• हिं

हेल्थ इन्शुरन्स के बारे में एक कहावत मशहूर है कि 'जब आपको कोई बीमारी न हो तब इसे लें, बीमारी होने के बाद कंपनी आपको हेल्थ इन्शुरन्स देगी ही नहीं।' जी हां, ये बात बिल्कुल सच है। यदि आप हेल्थ इन्शुरन्स लेना चाहते हैं (वैसे यह चाहत का नहीं जरूरत का मामला है), तो जल्द से जल्द ले लें। एक बार आपको कोई बीमारी लग गई तो फिर कोई भी कंपनी आपको हेल्थ इन्शुरन्स नहीं देगी, यदि किसी कंपनी ने आपको इन्शुरन्स दे भी दिया तो उसके बदले मोटा प्रीमियम वसूला जाएगा या उस बीमारी के लिए कभी भी क्लेम नहीं मिलेगा। सीधे शब्दों में में कहें तो प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन का मतलब ऐसी बीमारियों या समस्या से है जो पॉलिसी लेने से पहले ही आपको थी। प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज के बारे में और विस्तार से इस लेख में पढ़ेंगे। साथ ही यह भी जानेंगे कि क्या उन्हें हेल्थ इन्शुरन्स में कवर किया जाता है, अगर हां तो किन स्थितियों में।

(और पढ़ें - myUpchar बीमा प्लस पॉलिसी के बारे जानें)

  1. प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन का क्या मतलब है - What is a Pre-Existing Disease in Health Insurance in Hindi?
  2. क्या हेल्थ इन्शुरन्स में पहले से मौजूद बीमारी कवर होती है - Does health insurance cover pre-existing Condition in Hindi?
  3. हेल्थ इन्शुरन्स में प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज का निर्धारण कैसे होता है - How are pre-existing conditions determined in Hindi?
  4. प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन के कुछ उदाहरण - List of Diseases regarded as Pre-Existing in Health Insurance
  5. प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन के बावजूद हेल्थ इन्शुरन्स कैसे लें? - Buying Health Insurance If You Have Pre-Existing Health Issues in Hindi
  6. कौन सी प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज हेल्थ इन्शुरन्स में कवर नहीं होतीं - Pre existing conditions not covered by insurance in Hindi?
  7. ध्यान रखने योग्य बातें - Things to remember about Pre-Existing Disease in Health Insurance in Hindi

कोई भी चिकित्सीय समस्या, बीमारी या चोट जो आपको हेल्थ इन्शुरन्स खरीदने से पहले से है उसे प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज कहा जाता है। इसमें डायबिटीज, सीओपीडी, कैंसर और स्लीप एपनिया जैसी कई बीमारियों का नाम लिया जा सकता है। इस कैटेगरी में गंभीर और लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों को रखा जाता है।

(और पढ़ें - डे-केयर ट्रीटमेंट में कौन-कौन सी बीमारियां कवर होती हैं?)

हेल्थ इन्शुरन्स में प्री एग्जिस्टिंग कंडीशन कवर होती हैं? इस सीधे से प्रश्न का सीधा उत्तर हां है। हालांकि, अलग-अलग हेल्थ इन्शुरन्स कंपनियों में भिन्न स्थितियों को अलग-अलग समय के अंतराल पर कवर किया जाता है, यानी वेटिंग पीरियड अलग-अलग होता है। यदि आप वेटिंग पीरियड के दौरान किसी प्री एग्जिस्टिंग कंडीशन के लिए क्लेम करते हैं तो इन्शुरन्स कंपनी आपके क्लेम को रिजेक्ट कर देगी। हालांकि, कई कंपनियां कुछ प्री एग्जिस्टिंग कंडीशन के लिए पहले दिन से ही कवरेज उपलब्ध कराती हैं।

(और पढ़ें - क्लेम सेटलमेंट के दौरान पॉलिसीधारक की जिम्मेदारियां)

