myUpchar प्लस+ सदस्य बनें और करें पूरे परिवार के स्वास्थ्य खर्च पर भारी बचत,केवल Rs 99 में -

शरीर में बिलीरुबिन (एक-भूरे पीले रंग का द्रव्‍य) का स्‍तर अत्‍यधिक बढ़ने पर पीलिया रोग हो जाता है। पीलिया एक लिवर रोग है। पीलिया का सबसे सामान्‍य लक्षण है कि इसमें त्‍वचा और श्‍लेष्‍मा झिल्‍ली का रंग पीला पड़ने लगता है। अत्‍यधिक बिलीरुबिन की समस्‍या अनुवांशिक भी हो सकती है या फिर ये शरीर में संगृहीत होने लगता है।

अनुवांशिक कारण में ग्लूकोज 6 फॉस्फेट डिहाइड्रोजनेज की कमी की वजह से पीलिया होता है जबकि इसके संगृहीत कारण में ट्रॉमा और विटामिन बी12 की कमी शामिल है। प्‍लाज्‍मा में बिलीरुबिन के स्‍तर की जांच करके पीलिया का पता लगाया जाता है। कम वसायुक्‍त आहार और पर्याप्‍त मात्रा में पानी के सेवन से पीलिया की बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है।

पीलिया को इसके कारण के आधार पर तीन भागों में वर्गीकृत किया गया है: प्री-हिपेटिक पीलिया, हिपेटिक पीलिया और पोस्ट-हिपेटिक पीलिया। आयुर्वेदिक उपचार से लिवर विकारों का सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है जिसमें पीलिया के सभी प्रकार भी शामिल हैं। वर्तमान में 50 प्रतिशत से भी ज्‍यादा भारतीय लोग लिवर रोगों के इलाज के लिए आयुर्वेद को ही प्राथमिकता देते हैं।

इसका एक कारण यह भी है कि एलोपैथी की तुलना में आयुर्वेदिक दवाओं में विषाक्तता का स्‍तर काफी कम होता है। कई पशु और चिकित्‍सकीय अध्‍ययनों में भी ये बात साबित हो चुकी है कि लिवर रोगों के इलाज में हर्बो-मिनरल और औषधीय पौधे प्रभावकारी और सुरक्षित होते हैं। लिवर रोगों में सबसे असरकारी आयुर्वेदिक दवाओं में से एक आरोग्‍यवर्धिनी वटी है जोकि कामला (पीलिया) पर भी असरकारी है। 

हरिद्रा (हल्‍दी) और आमलकी (आंवला) जैसी कुछ जड़ी-बूटियों का इस्‍तेमाल पीलिया के लक्षणों से राहत पाने के लिए किया जाता है। पीलिया के इलाज में पंचकर्म क्रिया में से एक विरेचन (शुद्धि) को भी लाभकारी पाया गया है। 

(और पढ़ें - रोज कितना पानी पीना चाहिए)

  1. आयुर्वेद के दृष्टिकोण से पीलिया - Ayurveda ke anusar Piliya
  2. पीलिया का आयुर्वेदिक इलाज या उपचार - Piliya ka ayurvedic upchar
  3. पीलिया की आयुर्वेदिक जड़ी बूटी और औषधि - Piliya ki ayurvedic dawa aur aushadhi
  4. आयुर्वेद के अनुसार पीलिया होने पर क्या करें और क्या न करें - Ayurved ke anusar Piliya me kya kare kya na kare
  5. पीलिया में आयुर्वेदिक दवा कितनी लाभदायक है - Piliya ka ayurvedic upchar kitna labhkari hai
  6. पीलिया की आयुर्वेदिक औषधि के नुकसान - Piliya ki ayurvedic dawa ke side effects
  7. पीलिया के आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट से जुड़े अन्य सुझाव - Piliya ke ayurvedic ilaj se jude anya sujhav
  8. पीलिया की आयुर्वेदिक दवा और इलाज के डॉक्टर

