आँख का कैंसर - Eye cancer in Hindi

Dr. Ajay Mohan (AIIMS)MBBS

November 03, 2020

September 03, 2021

आँख का कैंसर
आँख का कैंसर

इसमें कोई शक नहीं कि हमारी दृष्टि यानी देखने की क्षमता, सबसे अहम ज्ञानेंद्रियों में से एक है। इंसान की आंखें जो उन्हें देखने में मदद करती हैं, उनका अंदरुनी कामकाज बेहद जटिल होता है और आंखों की संरचना भी बेहद पेचीदा होती है। 

हम अपनी आंखों की तुलना डिजिटल कैमरे के साथ कर सकते हैं। कैमरे के लेंस की ही तरह आंखों की पुतली की जो सामने वाली घुमावदार सतह होती है जिसे कॉर्निया कहते हैं, वह रोशनी को केंद्रित करने में मदद करती है। आंखों का रंगीन हिस्सा जिसे आइरिस कहते हैं, वह कैमरे के शटर या डायफ्राम की तरह काम करता है और आंखों की पुतली या प्युपिल (रंगीन आइरिस के अंदर काले रंग का गोलाकार केंद्र कैमरे के अपर्चर यानी छिद्र की तरह काम करता है) के साइज को अडजस्ट करता है ताकि आंखों में प्रवेश करने वाली रोशनी की मात्रा को कंट्रोल किया जा सके और तस्वीर को बेहतर तरीके से देखने में मदद मिले। आंखों की पुतली के जरिए, रोशनी आंखों के पारदर्शी लेंस पर पड़ती है जो उसे और अधिक फोकस करती है। कॉर्निया और पारदर्शी लेंस द्वारा फोकस की गई रोशनी फिर रेटिना (आंखों की सबसे अंदरुनी सतह) पर पड़ती है जो इमेज सेंसर की तरह काम करता है और इस ऑप्टिकल यानी प्रकाश संबंधी तस्वीर को इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल में परिवर्तित कर देता है और ऑप्टिक तंत्रिका, ब्रेन में मौजूद विजुअल कॉर्टेक्स तक इस सिग्नल को लेकर जाता है जहां पर वह वस्तु क्या है उसकी व्याख्या की जाती है।

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आंखों का कैंसर एक असाधारण बीमारी है। प्राथमिक आई कैंसर जो आंखों में ही शुरू होता है उस कैंसर की तुलना में दुर्लभ है जो शरीर के किसी और अंग में शुरू होता है लेकिन फिर फैलते हुए आंखों तक पहुंच जाता है। वयस्कों में पाया जाने वाला आंखों के कैंसर का सबसे कॉमन रूप आइरिस, सिलिअरी बॉडी और कोरॉइड यानी रक्तक का मेलानोमा है जो हर साल करीब 10 लाख लोगों में से सिर्फ 5 लोगों में डायग्नोज होता है। 

विस्तृत रूप से देखा जाए तो आंखों का कैंसर 2 तरह का होता है। पहला वो जो आंखों के अंदर मौजूद संरचनाओं में उत्पन्न होता है और दूसरा वो जो आसपास मौजूद सहयोगात्मक ऊत्तकों जैसे- पलकें आदि में होता है। अक्सर यह देखने में आता है कि आंखों का कैंसर सही समय पर डायग्नोज नहीं हो पाता क्योंकि इसमें मरीज को किसी तरह का दर्द महसूस नहीं होता है। व्यक्ति की देखने की क्षमता का धीरे-धीरे कमजोर होना ही इसका सामान्य लक्षण है। बाहरी संकेतों की बात करें तो इसमें आंखों की पुतलियों में उभार नजर आना और आंखों के आसपास मौजूद संरचनाओं में किसी तरह की गांठ दिखना शामिल है।

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आंखों के कैंसर को डायग्नोज करने के लिए ऑप्थैल्मोस्कोपिक परीक्षण, ब्लड टेस्ट और इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इसका निश्चित इलाज या तो सर्जरी हो सकती है या फिर रेडियोथेरेपी। बेहतर नतीजे हासिल करने के लिए लेजर थेरेपी का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर यह कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक न फैले तो रोग का निदान अच्छी तरह से हो सकता है।

आंखों का कैंसर क्या है? - What is Eye cancer in Hindi?

