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  1. प्रोस्टेट कैंसर ऑपरेशन क्या होता है? - Prostate Cancer Surgery kya hai in hindi?
  2. प्रोस्टेट कैंसर सर्जरी क्यों की जाती है? - Prostate Cancer Surgery kab kiya jata hai?
  3. प्रोस्टेट कैंसर सर्जरी होने से पहले की तैयारी - Prostate Cancer Surgery ki taiyari
  4. प्रोस्टेट कैंसर सर्जरी कैसे किया जाता है? - Prostate Cancer Surgery kaise hota hai?
  5. प्रोस्टेट कैंसर सर्जरी के बाद देखभाल - Prostate Cancer Surgery hone ke baad dekhbhal
  6. प्रोस्टेट कैंसर ऑपरेशन के बाद सावधानियां - Prostate Cancer Surgery hone ke baad savdhaniya
  7. प्रोस्टेट कैंसर सर्जरी की जटिलताएं - Prostate Cancer ke operation me jatilta

पुरुषों में पौरुष ग्रंथि का कैंसर (Prostate Cancer) सबसे आम है। यह अलग से उत्पन्न हो सकता है और ऐसा भी हो सकता है कि यह किसी और अंग में उत्पन्न होकर पौरुष ग्रंथि तक पहुंचा हो। इससे ग्रंथि में ट्यूमर बन जायेगा। इस बीमारी के फैलने से साथ लगे हुए लिम्फ नोड या आसपास के अंग भी कैंसरग्रस्त हो सकते हैं। ऐसी स्थितियों से बचने के लिए पौरुष ग्रंथि कैंसर की सर्जरी की जाती है।

सर्जरी में प्रोस्टेट कैंसर के उपचार हेतु पौरुष ग्रंथि का कैंसरग्रस्त हिस्सा, ट्यूमर और संलग्न लिम्फ नोड्स को हटाया जाता है। आसपास के अंग, जिनमें भी कैंसर के पहुँचने की सम्भावना है, भी हटाए जा सकते हैं (पूर्ण रूप से या आंशिक)। सर्जरी का उद्देश्य यह भी है कि बचे हुए स्वस्थ अंग और आसपास के स्वस्थ अंगों की कार्यवाही बनी रहे और सामान्य रूप से चलती रहे। 

(और पढ़ें - प्रोस्टेट कैंसर के लक्षण, कारण, उपचार, इलाज, दवा, निदान)

पौरुष ग्रंथि के कैंसर का उपचार आम तौर पर दवाओं, विकिरण चिकित्सा या सर्जरी से किया जाता है। उपचार का विकल्प रोगी की उम्र, स्वास्थ्य और कैंसर के स्टेज (चरण) पर निर्भर करता है। स्टेजिंग में कैंसर की गंभीरता का आंकलन (ट्यूमर के आकार और मौजूदगी, कितने लिम्फ नोड प्रभावित हुए हैं और अन्य अंगों तक कैंसर कितना फैला है के आधार पर) किया जाता है।

निम्न स्थितियां संकेत करती हैं कि सर्जरी की आवश्यकता है:

लक्षणों का बढ़ जाना
इस कैंसर के आम लक्षण हैं मूत्र त्याग करने में कठिनाई, बहार बार मूत्र त्याग करना, मूत्र में रक्त। उपचार के बावजूद ये लक्षण बढ़ सकते हैं। ऐसे में सर्जरी की आवश्यकता होती है।

अन्य उपचार का प्रभाव न होना या मरीज़ के लिए हानिकारक होना 
कुछ स्थितियों में दवाओं का मरीज़ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कई बार दवाएं या विकिरण चिकित्सा मरीज़ के लिए उचित नहीं होती और इनसे मरीज़ को नुक्सान हो सकता है। कुछ कैंसर इतने अग्रिम चरण पर होते हैं कि उनमें अन्य उपचार काम ही नहीं करते। ऐसी स्थितियों में सर्जरी की ज़रुरत होती है।

कैंसर की पुनरावृत्ति
पौरुष ग्रंथि का कैंसर उपचार किये जाने के बाद भी फिर से हो सकता है। ऐसे में कैंसर को सर्जरी द्वारा ठीक किया जाता है।

सर्जरी की तैयारी के लिए आपको निम्न कुछ बातों का ध्यान रखना होगा और जैसा आपका डॉक्टर कहे उन सभी सलाहों का पालन करना होगा: 

