कैथेटेराइजेशन की परिभाषा क्या है?

कैथेटेराइजेशन रोगियों में की जाने वाली बहुत ही जरूरी प्रक्रिया है, जिसमें मरीज के मूत्राशय में पतली सी कैथेटर ट्यूब डाली जाती है। यह ट्यूब मूत्र को एक थैली में पहुंचाती है और जैसे ही यह थैली भर जाती है इसे खाली कर दिया जाता है। हालांकि, बहुत जरूरी होने पर ही डॉक्टर इसका इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि इस प्रक्रिया में बहुत दर्द होता है और यह कई जटिलताओं से भी जुड़ी हो सकती है। लंबर पंचर टेस्ट और आर्टेरियल ब्लड गैसेज सैम्पलिंग टेस्ट की तुलना में कैथेटेराइजेशन में अधिक दर्द होता है।

ज्यादातर अस्पतालों में, नर्स कैथेटेराइजेशन करती हैं, लेकिन यदि इस दौरान किसी तरह की कठिनाई जैसे कि मूत्रमार्ग का सिकुड़ना या पतला होना या मरीज को प्रोस्टेट कैंसर हो और मरीज को हाल ही में चोट लगी है को डॉक्टर की उपस्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है।

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  1. कैथेटेराइजेशन के लिए संकेत - Indication for catheterisation in Hindi
  2. कैथेटर के प्रकार - Types of catheters in Hindi
  3. यूरीनरी कैथेटर काम कैसे करता है - How does urinary catheter work in Hindi
  4. कैथेटर लगाने का तरीका - Catheterization insertion procedure in Hindi
  5. कैथेटर प्रबंधन के साथ होने वाली समस्याएं - Issues with catheter management in Hindi
  6. कैथेटर निकालने की विधि - Catheter removal in Hindi
  7. कैथेटेराइजेशन की जटिलताएं - Complications associated with catheterisation in Hindi
  8. कैथेटेराइजेशन क्या है के डॉक्टर

कैथेटेराइजेशन करने से पहले, डॉक्टर के लिए कैथेटेराइजेशन के उद्देश्य को समझना जरूरी है। कैथेटेराइजेशन की जरूरत को अल्पकालिक (कम समय के लिए) और दीर्घकालिक (लंबे समय के लिए) जरूरत में बांटा जा सकता है।

कैथेटेराइजेशन की अल्पकालिक जरूरतों में निम्नलिखित शामिल हैं :

  • मूत्राशय भरा होने के बावजूद पेशाब न कर पाना
  • सर्जरी से पहले मूत्राशय को खाली करना
  • कितनी मात्रा में मूत्र उत्पादन हो रहा है, इस बात की जांच के लिए कुछ समय के लिए कैथेटेराइजेशन किया जाता है।

कैथेटेराइजेशन के दीर्घकालिक जरूरतों में निम्नलिखित शामिल हैं :

  • क्रोनिक यूरीनरी रिटेंशन, जिसमें आप पेशाब कर सकते हैं, लेकिन मूत्राशय पूरी तरह से खाली नहीं हो पाता है।
  • ऐसे मरीज जिन्हें यूरीनरी इंकॉन्टिनेंस (पेशाब का अनियंत्रित रूप से रिसाव होना) है, जो मानसिक रूप से बीमार या बेहद कमजोर हैं और बार-बार बिस्तर गीला कर देते हैं, उनमें भी कैथेटेराइजेशन का लंबे समय तक प्रयोग करने की जरूरत पड़ती है।

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कैथेटर का प्रकार कई कारकों से जुड़ा है, जैसे इसे कितने समय के लिए लगाया जाना चाहिए, यह संक्रमण के जोखिम और मरीज की इच्छा पर निर्भर करता है।

कैथेटर के प्रकार में निम्नलिखित शामिल हैं :