यकृत (लिवर) को प्रभावित करने वाले पित्त दोष के बढ़ने पर पीलिया की बीमारी घेर लेती है। इस बीमारी में त्‍वचा, पेशाब, मल, आंख की पुतली की सफेद बाहरी परत और श्‍लेष्‍मा झिल्‍ली का रंग पीला पड़ने लगता है। आयुर्वेद में कामला को अप्रत्‍यक्ष रोग के रूप में वर्गीकृत किया गया है। रक्‍त धातु में स्थित पित्त दोष बढ़ने के कारण होने वाले रोगों के समूह में पीलिया को रखा गया है।

(और पढ़ें - धातु रोग का घरेलू उपचार)

किसी अन्‍य बीमारी या अवस्‍था के कारण या शरीर में अपने आप पित्त का स्‍तर बढ़ने पर पीलिया रोग हो सकता है। खानपान और जीवनशैली पित्त के स्‍तर को बढ़ाते हैं जिससे मांसपेशियां और खून जलने लगता है। इसके परिणामस्‍वरूप व्‍यक्‍ति को पीलिया रोग हो जाता है।

दाह (जलन), हरीद्र-नेत्रत (आंखों का पीला पड़ना), दौर्बल्‍य (कमजोरी), हरीद्रा-अनना (चेहरे का पीला पड़ना) रक्‍त-पित्त शकृत (मल का पीला पड़ना और मल में खून आना), अविपक (अपच) और भेक वरन (मेंढक के जैसा हरा-पीला रंग) जैसे कुछ लक्षण पीलिया में नजर आते हैं।

आमतौर पर पीलिया का संबंध असहज महसूस होने (मलेइस), अपच और खाने में अरुचि (एनोरेक्सिया) से है। पीलिया रोग के कुछ मामलों में लिवर का आकार बढ़ने और सूजन जैसी समस्‍या भी देखी गई है। पीलिया के इलाज के लिए आयुर्वेद में शमन चिकित्‍सा (रोग का संपूर्ण इलाज) और शंशोधन या शोधन चिकित्‍सा (वात,पित्त और कफ को संतुलित करने के लिए पूरे शरीर का शुद्धिकरण) की सलाह दी जाती है। 

(और पढ़ें - वात असंतुलन के लक्षण)

पीलिया का आयुर्वेदिक इलाज या उपचार क्या है?

  • निदान परिवर्जन (पीलिया उत्‍पन्‍न करने वाले कारकों से बचना):
    इस चिकित्‍सा का लक्ष्‍य व्‍यक्‍ति को रोग पैदा करने वाले कारकों से बचाकर बीमारी से मुक्‍ति दिलाना है और ये सभी रोगों के आयुर्वेदिक इलाज का प्रमुख हिस्‍सा है। निदान परिवर्जन के दो फायदे हैं जिनमें रोग को बढ़ने और उसे दोबारा होने से रोकना शामिल है। पीलिया के निदान के अंतर्गत गंदी या अस्‍वच्‍छ जगहों पर खाने और पानी पीने से बचने, साफ तौलिया इस्‍तेमाल करने और साफ-सफाई का पूरा ध्‍यान रखने जैसी सावधानियां बरतनी चाहिए। (और पढ़ें - एसजीपीटी टेस्ट क्या है)
     
  • विरेचन: 
    विरेचन की प्रक्रिया में शरीर से अत्‍यधिक पित्त को निकाला जाता है। विभंदी (सेन्‍ना), घृतकुमारी (एलोवेरा) या अम्‍लपर्णी (रूबर्ब) जैसी खट्टी जुलाब करने वाली जड़ी-बूटियों कोो पीलिया जैसे लिवर रोगों में इस्‍तेमाल करने की सलाह दी जाती है। इसमें लिवर और जमे हुए पित्त की सफाई की जाती है और पित्त के प्रवाह के मार्ग में आ रही अड़चनों को दूर किया जाता है। कफ दोष से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति के शरीर में पित्त का स्‍तर बहुत ज्‍यादा होता है इसलिए इस स्थिति में विरेचन लाभकारी रहता है।(और पढ़ें - पीलिया में क्या खाएं)