  • प्री एग्जिस्टिंग डिजीज के इलाज के लिए आपके पास कम से कम 24 महीने तक लगातार इन्शुरन्स का कवर होना चाहिए। यानी myUpchar बीमा प्लस पॉलिसी इश्यू होने के 24 महीने बाद आप अपनी प्री एग्जिस्टिंग कंडीशन के लिए क्लेम कर सकते हैं। हालांकि, किसी दुर्घटना के कारण होने वाले क्लेम पर यह नियम लागू नहीं होता। (और पढ़ें - पर्सनल एक्सीडेंट इन्शुरन्स क्या है?)
  • यदि आपने अपना बीमाधन (सम-इनश्योर्ड) बढ़ाया है तो आपको उस बढ़े हुए बीमाधन का क्लेम करने के लिए भी उसे बढ़ाने के बाद 24 महीने का इंतजार करना होगा।
  • 24 महीने के वेटिंग पीरियड के बाद भी सिर्फ उन्हीं मेडिकल कंडीशन को कवर किया जाता है, जिन्हें इन्शुरन्स कंपनी ने आपको पॉलिसी देते हुए स्वीकार किया है। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने पॉलिसी बॉन्ड को ध्यानपूर्वक पढ़ें।
  • कुछ इन्शुरन्स कंपनियां जहा कई प्री एग्जिस्टिंग कंडीशन के लिए 24 महीने के वेटिंग पीरियड के बाद क्लेम दे सकती हैं, वहीं कुछ अन्य कंपनियों में उनका वेटिंग पीरियड 48 महीने का होता है। इसलिए अपने पॉलिसी बॉन्ड को ध्यान से पढ़ें।
  • अगर आप अपनी इन्शुरन्स कंपनी से खुश नहीं हैं तो हमारी आपको यही सलाह होगी कि प्री एग्जिस्टिंग कंडीशन के लिए वेटिंग पीरियड खत्म होने के बाद ही दूसरी कंपनी में अपनी पॉलिसी को पोर्ट करें। क्योंकि ऐसा न करने पर आपका वेटिंग पीरियड फिर से री-स्टार्ट हो सकता है। हालांकि, कई इन्शुरन्स कंपनियां अतिरिक्त प्रीमियम लेकर वेटिंग पीरियड कम भी कर देती हैं।
  • कई इन्शुरन्स कंपनियां ऐसे प्लान लेकर आती हैं, जिसमें प्री एग्जिस्टिंग कंडीशन के लिए को-पेमेंट का विकल्प मौजूद होता है। ऐसी पॉलिसी लेने पर आपको इलाज के दौरान को-पेमेंट की शर्त के अनुसार मेडिकल बिल का कुछ भाग स्वयं चुकाना होगा, जबकि बाकी हिस्सा इन्शुरन्स कंपनी देगी।

इस तरह प्री एग्जिस्टिंग कंडीशन के बावजूद आप हेल्थ इन्शुरन्स का लाभ ले सकते हैं। सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आपने हेल्थ पॉलिसी को लेकर कितनी रिसर्च की और अपनी जरूरतों के अनुसार सबसे अच्छी पॉलिसी चुनी या नहीं।

पॉलिसी खरीदने से पहले जिस किसी बीमारी या चोट का निदान हो चुका है या इलाज किया गया है, उन सबको प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन में रखा जाता है। आईआरडीए की तरफ से समय-समय पर नियम और शर्तों में बदलाव होता रहता है। फरवरी 2020 में आए सर्कुलर के अनुसार यदि पॉलिसी लेने के तीन माह के भीतर किसी बीमारी का निदान होता है तो उसे प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज नहीं माना जाएगा, जबकि 2019 के सर्कुलर में ऐसी बीमारियों को प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज में शामिल किया जाता था।

myUpchar बीमा प्लस पॉलिसी इश्यू होने से पहले 48 महीने के भीतर यदि किसी बीमारी का निदान होता है तो उस स्थिति को प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन माना जाता है। या ऐसी स्थिति जिसमें कोई डॉक्टर पॉलिसी लेने या लैप्स पॉलिसी को फिर से शुरू करने से 48 महीने पहले तक किसी इलाज के लिए कहे तो उसे प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन कहा जाता है। इसके अलावा यदि किसी बीमारी के लक्षण हैं और पॉलिसी लेने के तीन माह के भीतर उसका निदान होता है या कोई इलाज की जरूरत पड़ती है तो उसे प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन माना जाता है।

