बच्‍चों की आंखों की कम रोशनी को पीडियाट्रिक लो विजन के नाम से जाना जाता है. बच्चों की आंखों की रोशनी कम होने के पीछे प्रमुख कारण ऐल्बिनिजम, पीडियाट्रिक कैटरेक्ट या फिर पीडियाट्रिक ग्लूकोमा हो सकता है. छोटे बच्चों का तेज रोशनी में भी देर तक आंखें न झपकाना और बड़े बच्चों को पढ़ने में दिक्कत होना या सिरदर्द होना आंखों की रोशनी कम होने के मुख्य लक्षण हो सकते हैं. ऐसे में बच्चे को बाहर ले जाते हुए आंखों को सूरज की यूवी किरणों से बचाना व तय समय पर आंखों की जांच करवाना जरूरी है.

आज इस लेख में आप जानेंगे कि बच्चों की आंखों की रोशनी कम होने के मुख्य कारण व लक्षण क्या-क्या हैं -

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  1. बच्चों की आंखों की रोशनी कम होने के कारण
  2. बच्चों की आंखों की रोशनी कम होने के लक्षण
  3. बच्चों की आंखों की रोशनी बढ़ाने के उपाय
  4. सारांश
बच्चों की आंखों की रोशनी कम होने के कारण, लक्षण व उपाय के डॉक्टर

बच्चों की आंखों की रोशनी कम होने के पीछे पीडियाट्रिक ग्लूकोमा आदि हो सकता है. आइए, इन कारणों के बारे में विस्तार से जानते हैं -

ऐल्बिनिजम

ऐल्बिनिजम जीन में ही मौजूद होता है. इस आनुवंशिक समस्या में मेलेनिन का प्रोडक्शन या तो बिल्कुल नहीं होता या कम मात्रा में होता है. ऐल्बिनिजम आमतौर पर स्किन, हेयर और आंखों को प्रभावित करता है. हेल्दी मेलेनिन रेटिना को डेवलप करने में मदद करता है. वहीं, मेलेनिन की कम मात्रा या बिल्कुल भी न होने पर आंखों से संबंधी कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं, जैसे - धुंधला दिखाई देना, कम दिखाई देना या इरिवर्सिबल विजन लॉस होना, दूर का या पास का दिखाई देने में समस्या होना इत्यादि. ऐल्बिनिजम से जुड़ी आंखों संबंधी समस्याएं लाइफटाइम रहती हैं, लेकिन एक समय के बाद अधिक खराब नहीं होती.

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ओकुलर ट्रॉमा

ब्लाइंडनेस का मुख्य कारण ओकुलर ट्रॉमा है, जोकि आमतौर पर एक आंख को प्रभावित करता है. इस स्थि‍ति में परमानेंट विजुअल इंपेयरमेंट या ब्लाइंडनेस की समस्या हो सकती है.

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पीडियाट्रिक कैटरेक्ट

आंखों के लेंस में होने वाली अस्पष्टता या क्लाउडीनेस को पीडियाट्रिक कैटरेक्ट कहते हैं. कैटरेक्ट छोटा होने पर इसका आंख पर कोई खास असर नहीं होता, लेकिन गंभीर कैटरेक्ट होने पर सीरियस विजन लोस हो सकता है. इसका मुख्य कारण इंफेक्शन, जेनेटिक या एब्नॉर्मल लेंस डेवलपमेंट होना है. अगर कैटरेक्ट के कारण बच्चे को देखने में अधिक समस्या है, तो डॉक्टर तुरंत सर्जरी कर सकते हैं.

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पीडियाट्रिक ग्लूकोमा

इस समस्या का बच्चे के 1 साल का होने से पहले ही पता चल सकता है. ग्लूकोमा के कारण आई इंटरनेल प्रेशर बढ़ जाता है, जिसकी वजह से परमानेंट ऑप्टिक नर्व्स डैमेज हो सकती है. ग्लूकोमा के कारण देखने में समस्या होना, आंखों से पानी आना, कॉर्निया में धुंधलापन व लाइटिंग सेंसिटिविटी होना है. अधिकतर मामलों में पीडियाट्रिक ग्लूकोमा को कंट्रोल या ठीक किया जा सकता है.

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रेटिनल डिजीज

बार्डे बिडल सिंड्रोम (Bardet-Biedl syndrome), लेबर कन्जेनिटल अमौरोसिस (Leber congenital amaurosis), रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा (retinitis pigmentosa), स्टारगार्ड मैकुलर डिस्ट्रॉफी (Stargardt macular dystrophy) और अशर सिंड्रोम (Usher syndrome) जैसी रेटिनल समस्याएं बच्चों में आंखों की कम रोशनी या ब्लाइंडनेस का कारण बन सकती है. रेटिना डिजीज का पता चलने पर बच्चे का समय-समय पर चेकअप करवाना जरूरी है, क्योंकि ये समस्या समय के साथ बढ़ सकती हैं.