वात दोष से ग्रस्‍त लोगों को हमेशा विरेचन की सलाह नहीं दी जाती है। इसकी एक वजह ये भी है कि इससे पाचन अग्‍नि कमजोर होती है और दुर्बल व्‍यक्‍ति की पहले से ही पाचन अग्‍नि कमजोर होती है। गर्भवती, वृद्ध या कमजोर व्‍यक्‍ति को विरेचन की सलाह नहीं दी जाती है। बढ़े हुए पेट या गर्भाशय वाले व्‍यक्‍ति/महिला को भी विरेचन नहीं दिया जाता है। पीलिया के इलाज के लिए विरेचन प्रक्रिया में अरंडी के तेल का इस्‍तेमाल हो सकता है।

पाचन, दीपन (भूख बढ़ाने), स्‍नेहन (चिकना करना) और पित्तशामक (पित्त का नाश करने वाली) के लिए शमन चिकित्‍सा के रूप में दवाएं दी जाती हैं। 

(और पढ़ें - हेपेटाइटिस ए का इलाज)

पीलिया के लिए आयुर्वेदिक जड़ी-बूटिया

  • कुटकी:

कुटकी को पित्तघ्‍न (पित्त को नष्‍ट करने वाली) और कफघ्‍न (कफ नष्‍ट करने वाली) के गुणों के लिए जाना जाता है। शमन चिकित्‍सा की दीपन प्रक्रिया में कुटकी का इस्‍तेमाल किया जाता है। ये लिवर के कार्य को उत्तेजित करती है और पित्त को साफ करने और विरेचन (शुद्धि) में मदद करती है। ये पित्त और पित्तरस के स्‍तर को कम करने में इस्‍तेमाल की जाती है। इस तरह इससे पीलिया का इलाज किया जाता है। कुटकी को चूर्ण के रूप में पानी, गन्‍ने के जूस या शहद के साथ या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।

  • कालमेघ (चिरायता)

शमन चिकित्‍सा की दीपन प्रक्रिया में कालमेघ का प्रयोग किया जाता है। कालमेघ में कुछ ऐसे गुण होते हैं जो तेज बुखार के इलाज में, पित्त को हटाने, विरेचक और कीड़ों को नष्‍ट करने के लिए इस्‍तेमाल किए जाते हैं। ये प्‍लीहा (तिल्‍ली - यह एक आतंरिक अंग है जो बाईं ओर पसलियों के नीचे होता है) और पाचन तंत्र के कार्य को भी बेहतर करने में मदद करता है। चूर्ण के रूप में उपलब्‍ध कालमेघ को पानी, गन्‍ने के रस या शहद के साथ या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं। (और पढ़ें - पीलिया डाइट चार्ट)

  • भूम्‍यामलकी (भुंई आमला)

पीलिया जैसे कई लिवर रोगों में भूम्‍यामलकी का इस्‍तेमाल किया जाता है। ये लिवर के संपूर्ण स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार करती है और हेपेटाइटिस बी वायरस संक्रमण से बचाती है। भूम्‍यामलकी को जूस या चूर्ण के रूप में पानी, गन्‍ने के जूस या शहद के साथ या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।

  • जंगली गाजर

आयुर्वेद में जंगली गाजर को रक्‍त साफ करने और नर्विक टॉनिक (सीखने की क्षमता को बढ़ाने और मानसिक संतुलन को बेहतर करने वाला) के रूप में जाना जाता है। पिछले कई वर्षों से पीलिया के इलाज में इसका इस्‍तेमाल किया जाता रहा है। शमन चिकित्‍सा में स्‍नेहन और दीपन प्रक्रिया के लिए जंगली गाजर का इस्‍तेमाल किया जाता है। ये रक्‍त धातु में पित्त को कम करने और वात दोष को शांत करने में मदद करती है।

(और पढ़ें - गाजर खाने के फायदे)

पीलिया की आयुर्वेदिक दवाएं

  • फलत्रिकादि क्वाथ

हरीतकी (हरड़), नींब (नीम), भुनिम्ब (निर्मली), विभीतकी, कटुकी, आमलकी (आंवला), गुडुची (गिलोय) और वसाका (अडूसा) जैसी आठ जड़ी-बूटियों से बना काढ़ा फलत्रिकादि क्वाथ कहलाता है। इस क्‍वाथ (काढ़ा) का स्‍वाद खट्टा होता है और इसमें पित्त रेचक (पित्त को खत्‍म करने वाला), कोलेरेटिक (लिवर से पित्त के स्राव को उत्तेजित करता है), कोलागोग (तंत्र में पित्त के रिसाव को बढ़ाने वाला) और कफ-पित्त शामक (पित्त और कफ को शांत करने वाले) गुण पाए जाते हैं।