(और पढ़ें - हेल्थ इन्शुरन्स में क्या कवर नहीं होता?)

हेल्थ इन्शुरन्स कंपनियां कई स्थितियों और बीमारियों को प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन मानती हैं। खासतौर पर इसमें क्रोनिक कंडीशन होती हैं, जिनका असर लंबे समय तक रहता है। यदि पॉलिसी लेने से पहले से कोई महिला गर्भवती है तो उसे भी प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन में रखा जाता है। निम्न कुछ बीमारियों को प्री-एग्जिस्टिंग की लिस्ट में रखा जाता है।

(और पढ़ें - ट्यूमर और कैंसर में क्या अंतर है?)

प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन से जूझ रहे लोगों को अक्सर विभन्न प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। ऐसे में आपको इन्शुरन्स कंपनी क्लेम देने से इनकार कर सकती है, कवरेज रद्द कर सकती है और यहां तक कि आपके हेल्थ इन्शुरन्स को भी रद्द किया जा सकता है। अब आप सोच रहे होंगे कि प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन के साथ हेल्थ इन्शुरन्स नहीं लिया जा सकता। ऐसा नहीं है, आपको हेल्थ पॉलिसी मिल सकती है। यहां हम आपको कुछ महत्वपूर्ण बातें बता रहे हैं, ताकि आपको आसानी से हेल्थ इन्शुरन्स मिल जाए।

(और पढ़ें - फैमिली फ्लोटर हेल्थ इन्शुरन्स क्या होता है?)

दूसरी कंपनी का प्लान जरूर देखें - प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन के साथ हेल्थ इन्शुरन्स खरीदना मुश्किल हो सकता है, लेकिन सभी हेल्थ इन्शुरन्स कंपनियां अलग-अलग होती हैं। कुछ ऐसी कंपनियां हैं जो प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन से जुड़ी आपकी पूरी मेडिकल हिस्ट्री की मांग करती हैं, जबकि कुछ कंपनियां पिछले कुछ साल की मेडिकल हिस्ट्री देखकर आपको हेल्थ इन्शुरन्स पॉलिसी ऑफर कर देती हैं।

प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन को कभी न छिपाएं - हो सकता है आपके दिमाग में भी यह विचार आया हो कि हम प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन को बताए बिना ही हेल्थ इन्शुरन्स ले लेते हैं, कंपनी को क्या पता? लेकिन यह सरासर गलत है। यदि भविष्य में उस बीमारी से जुड़ा क्लेम आता है तो इन्शुरन्स कंपनी मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर उसका क्लेम भुगतान करने से इनकार कर सकती है।

(और पढ़ें - क्रिटिकल इलनेस हेल्थ इन्शुरन्स क्या होता है?)

डॉक्टर को दिखाने का मतलब मेडिकल हिस्ट्री नहीं - हेल्थ इन्शुरन्स कंपनियां सिर्फ उन्हीं निदान या इलाज को प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन मानती हैं, जिनका असर लंबे समय तक होता है। यदि आपको अक्सर फ्लू, खांसी-जुकाम और बुखार होता है तो घबराने की जरूरत नहीं है, इनका असर लंबे समय तक नहीं होता और इन्हें प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन में शामिल नहीं किया जाता।

