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एंटीबायोटिक्स वे दवाइयां हैं जो बैक्टीरिया के कारण होने वाली बीमारियों को दूर करने में मदद करती हैं, लेकिन वायरल इंफेक्शन जैसे- सर्दी-जुकाम, खांसी या फ्लू जो वायरस से होने वाले इंफेक्शन हैं उनके इलाज में एंटीबायोटिक कारगर साबित नहीं हो सकती। इतना ही नहीं, एंटीबायोटिक्स के कुछ साइड इफेक्ट्स भी होते हैं। यही कारण है कि अब एक नई स्टडी सामने आयी है जिसमें यह बताया गया है कि 2 साल से कम उम्र के बच्चों को अगर एंटीबायोटिक दिया जाता है तो बच्चे में आगे चलकर कई बीमारियां होने का जोखिम बढ़ जाता है। 

मेयो क्लिनिक प्रोसिडिंग्स नाम के मेडिकल जर्नल में प्रकाशित इस नई स्टडी की मानें तो जिन शिशुओं और छोटे बच्चों (टॉडलर्स) को एंटीबायोटिक्स की एक डोज दी जाती है उन बच्चों में कुछ साल के बाद अस्थमा, एक्जिमा, हे फीवर, फूड एलर्जी, सीलिएक डिजीज, वजन से जुड़ी बीमारियां, मोटापा और एडीएचडी जैसी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। 

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कई बार एंटीबायोटिक्स दी जाए तो एक साथ कई बीमारियों का खतरा
स्टडी में यह भी पाया गया कि अगर 2 साल से कम उम्र के बच्चे को कई बार एंटीबायोटिक ट्रीटमेंट दी जाए तो बच्चे में एक साथ कई बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है और ये बीमारियां बच्चे की उम्र, लिंग, दवा के प्रकार और दवा की खुराक के कारण अलग-अलग तरह की हो सकती हैं। मेयो क्लिनिक सेंटर के अनुसंधानकर्ता और इस स्टडी के सीनियर ऑथर नेथन लेब्रेसियर कहते हैं, "हम यहां पर जोर देकर यह बताना चाहते हैं कि यह स्टडी इन बीमारियों के संबंध को दिखाती है कारण को नहीं। स्टडी के नतीजे एक अवसर प्रदान करते हैं ताकि भविष्य में ऐसी रिसर्च की जा सके जो 2 साल से कम उम्र के बच्चों वाली इस एज ग्रुप में एंटीबायोटिक दवाइयों के अधिक विश्वसनीय और सुरक्षित खुराक और प्रकार को विकसित कर सकें।" 

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जितनी हाई डोज उतनी ही अधिक बीमारियां
इस स्टडी के लिए अनुसंधानकर्ताओं ने 14 हजार 500 बच्चों के आंकड़ों की जांच की जिसमें पता चला कि स्टडी में शामिल करीब 70 प्रतिशत बच्चे ऐसे थे जिन्होंने कम से कम एक बार एंटीबायोटिक की खुराक जरूर प्राप्त की थी और ज्यादातर बच्चे ऐसे थे जिन्होंने कई बार एंटीबायोटिक्स की खुराक दी गई थी। स्टडी के ऑथर लेब्रेसियर और उनकी टीम की मानें तो, "जिन बच्चों को प्रिस्क्रिप्शन के तहत 1-2 बार एंटीबायोटिक दिया गया उनमें एंटीबायोटिक प्राप्त न करने वाले बच्चों की तुलना में लड़कियों में अस्थमा और सीलिएक डिजीज होने का खतरा अधिक था। तो वहीं, जिन बच्चों को 3-4 बार एंटीबायोटिक्स दिया गया उनमें लड़के और लड़कियों दोनों में अस्थमा, एटोपिक डर्मेटाइटिस और ओवरवेट होने का जोखिम अधिक था।"    

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मोटापा, एडीएचडी, सीलिएक डिजीज का खतरा
स्टडी में यह भी पाया गया कि जिन बच्चों को 5 या इससे अधिक बार प्रिस्क्रिप्शन दवा के तहत एंटीबायोटिक्स दिया गया उन बच्चों में (दोनों ही लिंग में) अस्थमा, एलर्जिक राइनाइटिस, ओवरवेट, मोटापा और एडीएचडी जैसी बीमारियां होने का खतरा अधिक था। स्टडी के मुताबिक, पेनिसिलिन जो प्रिस्क्राइब की जाने वाली सबसे कॉमन एंटीबायोटिक है, अगर उसे 2 साल से कम उम्र के बच्चों को दिया गया तो उन बच्चों में लड़कियों में सीलिएक डिजीज और एडीएचडी और लड़कों में मोटापा और अस्थमा होने का खतरा अधिक था। इसके अलावा एक और कॉमन एंटीबायोटिक सेफालोस्पोरिन प्रिस्क्राइब करने की वजह से बच्चों में ऑटिज्म और एलर्जी का खतरा अधिक था।

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बच्चे की आंत में मौजूद बैक्टीरिया है इसका कारण
तो आखिर बच्चों की सेहत पर एंटीबायोटिक्स का इस तरह का असर क्यों देखने को मिलता है? स्टडी के ऑथर लेब्रेसियर की मानें तो ऐसा संभवतः इसलिए होता है क्योंकि बच्चों की आंत में (गट में) मौजूद बैक्टीरिया जिसकी जरूरत बच्चे के इम्यून सिस्टम, तंत्रिका तंत्र, शरीर की संरचना और मेटाबॉलिज्म के समुचित विकास के लिए होती है, वह टूटने लगता है। दरअसल, एंटीबायोटिक्स पाचन तंत्र में मौजूद अच्छे और बुरे बैक्टीरिया के बीच फर्क नहीं कर पाता और सारे बैक्टीरिया को मार देता है जिसकी वजह से आंत में उचित माइक्रोबायोम (सूक्ष्मजीवों) का वितरण नहीं हो पाता। हमारे शरीर को कुछ खास तरह के बैक्टीरिया की जरूरत होती है ताकि वह पोषक तत्वों को अवशोषित कर सके, आंत में मौजूद भोजन को तोड़ सके और पाचन तंत्र को विभिन्न रोगाणुओं से बचा सके। 

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एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस यानी एंटीबायोटिक प्रतिरोध की समस्या जो इस वक्त दुनियाभर में फैल रही है उसे रोकने के लिए एंटीबायोटिक का उपयोग कम से कम किया जा सकता है, लेकिन इस अध्ययन के आधार पर माइक्रोबायोम के संरक्षण में भी इसकी अहम भूमिका हो सकती है। 

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