  • एक्टर्नल बनाम इंड्वेलिंग कैथेटर्स : एक्टर्नल कैथेटर्स को कंडोम कैथेटर्स भी कहते हैं, इन्हें पुरुषों में लिंग के ऊपर से कंडोम की तरह से लगाया जाता है और इनके अगले सिरे पर ट्यूब लगी होती है। इस तहर के कैथेटर का प्रयोग या तो अनियंत्रित रूप से पेशाब का रिसाव होने या पेशाब बंद होने पर किया जाता है। इनमें संक्रमण का जोखिम कम होता है और इंड्वेलिंग कैथेटर्स की अपेक्षा यह ज्यादा आरामदायक होते हैं, लेकिन इसकी वजह से त्वचा को कुछ नुकसान हो सकता है और लिंग में खून के संचार में कमी आ सकती है। इसके अलावा जिन मरीजों में एक्टर्नल कैथेटर्स का इस्तेमाल हो रहा है, उनमें लीकेज की भी समस्या हो सकती है।
  • इंटरमिटेंट कैथेटेराइजेशन : इसका प्रयोग न्यूरोपैथिक ब्लैडर (न्यूरोलॉजिकल स्थिति या रीढ़ की हड्डी की चोट की वजह से मूत्राशय को खाली नहीं कर पाना) वाले रोगियों में लंबे समय तक करने की आवश्यकता होती है। इसका फायदा यह है कि मूत्र पथ के संक्रमण का जोखिम कम होता है, लेकिन त्वचा संबंधी संक्रमण (सेलुलाइटिस) का जोखिम ज्यादा रहता है। (और पढ़ें - बार-बार यूरिन इन्फेक्शन क्यों होता है?)

कैथेटर कई आकारों में आते हैं और यह अलग-अलग चीजों से बने हो सकते हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं :

  • लैटेक्स
  • सिलिकॉन
  • टेफ्लॉन

कैथेटर के प्रकार में निम्नलिखित शामिल हैं :

  • फोली कैथेटर (सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला)
  • स्ट्रेट कैथेटर
  • कूड टिप कैथेटर
  • सिल्वर कैथेटर, जिनमें रोगाणुरोधी गुण होते हैं

सेल्फ-रिटेनिंग फॉली कैथेटर, सबसे अधिक प्रयोग में लाए जाने वाले कैथेटर हैं और इनमें लगी ट्यूब मुलायम रबर से बनी होती है, जिसे मूत्र नली के जरिये मूत्राशय में डाल दिया जाता है। इसके सिरे पर गुब्बारा होता है, जिसे सैलाइन (पानी में सोडियम क्लोराइड का मिश्रण) के प्रयोग से फुलाया जाता है और फिर कैथेटर को इसके सही जगह तक पहुंचा दिया जाता है। पहले, फोली कैथेटर लेटेक्स के बने होते थे, लेकिन अब सिलिकॉन-आधारित कैथेटर्स पसंद किए जाते हैं, क्योंकि यह लेटेक्स के कारण होने वाली त्वचा की जलन को रोकने में मदद करता है। इसके अलावा यह कैथेटर लंबे समय (दो महीने) तक चलते हैं। लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि जितने समय के लिए डॉक्टर कैथेटर का प्रयोग करने के लिए कहते हैं उससे ज्यादा समय तक इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।

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कैथेटर का चुनाव कैसे करें - Deciding which type of catheter to use in Hindi

नीचे कुछ उदाहरण दिए गए हैं, जिससे आप जान जाएंगे कि स्थितियों के अनुसार, किस प्रकार के कैथेटर का प्रयोग किया जाना चाहिए :

  • अस्पताल में भर्ती मरीजों के लिए कुछ समय के लिए कैथेटर की आवश्यकता होती है, ऐसे में सिल्वर कैथेटर का उपयोग किया जा सकता है, क्योंकि यह रोगाणुरोधी है और मूत्र पथ के संक्रमण के जोखिम को कम करता है।
  • कुछ रोगियों में मूत्र का नमूना लेने के लिए स्ट्रेट कैथेटर का उपयोग किया जा सकता है।
  • यदि कैथेटर को लंबे समय के लिए अंदर छोड़ने की आवश्यकता पड़ती है, तो ऐसे में सिलिकॉन-बेस्ड फोली कैथेटर का उपयोग किया जा सकता है, क्योंकि यह लंबे समय तक चल सकता है।
  • जो मरीज मूत्राशय या प्रोस्टेट सर्जरी कराने वाले हैं उनमें तीन ल्यूमेन वाले कैथेटर का प्रयोग किया जा सकता है।

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कैथेटर का आकार - Catheter size in Hindi