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बच्चों की आंखों की रोशनी कम होने पर उन्हें पढ़ने, चेहरे पहचानने या गेम खेलने में समस्या हो सकती है. आइए, उम्र के हिसाब से बच्चों की आंखों की रोशनी कम होने के लक्षणों के बारे में जानते हैं -

जन्म से 4 महीने तक

आमतौर पर इस समय तक बच्चा चीजों पर फोकस करने और उन्हें ट्रैक करने लगता है, लेकिन आंखों की रोशनी कम होने पर तेज रोशनी के प्रति कम संवेदनशील होना या तेज रोशनी में आंखे देर तक न झपकाना या कोई फर्क न पड़ना जैसे लक्षण दिख सकते हैं.

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5 से 8 महीने तक

इस समय तक बच्‍चा चेहरा और रंग पहचानने लगता है, लेकिन आंखों की रोशनी कम होने पर आई कॉन्टेक्ट करने में देरी करना या परिचित चेहरों को पहचानने में दिक्कत होना आदि लक्षण दिख सकते हैं.

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9 महीने से 24 महीने तक

इस समय तक बच्चे रेंगना, चीजों को पकड़ना और हैंड-आई कॉर्डिनेशन शुरू कर देते हैं, लेकिन लो विजन होने पर हाथों के मोमेंट में या हाथों के डारेक्शन की तरफ अवेयर होने में कमी होना जैसे लक्षण दिख सकते हैं.

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24 महीने से अधिक होने पर

इस समय तक बच्चे क्रॉलिंग, वॉकिंग और माहौल के साथ खुद को एक्सप्लोर करने लगते हैं. वहीं, आंखों की रोशनी कम होने पर बच्चे को अपने खिलौने को पहचानने या उस तक पहुंचने में दिक्कत होती है. इसके अलावा, कदम ठीक से आगे न बढ़ा पाने जैसे लक्षण दिख सकते हैं.

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स्कूल जाने वाले बच्चे

इस उम्र में बच्चे आसानी से पढ़ने लगते हैं, लेकिन आंखों की रोशनी कम होने पर बच्चे सिरदर्द या आंखों में धुंधलेपन की शिकायत कर सकते हैं या उन्हें पढ़ने में दिक्कत हो सकती है. रोड क्रॉस करने में दिक्कत हो सकती है. किसी नई चीज को सीखने में समस्या आ सकती है.

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बच्चों की आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए उन्हें न्यूट्रिशन फूड, समय-समय पर चेकअप और ऐसी एक्टिविटीज करवानी चाहिए, जिससे आंखों की रोशनी बढ़े. साथ ही आंखों को सूरज की रोशनी से बचाना भी जरूरी है. आइए, बच्चों की आंखों की रोशनी बढ़ाने के उपायों के बारे में विस्तार से जानते हैं -

स्वस्थ भोजन

गर्भावस्था के दौरान महिला को स्वस्थ खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए. साथ ही बाद में जब बच्चा ठोस पदार्थ लेने शुरू करे, तो उसकी डाइट पर ध्यान देना भी जरूरी है. फलसब्जियांनट्स व फिश आदि एंटीऑक्सीडेंटविटामिन-सीविटामिन-ईजिंकओमेगा-3 फैटी एसिड और ल्यूटिन जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं, जो आंखों के स्वास्थ्य से जुड़े होते हैं.

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सन प्रोटेक्शन है जरूरी

बच्चे को सन ग्लासेज दें. जरूरी हो तो धूप में निकलते समय छतरी का उपयोग करें. ध्यान रखें बच्चें की आंखों में डायरेक्ट सनलाइट न जाए और साथ ही बहुत तेज रोशनी भी आंखों में न पड़े.

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इन बातों का भी रखें ध्यान

बच्चे को स्पो‍र्ट्स एक्टिविटी के समय सेफ एथलेटिक गियर पहनाएं. बच्चे की आंखों की नियमित जांच करवाएं. आंख में चोट लगने पर तुरंत इमरजेंसी में दिखाएं.

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बच्चों की आंखों की रोशनी कम होने से बच्चे के संपूर्ण विकास पर प्रभाव पड़ता है. ऐसे में बच्चे की आंखों की रोशनी के कम होने के कारणों का समय पर पता लगाकर उसका इलाज करवाना जरूरी है. बच्चों की आंखों की रोशनी रेटिना एब्नॉर्मल, पीडियाट्रिक कैटरेक्ट्स या ग्लूकोमा, ट्रामा या आनुवंशिक इत्यादि कारणों से हो सकती है. इसके लक्षणों में बच्चे का ठीक से पढ़ने-लिखने में दिक्कत होना, चेहरों को पहचानने में दिक्कत होना या आंखों में धुंधलापन की समस्या हो सकती है. बच्चों की आंखों की रोशनी को ठीक करने के लिए समय-समय पर डॉक्टर से चेकअप करवाना और हेल्दी फूड खाना जरूरी है. इमरजेंसी स्थिति या कोई आशंका होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

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