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भूमिका

राइनेक्टोमी नाक को आंशिक या पूर्ण रूप से हटाने से जुड़ी सर्जरी है। इस कारण राइनेक्टोमी को 2 प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है- पार्शियल यानी आंशिक राइनेक्टोमी और टोटल यानी संपूर्ण राइनेक्टोमी। हमारी नाक की त्वचा सूरज की बदलती रोशनी के प्रति काफी संवेदनशील होती है, जो कैंसर का कारण बनती है। इसके अतिरिक्त नाक की परत काफी नाजुक होती है और आक्रामक (मेटास्टेसिस या परिवर्तित) कैंसरों को नहीं रोक पाती। नाक का कैंसर तेजी से आंखों, होंठ और आसपास के अन्य ऊतकों तक फैल जाते हैं। एक सर्जरी के रूप में राइनेक्टोमी संवेदनशील कॉस्मेटिक नेचर की होती है और इसलिए यह सर्जरी बहुत कम ही मामलों में की जाती है। नाक के हिस्सों में तेजी से फैलने वाले आक्रामक और गंभीर कैंसर के मामले में यह सर्जरी विशेष रूप से की जाती है। राइनेक्टोमी करवाने के बाद अक्सर नाक की रीकंस्ट्रक्टिव यानी पुनर्निर्माण सर्जरी की भी जरूरत पड़ती है। 

  1. राइनेक्टोमी क्या है - What is Rhinectomy in Hindi?
  2. राइनेक्टोमी क्यों की जाती है - Why Rhinectomy is done in Hindi?
  3. राइनेक्टोमी से पहले की तैयारी - Preparations before Rhinectomy in Hindi
  4. राइनेक्टोमी कैसे की जाती है - How Rhinectomy is done in Hindi?
  5. राइनेक्टोमी के बाद देखभाल - Rhinectomy after care in Hindi
  6. राइनेक्टोमी की जटिलताएं - Rhinectomy complications in Hindi

राइनेक्टोमी एक सर्जिकल प्रक्रिया है, जिसमें नाक के कुछ हिस्से या पूरी नाक को हटाने का काम किया जाता है। इस प्रोसीजर में नाक के नाजुक या कोमल ऊतकों को अधिकतर नेजल फ्रेमवर्क के साथ हटा दिया जाता है।

किसी व्यक्ति के आकर्षक दिखने के पीछे नाक की भूमिका अहम मानी जाती है। लेकिन इसका सही से काम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। बताया जाता है कि सूरज की रोशनी में अधिक रहने से नाक को नुकसान हो सकता है और व्यक्ति नेजल स्किन कैंसर (नाक में त्वचा का कैंसर) से ग्रस्त हो सकता है।

नाक का बाहरी हिस्सा हड्डी और कार्टिलेज (एक लचीला और नाजुक ऊतक) से बना होता है। यह नाक के दोनों छेदों के बीच स्थित एंटिरियर नेजल सेप्टम द्वारा विभाजित होता है। नाक के पिछले हिस्से में नेजल कैविटी होती है, जहां नासिका छिद्र खुलते हैं। यह मुंह के ऊपरी हिस्से में होती है और गले के पीछे से होते हुए मुंह से कनेक्ट होती है। नाक के छेदों के जरिये अंदर आने वाली हवा नेजल कैविटी में गर्म और नम हो जाती है। हवा के जरिये नाक में घुसने वाले बैक्टीरिया इसी जगह छान लिए जाते हैं और शरीर में नहीं घुस पाते।

नाक के कैंसर अक्सर नेजल कैविटी में शुरू होते हैं या इससे सटी हड्डियों में मौजूद उन छोटी-छोटी जगहों में बनते हैं, जिनमें वायु भरी होती है। इन जगहों को पैरानेजल साइनसेस कहते हैं। नेजल सेप्टम के सबसे नीचे स्थित ऊतकों और नाक के प्रवेश की तरफ की नेजल कैविटी में बनने वाले कैंसर गंभीर और आक्रामक होते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि कैविटी की पतली और नाजुक ऊतक परत (टिशू लाइनिंग) किसी भी प्रकार से ट्यूमर को फैलने से नहीं रोक पाती।

