लिवर में होने वाली सूजन को हेपेटाइटिस कहते हैं। यह संक्रामक (वायरल, बैक्टीरियल, फंगल या परजीवी) या गैर-संक्रामक (शराब, ड्रग्स, ऑटोइम्यून बीमारियों या चयापचय रोगों के कारण) हो सकता है। इनमें वायरल हेपेटाइटिस सबसे आम है, जिसके प्रमुख पांच प्रकार हैं हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई।

इनमें से हेपेटाइटिस ए, बी और सी के मामले सबसे ज्यादा पाए जाते हैं। इसमें लक्षण अचानक (एक्यूट) से दिखाई देने लगते हैं, जिसमें पीलिया, बेचैनी, थकान, पेट में दर्द और मतली जैसी समस्या शामिल है। हालांकि, अचानक से होने वाले इस संक्रमण की वजह से क्रोनिक इंफेक्शन (लंबे समय तक संक्रमण) की समस्या हो सकती है, जो लिवर सिरोसिस (लिवर का धीरे-धीरे खराब होना) और हेपैटोसेलुलर कार्सिनोमा (लिवर कैंसर) के रूप में दिखाई दे सकती है।

हेपेटाइटिस का निदान अक्सर एमिनोट्रांस्फरेज (लिवर द्वारा उत्पादित एक एंजाइम) और हाइपरबिलिरुबिनमिया (पेशाब में बिलिरुबिन) के स्तर का परीक्षण करके किया जाता है। बिलिरुबिन खून में पाए जाने वाला भूरे-पीले रंग का एक तत्व है, जो लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने पर बनता है। यदि किसी को पीलिया है, तो इसके लक्षण बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करेंगे, जैसे गहरे पीले रंग की पेशाब से लेकर नाखून और आंखों का पीला पड़ना इत्यादि।

होम्योपैथिक उपचार बीमारी को जड़ से ठीक करने के लिए रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली को उत्तेजित करती है और एंटी-हेपाटोटॉक्सिक (लिवर में विषाक्तता के विरुद्ध कार्य करना) के रूप में कार्य करती है। हेपेटाइटिस के लक्षणों में आमतौर पर जिन उपचारों का उपयोग किया जाता है, उनमें एकोनिटम नेपेलस, ब्रायोनिया अल्बा, चेलिडोनियम मैजस, हेपर सल्फर, लैकेसिस म्यूटस, मर्क्यूरियस सॉल्यूबिलिस, फॉस्फोरस, नक्स वोमिका, लाइकोपोडियम क्लैवैटम, कार्डुअस मैरिऐनस, सीएनोथस अमेरिकैनस,  किओनैंथस वर्जिनिका और नैट्रियम सल्फ्यूरिकम शामिल हैं।

  1. हेपेटाइटिस के लिए होम्योपैथिक दवाएं - Homeopathic medicines for hepatitis in hindi
  2. हेपेटाइटिस रोगी के लिए आहार और जीवन शैली में बदलाव - Dietary and lifestyle changes for a hepatitis patient as per homeopathy in Hindi
  3. हेपेटाइटिस के लिए होम्योपैथिक दवाएं और उपचार कितने प्रभावी हैं - How effective are homeopathic medicines and treatments for hepatitis in hindi
  4. हेपेटाइटिस के लिए होम्योपैथिक दवा के दुष्प्रभाव और जोखिम - Side effects and risks of homeopathic medicine and treatments for hepatitis in Hindi
  5. टिप्स - Takeaway

ब्रायोनिया अल्‍बा
सामान्य नाम :
वाइल्ड हॉप्स
लक्षण : ब्रायोनिया अल्बा सभी श्लेष्म झिल्ली (शरीर के अंगों की अंदरूनी परत) पर काम करता है और यह शरीर के दाहिने हिस्से को बाएं हिस्से की तुलना में अधिक प्रभावित करता है। इस उपाय से जिन लक्षणों का इलाज किया जा सकता है, वे हैं :

  • लिवर में सूजन या जलन
  • लिवर वाले हिस्से में दर्द, तनाव या खिंचाव
  • पेट में जलन और चुभन वाला दर्द, यह लक्षण प्रभावित हिस्से पर किसी तरह का दबाव पड़ने या खांसी आने से और खराब हो सकता है।
  • पेट पर छूने से भी दर्द होना

