फेफड़ों में पानी भरना (प्लूरल इफ्यूजन) क्या है? 

फेफड़ों में पानी भरने की स्थिति में फेफड़ों के चारों ओर असामान्य मात्रा में द्रव इकट्ठा हो जाता है। इस समस्या में तरल को बाहर निकलना संभव है, लेकिन इलाज में इसके कारणों को दूर किया जाता है।

प्लूरा (Pleura), आपके सीने के अंदर और फेफड़ों की सतह पर मौजूद एक पतली श्लेषमा झिल्ली होती है। प्ल्यूरल इफ्यूजन में प्ल्यूरा के बीच की जगह पर तरल बनने लगता है। सामान्यतः प्ल्यूरा के अंदर एक चम्मच जितना तरल मौजूद होता है जो फेफड़ों को हिलने में मदद करता है।

फेफड़ों में पानी भरने के लक्षण क्या हैं?

प्ल्यूरल इफ्यूजन के लक्षणों में निम्न को शामिल किया जाता है। 

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फेफड़ों में पानी क्यों भरता होता है? 

प्ल्यूरा में जलन, सूजन या इंफेक्शन होने से इसमें अधिक तरल बनने लगता है। यह तरल फेफड़ों के बाहर सीने की गुहा (cavity) में जमा होने लगता है, इस स्थिति को ही प्ल्यूरल इफ्यूजन कहा जाता है। 

पुरुषों मेें फेफड़ों का कैंसर और महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के साथ ही कुछ अन्य प्रकार के कैंसर भी फुफ्फुस बहाव की समस्या के कारण बन सकते हैं।

प्ल्यूरल इफ्यूजन के अन्य कारण निम्न प्रकार से बताए गए हैं -

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फेफड़ों में पानी भरने का इलाज कैसे होता है?

प्ल्यूरल इफ्यूजन के कारण के आधार पर इलाज निर्धारित किया जाता है। इसके इलाज में सामान्यतः सीने की गुहा से तरल को बाहर निकाला जाता है, जिसके लिए सुई या सीने में छोटी ट्यूब डाली जाती है। 

एक अन्य उपचार में, तरल को निकालने के लिए फेफड़ों और सीने की गुहा में हल्की सूजन की जाती है और उसमें से फिर तरल निकाल लिया जाता है। इस प्रक्रिया को प्ल्यूरोडीसिस (pleurodesis) कहते हैं। तरल निकालने के बाद डॉक्टर इस जगह में एक दवा डालते हैं, जिससे फेफड़े और सीने की गुहा फिर से साथ चिपक जाते हैं और भविष्य में तरल पदार्थ बनने की संभावना कम हो जाती है। प्ल्यूरल इफ्यूजन के कुछ गंभीर मामलों का इलाज ऑपरेशन के द्वारा भी किया जाता है।

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  1. फेफड़ों में पानी भरना क्या है - What is Pleural Effusion in Hindi
  2. फेफड़ों में पानी के लक्षण - Pleural Effusion Symptoms in Hindi
  3. फेफड़ों में पानी भरने के कारण व जोखिम कारक - Pleural Effusion Causes & Risk Factors in Hindi
  4. प्ल्यूरल इफ्यूजन से बचाव - Prevention of Pleural Effusion in Hindi
  5. फेफड़ों में पानी भरने का परीक्षण - Diagnosis of Pleural Effusion in Hindi
  6. फेफड़ों में पानी भरने का इलाज - Pleural Effusion Treatment in Hindi
  7. फेफड़ों में पानी की जटिलताएं - Pleural Effusion Complications in Hindi
  8. फेफड़ों में पानी के डॉक्टर

फेफड़ों में पानी कैसे बनता है?

फेफड़ों में पानी भरने की स्थिति को “प्लूरल इफ्यूजन” (Pleural effusion) भी कहा जाता है। इस स्थिति में छाती और फेफड़ों के बीच की जगह में अत्यधिक द्रव जमा हो जाता है। 

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फेफड़ों में पानी भरने के लक्षण के लक्षण क्या हैं?