कैथेटर का आकार के बारे में जरूरी बातें - 

फोली कैथेटर्स को फ्रेंच ग्रेड या FG (1फ्रेंच = 1 / 3mm व्यास) में आकार के अनुसार बांटा गया है। सही आकार का कैथेटर चुनना बहुत जरूरी होता है, क्यों​कि ऐसा करना न केवल मरीज के लिए आरामदायक होता है, बल्कि यह पर्याप्त मात्रा में मूत्राशय खाली करने में भी उपयोगी होता है। सबसे छोटे आकार का कैथेटर मूत्राशय को खाली करने के लिए पर्याप्त और प्रभावी है, क्योंकि बड़े कैथेटर से अक्सर चोट लगने का जोखिम रहता है।

निम्नलिखित परिस्थितियों के अनुसार कैथेटर के आकार को निर्धारित करने में मदद मिल सकती है :

  • ऐसी महिलाओं जिनमें यूरिन साफ दिखाई देता है उनमें पहली बार में 10-12 फ्रेंच के कैथेटर का इस्तेमाल होता है
  • ऐसे पुरुष जिनमें यूरिन साफ दिखाई देता है उनमें पहली बार में 12-14 फ्रेंच के कैथेटर का इस्तेमाल होता है
  • ऐसे पुरुष जिनमें यूरिन धुंधला दिखाई देता है उनमें पहली बार में 16 फ्रेंच के कैथेटर का इस्तेमाल होता है
  • ऐसे पुरुष जिनमें अवशेष या खून को ड्रेन करना होता है उनमें 18 फ्रेंच के कैथेटर का इस्तेमाल होता है
  • जबकि बच्चों में छोटे आकार के कैथेटर की आवश्यकता होती है।

यूरीनरी ड्रेनेज बैग वह थैली होती है, जिसमें मूत्र इकट्टा होता है। यह सबसे आम तरीका है, जिसकी मदद से मूत्राशय में भरा तरल मूत्र नलिका से होते हुए थैली में जमा हो जाता है। इसमें 750 मिलीलीटर तक मूत्र एकत्र किया जा सकता है। ये बैग आमतौर पर बिस्तर के किनारे हैंगर की मदद से लटका दिए जाते हैं। यह जरूरी है कि क्लोज्ड ड्रेनेज सिस्टम का प्रयोग किया जाए, क्योंकि यह मूत्र पथ के संक्रमण के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है। बता दें, क्लोज्ड ड्रेनेज सिस्टम एक टयूबिंग प्रणाली है, इसका इस्तेमाल शरीर से फ्लूइड को निकालने के लिए किया जाता है, यह एक एअरटाइट सर्किट की मदद से पर्यावरण में मौजूद दूषित पदार्थों को शरीर में प्रवेश करने से रोकता है।

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कैथेटर डालने की विधि से जुड़ी जरूरी बातें -

कैथेटर्स को असेप्टिक 'बिना छुए' तकनीक के माध्यम से डाला जाना चाहिए, क्योंकि यह संक्रमण के जोखिम को कम करने में मदद करता है। इसमें केवल प्लास्टिक की पैकिंग को छुआ जाता है, नाकि इसके अंदर कैथेटर को।

कैथेटर को सफलतापूर्वक प्रयोग करने के लिए निम्नलिखित उपकरणों की आवश्यकता होती है :

  • स्टेरॉयल दस्ताने (स्‍वच्‍छ और जीवाणु-रहित)
  • एंटीसेप्टिक सॉल्यूशन जैसे डेटॉल, सेवलॉन या कोई अन्य
  • स्वैब (इसका इस्तेमाल घाव साफ करने या नमूना लेने के लिए डॉक्टर या नर्स द्वारा किया जाता है)
  • एंटीसेप्टिक एनेस्थेटिक जेल
  • यूरीनरी कैथेटर कितने फ्रेंच (fr) का होना चाहिए 
  • यूरिन बैग के साथ ट्यूब
  • सैलाइन के साथ सिरिंज जो फोले कैथेटर के गुब्बारे को फुलाने में मदद करता है।

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पुरुषों में कैथेटर लगाने का तरीका - How to insert a male catheter in Hindi

कैथेटेराइजेशन की प्रक्रिया (पुरुषों में) निम्नलिखित है :