चूंकि नेजल कैविटी कान, मुंह और आंखों के नजदीक होती है, इसलिए इसमें बनने वाला कैंसर आसानी से आसपास की हड्डियों, कार्टिलेज, गाल और होंठों तक पहुंच जाता है। इस फैलाव के लिए पेरियोस्टियम की भूमिका अहम बताई जाती है, जो हड्डियों को कवर करने वाली एक पतली झिल्ली है। ज्यादातर नेजल कैविटी कैंसर स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा (स्किन कैंसर का एक प्रकार) और एडिनोकार्सिनोमा (कैंसर जिसमें बलगम बनाने वाले ग्लैंड विकसित हो जाते हैं) होते हैं।

राइनेक्टोमी में ट्यूमर में जरूरी मार्जिन रखते हुए कैंसर ग्रोथ को हटाया जाता है। इसके बाद नाक की बनावट और संचालन की बहाली के लिए प्रभावित हिस्से का पुनर्निर्माण किया जाता है। इस सर्जरी के दो प्रकार हैं:

  • आंशिक (पार्शियल) राइनेक्टोमी: इसमें नासिका ढांचे को सीमित रूप से हटा दिया जाता है।
  • संपूर्ण (टोटल) राइनेक्टोमी: इसमें नाक की त्वचा, आंतरिक नासिका के ढांचे और नाजुक टिशू को हटा दिया जाता है।

तेजी से फैलने वाले, व्यापक और बार-बार होने वाले कैंसर के इलाज के लिए राइनेक्टोमी आधारित सर्जिकल प्रोसीजर अपनाया जाता है। हालांकि सर्जरी किसी व्यक्ति के चेहरे के लिए सौन्दर्य के लिहाज से नुकसानदेह हो सकती है। यही कारण है कि इसे नाक के कैंसर का प्राथमिक उपचार नहीं माना जाता। इसे तभी किया जाता है, जब रेडिएशन थेरेपी या कोई अन्य सर्जरी कैंसर का ट्रीटमेंट करने में विफल हो जाए।

निम्नलिखित परिस्थितियों में राइनेक्टोमी करने की नौबत आ सकती है:

  • यदि किसी व्यक्ति का स्किन कैंसर काफी ज्यादा फैलकर नाक और नेजल कैविटी के अलावा शरीर के दूसरे हिस्सों में पहुंच जाए।
  • बेसल सेल कार्सिनोमा (स्किन कैंसर का एक अन्य प्रकार) और स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा जैसे आम कैंसर होने पर।
  • दुर्लभ मेलानोमा (एक ऐसा कैंसर जो मेलानोसाइट नामक कोशिकाओं में बनता है) होने पर।
  • एडनेक्सल ट्यूमर (स्किन में मौजूद हेयर फॉलिकल और पसीना और तेल उत्पादन करने वाली ग्रंथि से जुड़ा कैंसर) की स्थिति में।
  • मर्केल सेल कार्सिनोमा (स्किन की मर्केल नामक कोशिकाओं से जुड़ा कैंसर) होने पर।
  • नेजल कैविटी से जुड़े स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा और एडिनोकार्सिनोमा की श्रेणी के कई अन्य घातक कैंसर होने पर राइनेक्टोमी करानी पड़ी सकती है। इनमें कोल्यूमेला (सेप्टम से अलग नाक का एक भाग, जो दो नासिका द्वारों को अलग करता है), वेस्टिब्यूल (नाक का एक बड़ा हिस्सा, जिसे एंटिरियर नेजल सेप्टम, कोल्यूमेला और लोअर लेटरल कार्टिलेज मिलकर बनाते हैं), सेप्टम और नेजल कैविटी में होने वाले कैंसर शामिल हैं।
  • रेडिएशन थेरेपी या सर्जरी के बाद भी एक ही लोकेशन पर बने रहने और वापस होने वाले कैंसरों के उपचार के लिए राइनेक्टोमी की मदद ली जाती है।
  • इसके अलावा, कैंसर मरीजों की परेशानी को कुछ कम कर उनकी जीवन गुणवत्ता को थोड़ा बेहतर करने के लिए भी राइनेक्टोमी की जा सकती है, भले ही कैंसर मरीज के अन्य अंगों में फैल रहा हो।

