कैनुला क्या है?

कैनुला एक पतली ट्यूब है, जिसे शरीर में नसों के जरिए इंजेक्ट किया जाता है, ताकि जरूरी तरल पदार्थ को शरीर से निकाला (नमूने के तौर पर) या डाला जा सके। इसे आमतौर पर इंट्रावीनस कैनुला (IV cannula) कहा जाता है।

बता दें, इंट्रावीनस थेरेपी देने के लिए सबसे आम तरीका पेरिफेरल वीनस कैनुलेशन (शरीर के परिधीय नसों में कैनुला का उपयोग करना) है। इंट्रावीनस (नसों के अंदर) प्रबंधन का मुख्य लक्ष्य ऊतकों को नुकसान पहुंचाए बिना, सुरक्षित और प्रभावी ढंग से उपचार प्रदान करना है। जब किसी मरीज का लंबे समय तक उपचार चलता है, तो ऐसे में इंट्रावीनस थेरेपी की विशेष जरूरत पड़ती है। शोध से पता चला है कि जिन मामलों में इंट्रावीनस कैनुला की जरूरत नहीं होती है, उनमें भी इसका प्रयोग किया जाता है, जबकि कुछ मामलों में इसे टाला जा सकता है।

जनरल वार्डों में भर्ती 1,000 रोगियों पर हाल ही में एक शोध किया गया, इस दौरान इन सभी मरीजों के नमूने लिए गए। अध्ययन में पाया गया कि लगभग 33% रोगियों में इंट्रावीनस कैनुला का प्रयोग सामान्य से अधिक समय के लिए किया जा रहा है। जबकि इसका प्रयोग 48 घंटे या इससे ज्यादा या फिर बिना प्रोफिलैक्टिक इंडीकेशन के नहीं किया जाता है। प्रोफिलैक्टिक इंडीकेशन से मतलब है कोई दवा या उपकरण जो बीमारी को रोकता है।

  1. कैनुला का उपयोग - Indications of IV cannulation in Hindi
  2. कैनुला के फायदे - Cannula benefits in Hindi
  3. कैनुला का प्रयोग कहां नहीं करना चाहिए - Contraindications of cannula insertion in Hindi
  4. कैनुला के प्रकार - Cannula ke type
  5. कैनुला लगाने से पहले की तैयारी - Preparation before cannulation in Hindi
  6. इंट्रावीनस कैनुलेशन के लिए आवश्यक चीजें - Materials required for IV cannulation in Hindi
  7. कैनुलेशन की प्रक्रिया - Process of cannulation in Hindi
  8. कैनुलेशन से जुड़ी जटिलताएं - Complications of cannulation in Hindi
कैनुला कैसे लगाते हैं के डॉक्टर

आईवी कैनुलेशन के कुछ उपयोग निम्नलिखित हैं :

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कैनुला का उपयोग करने के फायदे नीचे बताए गए हैं :

  • कैनुलेशन प्रोसीजर के दौरान, तरल सीधे रक्तप्रवाह में प्रवेश करता है, यही वजह है कि यह तत्काल रूप से प्रभाव शुरू कर देता है।
  • इंट्रावीनस यानी नसों के जरिये जब किसी लिक्विड को शरीर में डाला जाता है जो ऐसे में शरीर जितना संभव हो सके, उतनी अच्छे से दवाई या तरल को अपना लेता है। हालांकि, दवाई या तरल दिए जाने के अन्य तरीके भी हैं, जैसे ओरली (मौखिक रूप से), इंट्रामस्क्युलर (जैसे इंजेक्शन) या सबलिंगुअल (जीभ के नीचे दवा रखना)। लेकिन इन सबसे तेज और सटीक तरीका इंट्रावीनस है।
  • यह उन मरीजों के लिए बेहतरीन तरीका है, जिन्हें मौखिक या अन्य तरीकों से दवाइयां लेने में दिक्कत आती है। इसके अलावा इंट्रावीनस के जरिये रोगियों में पर्याप्त मात्रा दवाई या तरल भी पहुंचने में मदद मिलती है।
  • कुछ दवाओं को अन्य तरीकों से अवशोषित नहीं किया जा सकता है, उदाहरण के लिए ऐसी दवाइयां जिनका मॉलिक्युलर वेट बहुत ज्यादा होता है। ऐसे में केवल इंट्रावीनस दवाएं दी जा सकती हैं।
  • एक बार जब कैनुलेशन का प्रयोग किया जाता है, तो इसके बाद मरीज को बार-बार चुभन वाले दर्द को झेलने की जरूरत नहीं होती है, क्योंकि कैनुला हाथ में कुछ दिन तक लगा रहता है और डॉक्टर या नर्स उस कैनुला के ढक्कन को खोलकर तरल को इंजेक्ट करके वापस से बंद कर देते हैं।