  • रोगी को सबसे पहले पीठ के बल लेटने के लिए कहिए और अपने हाथ को अच्छे से साफ कर लीजिए।
  • दस्ताने पहन लें और एक हाथ से रोगी के लिंग को पकड़ें, ताकि कैथेटर का उपयोग करते समय मरीज खुद को चोट न पहुंचा पाए। अब लिंग की बाहरी त्वचा को पीछे की ओर खींच लें।
  • रूई में एंटीसेप्टिक घोल लेकर लिंग के सिरे को हल्के हाथ से साफ कर लें।
  • इंजेक्शन (बिना सुई वाला) में एनेस्थेटिक जेल लें और उसे लिंग के अंदर डाल दें, ताकि कैथेटर आसानी से चला जाए। अब करीब तीन मिनट तक इंतजार करें, ताकि यह जेल अंदर मूत्राशय तक चला जाए।
  • अब कैथेटर की ट्यूब को लिंग के अंदर सावधानीपूर्वक और धीरे-धीरे डालें। इस प्रक्रिया के दौरान लिंग को सीधा पकड़ना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि ट्यूब की सिर्फ ओपनिंग (वह हिस्सा जहां से ड्रेनेज बैग को जोड़ना होता है) हिस्सा बाहर रहे। इस हिस्से से ड्रेनेज बैग को तुरंत जोड़ लें।
  • ट्यूब की ओपनिंग वाले हिस्से के पास एक और नली होगी, जिसे बैलून पोर्ट कहते हैं। इसके माध्यम से सैलाइन (आमतौर पर 10-15 मिलीलीटर) को इंजेक्ट किया जाता है। ऐसा इसलिए करते हैं, ताकि ट्यूब का जो सिरा मूत्राशय के अंदर है उसमें फुलाव आ जाए, बता दें फुलाव आना इसलिए जरूरी होता है ताकि ट्यूब अपने आप बाहर न निकल आए।
  • अब कैथेटर को धीरे-धीरे तब तक बाहर निकालें जब तक आपको यह एहसास न हो कि मूत्राशय के अंदर फुलाव वाला हिस्सा किनारे पर आ चुका है। इस पोजीशन पर मूत्र खुलकर मूत्र थैली में जाते दिखना चाहिए।
  • सुनिश्चित करें कि आपने पूरी प्रक्रिया के बाद लिंग की त्वचा को जितना हो सके उतना बंद कर दिया है।
  • कैथेटर की ट्यूब को ऐसे टेपिंग कर देनी चाहिए कि टेप जांघ के अंदरूनी भाग पर चिपक जाए, इससे ट्यूब पर किसी तरह का दबाव नहीं बन सकेगा।

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महिलाओं में कैथेटर लगाने का तरीका - How to insert a female urinary catheter in Hindi

कैथेटेराइजेशन की प्रक्रिया (महिलाओं में) निम्नलिखित है :

यह पुरुषों में किए जाने वाले कैथेटेराइजेशन से मिलता-जुलता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि महिलाओं में मूत्रमार्ग पुरुषों की अपेक्षा छोटा होता है, कभी-कभी मूत्र मार्ग की पहचान करना मुश्किल भरा हो सकता है।

  • सबसे पहले रोगी को पीठ के बल लेट जाना चाहिए।
  • मूत्रमार्ग के अंदर व बाहर इसके आसपास वाले हिस्से को लिक्विड एंटीसेप्टिक से अच्छे से साफ किया जाना चाहिए, क्योंकि योनी में अक्सर बैक्टीरिया होते हैं। कई डॉक्टर योनी से लेकर आधी जांघ तक के हिस्से को साफ करने की सलाह देते हैं। 
  • यूरीनरी कैथेटर के टिप पर एनेस्थेटिक सॉल्यूशन या जेल लगाएं या आप चाहें तो इंजेक्शन (बिना सुई वाला) में एनेस्थेटिक जेल लेकर लेबिया (होंठ जैसी संरचनाएं) को खोलकर इसमें डाल दें, इससे कैथेटर को अंदर जाने में आसानी होगी और त्वचा को नुकसान नहीं होगा।
  • कुछ मिनट (3-5) इंतजार करें और फिर कैथेटर को सावधानीपूर्वक व धीरे से अंदर करें।
  • यदि आपको मूत्रमार्ग की पहचान करने में कठिनाई हो रही है, तो आप पहले योनि के सामने वाले हिस्से को छूकर या टटोलकर मूत्रमार्ग की पहचान सुनिश्चित कर लें।
  • मूत्राशय में लगभग 10 सेमी तक कैथेटर को धीरे-धीरे डालें। ध्यान रहे, कैथेटर का इस्तेमाल करने से पहले इसकी एक्सपायरी और आकार जरूर चेक कर लेना चाहिए।
  • कैथेटर में लगे बैलून पोर्ट की मदद से सैलाइन को इंजेक्ट करें, ता​कि ट्यूब का जो सिरा मूत्राशय के अंदर है उसमें फुलाव आ जाए और ट्यूब अपने आप बाहर न निकल आए।
  • अब कैथेटर को धीरे-धीरे तब तक बाहर निकालें जब तक आपको यह एहसास न हो कि मूत्राशय के अंदर फुलाव वाला हिस्सा किनारे पर आ चुका है।
  • अब बाहर वाले ​सिरे को तुरंत पेशाब की थैली से जोड़ दें ताकि मूत्र का रिसाव बिस्तर पर न गिरने पाए।
  • इस पोजीशन पर मूत्र थैली में जाते दिखना चाहिए।
  • कैथेटर की ट्यूब को ऐसे टेपिंग कर देनी चाहिए कि टेप जांघ के अंदरूनी भाग पर चिपक जाए, इससे ट्यूब पर किसी तरह का दबाव नहीं बन सकेगा।