ये पीलिया के साथ-साथ एनीमिया के इलाज में भी उपयोग किया जाता है। इसमें मौजूद गुण लिवर के ऊत्तकों को मजबूत और उत्तेजित करते हैंं इसलिए फलत्रिकादि क्वाथ बेहतरीन हेप्‍टो प्रोटेक्‍टिव (लिवर को सुरक्षा देने वाली) दवा भी है।

इसमें वायरलरोधी और एंटी-ऑक्‍सीडेंट गुण भी पाए जाते हैं जोकि सुरक्षात्‍मक और निवारक के रूप में कार्य करते हैं। फलत्रिकादि क्वाथ को दो से तीन हफ्ते तक या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।

(और पढ़ें - एंटी-ऑक्‍सीडेंट की कमी के लक्षण)

  • वसागुडुच्‍यादि क्‍वाथ

वसागुडुच्‍यादि क्‍वाथ आयुर्वेद की प्रसिद्ध दवा है जिसका इस्‍तेमाल कामला (पीलिया) जैसे कई रोगों के इलाज में किया जाता है। इसका इस्‍तेमाल एल्‍कोहोलिक लिवर रोग और पांडुरोग (एनीमिया) के इलाज में भी किया जाता है। वसागुडुच्‍यादि क्‍वाथ हरीतकी, वसाका (अडूसा), नींब (नीम), कटुकि, गुडुची, चिरायता, आमलकी और वि‍भीतकी का मिश्रण है।

इन सभी जड़ी-बूटियों में हेप्‍टो प्रोटेक्‍टिव गुणों से युक्‍त फ्लेवोनॉयड्स, टैनिन-गैलिक एसिड, ट्रिटेरपेनोइड्स, कोमरिन ग्‍लाइकोसिड और फेनोलिक अवयव जैसे फाइटोकॉन्‍सटिट्यूंट्स (पौधों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले रसायनिक यौगिक) प्रचुर मात्रा में होते हैं। वसागुडुच्‍यादि क्‍वाथ दो से तीन हफ्ते तक या डॉक्‍टर के आयुर्वेदिक चिकित्‍स के निर्देशानुसार ले सकते हैं। (और पढ़ें - नीम के तेल के फायदे)

  • पुनर्नवा मंडूर

छाछ या चिकित्‍सक के निर्देशानुसार पुनर्नवा मंडूर को दो से तीन सप्‍ताह तक ले सकते हैं। इस आयुर्वेदिक दवा को खांसी और बुखार कम करने, ऊर्जा देने वाले, सूजन रोधी और मूत्रवर्द्धक गुणों के लिए जाना जाता है। इसका इस्‍तेमाल स्‍वेदोपग (पसीने की चिकित्‍सा में एक सहायक के रूप में) दवा के तौर पर भी किया जाता है। पुनर्नवा का प्रयोग सब्‍जी के रूप में भी किया जा सकता है। (और पढ़ें - बुखार भगाने के घरेलू उपाय)

  • आरोग्‍यवर्धिनी वटी

लिवर विकारों के इलाज में इस्‍तेमाल होने वाली कई दवाओं के मिश्रण से आरोग्‍यवर्धिनी वटी को तैयार किया गया है। ये दवा शरीर में सभी दोषों को संतुलित कर स्‍वास्‍थ्‍य को बेहतर करती है। इस दवा में एंटीऑक्‍सीडेंट और हेप्‍टो प्रोटेक्टिव गुण मौजूद होते हैं जो लिवर के कार्य को बेहतर करने में मदद करते हैं।