फेफड़ों में पानी भरने पर शुरूआत में किसी प्रकार के लक्षण पैदा नहीं होते या फिर शुरूआत में काफी हल्के लक्षण होते हैं।

फेफड़ों में पानी चाहे किसी भी कारण से जमा हो या फिर फेफड़े के किसी भी हिस्से में पानी भरा हो, इससे आमतौर पर होने वाले लक्षणों में सांस फूलना या सांस लेने में दिक्कत होना आदि जैसे लक्षण होने लग जाते हैं। इस स्थिति को डिस्पनिया और छाती में दर्द कहा जाता है। 

छाती का दर्द आमतौर पर फेफड़ों की झिल्ली से संबंधित दर्द (Pleuritic pain) होता है। यह तब महसूस होता है जब व्यक्ति गहरी सांस लेता है या खांसी करता है। लेकिन कुछ मामलों में छाती का दर्द लगातार महसूस होता रहता है और गहरी सांस लेने या खांसी करने से और बदतर हो जाता है। 

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फेफड़ों में पानी भरने पर होने वाले लक्षण पानी की मात्रा और पानी कितनी तीव्रता से फेफड़ों में भरा है आदि पर निर्भर करते हैं। इसके लक्षणों में निम्न शामिल है:

डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए?

यदि आपको सांस लेने में दिक्कत या छाती में दर्द हो रहा हो तो आपको डॉक्टर को दिखा लेना चाहिए। यदि छाती किसी प्रकार की चोट लगने या फिर किसी प्रकार के ऑपरेशन (सर्जरी) के बाद ये लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो जल्द से जल्द डॉक्टर के पास चले जाना चाहिए। 

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फेफड़ों में पानी का क्या कारण है?

फेफड़ों में पानी जमा होना कोई आम स्थिति नहीं है। यह कोई रोग नहीं भी नहीं होता लेकिन यह किसी अंदरुनी बीमारी से होने वाली जटिलता के रूप में विकसित हो सकती है। 

ज्यादातर मामलों में फेफड़ों में पानी का कारण कॉग्निटिव हार्ट फेलियर, निमोनिया, प्लमोनरी एंबोलिस्म (फेफड़ों में खून का थक्का बनना) और मालिगैंसी (malignancy) होता है। 

  • कैंसर:
    यदि कैंसर की कोशिका प्लूरा तक फैल जाएं तो ऐसी स्थिति में भी फेफड़ों में पानी भर सकता है। इस स्थिति में फेफड़ों में जलन व अन्य तकलीफ होने लग जाती हैं और द्रव बनने लग जाता है। (और पढ़ें - कैंसर के लिए आहार)
     
  • पल्मोनरी एंबोलिस्म:
    इसमें आपके फेफड़ों में मौजूद किसी की भी धमनी में किसी प्रकार के रुकावट आ जाती है जिससे भी  फेफड़ों में पानी जमा होने लगता है।
     
  • शरीर किसी अन्य से द्रव रिसना:
    यह आमतौर पर कंजेस्टिव हार्ट फेलियर या जब आपका हृदय ठीक तरीके से खून को शरीर में पंप ना करने वाली स्थितियों में होता है। लेकिन यह लीवर व किडनी के रोगों के कारण भी हो सकता है, क्यों की इस स्थिति में इनके अंदर जमा द्रव रिसने लगता है और वह फेफड़ों मे जाने लगता है।
     
  • संक्रमण:
    टीबी या निमोनिया ऐसी स्थितियों में भी फेफड़ों में पानी जमा होने जैसी समस्याएं होने लग जाती हैं।

कुछ अन्य स्थितियां भी हैं, जिनके कारण फेफड़ों में पानी भर जाता है:

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फेफड़ों में पानी भरने का खतरा कब बढ़ता है?

कुछ स्थितियों में फेफड़ों में पानी भरने के जोखिम बढ़ जाते हैं:

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फेफड़ों में पानी भरने के उपाय क्या हैं?