(और पढ़ें - पेशाब कम आने का इलाज)

कैथेटर लगाते समय होने वाली समस्याएं - Catheterization difficulty in hindi

मूत्रमार्ग में कैथेटर डालते समय निम्नलिखित समस्याएं हो सकती हैं :

  • फिमोसिस : यह समस्या केवल पुरुषों में देखी जाती है। इसमें व्यक्ति लिंग की त्वचा को पीछे करने में असमर्थ हो जाता है। यदि हल्की सी त्वचा पीछे हो जाती है और ओपनिंग (जहां से मूत्र बाहर आता है) में कैथेटर डाला जा सकता है। यदि ओपनिंग वाला हिस्सा बहुत पतला है, तो उसमें फैलावा लाने के लिए छोटे कैथेटर का प्रयोग करें। (और पढ़ें - फिमोसिस का इलाज)
  • प्रोस्टेट के पिछले हिस्से में कैथेटर जाने में परेशानी : यह भी केवल पुरुषों में होता है। कोशिश की जानी चाहिए कि पुरुषों में बड़े आकार के कैथेटर का इस्तेमाल किया जाए, ताकि अंडाशय की वजह से होने वाली परेशानी से निपटने में मदद मिल सके। आप एक सिलिकॉन कैथेटर का उपयोग भी कर सकते हैं, क्योंकि यह सख्त या कठोर होता है।
  • ब्लैडर नेक को पास न कर पाना : यहां ब्लैडर नेक का मतलब मूत्राशय के किनारे वाले ​उस हिस्से से है, जहां कैथेटर के ट्यूब में फुलाव लाया जाता है, ताकि ट्यूब फंस जाए और अपने आप बाहर न आ सके। जब कैथेटर ब्लैडर नेक के पार नहीं जा पाता है तो ऐसे में छोटे आकार के कैथेटर का उपयोग किया जा सकता है।
  • ल्यूमेन ब्लॉक हो जाना : यह ज्यादातर उन मरीजों में होता है जिन्हें खुलकर पेशाब नहीं होती है और मूत्राशय खाली नहीं हो पाता है। ल्यूमेन का मतलब ट्यूब के अंदर की जगह से है। ​यदि यह ब्लॉक है तो ऐसे में कम ल्यूमेन वाले कैथेटर को आसानी से मूत्राशय में डाला जा सकता है।

(और पढ़ें - पेशाब कम आने के घरेलू उपाय)

कैथेटर प्रबंधन के साथ कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हो सकती हैं :

