकिन इसकी वजह से कई स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। अकेलापन निम्नलिखित चीजों से जुड़ा है:

मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं

शारीरिक स्वास्थ्य समस्या

  • हाई ब्लड प्रेशर
  • हृदय रोग
  • फेफड़ों की बीमारी
  • एथेरोस्क्लेरोसिस और स्ट्रोक का खतरा
  • समय से पहले मौत

खुद में और अपने प्रियजनों में अकेलेपन के संकेतों पर नज़र रखना महत्वपूर्ण है और जरूरत पड़ने पर मदद के लिए हाथ आगे जरूर बढ़ाएं। संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी हर उम्र और जीवन के हर चरण में लोगों की मदद कर सकती है। अकेलेपन के अंतर्निहित कारणों का पता लगाकर इसके लिए कई तरह की ड्रग थेरेपी और इलाज मौजूद है जो अकेलेपन को नियंत्रण से बाहर होने में मदद कर सकता है।

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