कोशिकाओं का अनियंत्रित विकास जो आंखों के अंदर शुरू होता है और वहीं पर बढ़ने लगता है उसे ही आंखों के कैंसर के रूप में जाना जाता है। ये कोशिकाएं सामान्य कोशिकाओं से अलग होती हैं क्योंकि उनकी वृद्धि अनियंत्रित होती है और इसलिए उन्हें असामान्य या अप्रारुपिक कोशिकाएं कहा जाता है। कुछ मामलों में ये आंखों से आगे बढ़कर शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी फैल सकता है। तो वहीं, कुछ मामलों में इसका उलटा भी हो सकता है यानी शरीर के दूसरे हिस्सों में मौजूद ट्यूमर की असामान्य कोशिकाएं आंखों में आकर जमा हो सकती हैं या फिर आंखों में घुसने की कोशिश कर सकती हैं।

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आंखों के कैंसर का प्रकार - Types of Eye cancer in Hindi

आंखों का कैंसर किस जगह से शुरू हुआ है और किस तरह से फैलता इसके आधार पर आंखों के कैंसर का प्रकार अलग-अलग हो सकता है:

  • ऑक्यूलर मेलानोमा : वयस्कों में होने वाला यह सबसे कॉमन प्रकार का आई कैंसर है। मेलानोमा यानी घातक ट्यूमर उन कोशिकाओं में उत्पन्न होता है जो आंखों सहित शरीर के विभिन्न हिस्सों में पिगमेंट यानी रंजक के निर्माण में शामिल होते हैं। आंखों के कोरॉयड यानी रक्तक में यह नुकसान शुरू होता है जिसमें ये पिग्मेंटेड कोशिकाएं होती हैं। यूवीया (आंखों की तीन में से एक सतह) से संबंधित मेलानोमा को वयस्कों में होने वाले सबसे घातक और प्राथमिक आई कैंसर के रूप में जाना जाता है। 
  • प्राइमरी इंट्राऑक्यूलर लिम्फोमा : यह एक तरह का नुकसान है जिसमें लिम्फोसाइट्स नाम की सफेद रक्त कोशिकाएं शामिल होती हैं। यह आमतौरपर एचआईवी-एड्स से पीड़ित इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज्ड मरीजों में देखने को मिलता है।
  • रेटिनोब्लास्टोमा : यह बच्चों में होने वाला आंखों से संबंधित सबसे कॉमन नुकसान है। रेटिनोब्लास्टोमा के पीछे जो रोग-निदान जिम्मेदार है उसमें वंशानुगत जेनेटिक म्यूटेशन शामिल है। इसमें मौजूद ट्यूमर रेटिना में शुरू होता है जो बाद में आंखों के अलग-अलग हिस्सों तक फैलने लगता है और शरीर के दूसरे अंगों और तंत्रों तक भी।     
  • ऑक्यूलर मेटास्टेसिस : कई बार ऐसा होता है कि शरीर के अलग-अलग हिस्सों में जो ट्यूमर उत्पन्न होता है जैसे- फेफड़ों का कैंसर वह भी आंखों को प्रभावित कर सकता है। कैंसर के लिए जिम्मेदार ये घातक कोशिकाएं रक्त वाहिकाओं के माध्यम से सफर करते हुए आंखों तक पहुंच सकती हैं। खून के माध्यम से जब कैंसर शरीर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक फैलता है तो इसे हीमाटोजीनियस यानी खून द्वारा होने वाला प्रसार कहा जाता है।

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आंखों के कैंसर के लक्षण - Eye cancer Symptoms in Hindi

ऑक्यूलर यानी नेत्र संबंधी हानि के लक्षण हो भी सकते हैं और नहीं भी इसलिए सिर्फ रूटीन आई चेकअप के दौरान ही इसका पता लगाया जा सकता है। इसके सामान्य लक्षणों में निम्नलिखित चीजें शामिल हैं:

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आंखों के कैंसर के जोखिम कारक - Eye cancer Risk and Complication in Hindi

ऐसे एक नहीं बल्कि कई कारक हैं जो आंखों का कैंसर विकसित होने के जोखिम को बढ़ा सकते हैं और इसमें निम्नलिखित चीजें शामिल हैं:

  • उम्र : आंखों का कैंसर मुख्य रूप से 50 से 60 साल के बीच के लोगों को प्रभावित करता है। 70 साल से ऊपर के व्यक्ति में आंखों का कैंसर होना दुर्लभ माना जाता है
  • जाति या वंश : कॉकेशियन यानी सफेद नस्ल के लोगों में मेलानोमा विकसित होने का खतरा दूसरों की तुलना में अधिक होता है। 
  • आंखों से जुड़ी कुछ स्थितियां : जिन लोगों में आंखों में या इसके आसपास की त्वचा में पिग्मेंटेशन होने लगता है या आंखों में तिल-मस्सा होता है।
  • जेनेटिक प्रसार : कुछ आंख के कैंसर ऐसे भी होते हैं जिन्हें आनुवांशिक रूप से प्राप्त किया जाता है जैसे- रेटिनोब्लास्टोमा।
  • पर्यावरण से जुड़े कारक : कुछ अध्ययनों में यह सुझाव दिया गया है कि सूरज की रोशनी के संपर्क में बहुत ज्यादा रहने की वजह से भी आंखों में कैंसर की समस्या विकसित हो सकती है।

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आंखों के कैंसर के बचाव के उपाय - Prevention of Eye cancer in Hindi

सामान्य रूप से आंखों के कैंसर को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता क्योंकि इस कैंसर से जुड़े ऐसे जोखिम कारक बहुत ज्यादा नहीं हैं जिसमें किसी तरह का परिवर्तन किया जा सके। लिहाजा, सबसे महत्वपूर्ण कारक को सीमित करना - सूरज की रोशनी और यूवी किरणों का सीधा संपर्क- ही इस बीमारी की प्राथमिक रोकथाम का सबसे अहम तरीका है।

प्राथमिक रोकथाम

  • पारिवारिक इतिहास : अगर आपको पहले से अपने परिवार में मौजूद आई कैंसर के मामलों की जानकारी हो तो आंखों के कैंसर की समस्या का जल्दी पता लगाया जा सकता है। रेटिनोब्लास्टोमा की समस्या से पीड़ित माता-पिता से जन्म लेने वाले हर 2 में से 1 बच्चे में यह समस्या होने का जोखिम अधिक होता है।
  • सूरज की रोशनी का संपर्क कम से कम : स्किन में होने वाली मेलानोमा की समस्या यानी स्किन कैंसर की ही तरह आंखों के कैंसर के लिए भी सूरज की रोशनी से निकलने वाली हानिकारक यूवी किरणों का लंबे समय तक एक्सपोजर जिम्मेदार है। लिहाजा सूरज की रोशनी में आप कितना समय बिताते हैं इसे सीमित करना इससे बचने का एक तरीका हो सकता है।
  • धूप के चश्मे पहनना : अमेरिकन कैंसर सोसायटी का सुझाव है कि घर से बाहर सूरज की रोशनी में निकलते वक्त हम सभी को 99-100 प्रतिशत तक यूवी-ए और यूवी-बी के खिलाफ सुरक्षा देने वाले धूप के चश्मे का इस्तेमाल करना चाहिए। (और पढ़ें - चश्मे का निशान हटाने का तरीका)

माध्यमिक रोकथाम

  • जन्म के समय आंखों की जांच : बच्चों को प्रभावित करने वाला सबसे कॉम आई कैंसर रेटिनोब्लास्टोमा के कुछ मामलों का जन्म के समय ही पता लगाया जा सकता है। इसका पता लगाने का सबसे कॉमन संकेत है- ल्यूकोकोरिया या सफेद पुतली (प्युपिल)। इसका अर्थ हुआ है कि आंखों के रंगीन हिस्से आइरिस के अंदर तो केंद्रीय बिंदू है वह सामान्यतौर पर काले रंग का न होकर सफेद रंग का है।
  • नियमित आई चेकअप : 18 से 40 साल के बीच के स्वस्थ वयस्क जिनके परिवार में आंखों से जुड़ी बीमारी का कोई पारिवारिक इतिहास नहीं है उन्हें हर 2 से 3 साल में एक बार आंखों का चेकअप जरूर करवाना चाहिए। जिन लोगों की उम्र 41 से 60 साल के बीच है उनके लिए हर 2 साल में एक बार डॉक्टर से आंखों की जांच करवाना फायदेमंद हो सकता है। जिन लोगों की उम्र 60 साल से अधिक है या जिनमें किसी तरह का जोखिम कारक है उन्हें हर साल आंखों का चेकअप करवाना चाहिए।