यह लक्षण सुबह और गर्म मौसम में पेट वाले हिस्से पर कुछ गर्म अप्लाई (जैसे सिकाई) करने से और बिगड़ जाते हैं। जैसे ही प्रभावित व्यक्ति बैठने की कोशिश करता है, उसे कमजोरी आने लगती है। हालांकि, ये लक्षण दर्द वाले हिस्से के बल लेटने, किसी तरह का दबाव पड़ने, पर्याप्त मात्रा में आराम करने और ठंडी चीजों के सेवन के बाद ठीक हो सकते हैं।

चेलिडोनियम मैजस
सामान्य नाम :
सेलंडाइन
लक्षण : सेलंडाइन मैजस लिवर की समस्याओं के लिए जाने माने उपचारों में से एक है। पीलिया, पीली त्वचा और कंधे की हड्डी के निचले हिस्से में लगातार दर्द की स्थिति में इस उपाय का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा यह निम्नलिखित लक्षणों को ठीक करने में भी मददगार है :

  • पित्ताशय की थैली में अचानक दर्द
  • पेट में खिंचाव (गैस या किसी तरल के जमा होने से)
  • मल कठोर आना
  • लिवर का बढ़ना

यह लक्षण सुबह के समय मल त्याग करने और मौसम के बदलाव होने पर बिगड़ जाते हैं, लेकिन रात में खाने के बाद और प्रभावित हिस्से पर दबाव पड़ने पर लक्षणों में सुधार होता है।

हेपर सल्फर
सामान्य नाम :
हैनिमैन कैल्शियम सल्फाइड
लक्षण : यह उपाय उन लोगों में असर करता है, जिनकी ग्रंथियों में सूजन, मांसपेशियों में कमजोरी और त्वचा की सेहत ठीक नहीं होती है यानी त्वचा फटने का खतरा होता है। इस उपाय का उपयोग निम्नलिखित स्थितियों में किया जा सकता है :

  • हिलने-डुलने जैसे चलने, खांसी, सांस लेने या छूने पर लिवर वाले हिस्से में चुभन जैसा दर्द
  • पेट में खिंचाव (गैस या किसी तरल के जमा होने से)
  • पेट से जुड़ी पुरानी या लंबे समय से कोई परेशानी

यह लक्षण शुष्क और ठंडी हवा, छूने और दर्द वाले हिस्से के बल लेटने से बदतर हो जाते हैं। गर्मी और भोजन के बाद इन लक्षणों में सुधार देखा जाता है।

लैकेसिस म्यूटस
सामान्य नाम :
बुशमास्टर
लक्षण : लैकेसिस म्यूटस विशेष रूप से शराब का सेवन करने वालों के लिए अनुकूल है। यह उपाय निम्नलिखित लक्षण वाले व्यक्तियों को भी दिया जा सकता है :

  • लिवर वाले हिस्से में संवेदनशीलता
  • कमर के आसपास कुछ भी बर्दाश्त न कर पाना
  • पेट में दर्द

यह लक्षण शरीर के बाएं तरफ होने पर और वसंत के मौसम में बदतर हो जाते हैं। इसके अलावा नींद लेने के बाद, किसी तरह का दबाव या संकुचन की वजह से भी यह लक्षण बिगड़ सकते हैं।

मर्क्यूरियस सॉल्यूबिलिस
सामान्य नाम :
क्विकसिल्वर
लक्षण : क्विकसिल्वर शरीर के प्रत्येक अंग और ऊतक को प्रभावित करता है। इसके अलावा यह ऊतकों में सूजन, मृत कोशिका और खून के अपघटन (जिसमें तत्व अलग-अलग सूक्ष्म भागों में विभाजित हो जाते हैं) की स्थिति में भी असर करता है। हालांकि, इस खनिज को होम्योपैथी के सिद्धांतों का उपयोग करके औषधीय रूप में परिवर्तित किया जाता है। इसके अलावा निम्न स्थितियों में भी इस उपाय की आवश्यकता होती है :