फेफड़ों में पानी भरने से पहले ही उसकी रोकथाम करने के लिए कोई स्थापित उपाय नहीं है। हालांकि इसके जोखिम कारकों से बचाव करने से काफी मदद मिल सकती है, जिनमें निम्न शामिल हैं:

  • धूम्रपान छोड़ना
  • शराब छोड़ना (और पढ़ें - शराब छोड़ने के उपाय)
  • निमोनिया का जितना जल्दी हो सके इलाज करवा लेना
  • हार्ट फेलियर की समस्या को नियंत्रित रखना

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यदि फेफड़ों में पानी की समस्या बार-बार हो रही है, तो उसके कारण का उचित रूप से इलाज करके इसे बार-बार होने से रोका जा सकता है। इसके मुख्य कारणों में हार्ट फेलियर, मलिग्नन्सी और सिरोसिस आदि शामिल है।

(और पढ़ें - धूम्रपान छोड़ने के घरेलू उपाय)

फेफड़ों में पानी भरने की जांच कैसे की जाती है?

इस दौरान आपके डॉक्टर आपका शारीरिक परीक्षण करेंगे और एक स्टीथोस्कोप (एक प्रकार का यंत्र) की मदद से फेफड़ों से आने वाली आवाज को सुनने की कोशिश करेंगे। इसके अलावा डॉक्टर अपनी उंगलियों से आपकी छाती को छू कर भी छाती में पानी का पता लगा सकते हैं। 

इस स्थिति का परीक्षण करने के लिए कुछ अन्य टेस्ट भी किए जा सकते हैं:

  • एक्स रे:
    फेफड़ों में पानी का पता लगाने के लिए आमतौर पर सबसे पहले छाती का एक्स रे किया जाता है। हालांकि यदि फेफड़ों में थोड़ा बहुत ही पानी है, तो हो सकता है एक्स रे में वह दिखाई भी ना दे। (और पढ़ें - लिवर फंक्शन टेस्ट क्या है)
     
  • अल्ट्रासोनोग्राफी:
    यदि चेस्ट में थोड़ी सी मात्रा में पानी भरा है, तो अल्ट्रासोनोग्राफी टेस्ट की मदद से उसका पता लगया जा सकता है। इस प्रक्रिया में अल्ट्रासाउंड मशीन की मदद से फेफड़ों में मौजूद द्रव पानी की जगह का पता लगाया जाता है, ताकि वहां से द्रव का सेंपल लेकर उसकी जांच की जा सके। (और पढ़ें - यूरिक एसिड टेस्ट क्या है)
     
  • द्रव का सेंपल लेना:
    डॉक्टर थोरासेंटेसिस (Thoracentesis) प्रक्रिया का उपयोग कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में सुई की मदद से सेंपल के रूप में फेफड़ों में जमा पानी थोड़ा सा निकाल लिया जाता है। द्रव कैसा दिखता है व कितना गाढ़ा है आदि इन सभी चीजों के आधार पर भी डॉक्टर छाती में पानी भरने के कारण का पता लगा सकते हैं। सेंपल पर कई प्रकार के लेबोरेटरी टेस्ट किए जाते हैं। लेबोरेटरी में किए गए टेस्ट की मदद से द्रव में मौजूद केमिकल और बैक्टीरिया आदि का पता लगाया जाता है, इनमें टीबी का कारण बनने वाले बैक्टीरिया भी शामिल हैं। कैंसर कोशिकाओं का पता लगाने के लिए भी इस द्रव की जांच की जाती है, जिस दौरान कोशिकाओं के प्रकार व संख्या की जांच की जाती है। (और पढ़ें - एचएसजी टेस्ट क्या है)

यदि ऊपर बताए गए टेस्ट की मदद से फेफड़ों में पानी भरने के कारण का पता ना लग पाए, तो ऐसी स्थिति में कुछ अन्य टेस्ट भी किए जा सकते हैं, जैसे:

  • सीटी एंजियोग्राफी:
    यह टेस्ट फेफड़ों और उनमें जमा द्रव को और स्पष्ट रूप से दिखा देता है। इसके अलावा यह निमोनिया, फेफड़ों में फोड़ा या ट्यूमर आदि के संकेत भी दे सकता है, जिनके कारण फेफड़ों में द्रव जमा जाता है। सीटी एंजियोग्राफी करवाने के लिए लोगों को स्कैनिंग के दौरान अपनी सांस रोकनी पड़ती है। (और पढ़ें - कोरोनरी एंजियोग्राफी क्या है)
     