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आंखों के कैंसर का निदान - Diagnosis of Eye cancer in Hindi

अगर मरीज के सामान्य चेकअप के दौरान किसी जनरल फिजिशियन को आंखों के कैंसर का शक होता है तो वह मरीज को नेत्र विशेषज्ञ के पास रेफर कर देते हैं। इसके बाद नेत्र-चिकित्सक विस्तृत रूप से मरीज की आंखों की जांच करते हैं और कई तरह के टेस्ट भी करते हैं ताकि डायग्नोसिस की पुष्टि की जा सके। 

  • आंखों की जांच : ऑप्थैल्मोस्कोप जैसे उपकरणों का इस्तेमाल कर आंखों के अलग-अलग हिस्सों की विस्तार से जांच की जाती है।
  • अल्ट्रासाउंड स्कैन : मरीजों की आंखों की जांच के लिए आंखों का भी अल्ट्रासाउंड किया जाता है जिससे डॉक्टर को ट्यूमर की सही जगह और साइज की जानकारी मिल जाती है।
  • फ्लोरेसिन एंजियोग्राफी : फ्लोरोसेंट या प्रतिदीप्त डाई को खून में इंजेक्ट किया जाता है जो शरीर के विभिन्न हिस्सों से ट्रैवल करती हुई आंखों की रक्त वाहिकाओं तक पहुंचती है। इसके बाद नेत्र विशेषज्ञ स्पेशल कैमरे की मदद से आंखों की कई तस्वीरें लेते हैं ताकि आंखों को प्रभावित करने वाली किसी और बीमारी की आशंका को खारिज किया जा सके।
  • बारीक सुई से बायोप्सी : इसका इस्तेमाल दुर्लभ मामलों में ही किया जाता है क्योंकि आंखों से जुड़े ज्यादातर ट्यूमर का पता बायोप्सी से लग जाता है। इस प्रक्रिया में बारीक सुई की मदद से कुछ कोशिकाओं को निकालकर फिर माइक्रोस्कोप के जरिए उनका अध्ययन किया जाता है।
  • जेनेटिक टेस्टिंग : इस प्रक्रिया के जरिए असामान्य ट्यूमर जीन्स और प्रोटीन का पता लगाया जाता है जिससे मरीज की रिकवरी और रोग निदान की जानकारी मिलने के साथ ही मरीज के लिए इलाज का एक उचित प्लान बनाने में भी मदद मिलती है।
  • ट्यूमर के प्रसार का परीक्षण : आंखों के कैंसर के मेटास्टेसिस यानी स्थानांतरण की सबसे कॉमन जगह लिवर है। ऐसे में लिवर मेटास्टेसिस का पता लगाने के लिए लिवर फंक्शन टेस्ट किया जाता है और साथ ही में इसे सपोर्ट करने के लिए पेट का अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन भी।
  • सीटी स्कैन : एक्स-रे मशीन का इस्तेमाल कर इस प्रक्रिया में 3डी तस्वीर बनती है जिससे डॉक्टर को ट्यूमर का साइज और उसकी लोकेशन का स्पष्ट रूप पता लगाने में मदद मिलती है।
  • एमआरआई : एमआरआई भी सीटी स्कैन जैसा ही काम करता है- यानी ट्यूमर की माप, लोकेशन और उसने स्थानांतरण किया है या नहीं इसका पता लगाना। सीटी स्कैन और एमआरआई में मुख्य अंतर ये है कि एमआरआई में एक्स-रे की जगह चुंबकीय तरंगों का इस्तेमाल किया जाता है।
  • पीईटी स्कैन : पीईटी स्कैन इस सिद्धांत पर काम करता है कि कैंसर कोशिकाएं, सामान्य कोशिकाओं की तुलना में अधिक ग्लूकोज का इस्तेमाल करती हैं। लिहाजा, रेडियोऐक्टिव लेबल वाले ग्लूकोज को मरीज के शरीर में इंजेक्ट किया जाता है और फिर असामान्य कोशिकाओं में उसके उद्ग्रहण को मापा जाता है। स्कैनर इसका पता लगाता है और जो अंग इसमें शामिल है उसकी तस्वीरों को भी दिखाता है।