बात करते हैं नेजल या पैरानेजल कैंसर से पीड़ित लोगों में अक्सर दिखने वाले लक्षणों की। ये लक्षण निम्नलिखित हैं:

  • नाक से जुड़ी समस्याएं, जो लगातार बनी रहती हैं
    • नाक से बलगम का निकलना
    • बलगम का नाक और गले के पीछे पहुंचकर बहना
    • नाक का एक तरफ से बंद रहना और दम घुटने जैसा महसूस करना
    • नाक से खून आना
    • सूंघने की क्षमता प्रभावित होना
  • आंख से जुड़ी समस्याएं
    • दोहरी दृष्टि दोष
    • एक आंख में उभार नजर आना
    • देखने की क्षमता आंशिक या पूर्ण रूप से खो देना
    • आंख के आसपास दर्द
    • आंख से लगातार पानी या आंसू बहना
  • अन्य लक्षण
    • चेहरे के अलग-अलग हिस्सों में सुन्नता या दर्द महसूस करना, खासकर गाल पर
    • मुंह खोलने में मुश्किल
    • गर्दन के लिम्फ नोड्स (छोटे आकार की गांठें) में सूजन होना
    • किसी भी कान में दर्द या दबाव महसूस होना
    • चेहरे, नाक और मुंह में तालु का आकार बड़ा हो जाना और ऐसा बने रहना
    • दांत हिलना

राइनेक्टोमी कब नहीं की जाती?

निम्नलिखित परिस्थितियों में यह सर्जरी नहीं करने की सलाह दी जाती है:

  • कैंसर के बहुत अधिक मेटास्टेटिक स्टेज पर पहुंचने पर राइनेक्टोमी बतौर इलाज नहीं अपनाई जाती। हालांकि इस स्टेज में आकर मरीज को केवल कुछ राहत देने के लिए यह सर्जिकल प्रक्रिया की जा सकती है।
  • अगर पीड़ित पहले से ऐसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित हो, जिनके चलते उसे एनेस्थीसिया दिए जाने का खतरा नहीं लिया जा सकता।
  • अगर मरीज ही सर्जरी कराने से इनकार कर दे।

(और पढ़ें : लिम्फ नोड्स में सूजन का कारण)

राइनेक्टोमी से पहले निम्नलिखित तैयारियां करनी होती हैं:

  • सर्जरी से पहले मरीज के प्रभावित हिस्सों के परीक्षण किए जाएंगे, जिनमें बायोप्सी, कंप्यूटेड टोमोग्राफी (सीटी स्कैन) और मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेंजिंग (एमआरआई) जैसे टेस्ट शामिल होंगे। इन टेस्ट को करने का मकसद ऑपरेशन से पहले बीमारी की पुष्टि करना होता है।
  • मरीज की सेहत की स्थिति का पता करने के लिए उसके ब्लड टेस्ट किए जाएंगे। ट्रांसफ्यूजन की संभावना को देखते हुए मरीज के ब्लड ग्रुप की पहचान की जाएगी।
  • फेफड़ों के संचालन का आंकलन करने के लिए ब्रीथिंग टेस्ट और चेस्ट एक्स-रे किया जाएगा।
  • हृदय के संचालन का पता करने के लिए ईसीजी किया जाएगा और मरीज को कुछ एक्सरसाइज करने को भी कहा जाएगा।
  • मरीज का रक्तचाप, नाड़ी, तापमान, सामान्य स्वास्थ्य और वजन चेक किए जाएंगे।
  • सर्जरी से पहले डॉक्टर को पुरानी और मौजूदा बीमारियों (अगर हों) के बारे में बताया जाना चाहिए।
  • किसी भी प्रकार की एलर्जी (एनेस्थीसिया से भी) के बारे में डॉक्टर को जानकारी देनी चाहिए।
  • सर्जरी की योजना बनाने के लिए मरीज के चेहरे, नाक, मुंह और गले के हिस्सों की जांच की जाएगी।
  • सर्जरी के लिए मरीज को सहमति देनी होगी। उसके बाद ही आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।
  • जिन मरीजों की नाक फिर से बनाने की जरूरत होती है, उनके शरीर के दूसरे हिस्सों से टिशू लिए जाते हैं। ऐसे में इन टिशूज का स्वास्थ्य पता करने के लिए भी कुछ टेस्ट किए जाते हैं। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि ऊतकों में ब्लड सप्लाई अच्छी है।
  • सर्जरी से जुड़े कॉस्मेटिक परिणामों के मद्देनजर मरीज की उचित काउंसलिंग होगी। इसमें मरीज सभी सवाल कर अपने संदेह दूर कर सकता है।
  • जिन लोगों की गर्दन के लिम्फ नोड में मेटास्टेटिक कैंसर की समस्या होती है, उनकी भी विच्छेदन से पहले काउंसलिंग की जाती है।
  • एनेस्थीसिया विशेषज्ञ इस पर चर्चा करेंगे कि सर्जरी के लिए मरीज को कौन सा एनेस्थीसिया दिया जाए।
  • डायटिशियन मरीज को बताएगा कि सर्जरी से पहले उसे किस प्रकार के खाद्य पदार्थ और सप्लिमेंट लेने चाहिए।
  • सर्जरी के बाद की जाने वाली कुछ ब्रीथिंग और लेग एक्सरसाइज की जानकारी मरीज को दी जाएगी ताकि बाद में चेस्ट इन्फेक्शन और पांव में ब्लड क्लॉटिंग की समस्या न हो।
  • पांव में खून के थक्कों से बचाव के लिए मरीज को दवाएं लेनी होंगी। इसके लिए कुछ इन्जेक्शन लगाए जा सकते हैं। इसके अलावा, मरीज को कम्प्रेशन स्टॉकिंग पहनने को कहा जा सकता है।
  • सर्जरी के बाद सूजन न हो, इसलिए एक स्पीच थेरेपिस्ट मरीज को बताएगा कि उसे क्या खाना चाहिए और क्या नहीं।
  • अगर मरीज सिगरेट और तंबाकू का सेवन करता है और उसकी रीकन्स्ट्रक्टिव सर्जरी होनी है तो ऑपरेशन से कुछ हफ्ते पहले इसे छोड़ना होगा।
  • डॉक्टर से कन्सल्ट करने के बाद सभी ब्लड थिनर मेडिकेशन, सप्लिमेंट और हर्बल प्रॉडक्ट का इस्तेमाल बंद करना होगा।
  • सर्जरी से एक शाम पहले और सर्जरी की सुबह मरीज को कार्बोहाइड्रेट युक्त पेय पदार्थ पीने को कहा जाएगा ताकि मरीज के शरीर में ऊर्जा की आपूर्ति हो और उसकी रिकवरी तेजी से हो सके। अगर मरीज इस पेय पदार्थ को नहीं पी सकता तो उसे यह तरल पदार्थ नसों के जरिये बूंद-बूंद करके दिया जाएगा।

अन्य तैयारियां

  • सर्जरी से पहले मरीज को नहाना चाहिए और ढीले कपड़े पहनने चाहिए।
  • डियोड्रेंट, क्रीम, लोशन, पाउडर या पर्फ्यूम का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
  • सर्जरी के दौरान स्पेक्टिकल पहनने चाहिए, न कि कॉन्टैक्ट लेंस।
  • अगर आभूषण या कोई पैनी चीज पहनी हुई है तो सर्जरी से पहले उसे उतार देना चाहिए।
  • सर्जरी से पहले डॉक्टर मरीज को एंटीबायोटिक्स देगा ताकि संक्रमण का खतरा कम रहे।