  • ठंड लगने के साथ लिवर वाले हिस्से में तेज दर्द
  • दाहिने कमर में दर्द
  • पेट में दर्द व पेट फूलना
  • लिवर बढ़ना और लिवर में सूजन, प्रभावित हिस्से के आसपास छूने पर भी दर्द होना
  • पीलिया

य​ह लक्षण रात में, नम मौसम में, पसीना आने और दाएं तरफ लेटने से खराब हो जाते हैं।

फास्फोरस
सामान्य नाम :
फॉस्फोरस
लक्षण : इस उपाय से जिन लक्षणों का इलाज किया जा सकता है, वे हैं :

  • ठंड लगना
  • पेट में तेज, चुभन वाला दर्द
  • कमजोरी, पेट के गुहा में खालीपन
  • लिवर में किसी चीज का जमाव
  • शरीर के ऊतकों का खराब होना
  • पीलिया
  • अग्नाशय से जुड़ा विकार
  • पेट पर बड़े और पीले धब्बे

यह लक्षण शाम के समय, अत्यधिक थकावट, मौसम के बदलने या भीगने, गर्म भोजन का सेवन करने, बाएं तरफ लेटने और सीढ़ियों पर चढ़ने से बिगड़ते हैं। जबकि ठंडी हवा के संपर्क में आने, ठंडे पानी से नहाने, ठंडा भोजन खाने, पर्याप्त नींद लेने और दाएं ओर लेटने पर इन लक्षणों में सुधार आ जाता है।

नक्स वोमिका
सामान्य नाम :
पॉइजन-नट
लक्षण : नक्स वोमिका का उपयोग निम्नलिखित स्थितियों के उपचार के लिए किया जाता है :

  • पेट की सतह या दीवारों में दर्द (किसी चोट लगने जैसा)
  • हवा या गैस की वजह से पेट या आंतों का फूलना या बढ़ना
  • चुभन वाला दर्द व लिवर का बढ़ना
  • शिशुओं में अम्बिलिकल हर्निया (नाभि के आसपास मांसपेशियों में कमजोरी)

सुबह के समय, मानसिक तनाव, कुछ खाने के बाद - खासकर कुछ मसालेदार खाने के बाद, नशीले पदार्थों के सेवन और सूखे व ठंडे मौसम में यह लक्षण खराब हो जाते हैं। लेकिन नियमित रूप से सोने, शाम के समय और गर्मी के मौसम में इन लक्षणों में सुधार होता है।

लाइकोपोडियम क्लैवैटम
सामान्य नाम :
क्लब मॉस
लक्षण : यह निम्नलिखित लक्षणों को ठीक करने में मदद करती है :

  • हल्के भोजन के तुरंत बाद पेट फूलना
  • दाएं तरफ हर्निया
  • लिवर का संवेदनशील होना
  • पेट पर भूरे धब्बे
  • लिवर रोग के कारण सूजन
  • लिवर का सही तरह से कार्य न करना
  • पेट के निचले हिस्से में चुभन वाला दर्द

यह लक्षण शाम 4 से रात 8 बजे के बीच, दाएं ओर लेटने, गर्मी या गरम माहौल में खराब हो जाते हैं। आधी रात के बाद, गले और पेट पर गर्म अप्लाई करने, गर्म भोजन या पेय पदार्थ के सेवन से इन लक्षणों में सुधार हो सकता है।

कार्डुअस मैरियानस
सामान्य नाम :
सेंट मैरी थीसल
लक्षण : यह दवा लिवर के स्वास्थ और पोर्टल प्रणाली (रक्त वाहिकाओं की एक प्रणाली, जो पेट के अन्य अंगों को लिवर से जोड़ती है) पर फोकस करती है। यह पेट दर्द और पीलिया को कम करने में मदद करती है। इसके अलावा यह निम्नलिखित लक्षणों को भी ठीक करने में मददगार है :