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आंखों के कैंसर के अलग-अलग स्टेज - Various Stages of Eye cancer in Hindi

किसी ट्यूमर के स्टेज का पता लगाने के लिए टीएनएम सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है:

  • टी यानी ट्यमूर : ट्यूमर की लोकेशन और साइज
  • एन यानी नोड : क्या ट्यूमर किसी लिम्फ नोड्स यानी लसीका पर्व तक फैला है या नहीं
  • एम यानी मेटास्टेसिस : कैंसर शरीर के किसी और हिस्से तक स्थानांतरित हुआ है या नहीं

टीएनएम सिस्टम के के हर एक हिस्से की अच्छी तरह से जांच करने के बाद और सभी नतीजों को मिलाकर ट्यूमर के स्टेज का पता लगाया जाता है। आंखों के कैंसर में ये 4 स्टेज होते हैं:

  • स्टेज 1: ट्यूमर छोटा है (3 मिलीमीटर से छोटा) और आंख का कोई और हिस्सा शरीर का कोई और अंग तंत्र इसमें शामिल नहीं है
  • स्टेज 2: स्टेज 1 की तुलना में ट्यूमर का साइज कुछ बड़ा है और यह आंख के दूसरे हिस्सों या अंग तंत्र तक फैल भी सकता है और नहीं भी
  • स्टेज 3: ट्यूमर का साइज अब बड़ा हो चुका है और यह आंखों के बाकी हिस्सों में भी फैल चुका है
  • स्टेज 4: कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैल चुका है (मेटास्टेसिस यानी स्थानांतरण हो चुका है)

आंखों के कैंसर का इलाज - Eye cancer Treatment in Hindi

जब बात कैंसर के मरीज के इलाज की आती है तो उसमें डॉक्टरों की एक पूरी टीम होती है जिसमें अलग-अलग विशेषज्ञ डॉक्टर होते हैं जो मरीज के इलाज और देखभाल के अलग-अलग पहलुओं से जुड़े होते हैं। आंखों के कैंसर की बात करें नेत्र विशेषज्ञ और कैंसर स्पेशलिस्ट (ऑन्कोलॉजिस्ट) के अलावा फिजिशियन, प्लास्टिक सर्जन, रेडियोलॉजिस्ट, नर्स, डाइटिशियन- इन सभी का होना जरूरी होता है जब मरीज की देखभाल से जुड़े फैसले लेने की बात आती है।

आंखों के कैंसर में इलाज से जुड़े प्रोटोकॉल में निम्नलिखित दिशा-निर्देशों का पालन किया जाता है:

  • सक्रिय निगरानी : इसमें मरीज की चौबीसों घंटे निगरानी की जाती है। इलाज की इस पद्धति को उन मरीजों में अपनाया जाता है जिनमें ट्यूमर छोटा और गैर-आक्रामक होता है, या फिर ऐसे मामलों में जहां मरीज को चिकित्सीय इलाज देने का फायदा, इलाज से जुड़े खतरे से कम होता है या फिर खराब रोग निदान का कोई प्रभाव नहीं होता। कई बार आक्रामक थेरेपी से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होता है एंड-ऑफ-लाइफ केयर (ऐसे व्यक्ति की सेहत का ध्यान रखना जिसकी बीमारी असाध्य बन गई हो)। अगर कैंसर में तेजी से बढ़ने के संकेत दिखते हैं (10 मिलीमीटर से ज्यादा) या फिर अगर कैंसर बाकी अंगों में भी फैलने लगता है (मुख्य रूप से लिवर में) तब इलाज के इस प्रोटोकॉल को बदलकर सक्रिय इलाज किया जाता है।
  • सर्जरी : इसमें ट्यूमर के साथ ही आसपास मौजूद स्वस्थ संचरनाओं को भी हटाया जाता है और इसे ट्यूमर रीसेक्शन (विभाजन) के तौर पर जाना जाता है। आंखों के कैंसर के इलाज का यह सबसे कॉमन तरीका है। इसमें ऊत्तकों की कितनी मात्रा हटायी जाएगी यह कैंसर के स्टेज पर निर्भर करता है। इसके लिए सर्जन ये 3 चीजें कर सकते हैं :
    • इरिडेक्टमी जिसमें आइरिस के हिस्सों को हटाया जाता है (वह संरचना जो आंखों की पुतली के साइज को कंट्रोल करती है)
    • इरिडोसाइक्लेक्टमी जिसमें आइरिस और सिलिअरी बॉडी के हिस्सों को हटाया जाता है (वह संरचना जो लेन्स के शेप को कंट्रोल करती है)
    • इन्यूसिलेशन जिसमें पूरी आंख ही सर्जरी करके हटा दी जाती है
  • रेडियोथेरेपी : ऊच्च ऊर्जा वाली एक्स-रे का इस्तेमाल कर हानिकारक और जानेवाल कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। रेडियोथेरेपी, रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट द्वारा की जाती है। 
  • लेजर ट्रीटमेंट : लेजर से उत्पन्न होने वाली गर्मी ट्यूमर के साइज को कम करती है जिससे सर्जरी के जरिए उसे हटाना या रेडिएशन थेरेपी के जरिए उसका इलाज करना आसान हो जाता है। इलाज के इस तरीके के दुष्प्रभाव काफी कम हैं।