आरोग्‍यवर्धिनी वटी बॉडी चैनल्‍स (पूरे शरीर में बहने वाली ऊर्जा के प्रवाह के 12 मुख्य माध्यम या चैनल हैं , इस जीवन ऊर्जा को चीन के पांरपरिक ज्ञान में “की” (Qi) और “ची” (Chi or Chee) कहा जाता है) को साफ, पाचन अग्‍नि को उत्तेजित, शरीर में वसा के वितरण को संतुलित और पाचन तंत्र से विषाक्‍त पदार्थों को बाहर निकालने का काम करती है। आरोग्‍यवर्धिनी वटी चूर्ण के रूप में भी उपलब्‍ध है। वटी या चूर्ण को दो से तीन हफ्ते तक पानी, गन्‍ने के रस या शहद के साथ डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।

(और पढ़ें - पीलिया होने पर क्या करें)

क्‍या करें

(और पढ़ें - गाय का दूध के फायदे)

क्‍या ना करें

लिवर विकारों से ग्रस्‍त 180 मरीज़ों पर किए गए अध्‍ययन में 90%, 83.3% और 22.2% पीलिया, गंभीर हेपेटाइटिस और ऑब्‍सट्रक्‍टिव पीलिया (लिवर में पित्त का असामान्‍य प्रतिधारण) की बीमारी में कालमेघ असरकारी साबित हुई है। इनमें से किसी भी मरीज में कोई हानिकारक प्रभाव देखे नहीं गए हैं।

अन्‍य स्‍टडी के मुताबिक वसागुडुच्‍यादि क्‍वाथ का कोई हानिकारक प्रभाव नहीं है और इससे शरीर पर भी कोई भारी प्रभाव नहीं पड़ता है। (और पढ़ें - हेपेटाइटिस बी में क्या खाना चाहिए)

आरोग्‍यवर्धिनी वटी को एंटीऑक्‍सीडेंट और हेप्‍टो प्रोटेक्टिव पाया गया है। ये लिवर के लिए प्राकृतिक डिटॉक्सिफाइंग (विषाक्‍त पदार्थों को बाहर निकालने वाला) एजेंट के रूप में कार्य करती है और फैटी लिवर के लिए ये उत्तम दवा है। ये लिवर के सही तरह से कार्य करने की क्षमता को बनाए रखती है और पाचन को भी बेहतर करती है। 

(और पढ़ें - फैटी लिवर का उपचार)

इस लेख में उल्लिखित किसी भी जड़ी-बूटी और दवा का कोई हानिकारक प्रभाव नहीं है। पीलिया के प्रकार और व्‍यक्‍ति की प्रकृति के अनुसार इलाज में भिन्‍नता हो सकती है। उचित दवा के लिए आयुर्वेदिक चिकित्‍सक से संपर्क करें।

आरोग्‍यवर्धिनी वटी में भारी मात्रा में पारा जैसे धातु मौजूद होते हैं इसलिए इस वटी की अत्‍यधिक खुराक लेने पर शरीर में विषाक्‍तता (जहर का स्‍तर बढ़ना) बढ़ सकती है। स्तनपान करवा रही और गर्भवती महिलाओं और बच्‍चों को इसका इस्‍तेमाल बिलकुल नहीं करना चाहिए।

(और पढ़ें - हेपेटाइटिस सी टेस्ट क्या है)

कालमेघ जैसी जड़ी-बूटी शरीर में अतिरिक्‍त पित्त को कम कर पीलिया के इलाज में मदद करती है। वसागुडुच्‍यादि क्‍वाथ और फलत्रिकादि क्वाथ जैसे आयुर्वेदिक मिश्रण के औषधीय गुणों का प्रयोग ना सिर्फ पीलिया के इलाज में किया जाता है बल्कि ये रोगों से लिवर की भी सुरक्षा करती है और लिवर के कार्य को बेहतर करती है। (और पढ़ें - हेपेटाइटिस ए का टीका क्या है)

दवाओं के अलावा चिकित्‍सक की सलाह पर जीवनशैली और खानपान में बदलाव लाकर भी पीलिया को बेहतर तरीके से नियंत्रित कर मरीज़ को जल्‍दी ठीक किया जा सकता है। एलोपैथी से लिवर रोगों का इलाज करने पर गंभीर हानिकारक प्रभाव झेलने पड़ सकते हैं। आयुर्वेद की जड़ी-बूटियां और दवाएं हर प्रकार के पीलिया का इलाज करने में मदद करती हैं और इनका शरीर पर कोई हानिकारक प्रभाव भी नहीं पड़ता है। 

(और पढ़ें - आयुर्वेद में स्‍वस्‍थ जीवनशैली के उपाय)

Dr. Rajesh Mishra

Dr. Rajesh Mishra

आयुर्वेदा

Dr. Abhishek Singh Sagar

Dr. Abhishek Singh Sagar

आयुर्वेदा

Dr. Prateek Agrawal

Dr. Prateek Agrawal

आयुर्वेदा

और पढ़ें ...