राइनेक्टोमी को निम्नलिखित तरीके से किया जाता है:

  • मरीज को वायु नली में ट्यूब डालकर या मुंह में विंडपाइप के जरिये एनेस्थीसिया दिया जाएगा।
  • उसे पीठ के बल इस तरह सीधा लेटने को कहा जाएगा कि उसका सिर पैरों से ऊपर रहे। इस दौरान उसका शरीर फिजिशियन की तरफ थोड़ा झुका हुआ होगा।
  • ऑपरेशन के लिए मरीज की बॉडी की पॉजीशन सेट होने के बाद सर्जन उसकी नेजल कैविटी में (तरल पदार्थ को) सोखने वाला महीन कपड़ा डालता है।
  • इसके बाद नासिक छिद्रों के बाहर नेजल स्किन, डोरसम और इन्फिरियर स्किन पर कट लगाया जाएगा। इस डिस्सेक्शन से कार्टिलेज को हड्डी संबंधी स्ट्रक्चर से अलग किया जाता है।
  • फिर सर्जन मरीज की नेजल स्किन की सेप्टम तक जांच कर यह पता लगाएगा कि कैंसर किस सीमा तक फैल चुका है।
  • इसके बाद कोल्यूमेला के बेस पर कट लगेगा, जिससे सेप्टम की लचीली हड्डी तक पहुंचा जाएगा।
  • फिर बोनी सेप्टम और नाक की अन्य हड्डियों (ओस्टियोटोमी) पर चीरा लगेगा। यह काम सर्जिकल यंत्रों की मदद से किया जाएगा और ट्यूमर को ओस्टियोटोमी से अलग कर दिया जाएगा।
  • इसके बाद सर्जन एंडोस्कोप का इस्तेमाल कर नेजल कैविटी की और जांच करेगा, यह जानने के लिए वहां कोई और ट्यूमर ऐसा तो नहीं रह गया, जिसकी जानकारी न मिल पाई हो।
  • फिर फ्रोजन सेक्शन तकनीक की मदद से ट्यूमर मार्जिन का आंकलन लगाया जाएगा और अगर जरूरत पड़ी तो नए मार्जिन को हटा दिया जाता है। सफल ऑपरेशन के लिए क्लीन सर्जिकल मार्जिन महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
  • सर्जरी के लिए डॉक्टर त्वचा और म्यूकोस एजिस पर एक साथ टांका लगाएगा और दबे हुए स्पंज को वहां प्लेस करेगा। इस स्पंज पर एंटीबायोटिक लेप लगा होगा, जिसे कैविटी के आसपास लगाया जाएगा ताकि पोस्ट-सर्जिकल ब्लीडिंग को रोका जा सके। इस स्पंज को तीन दिन के बाद हटाया जाएगा।
  • चूंकि टिशूज के किनारों को एक साथ लाकर टांका नहीं लगाया जा सकता, इसलिए कैविटी को ठीक होने के लिए खुला छोड़ दिया जाता है।
  • रीकन्स्ट्रक्शन के बाद कैविटी को बंद कर रीस्टोर कर दिया जाता है।

टोटल राइनेक्टोमी में आंतरिक नासिका में नाक की त्वचा, नाजुक ऊतक और फ्रेमवर्क को पूरी तरह हटा दिया जाता है।

सर्जरी पूरे होने के बाद अस्पताल में मरीज की निम्नलिखित देखभाल की जाती है:

  • ऑपरेशन के बाद मरीज को या तो रिकवरी रूम में रखा जाता है या आईसीयू में भेज दिया जाता है।
  • उठने के बाद मरीज को सुस्ती और खोया-खोया सा महसूस हो सकता है। ऐसा एनेस्थीसिया और पेनकिलर के प्रभाव के कारण हो सकता है। जैसे-जैसे एनेस्थीसिया का असर कम होता है, वैसे-वैसे मरीज की हालत बेहतर होती जाती है।
  • सर्जरी के बाद मरीज का ऑक्सीजन लेवल, पल्स रेट, तापमान और ब्लड प्रेशर मॉनिटर किए जाएंग।
  • जब तक मरीज फिर से खाने-पीने योग्य नहीं हो जाता, तब तक उसे तरल पदार्थ और दर्दनिवारक दवाएं ड्रिप के रूप में दिए जाते रहेंगे।
  • एक बार घाव ठीक हो जाए, उसके बाद मरीज हल्का खाना शुरू कर सकता है।
  • मरीज के ब्लेडर से एक ट्यूब को अटैच कर दिया जाएगा ताकि वह उसकी मदद से यूरीन निकाल सके।
  • घाव के अंदर भी कुछ ड्रेनेज ट्यूब लगाई जाएंगी ताकि वहां इकट्ठा होने वाला फ्लूड उनके जरिये बाहर निकल सके।
  • इसके अलावा, पेट में बनने वाले तरल पदार्थ को भी निकालने के लिए एक और पतली ट्यूब का इस्तेमाल किया जाएगा।
  • रिकवरी के दौरान नेजल कैविटी को साफ करने के लिए नमक वाले पानी का इस्तेमाल किया जाएगा। इस काम में ठंडे ह्यूमिडिफिकेशन की भी मदद ली जाती है।
  • मरीज के हीमोग्लोबिन और हीमेटोक्रिट की जांच की जाएगी।
  • डॉक्टर सलाह दे सकता है कि सोते समय मरीज को अपना सिर थोड़ा ऊपर की तरफ रखना चाहिए। इस हिस्से में सूजन को कम करने के लिए बर्फ का इस्तेमाल किया जाता है।
  • नोज पैक सामान्यतः सर्जरी के 24 से 48 घंटों में निकाल लिए जाते हैं।
  • घाव पर लगे टांके दस दिन या ठीक होने के बाद हटाए जाएंगे। यहां कुछ दिन पट्टी भी की जाएगी। अगर नाक को फिर बनाने के लिए शरीर के किसी हिस्से से त्वचा ली गई है, तो वहां भी घाव होगा।
  • दर्द कम करने के लिए मरीज को पेनकिलर्स दिए जाएंगे। हालांकि शुरुआत में नॉन-स्टेरॉयडल ड्रग देने से परहेज किया जाएगा।
  • नाक की बनावट और संचालन के संबंध में मरीज की काउंसलिंग होगी और मनोवैज्ञानिक सपोर्ट भी दिया जाएगा।
  • सर्जरी के बाद मरीज सामान्य गतिविधियां करने लायक हो जाना चाहिए। एक फिजियोथेरेपिस्ट हर रोज उसे व्यायाम कराएगा ताकि रिकवरी जल्दी की जा सके।
  • हर मरीज की ठीक होने की अपनी गति होती है। डॉक्टर इस मामले में सबसे अच्छी सलाह देगा और बताएगा कि मरीज कब फिर से काम कर सकता है। अगर मरीज का काम बैठने पर ज्यादा निर्भर है तो वह हेवी लिफ्टिंग जैसा काम करने वालों की अपेक्षा ज्यादा जल्दी काम पर लौट सकता है।