इंट्रावीनस दवाओं का उपयोग निम्नलिखित स्थितियों में किया जा सकता है :

  • गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को इंट्रावीनस माध्यम से दवाओं की आवश्यकता हो सकती है, क्योंकि मौखिक दवाओं की तुलना में इंट्रावीनस दवाओं के इस्तेमाल के कई फायदे हैं। यह जानलेवा बैक्टीरियल इंफेक्शन जैसी गंभीर बीमारियों के मामले में मृत्यु दर को कम करने में मदद करता है।
  • जब किसी दवा की ओरल बायोअवैलबिलिटी (रक्तप्रवाह में प्रवेश करने वाली दवा की सटीक मात्रा) कम होती है या जब दवा केवल इंट्रावीनस रूप (जैसे मिनोग्लाइकोसाइड एंटीबायोटिक्स) में ही उपलब्ध होती है, तो आमतौर पर जठरांत्र प्रणाली के माध्यम से इसे अवशोषित नहीं किया जा सकता है। इसलिए, इन्हें इंट्रावीनस रूप से दिए जाने की जरूरत होती है।
  • उल्टी जैसे मामलों में जहां मरीज मौखिक रूप से किसी दवा का सेवन नहीं कर पाता है या जब डॉक्टर मौखिक रूप से कुछ भी सेवन करने से मना करते हैं, तो इन रोगियों में अन्य मार्गों जैसे मलाशय, सबलिंगुअल, इंट्रावीनस या इंट्रामस्क्युलर का उपयोग किया जाना चाहिए। (और पढ़ें - उल्टी रोकने के उपाय)
  • जिन मरीजों में देखने, सुनने, महसूस करने की क्षमता में कमी होती है, उनमें मौखिक दवाओं के सेवन से चोकिंग की समस्या हो सकती है। ऐसे मामलों में, इंट्रावीनस के माध्यम से दवाइयां देनी चाहिए।
  • इंट्रावीनस का इस्तेमाल तब किया जा सकता है जब डॉक्टर दवा के तेज परिणाम हासिल करना चाहते हैं। ऐसा बोलस इंजेक्शन के माध्यम से संभव है, क्योंकि इससे खून में दवा की मात्रा में तुरंत वृद्धि होती है।

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कैनुला का निम्नलिखित स्थितियों में उपयोग नहीं किया जाना चाहिए :

  • सूजन या संक्रमण वाले स्थान पर कैनुला के प्रयोग से बचें। (और पढ़ें - सूजन कम करने के उपाय)
  • किडनी फेलियर से पीड़ित रोगियों में, कैनुला को हाथ पर की नसों में नहीं डाला जाना चाहिए।
  • ऐसे ड्रग्स जो नसों में सूजन या जलन पैदा करने का कारण बन सकते हैं, इन्हें कम प्रवाह दर से छोटी नसों में इंजेक्ट किया जाना चाहिए। ये नसें टांग और पैरों में होती हैं।

इसलिए, कैनुला का प्रयोग करने से पहले, यह समझना जरूरी है कि यह रोगी के नैदानिक ​​उपचार के लिए आवश्यक है या नहीं। कभी-कभी, कैनुला का तुरंत उपयोग नहीं किया जाता है, लेकिन इसे सम्मिलित किया जाना चाहिए, क्योंकि बाद में यानी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त रोगियों के लिए जरूरी हो सकता है। बता दें, ज्यादातर रोगियों में तरल पदार्थों के वितरण के लिए इंट्रावीनस कैनुला का प्रयोग किया जाता है। फिलहाल, कैनुला का प्रयोग करने से पहले यह निर्धारित करना जरूरी है कि इंट्रावीनस के जरिये फ्लूइड दिया जाना आवश्यक है या नहीं।