  • बायोप्सी टेस्ट:
    यदि डॉक्टर को किसी गंभीर स्थिति पर संदेह हो रहा है, तो ऐसी स्थिति में डॉक्टर एक ट्यूब जैसे उपकरण को मुंह के अंदर से छाती में डालते हैं। इस उपकरण को थोरास्कोप कहा जाता है, इसकी मदद से फेफड़ों और/या प्लूरा से सेंपल ले लिया जाता है। (और पढ़ें - बायोप्सी क्या है​)
  • किडनी फंक्शन टेस्ट:
    यदि किडनी संबंधी कोई समस्या लग रही है, तो किडनी फंक्शन टेस्ट भी किया जा सकता है। (और पढ़ें - स्टूल टेस्ट क्या है)
     
  • लीवर फंक्शन टेस्ट:
    लीवर सिरोसिस या लीवर खराब होना आदि जैसी समस्याओं का पता लगाने के लिए लीवर फंक्शन टेस्ट किया जाता है। (और पढ़ें - एसजीपीटी टेस्ट क्या है)
     
  • ब्रोंकोस्कोपी:
    सांस लेने में होने वाली समस्याओं व ट्यूमर आदि का पता लगाने के लिए ब्रोंकोस्कोपी टेस्ट किया जाता है। (और पढ़ें - प्रोलैक्टिन परीक्षण क्या है)
     
  • हृदय अल्ट्रासाउंड:
    हार्ट अल्ट्रासाउंड टेस्ट की मदद से हार्ट फेलियर के संकेत आदि का पता लगाया जाता है।

(और पढ़ें - एंडोस्कोपी क्या है)

फेफड़ों में पानी भरने का इलाज कैसे करें?

  • फेफड़ों में पानी का इलाज उसका कारण बनने वाली स्थिति पर या उससे होने वाले लक्षणों की गंभीरता पर निर्भर करता है, जैसे सांस फूलना या सांस लेने में दिक्कत होना। 
  • यदि फेफड़ों में पानी के कारण श्वसन तंत्र से जुड़े लक्षण विकसित होने लगे हैं, तो फेफड़ों में जमा द्रव को थेराप्युटिक थोरासेंटेसिस (Thoracentesis) या चेस्ट ट्यूब (जिसे थाराकोस्टोमी कहा जाता है) की मदद से निकाल देते हैं।
  • यदि फेफड़ों में पानी का कारण कंजेस्टिव हार्ट फेलियर या कोई अन्य मेडिकल समस्या है, तो उसका इलाज करने के लिए डाइयुरेटिक्स व अन्य हार्ट फेलियर की दवाओं का उपयोग करते हैं। 
  • यदि फेफड़ों में पानी का कारण मलिग्नन्सी है, तो उसका इलाज करने के लिए कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा इस दौरान कुछ दवाएं सुई की मदद से सीधे छाती या फेफड़ों तक पहुंचाई जा सकती है। 

(और पढ़ें - दवा की जानकारी)

ऑपरेशन: 

यदि फेफड़ों से पानी निकाल देने के बाद या प्लूरल स्क्लेरोसिस के बाद भी स्थिति ठीक ना हो पाए, तो ऐसी स्थिति में ऑपरेशन भी करना पड़ सकता है। 

  • प्लूरोडेसिस:
    यह इलाज का एक प्रकार होता है, जिसकी मदद से छाती व फेफड़ों के बीच की जगह में हल्की सी सूजन, लालिमा व जलन पैदा कर दी जाती है। जमा हुऐ सारे द्रव को बाहर निकालने के बाद डॉक्टर इंजेक्शन की मदद से एक दवाई डाल देते हैं। इस दवा में अक्सर एक टैल्क (एक तरह की मिट्टी) मिक्सचर होता है। इस दवा के कारण प्लूरा की दो झिल्लियां आपस में चिपक जाती हैं, जिसके बाद उनके बीच में द्रव जमा होने की जगह नहीं रहती।
     