References

  1. Panda AK, Bhuyan GC, Rao MM. Ayurvedic Intervention for Hepatobiliary Disorders: Current Scenario and Future Prospect. Current Scenario and Future Prospect. J Tradit Med Clin Natur 6:210.
  2. Ministry of AYUSH, Govt. of India. Ayurvedic Standard Treatment Guidelines. [Internet]
  3. Girendra Singh Tomar. A Review Of Ayurvedic Hepatology And Inferences From A Pilot Study On Kalmegh ( Andrographis Paniculata) Intervention In Hepatic Disorders Of Variable Etiology. Annals Ayurvedic Med. 2012: 1 (1 & 2) 44-52.
  4. Nambuhewagw Dhammika Namal Jayawardhane, Sri Kanth Tiwari. Ayurvedic Herbo-Mineral Approach in Management of Hepatitis (Kamala). International Journal of Pharmaceutical Research & Allied Sciences, Volume 2, issue 2 (2013),24-31.
  5. Ashutosh Chauhan, Deepak Kumar Semwal, Satyendra Prasad Mishra, Ruchi Badoni Semwal. Ayurvedic research and methodology: Present status and future strategies. An International Quarterly Journal of Research in Ayurveda : Volume : 36 Issue : 4, 2015.
  6. Deepthi Viswaroopan et al. Undernutrition In Children: An Updated Review. International Journal Of Research IN, 8(suppl 2), 2017.
  7. S Kamalakar Puripanda, Mahesh raju B, Mallika KJ, Tripathy TB. Understanding The Concept Of Sankramika Dadru Kusta- A Case Study. International Journal of Ayurveda and Pharma Research, August 2016, Volume 4 Issue 8 -81.
  8. Surendra K. Sharma, M. A. Sheela. Pharmacognostic evaluation of leaves of certain Phyllanthus species used as a botanical source of Bhumyamalaki in Ayurveda. Ayu. 2011 Apr-Jun; 32(2): 250–253, PMID: 22408311.
  9. Abbi Charu et al. Punarnava ( Boerhavia Diffusa) : A Promising Indigenous Herbal Drug . International Research Journal Of Pharmacy; 2013,4 (3).
  10. Pramod Kumar Mishra, Deepika Dwivedi, N.P. Rai. Therapeutic appraisal of Phalatrikadi Kwatha with special reference to hepatitis. World Journal of Pharmaceutical Sciences, 2016; 4(5): 260-263.
  11. Kalpu N. Kotecha, B.K.Kotecha, Vinay J. Shukla, Pradipkumar Prajapati, B.Ravishankar. Acute toxicity study of Vasaguduchyadi Kwatha: A compound Ayurvedic formulation. Ayu. 2013 Jul-Sep; 34(3): 327–330, PMID: 24501533.
  12. Kalpu N Kotecha, BK Ashok, VJ Shukla, PK Prajapati, B.Ravishankar. Hepatoprotective Activity Of Vasaguduchyadi Kwatha- Acompound Herbal Fromulation Against Paracetamol Inducedhepatotoxicity In Albino Rats. Pharma Science Monitor 6(4), Oct-Dec 2015, 157-167.
  13. Santosh Pal, A Ramamurthy, Bidhan Mahajon. Arogyavardhini Vati: A theoritical analysis. Journal of Scientific and Innovative Research 2016; 5(6): 225-227.
  14. Kalpu N. Kotecha et al. Acute toxicity study of Vasaguduchyadi Kwatha: A compound Ayurvedic formulation. Ayu. 2013 Jul-Sep; 34(3): 327–330, PMID: 24501533.
ऐप पर पढ़ें