  • लिवर वाले हिस्से में दर्द (ऊपरी दाहिनी ओर)
  • लिवर के बाएं हिस्से का संवेदनशील होना
  • निरंतर पेट भरे होने का एहसास होना
  • कब्ज (मल सख्त रूप में आना) के साथ दस्त आना
  • पीले रंग का मल
  • पित्ताशय (पित्त) की सूजन व टेंडन में दर्द होना
  • पीलिया व लिवर में संकुचन
  • द्रव इकट्ठा होने के साथ सिरोसिस (लिवर की कोशिकाओं का खत्म होना)

सीएनोथस अमेरिकैनस
सामान्य नाम :
न्यू जर्सी टी
लक्षण : सीएनोथस अमेरिकैनस के जरिए निम्नलि​खित लक्षणों को ठीक किया जा सकता है :

यह लक्षण किसी तरह की गतिविधि करने या बाईं ओर लेटने के दौरान बिगड़ जाते हैं।

किओनैंथस वर्जिनिका
सामान्य नाम :
फ्रिंज-ट्री
लक्षण : इस उपाय का उपयोग आमतौर पर सिरदर्द, शारीरिक और मानसिक थकावट से संबंधित दर्द और मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द के इलाज के लिए किया जाता है। इस उपाय से जिन अन्य लक्षणों का इलाज किया जा सकता है वे निम्नलिखित हैं :

  • गर्भनाल वाले हिस्से में एक तेज दर्द
  • पीलिया और कब्ज के साथ गले में खराश और लिवर का बढ़ना
  • मिट्टी के रंग जैसा मल त्याग करना, जो नरम, पीला और चिपचिपा होता है
  • जुबान भारी लगना, मानो हरे-पीले रंग की परतें जम गईं हों
  • भूख में कमी
  • पेट के ऊपरी दाएं भाग में हल्का दर्द
  • लिवर वाले हिस्से में छूने पर भी दर्द होना
  • अग्नाशय की बीमारी व अन्य ग्रंथियों के विकार

नैट्रियम सल्फ्यूरिकम
सामान्य नाम :
सल्फेट ऑफ सोडियम-ग्लूबेर सॉल्ट
लक्षण : इस उपाय का प्रयोग निम्नलिखित लक्षणों में किया जाता है :

  • पीलिया
  • लिवर वाले हिस्से को छूने पर दर्द महसूस होना
  • लिवर वाले हिस्से में तेज और चुभन वाला दर्द होना
  • कमर के चारों ओर किसी भी तरह का दबाव न सहन कर पाना
  • पेट में गैस बनना
  • जीभ पर भूरे रंग की परत जमना व मुंह में कड़वा स्वाद आना 
  • ठंडी चीजों की प्यास

यह लक्षण बाईं ओर लेटने और नमी वाले मौसम में खराब हो जाते हैं और शुष्क मौसम में इन लक्षणों में सुधार आता है।

होम्योपैथिक दवाएं अत्यधिक घुलनशील रूप में तैयार की जाती हैं, ऐसे में कई प्रकार के आहार और जीवन शैली के कारण आसानी से इन दवाइयों का असर प्रभावित हो सकता है। इसलिए, होम्योपैथिक डॉक्टर मरीजों को निम्नलिखित चीजों से सावधान रहने की सलाह देते हैं। यहां कुछ महत्वपूर्ण बिंदु दिए गए हैं, जो डॉक्टर आपको सुझाव दे सकते हैं :

क्या करना चाहिए

  • मनोरंजक गतिविधियों में शामिल होने की कोशिश करें
  • रोजाना व्यायाम करें, आप खुली हवा में रोजाना टहलने जा सकते हैं
  • पौष्टिक खाद्य और पेय पदार्थ का सेवन करें।
  • ढीले-ढाले कपड़े पहनें, ताकि शरीर को हवा मिलती रहे। कोशिश करें सूती कपड़े पहनें