  1. सर्जरी से पहले किये जाने वाले टेस्ट्स/ जांच (Tests Before Surgery)
  2. सर्जरी से पहले एनेस्थीसिया की जांच (Anesthesia Testing Before Surgery)
  3. सर्जरी की योजना (Surgery Planning)
  4. सर्जरी से पहले निर्धारित की गयी दवाइयाँ (Medication Before Surgery)
  5. सर्जरी से पहले फास्टिंग खाली पेट रहना (Fasting Before Surgery)
  6. सर्जरी का दिन (Day Of Surgery)
  7. सामान्य सलाह (General Advice Before Surgery)
  8. ध्यान देने योग्य अन्य बातें (Other Things To Be Kept In Mind Before Surgery)
    शरीर के जिस क्षेत्र में सर्जरी की जानी है उसे मार्क किया जाता है। पौरुष ग्रंथि तक आम तौर पर पेट के निचले हिस्से से (नाभी और प्यूबिस के बीच में) पहुंचा जाता है। कभी कभी गुदे (Anus) से वृषणकोष (Scrotum) के बीच का हिस्सा भी इस्तेमाल किया जाता है। त्वचा का वो हिस्सा जहाँ से चीरा काटा जायेगा वहां पर से बाल हटा दिए (शेव) जाते हैं। इसके बाद उस त्वचा को एंटी-सेप्टिक सोल्युशन से साफ़ किया जाता है।

इन सभी के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए इस लिंक पर जाएँ - सर्जरी से पहले की तैयारी

प्रोस्टेट कैंसर का उपचार निम्न पांच प्रकार की प्रक्रियाओं द्वारा किया जा सकता है:

  1. ओपन प्रोस्टेटेक्टॉमी (Open Prostatectomy)
  2. लैप्रोस्कोपिक रेडिकल प्रोस्टेटेक्टॉमी (Laproscopic Radical Prostatectomy)
  3. क्रायोसर्जरी (Cryosurgery)
  4. द्विपक्षीय वृषणग्रंथि-उच्छेदन (Bilateral Orchiectomy)
  5. प्रोस्टेट का ट्रांसुरेथ्रल विभाजन (Transurethral Resection of Prostate, TURP)

ओपन प्रोस्टेटेक्टॉमी (Open Prostatectomy)

प्रोस्टेटेक्टॉमी का अर्थ है पौरुष ग्रंथि को हटाना। ओपन सर्जरी में अपेक्षाकृत बड़ा चीरा काटा जाता है और कई सर्जिकल उपकरणों का प्रयोग करके पौरुष ग्रंथि तक पहुंचा जाता है। इस प्रकार की सर्जरी में अन्दरूनी अंग सीधा देखे जा सकते हैं। सर्जरी दो प्रकार से की जा सकती है- नाभी और प्यूबिस के बीच से पहुँच कर (यह आम तौर पर किया जाता है) या गुदे और वृषणकोश के बीच से (यह कम प्रयोग किया जाता है क्योंकि इस क्षेत्र का प्रयोग करने से स्तंभन में परेशानियां हो सकती हैं)।

चुने हुए क्षेत्र पर चीरा काटा जाता है। उसके नीचे के वसा ऊतकों को हटाया जाता है। फिर मांसपेशियों की परत को सावधानी से काटा जाता है ताकि उनमें और संलग्न नसों या रक्त वाहिकाओं को कोई स्थायी क्षति न हो जाए। ऊतकों को सावधानी से काटा जाता है जबतक पौरुष ग्रंथि न आ जाये। 

आम तौर पर शुक्र-संबंधी पुटिका (Seminal Vesicle) भी पौरुष ग्रंथि के साथ हटाई जाती है। संलग्न लिम्फ नोड भी हटा दिए जाते हैं ताकि कैंसर अन्य अंगों तक न पहुंचे। हटे हुए ऊतक को फिर से उसकी जगह पर लगाया जाता है। मांसपेशियों की मरम्मत की जाती है। चीरे को सिल दिया जाता है। 

लैप्रोस्कोपिक रेडिकल प्रोस्टेटेक्टॉमी (Laproscopic Radical Prostatectomy)