घर में ऐसे करें देखभाल

  • डायटिशियन द्वारा निर्धारित डाइट ही लेनी चाहिए।
  • सर्जरी के बाद कई हफ्तों तक थका हुआ महसूस करना सामान्य है। लेकिन मरीज का एक्टिव रहना जरूरी है। उसे रोज घर में और उसके आसपास घूमना चाहिए।
  • दर्द निवारक दवाएं डॉक्टरी निर्देश के तहत ही लेनी चाहिए।
  • हर दिन कम से कम दस गिलास पानी पीना चाहिए ताकि आंतों के संचालन में मदद मिले और कब्ज न बने।
  • अस्पताल से छूटने से पहले टांके हटाए जा सकते हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ है तो घर लौटने के बाद टांके हटवाने के लिए अस्पताल जाना होगा।
  • अगर सर्जरी से पहले मरीज की गर्दन की रेडिएशन थेरेपी हुई है तो टांके हटने में दो-तीन हफ्ते लग सकते हैं।
  • सर्जरी के बाद पहले 48 घंटों में मरीज स्पंज बाथ ले सकता है। इस मामले में डॉक्टरी सलाह को भी देखा जाना चाहिए, क्योंकि ट्यूब और ड्रेन्स को सूखा रखना जरूरी है।
  • सर्जरी के बाद मरीज को अपने सूंघने और स्वाद लेने की क्षमता में बदलाव महसूस होंगे। हालांकि ये समस्याएं बाद में ठीक हो जाएंगी।

इसके अलावा, पहले छह हफ्तों में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना होता है:

  • मुंह खोल कर ही खांसना और छींकना चाहिए।
  • नाक में अपनी मर्जी से कुछ भी न डालें और सिर को कभी भी कंधों से नीचे न होने दें।
  • मुश्किल काम और खेलकूद से परहेज करना चाहिए।
  • कोई भी भारी चीज न उठाएं।
  • हवाई यात्रा से दूर रहें।

डॉक्टर से कब मिलना है?

नीचे दी गई परिस्थितियों या कारणों में से किसी के भी होने पर डॉक्टर से मिलना या संपर्क करना चाहिए:

  • घाव के दोनों तरफ लालिमा या परेशानी बढ़ना
  • घाव से रिसने वाले फ्लूड का इकट्ठा हो जाना
  • सांस फूलना
  • घाव के आसपास सूजन बढ़ना
  • सोने और भूख के पैटर्न में बदलाव आना
  • उदासी या लाचार जैसी भावनाएं लंबे समय तक महसूस होना या डिप्रेशन जैसे लक्षण दिखना

राइनेक्टोमी के संभावित जोखिम व जटिलताएं निम्नलिखित हैं:

  • फेशियल, ऑफथैल्मिक (आंख) और मैक्सलेरी (दाढ़ की हड्डी) आर्टेरी से ब्लीडिंग होना।
  • सेरिब्रोस्पाइनल फ्लूड लीक: एथमॉइड बोन के अत्यधिक संचालन के कारण यह समस्या सामने आती है। यह हड्डी नेजल कैविटी को मस्तिष्क से अलग करती है। अगर सर्जरी के दौरान इस लीकेज पर ध्यान न दिया जाए तो मरीज दिमागी बुखार, इन्सेफेलाइटिस और ब्रेन एब्सेस (सूजन के कारण मवाद बन जाना) से पीड़ित हो सकता है।
  • कैंसर का फिर से उभरना।
  • मुंह में तालु के सख्त भाग में इंजरी होना

सर्जरी के बाद डॉक्टर के पास नियमित रूप से जाना और चेकअप कराना बेहद अहम है। अगर सिर और नाक के कैंसर के खतरे को रोकना व मैनेज करना हो तो इस तरह की सावधानियां जरूरी है। राइनेक्टोमी के छह हफ्तों के बाद अस्पताल की पहली विजिट होगी। इसकी फ्रीक्वेंसी में धीरे-धीरे कमी आएगी। दो सालों के बाद मरीज को हर तीन से छह महीनों में एक बार सर्जन को दिखाना होगा। फिर तीन साल पूरे होने के बाद पांच साल पूरे होने तक छह महीनों में डॉक्टर के यहां जाना होगा। स्क्वैमस सेल कैंसर के मामले में मरीज को दस सालों तक विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाना पड़ सकता है।

डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी केवल पाठकों को शिक्षित करने के लिए है। यह किसी भी प्रकार से एक क्वालिफाइड डॉक्टर द्वारा दी जाने वाली मेडिकल एडवाइस का विकल्प नहीं है।

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संदर्भ

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