आंखों के कैंसर में ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल के साइड इफेक्ट्स - Eye cancer Treatment Protocol Side Effects in Hindi?

आंखों के कैंसर के इलाज से जुड़े मुख्य साइड इफेक्ट्स निम्नलिखित हैं :
सर्जरी के दुष्प्रभाव

रेडियोथेरेपी के दुष्प्रभाव

  • मोतियाबिंद : इसकी वजह से देखने की क्षमता (विजन) कमजोर हो जाती है और सूरज की रोशनी में आंखें चौंधिया जाती हैं
  • पलकों की हानि
  • आंखों में सूखापन महसूस होना

फॉलोअप
इलाज के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए मरीज के बेहतर स्वास्थ्य का ध्यान रखना जरूरी है, इसलिए सक्रिय थेरेपी पूरी होने के बाद एक व्यापक फॉलोअप प्लान भी बनाया जाना चाहिए। इसमें हर 6 से 12 महने के बीच डॉक्टर से जांच करवाना शामिल होता है जिसमें डॉक्टर आंखों की जांच करते हैं, ब्लड टेस्ट, रेडियोलॉजिकल टेस्ट जैसे- एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन और पीईटी स्कैन आदि करवाते हैं।

आंखों के कैंसर में मरीज के बचने की संभावना? - Eye cancer Patient Chances of Survival in Hindi?

आंखों के कैंसर के मामले में कैंसर का पता लगने के कम से कम 5 साल बाद तक करीब 80 प्रतिशत मरीज ऐसे हैं जिनके जीवित रहने की संभावना अधिक होती है। अगर कैंसर का पता जल्दी ही चल जाए तो उनके जीवित रहने का प्रतिशत बढ़कर 85 हो जाता है। अगर ट्यूमर आसपास के अंगों में लसीका पर्व (लिम्फ नोड्स) के हिस्सों में फैल जाता है तो 5 साल तक जीवित रहने की दर घटकर 71 प्रतिशत हो जाती है। तो वहीं, उन मामलों में जिसमें कैंसर शरीर के अन्य अंगों और तंत्रों तक पहुंच जाता है, ऐसे मामलों में मरीजे के 5 साल तक जीवित रहने की दर घटकर सिर्फ13 प्रतिशत रह जाती है।



संदर्भ

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  5. P. De Potter. Ocular manifestations of cancer. Current Opinion in Ophthalmology, December 1998; 9(6): 100-4. PMID: 10387328.

आँख का कैंसर की ओटीसी दवा - OTC Medicines for Eye cancer in Hindi

आँख का कैंसर के लिए बहुत दवाइयां उपलब्ध हैं। नीचे यह सारी दवाइयां दी गयी हैं। लेकिन ध्यान रहे कि डॉक्टर से सलाह किये बिना आप कृपया कोई भी दवाई न लें। बिना डॉक्टर की सलाह से दवाई लेने से आपकी सेहत को गंभीर नुक्सान हो सकता है।