यह प्रक्रिया ओपन सर्जरी से इस प्रकार अलग है कि इसमें ओपन प्रक्रिया के मुकाबले छोटे और ज़्यादा चीरे किये जाते हैं। इससे रक्त की हानि कम होती है और घाव जल्दी भरता है। एक चीरे के माध्यम से एक छोटा वीडियो कैमरा डाला जाता है जो सर्जन को अंदरूनी अंग देखने में मदद करता है जिससे पौरुष ग्रंथि तक पहुंचा जा सके। अन्य चीरे सर्जिकल उपकरण डालने के लिए किये जाते हैं। आगे की प्रक्रिया ओपन सर्जरी के समान है।

इस प्रक्रिया को रोबोटिक सर्जरी (Robotic Surgery) से भी किया जा सकता है। सर्जन को ऑपरेशन थिएटर (Operation Theater) में रहने की आवश्यकता नहीं होती और कंप्यूटर द्वारा नियंत्रित रोबोटिक आर्म्स (Robotic Arms) की मदद से पूरी प्रक्रिया की जा सकती है। 

क्रायोसर्जरी (Cryosurgery)

क्रायो (Cryo) का अर्थ है ठंडा। इस सर्जरी में बहुत ही कम तापमान में फ्रीज़ करके कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करता है जिससे उन्हें फैलने से बचाता है। यह सर्जरी रीजनल एनेस्थीसिया (Regional Anesthesia) देकर भी की जा सकती है, इसका अर्थ है कि मरीज़ सर्जरी के दौरान होश में होता है। एनेस्थटिक दवाएं इस प्रकार दी जाती हैं कि शरीर के किसी विशेष अंग की नसें सुन्न हो जाएँ। गुदे और वृषणकोष के बीच की त्वचा पर नीडल्स डाली जाती हैं। नीडल्स द्वारा ठंडी गैसों (Cold Gases) को डाला जाता है जिससे पौरुष ग्रंथि का कैंसरग्रस्त भाग नष्ट हो जाए। अन्य अंगों को क्षति न पहुंचे इसका ध्यान रखा जाता है। 

मूत्र सम्बन्धी परेशानियों से बचने के लिए मूत्राशय में कैथेटर (Cathetar) डाला जाता है। सर्जरी के दौरान, मूत्रमार्ग में गर्म नमक का पानी इंजेक्ट किया जाता है ताकि वह न जम जाए। 

यह प्रक्रिया प्राथमिक चरण के कैंसर के उपचार में प्रयोग की जा सकती है हालांकि इसकी अग्रिम चरण के कैंसर में प्रभावशीलता पर ज़्यादा अध्ययन नहीं किया गया है। यह सर्जरी आउट पेशेंट (Outpatient; जिस मरीज़ को उपचार के बाद अस्पताल में दाखिल होने की आवश्यकता नहीं होती) आधार पर भी की जा सकती है जिससे हर बार मरीज़ को अस्पताल में भर्ती न होना पड़े। प्रोस्टेटेक्टॉमी के मुकाबले इसमें रक्त की हानि बहुत काम होती है।

सर्जरी में बड़े चीरे नहीं किये जाते। सर्जन सीधा पौरुष ग्रंथि को नहीं देख पाते इसलिए सोनोग्राफी (Sonography) की सहायता ली जाती है। 

द्विपक्षीय वृषणग्रंथि-उच्छेदन (Bilateral Orchiectomy)

इस प्रक्रिया में सर्जरी द्वारा दोनों वृषण निकाल दिए जाते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि पौरुष ग्रंथि में टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) की आपूर्ति न हो सके और कैंसर के विकास को और उसको फैलने से रोका जा सके। टेस्टोस्टेरोन वृषण में उत्पादित किया जाता है। इस प्रक्रिया में वृषणकोष के आगे एक-एक चीरा काटा जाता है। मांसपेशियों के ऊतकों को सावधानी से काटा जाता है। वृषण ऊतकों को हटा दिया जाता है। 

इस सर्जरी के अन्य प्रकार को सबकैप्सूलर वृषणग्रंथि-उच्छेदन (Subcapsular Orchiectomy) कहा जाता है जिसमें सिर्फ टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) बनाने वाले ऊतकों को हटाया जाता है। दोनों ही प्रक्रियाओं में लिंग और वृषणकोष को नहीं छेड़ा जाता। यह सर्जरी प्रजनन आयु के अंतर्गत आने वाले पुरुषों (जवान पुरुषों) में नहीं की जाती। टेस्टोस्टेरोन की मात्रा में अचानक कमी हो जाने से उनकी प्रजनन क्षमता बाधित हो सकती है। टेस्टोस्टेरोन दर कम होने से शरीर में कई दुष्प्रभाव हो सकते हैं इसलिए सर्जरी के बाद देखभाल किया जाना आवश्यक है। कई बार वृषण को कृत्रिम वृषण से भी बदला जा सकता है। 