क्या नहीं करना चाहिए

  • कॉफी, चाइनीज और अन्य हर्बल चाय जैसे पेय पदार्थों से बचें। इसके अलावा बियर न पिएं, क्योंकि इसमें औषधीय गुण होते हैं।
  • शराब न पिएं, इसके अलावा सभी प्रकार के पंच के सेवन से बचें। पंच एक तर​ह का पेय पदार्थ है जो कि मादक और गैर-मादक हो सकता है। इसमें आमतौर पर फल या फलों का रस मिलाया जाता है।
  • अत्यधिक मसालेदार भोजन से बचें। इसके अलावा औषधीय गुणों वाले पौधों की जड़ी-बूटियों, जड़ों और डंठल के सेवन से भी बचने की कोशिश करें।
  • प्याज, रखा हुआ पनीर और बासी मांस जैसे खाद्य पदार्थों से बचें, साथ ही ऐसे मीट का भी सेवन न करें जिसमें औषधीय गुण होते हैं जैसे कि बत्तख।
  • सामान्य से ज्यादा न खाएं। चीनी और नमक का सेवन कम करें।
  • कमरे में सुगंधित फूलों, पाउडर वाला मंजन और किसी भी प्रकार के इत्र का उपयोग न करें
  • टाइट-फिटिंग और ऊनी कपड़े न पहने

(और पढ़ें - हेपेटाइटिस का आयुर्वेदिक इलाज)

प्रमाणित दवाएं लक्षणों को दबाने पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जबकि होम्योपैथिक उपचार व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रणाली पर कार्य करती है, ताकि संक्रमण का जड़ से इलाज किया जा सके। ये उपाय पित्त से होने वाले स्राव को नियंत्रित करने में भी मदद करता है और मतली व अपच जैसे हेपेटाइटिस के लक्षणों से छुटकारा दिलाता है। इसके अतिरिक्त, होम्योपैथिक उपचार लिवर की सूजन और कुछ प्रकार के पेट फूलने और पीलिया जैसी समस्या को भी कम करने में सहायक है।

होम्योपैथी का एक अंतर्निहित सिद्धांत यह है कि जो तत्व लक्षणों का कारण बनता है, उसमें लक्षणों को सही करने की क्षमता भी होती है। एक योग्य डॉक्टर हमेशा मरीज की मानसिक और शारीरिक स्थिति के अनुसार सबसे उपयुक्त उपाय बताता है। होम्योपैथी उपचार में प्राकृतिक गुण होते हैं, यदि इन दवाइयों का नियमित रूप से सही मात्रा में इलाज किया जाए तो यह प्रभावी होता है और इसके कोई दुष्प्रभाव भी नहीं हैं।

कैलिफोर्निया में किए गए एक अध्ययन में, हेपेटाइटिस के दो मरीजों ने प्रमाणित चिकित्सा ली थी, लेकिन उन्हें कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद उनका होम्योपैथिक उपचार, कैलिडोनियम मेजस और थूजा के साथ सफलतापूर्वक इलाज किया गया।

होम्योपैथिक उपचार एनिमल प्रोडक्ट, जड़ी-बूटियों और खनिजों जैसे प्राकृतिक पदार्थों से बनाए जाते हैं, जिन्हें घुलनशील रूप में तैयार किया जाता है। घुलनशील होने से यह विषाक्तता से मुक्त हो जाते हैं और इनके औषधीय गुण बने रहते हैं।

जब योग्य होम्योपैथिक चिकित्सक द्वारा व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्थिति जानने के बाद उपाय निर्धारित किया जाता है तो इन दवाइयों का असर सकारात्मक होता है, बशर्ते आहार और जीवनशैली की सभी शर्तों का पालन किया गया हो।

होम्योपैथी विचारधारा 'लाइक क्योर लाइक' सिद्धांत का अनुसरण करती है। इसका मतलब है, किसी स्वस्थ व्यक्ति में जिस विषाक्त यौगिक के कारण समस्या बनी है, उसी विषाक्त यौगिक में बीमार व्यक्ति में लक्षणों को ठीक करने की क्षमता भी होती है, लेकिन खुराक का नियंत्रित मात्रा में होना जरूरी है।

होम्योपैथी दवाएं लक्षणों को दबाने के बजाय रोग की जड़ को ढूंढकर उसे मिटाने का काम करती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों ने हेपेटाइटिस के उपचार में होम्योपैथी की दक्षता को असरदार बताया है, लेकिन ध्यान रहे, इन दवाइयों का उपयोग किसी योग्य चिकित्सक के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।

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संदर्भ

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  2. Oscar E. Boericke. Jaundice (icterus). In: Repertory. Médi-T. 2000.
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