  • रिसाव : रिसाव होने पर छोटे आकार के कैथेटर का उपयोग करने की कोशिश करनी चाहिए।
  • क्रस्ट बनना : यह विभिन्न खनिजों और अन्य चीजों जैसे प्रोटीन या बैक्टीरिया के इकट्ठा होने के कारण बनता है। इसकी वजह से बार-बार ब्लॉक होने की समस्या होती है। ऐसे में तरल पदार्थ का सेवन बढ़ाने और विटामिन सी व क्रैनबेरी का जूस जैसे अम्लीय पदार्थों का सेवन करने की सलाह दी जाती है।
  • सूजन और जलन : किस पदार्थ से बने कैथेटर का इस्तेमाल किया गया है, इस पर सूजन और जलन निर्भर करती है। ऐसे मामले में, दूसरे मै​टेरियल से बने कैथेटर प्रकार का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • यूरीनरी कैथेटर का ब्लॉक होना : इस स्थिति में कैथेटर बदलने की जरूरत होती है। कैथेटर को नियमित रूप से बदलने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि कैथेटर की एक्सपाइरी के बाद इनमें ब्लॉकेज की समस्या होना आम है।

(और पढ़ें - पेनिस में सूजन क्या है)

कैथेटर निकालने की विधि में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए :

  • पहले, कैथेटर को सुबह के समय जल्दी हटा दिया जाता था, ताकि यदि मरीज बाद में पेशाब करने में असमर्थ महसूस करे, तो इस प्वॉइंट को आसानी से नोट किया जा सके और दोबारा से कैथेटेराइजेशन किया जा सके। कुछ डॉक्टर रात को सोने से पहले इसे हटाने की सलाह देते हैं, क्योंकि आमतौर पर लोग लेटने से पहले पेशाब करते हैं, इसलिए कैथेटर निकालने के लिए उचित समय का चयन करना चाहिए।
  • जब यूरीनरी कैथेटर को हटाने का समय होता है, तो सबसे पहले 50 एमएल सैलाइनयुक्त सिरिंज को उस नली (बैलून पोर्ट) में लगाएं, जहां से कैथेटेराइजेशन के दौरान सैलाइन डाला गया था। अब वापस से इंजेक्शन की मदद से गुब्बारे के अंदर भरे लिक्विड को बाहर खींच लें, इससे सारा लिक्विड बाहर आ जाएगा। अब कैथेटर को धीरे-धीरे करके बाहर निकाला जा सकता है।
  • यदि गुब्बारे में भरा लिक्विड नहीं निकल पाता है, तो डॉक्टर इस प्रक्रिया को दोबारा से कर सकते हैं। इस दौरान बहुत धीरे से सिरिंज के प्लग को पीछे खींचने की जरूरत होती है या आप चाहें तो इंजेक्शन के प्लग को खींचते समय कैथेटर की ट्यूब को घुमा सकते हैं। 
  • इसके अलावा आप कैथेटर को मूत्रमार्ग के ठीक बाहर से काट भी सकते हैं। सुनिश्चित करें कि यह मूत्राशय के अंदर वापस नहीं जाने पाए। आप इसे रोकने के लिए एक पिन लगा सकते हैं - एक या दो घंटे के लिए कैथेटर छोड़ दें और गुब्बारे को पूरी तरह से खाली होने दें।
  • यदि गुब्बारा अब भी सख्त या उसके अंदर का लिक्विड नहीं निकल रहा है, तो ऐसे में एक डिजिटल टेस्ट की मदद से छोटी सुई का उपयोग करके इसमें छेद किया जा सकता है। यह आमतौर पर पुरुषों में मलाशय और महिलाओं में योनि के माध्यम से किया जाता है।
  • यदि कोई डॉक्टर गुब्बारे को सामान्य से अधिक भर देता है और यह अंदर ही फूट जाता है, तो सिस्टोस्कोपी (कैमरे की मदद से मूत्राशय की जांच करना) करने और अवशेषों को बाहर निकालने की जरूरत होती है।

(और पढ़ें - पेनिस में इन्फेक्शन का इलाज)

कैथेटेराइजेशन की जटिलताएं दर्द व संक्रमण से जुड़ी हो सकती हैं :

  • ब्लीडिंग (और पढ़ें - खून बहना ऐसे रोकें)
  • मूत्रमार्ग को नुकसान पहुंचना
  • यूरेथ्रल स्ट्रिंक्चर (मूत्रनली में स्कार हो जाना, जिसकी वजह से नली पतली हो जाती है और पेशाब सही से नहीं हो पाती)
  • जो लोग लंबे समय से खुद से कैथेटेराइजेशन कर रहे हैं, उनमें चोट लगने का जोखिम

संक्रामक जटिलताओं में निम्नलिखित शामिल हैं :

(और पढ़ें - सेप्सिस की होम्योपैथिक दवा)

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