प्रोस्टेट का ट्रांसुरेथ्रल विभाजन (Transurethral Resection of Prostate, TURP)

यह प्रक्रिया सीधा कैंसर के उपचार के लिए नहीं बल्कि अक्सर पौरुष ग्रंथि के कैंसर रहित बढ़ाव के उपचार में की जाती है। कैंसर में इसका प्रयोग मूत्रत्याग में कठिनाई के लक्षण से आराम पाने के लिए किया जाता है। मूत्रमार्ग का प्रोस्टेटिक भाग इस सर्जरी में एक्सेस पॉइंट (Acces Point; रोगग्रस्त अंग तक पहुँचने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाले क्षेत्र) होता है। अंदरूनी अंगों को ढंग से देखा जा सके इसके लिए मूत्रमार्ग में एक रेसेक्टोस्कोप (Resectoscope) डाला जाता है। मूत्रमार्ग के आसपास के पौरुष ग्रंथि को बहुत ही कम और परिगणित तीव्रता की बिजली या लेज़र बीम से वेपराइज़ किया जाता है। सावधानी बरती जाती है कि आसपास के ऊतकों को कोई नुक्सान न हो। इस सर्जरी में चीरों की आवश्यकता नहीं होती। मूत्रत्याग के लिए कैथेटर लगाया जाता है जिसे दो से तीन दिनों के लिए रखा जाता है। 

मरीज़ की उम्र, कैंसर की गंभीरता, रोगी का सामान्य स्वस्थ और अन्य अंगों को कितना प्रभाव पहुँच रहा है, के आधार पर सर्जरी की प्रक्रिया तय की जाती है।

सर्जरी की प्रक्रिया समाप्त होने का अर्थ यह नहीं है कि उपचार भी समाप्त हो चुका है। कुछ तत्काल किये जाने जाने वाले और लम्बे समय तक की जाने वाली देखभाल के तरीके निम्न हैं। जल्दी रिकवरी तब ही मुमकिन है अगर ये साड़ी बातें मानी जाये और उचित देखभाल की जाए।

तत्काल की जाने वाली देखभाल (Short Term Care)

  1. सर्जरी के बाद मरीज़ की सामान्य स्वास्थ्य स्थिति की जांच की जाती है। जब तक एनेस्थीसिया का असर पूरी तरह नहीं चला जाता तब तक रक्त चाप, ह्रदय की गति, श्वास एवं शरीर का तापमान को निरंतर मॉनिटर किया जाता है।
  2. जैसा कि पहले बताया गया है - सर्जरी के बाद एक कैथेटर मरीज़ के शरीर में लगाया जाता है जिससे मूत्रत्याग करने में परेशानी न हो। कैथेटर की भी निरंतर जांच की जाएगी कि वो अपनी जगह पर है या नहीं और कहीं कोई रक्तस्त्राव तो नहीं। कुछ दिनों के बाद कैथेटर को हटा दिया जायेगा।
  3. मरीज़ को शुरूआती कुछ घंटों तक ठोस आहार नहीं दिया जाता अगर सर्जरी के दौरान जनरल एनेस्थीसिया का प्रयोग किया गया है। सर्जन मरीज़ की आँतों की गतिविधि और मल त्याग का आंकलन करेंगे और फिर तय किया जायेगा कि ठोस आहार कबसे शुरू किया जाना है।
  4. कब्ज न हो इसके लिए रेशेदार भोजन को अपनी रोज़ की डाइट में शामिल करें। कब्ज से आँतों पर तनाव पड़ सकता है जो कि सर्जरी एक बाद मरीज़ के लिए बिलकुल सही नहीं है।
  5. अत्यधिक मात्रा में पानी पियें। इससे मूत्र का संचय बना रहेगा और मूत्र संक्रमण से बचा जा सकेगा। (और पढ़ें – यूरिन इन्फेक्शन के लक्षण)
  6. रेचक औषधि दी जा सकती हैं जिससे मल त्याग करने में आसानी हो।
  7. ज़्यादातर मरीज़ों को एंटीबायोटिक्स और दर्द निवारक दवाएं दी ही जाती हैं। 
  8. नियमित रूप से डॉक्टर से जांच करवाते रहें। 
  9. मरीज़ ध्यान दें कि कुछ दिनों तक किसी भी प्रकार की यौन गतिविधि न करें। सर्जन से पूछ कर ये शुरू किये जा सकते हैं। 