यहां यह समझना आवश्यक है कि अस्पतालों में भर्ती रोगियों में तरल या इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन बेहद आम है। लेकिन, कुछ मामलों में, असंतुलन का प्रबंधन ठीक से नहीं हो पाता है। यह विशेष रूप से ऐसे रोगियों में होता है, जो लंबे समय से किसी चिकित्सकीय स्थिति से ग्रस्त हैं। अध्ययनों से पता चला है कि यह डॉक्टरों के सही तरीके से प्रशिक्षित ना होने का नतीजा है, जो जूनियर स्तर पर काम करते हैं। आमतौर पर ऐसे डॉक्टर मेडिकल वार्डों में नसों के माध्यम से तरल पदार्थों को निर्धारित करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।

हाल ही में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि लगभग 60% जूनियर डॉक्टरों को नसों के माध्यम से तरल पदार्थों का इस्तेमाल नहीं सिखाया गया था और लगभग 40% को तरल पदार्थ निर्धारित करने से पहले रोगी की प्रोफाइल या ब्लड टेस्ट रिपोर्ट का कोई पता नहीं था।

आमतौर पर, निर्जलीकरण से पीड़ित मरीजों के लिए इंट्रावीनस ट्रीटमेंट निर्धारित किया जाता है। लेकिन, जरूरी नहीं है कि निर्जलीकरण से ग्रस्त सभी लोगों को इंट्रावीनस ट्रीटमेंट ही दिया जाए। पेट में इंफेक्शन के एक्यूट मामलों (खासकर बच्चों में) के उपचार के लिए मौखिक रूप से फ्लूइड थेरेपी का इस्तेमाल किया जा सकता है। ओरली फ्लूइड थेरेपी को उन रोगियों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जिन्हें उल्टी की समस्या है।

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कैनुला गेज में अलग-अलग होते हैं। यहां गेज का मतलब इनमें लगी नली की मोटाई से है। अलग-अलग कामों के अनुसार अलग-अलग गेज वाली कैनुला का इस्तेमाल किया जाता है। कम गेज वाली कैनुला की नली मोटी होगी, जैसे-जैसे गेज नंबर बढ़ता जाएगा, वैसे-वैसे उसकी नली पतली होगी। आमतौर पर यह गेज नंबर 14-24 के बीच होते हैं। गेज नंबर के अनुसार इन्हें इनके रंग से भी पहचाना जा सकता है जैसे 14 नंबर वाले कैनुला का रंग नारंगी होता है। इसी तरह गेज नंबर के अनुसार इनके रंग भी अलग-अलग होते हैं।

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मान लीजिए, नसों के माध्यम से खून जैसा चिपचिपा तरल मरीज को देने की जरूरत है तो ऐसे में 14-16 नंबर वाले कैनुला का प्रयोग किया जाएगा। जबकि फ्लूइड रिप्लेसमेंट के दौरान मरीज को क्रिसटेलॉयड फ्लूइड चढ़ाने के लिए 20-24 नंबर वाले कैनुला का प्रयोग किया जाएगा।

कैनुला के प्रकार निम्नलिखित हैं :

  • नारंगी रंग वाला कैनुला : 14 गेज नंबर। इसका उपयोग ऑपरेशन थिएटरों में या आपातकालीन स्थितियों जैसे खून चढ़ाना, ब्लड प्रोडक्ट या इंट्रावीनस फ्लूइड देते समय किया जाता है।
  • ग्रे रंग वाला कैनुला : 16 गेज नंबर। इसका भी उपयोग ऑपरेशन थिएटरों या आपातकालीन स्थितियों जैसे खून चढ़ाना, ब्लड प्रोडक्ट या इंट्रावीनस फ्लूइड देते समय किया जाता है।
  • हरे रंग वाला कैनुला : 18 गेज नंबर। इसका उपयोग उन रोगियों में किया जाता है जिन्हें खून चढ़ाने व पोषक तत्वों की आपूर्ति और बड़ी मात्रा में इंट्रावीनस लिक्विड लेने की आवश्यकता होती है।
  • गुलाबी रंग वाला कैनुला : 20 गेज नंबर। इसका उपयोग उन रोगियों में किया जाता है जिन्हें खून चढ़ाने, पोषण तत्वों आपूर्ति और बड़ी मात्रा में इंट्रावीनस लिक्विड लेने की आवश्यकता होती है।
  • नीले रंग वाला कैनुला : 22 गेज नंबर। इसका प्रयोग छोटी नसों में किया जाता है। इसका उपयोग बच्चों में दवाओं और तरल पदार्थ पहुंचाने के लिए भी किया जा सकता है।

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कैनुला लगाने से पहले निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए :

  • कैनुलेशन प्रक्रिया से पहले मरीज को इसके बारे में पूरी जानकारी देनी चाहिए और यह भी बताना चाहिए कि कैनुलेशन की जरूरत क्यों है।
  • कैनुलेशन प्रक्रिया से पहले मरीजों की सहमति मिलनी चाहिए।
  • रोगी को आरामदायक महौल देना चाहिए और उन्हें पीठ के बल लेटने के लिए कहना चाहिए।
  • डॉक्टर या नर्स जो भी कैनुलेशन प्रक्रिया करने जा रहा है, उसे सबसे पहले अपने हाथ अच्छे से साफ करने चाहिए, इसके बाद जिस हाथ की नस में कैनुलेशन करना है वहां भी अच्छे से सफाई करनी चाहिए।
  • जिस हाथ पर कैनुलेशन प्रक्रिया करनी है, उसे किसी तकिए या अन्य मुलायम सतह पर रखें।
  • इस प्रक्रिया में आगे बढ़ने से पहले, यह जांच लें कि जिस जगह पर कैनुला का प्रयोग किया जाना है, वहां किसी तरह का संक्रमण, ऊतक को नुकसान या अन्य कोई समस्या तो नहीं है।

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इंट्रावीनस कैनुलेशन करने से पहले निम्नलिखित उपकरणों की आवश्यकता हो सकती है :

  • ड्रेसिंग ट्रे
  • दस्ताने (नॉन-स्टेरॉइल)
  • एप्रन (नॉन-स्टेरॉइल)
  • सफाई के लिए वाइप्स
  • इंट्रावीनस कैनुला
  • टर्निकिट (यह एक तरह की छोटी बेल्ट है, जिसे कैनुलेशन से पहले कलाई और कोहनी या कुछ कंधे और कोहनी के बीच बांधा जाता है, इस प्रक्रिया के तुरंत बाद इसे खोल दिया जाता है)
  • कैनुला को उसके उचित स्थान पर बनाए रखने के लिए बैंडेज या सर्जिकल टेप
  • स्प्रिट
  • एंटीसेप्टिक सॉल्यूशन
  • साधारण सैलाइन (पानी में सोडियम क्लोराइड का मिश्रण)
  • स्टेराइल सिरिंज
  • धारदार चीजों को फेंकने के लिए वेस्टबिन (कूड़ा फेकने वाला​ डिब्बा)

कैनुलेशन की प्रक्रिया में निम्नलिखित सुझावों का ध्यान रखना जरूरी है :

  • सुनिश्चित करें कि टर्निकिट को ठीक से बांधा जाए, आमतौर पर इसे ऊपरी बांह पर लगाया जाना चाहिए। टर्निकिट को उचित मात्रा में टाइट होना चाहिए, ताकि दबाव इतना बन जाए कि नस आसानी से उभर कर दिखने लगें, लेकिन इस दौरान यह ध्यान रखना चाहिए कि धमनी को नुकसान न पहुंचे।
  • रोगी को मुट्ठी खोलने और बंद करने के लिए कहें।
  • सुनिश्चित करें कि हाथ दिल के स्तर से नीचे होना चाहिए।

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केनुलेशन के लिए नस का चुनाव - Selecting a good vein for cannulation in Hindi

नस का चुनाव करते समय निम्नलिखित बातों का रखें ध्यान :

क्या होना चाहिए :

  • नस पर्याप्त मात्रा में उभरी हुई होनी चाहिए
  • नस पर्याप्त रूप से नरम होनी चाहिए
  • आसानी से दिखाई देनी चाहिए
  • इसमें पर्याप्त रूप से बड़ी होनी चाहिए
  • नस सीधी होनी चाहिए
  • आसानी से छूने योग्य होना चाहिए

क्या नहीं होना चाहिए :

  • गुत्थीदार या सख्त नहीं होनी चाहिए
  • नस में चोट न लगी हो (और पढ़ें - चोट के लिए होम्योपैथिक दवाएं)
  • नस में सूजन नहीं होनी चाहिए
  • नस बेहद पतली नहीं होनी चाहिए
  • नस बहुत नाजुक नहीं होनी चाहिए
  • नस किसी उभरी हुई हड्डी के पास नहीं होनी चाहिए
  • संक्रमण या पिछली किसी चोट वाली जगह पर नस नहीं होनी चाहिए

(और पढ़ें - कैंडिडा संक्रमण का इलाज)