क्या आप हेल्थ इन्शुरन्स प्लान लेना चाहते हैं और डरते हैं कि पहले से मौजूद किसी बीमारी के कारण आपको हेल्थ इन्शुरन्स नहीं मिलेगा? डरिए मत, आप हेल्थ इन्शुरन्स के लिए अप्लाई करें; जैसा कि हम ऊपर बता चुके हैं, हेल्थ इन्शुरन्स में प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन को कवर किया जाता है। हां, ये जरूर है कि कुछ स्थितियों में आपको पॉलिसी देने से इनकार किया जा सकता है और कुछ स्थितियों में आपसे प्रीमियम बढ़ाकर लिया जा सकता है। यहां एक बात गांठ बांध लीजिए इन्शुरन्स कंपनियां भी कमाई करने के लिए ही यह बिजनेस कर रही हैं। यदि आप किसी ऐसी बीमारी से ग्रस्त हैं, जिसका इलाज है ही नहीं या बहुत महंगा है तो उस स्थिति में आपके बार-बार और जल्दी-जल्दी क्लेम करने की आशंका होगी। ऐसे में कंपनी इन्शुरन्स देने से इनकार कर देती है या आपसे मोटा प्रीमियम वसूला जाता है। यही नहीं 24 से 48 महीने के वेटिंग पीरियड की शर्त भी रखी जा सकती है।

यदि पॉलिसी लेते समय कोई महिला गर्भवती है तो इसे भी प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन में रखा जाता है। कैंसर और एचआईवी जैसी कई अन्य गंभीर और लंबे समय तक चलने वाली बीमारियां जो पॉलिसीधारक के पॉलिसी लेने से पहले से ही मौजूद हैं, उन्हें इन्शुरन्स कंपनियां कवर नहीं करती हैं। हालांकि, कुछ कंपनियां अतिरिक्त प्रीमियम लेकर और 48 महीने तक के वेटिंग पीरियड के बाद इनके लिए भी इन्शुरन्स क्लेम देती हैं।

(और पढ़ें - सबसे अच्छा हेल्थ इन्शुरन्स कौन सा है?)

जब भी आप कोई हेल्थ इन्शुरन्स प्लान खरीद रहे हों, आपको कुछ खास बातों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए। 

  • पॉलिसी लेते समय जब फॉर्म भरें तो उसमें अपनी मेडिकल हिस्ट्री के बारे में बिल्कुल भी झूठ न बोलें।
  • यदि आप किसी प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन से गुजर रहे हैं तो कंपनी को इस बारे में सही-सही बता दें।
  • यदि आप प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन के बारे में नहीं बताते हैं तो इन्शुरन्स कंपनी भविष्य में आपके क्लेम को रिजेक्ट कर सकती है।
  • इन्शुरन्स कंपनी को यदि पता चल जाए कि आपने झूठ बोलकर पॉलिसी ली है तो वह पॉलिसी को रिन्यु करने से इनकार कर सकती है।
  • यदि आप किसी प्री-एग्जिस्टिंग कंडीशन से गुजर रहे हैं तो इन्शुरन्स कंपनी अतिरिक्त प्रीमियम लेकर आपकी उस बीमारी को भी एक निश्चित वेटिंग पीरियड के बाद कवर कर सकती है।

अंत में आपको यही कहेंगे कि जब भी आप अपने लिए हेल्थ इन्शुरन्स खरीदें तो कई कंपनियों के अलग-अलग प्लान को आपस में कंपेयर जरूर करें। इसमें आपको सिर्फ प्रीमियम ही नहीं देखना चाहिए, बल्कि कवरेज, नेटवर्क अस्पताल, क्लेम रेशियो, वेटिंग पीरियड जैसे कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की तुलना करनी चाहिए। इसके अलावा हमेशा अपनी पॉलिसी के नियम और शर्तों को जरूर पढ़ें।

(और पढ़ें - क्या बच्चों के लिए हेल्थ इन्शुरन्स लिया जा सकता है?)

cross
डॉक्टर से अपना सवाल पूछें और 10 मिनट में जवाब पाएँ