लम्बे समय तक की जाने वाली देखभाल (Long Term Care)

रिकवरी का समय सर्जरी की प्रक्रिया पर भी निर्भर करता है। अगर मरीज़ पूरी तरह ठीक हो भी गया है, तो भी उसे अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखा चाहिए। डॉक्टर आम तौर पर एक विस्तृत विवरण करते हैं कि सर्जरी के बाद किन बातों का ध्यान रखा जाना है।

कैंसर के मरीज़ों को आमतौर लम्बे समय तक फॉलो-अप के लिए बुलाया जाता है ताकि यह जांच की जा सके कि कैंसर की पुनरावृत्ति तो नहीं हुई या कैंसर किसी और अंग में तो उत्पन्न नहीं हुआ। 

कई बार कैंसर पूरी तरह ठीक नहीं हुआ होता या दुबारा उत्पन्न हो जाता है। इसके उपचार के लिये उपर्लिखित किसी प्रक्रिया (व्यक्तिगत स्थिति के आधार पर) का इस्तेमाल करके उसका उपचार किया जाता है। आंकलन करने के लिए कई तरह के टेस्ट्स किया जाएंगे जैसे एमआरआई (MRI), सीटी स्कैन (CT Scan), सोनोग्राफी (Sonography) आदि।

रिकवरी का समय प्रक्रिया की विधि और आपकी स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। उपर बताई गई बातों का ध्यान रखें और उचित देखभाल करें।

हर उपचार से जुड़े कुछ जोखिम और कुछ नुक्सान होते हैं। कई बार ऐसा हो सकता है कि मरीज़ को कोई परेशानी न हो और कई बार गंभीर जोखिमों का सामना करना पड़ता है।

  1. द्विपक्षीय वृषणग्रंथि-उच्छेदन (Bilateral Orchiectomy) के बाद प्रजनन क्षमता में कमी, हॉट फ्लैशेस (Hot Flashes:चेहरे, गर्दन, कान और धड़ में गर्मी का महसूस होना), घबराहट और अवसाद, Gynecomastia (पुरुषों में स्तन बढ़ना), वज़न बढ़ना, लिंग स्तम्भन में परेशानी हो सकती है। इनके उपचार के लिए हॉर्मोनल चिकत्सा की आवश्यकता होती है।
  2. प्रजनन में असमर्थता भी एक परिणाम हो सकता है। यह टेस्टोस्टेरोन आपूर्ति में कमी, यौन इच्छा में कमी, लिंग स्तम्भन में परेशानी से हो सकता है। इन समस्याओं से निजात पाने हेतु दवाएं दी जाती हैं।
  3. मूत्रमार्ग के इस प्रक्रिया में शामिल होने की वजह से मूत्रत्याग में परेशानी या कठिनाई हो सकती है। यह परशानी आमतौर पर स्वयं ही बेहतर हो जाती है। बेहतर न होने पर अपने सर्जन से संपर्क करें।
  4. बार बार मूत्रत्याग की तीव्र इच्छा होना या मूत्र रोक पाने में असमर्थता हो सकती है।
  5. पौरुष ग्रंथि के स्वस्थ भाग या संलग्न स्वस्थ अंगों को आकस्मिक चोट पहुँच सकती है।
  6. रक्त वाहिका को क्षति होने से रक्त की अत्यधिक हानि हो सकती है। इसलिए लगभग हर सर्जरी से पहले ही रक्त-आधान (Blood-Transfusion; खून चढ़ाना) के लिए रोगी के ब्लड ग्रुप का रक्त तैयार रखा जाता।
  7. एनेस्थेटिक दवाओं के प्रति एलर्जिक प्रतिक्रिया हो सकती है। इसके लिए उचित मेडिकल चिकित्सा आवशयक है।
  8. आम तौर देखा गया है कि प्रोस्टेट का ट्रांसुरेथ्रल विभाजन (Transurethral Resection of Prostate, TURP) के बाद मूत्र में रक्त पारित होता है। अगर यह स्वयं बंद न हो तो सर्जन से परामर्श अवश्य करें। 
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