कैनुला कैसे लगाते हैं - Inserting the cannula in Hindi

कैनुला लगाने के लिए सभी चरणों के बारे में नीचे बताया गया है :

  • सबसे पहले हाथ साफ करें और आवश्यक उपकरण तैयार करें।
  • कैनुला को उसकी पैकिंग से बाहर निकालें और चेक करें कि सभी पार्ट मौजूद व सही हैं।
  • इसमें ऊपर की तरफ लगी कैप को दाईं तरफ घुमाकर ढीला करें।
  • टर्निकिट को उचित रूप से बांधें। यह एक तरह की बेल्ट है, जिसे कुछ देर के लिए ब्लड सर्कुलेशन रोकने के लिए लगाया जाता है। (और पढ़ें - ब्लड सर्कुलेशन कम होने का इलाज)
  • अब ऐसी नस का चुनाव करें जो सीधी और उभरी हुई हो। इसके बाद अल्कोहल या स्प्रिट से उस जगह को अच्छे से साफ करें और इसे सूखने दें।
  • नॉन-स्टेरॉयल दस्ताने पहनें।
  • सुई के ऊपर प्रोटेक्टिव कवर को निकाल दें।
  • जिस नस पर कैनुला लगाना है वहां की त्वचा को दूसरे हाथ से हल्का सा खींचे और फिर करीब 20-30 डिग्री से कैनुला की सुई अंदर डालें, ध्यान रहे इस दौरान आपको पूरी सुई अंदर नहीं डालनी है, बल्कि आधे से कम अंदर डालनी है।
  • यदि आप चेक करना चाहते हैं कि आपने सही से कैनुला को इंजेक्ट किया है तो बता दें, सुई अंदर जाने के बाद 'नीडल ग्रिप' को पीछे खींचे, ऐसा करने से कैनुला के पिछले हिस्से (फ्लैशबैक) में कुछ मात्रा में खून आ जाएगा। यदि ऐसा होता है तो अब सुई को बेहद सावधानीपूर्वक पूरा अंदर कर दें। ऐसा करते ही आपको कैनुला के सबसे पिछले हिस्से में लगी कैप (लुइर लॉक प्लग) को निकाल लें और फिर कैनुला के अंदर लगी सुई को पूरी तरह से बाहर निकालकर उचित स्थान पर फेंक दें। ऐसा करते ही आपको तुरंत टर्निकिट को खोल देना है और लुइर लॉक प्लग को वापस से लगा देना है।
  • कैनुला में आपको दो विंग (पंख की तरह दिखने वाला​ हिस्सा) दिखाई देंगे, जिनके ऊपर से टेपिंग कर दें। आमतौर पर डॉक्टर सर्जिकल टेप का प्रयोग करते हैं।

इंट्रावीनस कैनुलेशन की वजह से निम्नलिखित जटिलताएं हो सकती हैं :

  • हेमेटोमा : कैनुला इंजेक्ट करते समय नस को नुकसान होने के कारण खून जमा होना। (और पढ़ें - खून का थक्का जमना)
  • इंफिल्ट्रेशन : नस की जगह, ऊतकों में कैनुला इंजेक्ट हो जाना।
  • इबोलिज्म : नस का अचानक से ब्लॉक हो जाना। हालांकि, ऐसा तब होता है जब नसों में किसी भी बाहरी मैटेरियल का सूक्ष्म टुकड़ा चला जाता है।
  • सूजन : नस सूज जाना

(और पढ़ें - सूजन कम करने की होम्योपैथिक दवा)

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संदर्भ

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  2. Osti Chadani, Khadka Menuka, Wosti Deepa, Gurung Ganga, Zhao Qinghua. Knowledge and practice towards care and maintenance of peripheral intravenous cannula among nurses in Chitwan Medical College Teaching Hospital, Nepal. Nurs Open. 2019 Jul; 6(3): 1006–1012. PMID: 31367425.
  3. Rüsch Dirk, Koch Tilo, Spies Markus, Eberhart Leopold HJ. Pain During Venous Cannulation: A Randomized Controlled Study of the Efficacy of Local Anesthetics. Dtsch Arztebl Int. 2017 Sep; 114(37): 605–611. PMID: 28974291.
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  5. Khadim MF, Leonard D, Moorehead RA, Hill C. Back to basics: iatrogenic intravenous cannula embolus. Ann R Coll Surg Engl. 2013 Oct; 95(7): e4–e5. PMID: 24112480.
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