  • थोराकोटोमी:
    इस प्रक्रिया में छाती में 6 से 8 इंच लंबा चीरा दिया जाता है। थोराकोटोमी प्रक्रिया का उपयोग खासतौर तब किया जाता है, यह स्थिति इन्फेक्शन से जुड़ी हो। थोराकोटोमी सभी फाइबरयुक्त ऊतकों को हटा देती है और प्लूरा की जगह से इन्फेक्शन को साफ करने में भी मदद करती है। मरीजों को ऑपरेशन के बाद भी 2 दिन से 2 हफ्तों तक चेस्ट ट्यूब की आवश्यकता पड़ सकती है, ताकी फेफड़ों से निकलने वाले द्रव को जारी रखा जा सके।

डॉक्टर आपके लिए सबसे अच्छा व सुरक्षित उपचार विकल्प का पता लगाने के लिए आपकी अच्छे से जांच करेंगे और इलाज को शुरु करने से पहले उसके फायदे व संभावित जोखिमों के बारे में बताएंगे।

(और पढ़ें - बैक्टीरियल संक्रमण का इलाज)

फेफड़ों में पानी की जटिलताएं क्या हैं?

फेफड़ों में पानी भरने का कारण बनने वाली स्थिति के अनुसार इससे होने वाली जटिलताएं भी अलग-अलग हो सकती हैं। हालांकि जो लोग अपनी बीमारी के दौरान बिना देरी किए जांच व उचित इलाज करवा लेते हैं, उनमें इससे होनी वाली जटिलताएं का खतरा अन्य मरीजों (जो समय पर जांच व इलाज नहीं करवाते) के मुकाबले काफी हद तक कम हो जाता है।

फेफड़ों में पानी जमा होने की गंभीरता उसके मुख्य कारण पर निर्भर करती है। इसमें ठीक से सांस लेने की क्षमता प्रभावित हो जाती है या इलाज करने पर यह स्थिति ठीक भी हो सकती है। फेफड़ों में पानी जमा होने के कारण का सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है, जिसमें​ वायरस के कारण होने वाला इन्फेक्शन, निमोनिया या हार्ट फेलियर आदि शामिल है। 

फेफड़ों में पानी जमा होने से कुछ अन्य जटिलताएं भी विकसित हो सकती हैं, जैसे:

  • ओर्थोपोनिया:
    यदि आपको सांस फूलने की समस्या है और लेटने पर यह स्थिति और बदतर हो जाती है, तो आपको ओर्थोपोनिया की समस्या है। इसमें बैठने या खड़े होने पर थोड़ा आराम महसूस होता है।
     
  • थकान:
    सांस फूलने की समस्या से आपको सामान्य से ज्यादा थकान महसूस होने लगती है और रात के समय आपकी नींद खुलने लग जाती है। (और पढ़ें - थकान दूर करने के उपाय)
     
  • न्यूमोथोरॉक्स (फेफड़े सिकुड़ जाना):
    थोरासेंटेसिस की जटिलता के रूप में आपको न्यूमोथोरॉक्स की समस्या भी हो सकती है।
     
  • वातस्फीति:
    इस स्थिति में फेफड़ों के प्लूरल की खाली जगह में पस बनने लग जाती है। (और पढ़ें - वातस्फीति के कारण)
     
  • सेप्सिस (ब्लड इन्फेक्शन):
    इस स्थिति में कई बार मरीज की मृत्यु भी हो जाती है। (और पढ़ें - ब्लड इन्फेक्शन का इलाज)
     
  • लंग स्कारिंग:
    इस स्थिति में फेफड़ों में स्कार ऊतक (ऊतकों में खरोंच जैसे निशान) बनने लग जाते हैं। 

(और पढ़ें - फेफड़ों में इन्फेक्शन के लक्षण)

Dr. Kiran M

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श्वास रोग विज्ञान

Dr. Pratik Kumar

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श्वास रोग विज्ञान

Dr. Mukesh Tiwari

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