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वैसे तो जलवायु परिवर्तन की वजह से कई तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं, लेकिन जलवायु में बदलाव के कारण वेक्टर-जनित बीमारियों (कीड़े-मकोड़ों से होने वाली बीमारियां) को सबसे ज्यादा बढ़ावा मिला है। जैसे कि डेंगू और चिकनगुनिया। आपको जानकर हैरानी होगी कि केवल इन बीमारियों की वजह से हर साल 7 लाख से ज्यादा मौतें होती हैं।

हालांकि, समस्या यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि ये तो शुरुआत है। जलवायु परिवर्तन के चलते बढ़ा तापमान, सीधे हमारे शरीर के आंतरिक तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता से समझौता करके स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। यही कारण है कि शरीर के आंतरिक तापमान को नियंत्रित करने की असर्मथता के साथ अधिक गर्मी और सर्दी के चलते हम ऐंठन, थकावट, हीट-स्ट्रोक और हाइपरथर्मिया जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं।

इसके अलावा अब अध्ययनकर्ताओं की एक रिसर्च से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा प्रभाव गर्भवती महिलाओं पर भी पड़ता है। जिससे प्रीमैच्योर (समय से पहले प्रसव) का जोखिम बढ़ा है।

क्या कहती है रिसर्च?
अमेरिका के लॉस एंजलिस में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफॉर्निया के इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरनमेंटल सस्टेनेबिलिटी के एक एसोसिएट प्रोफेसर एलन बेरेका और उनके साथी शोधकर्ता की रिसर्च में ये बात सामने आई है। रिसर्च के तहत शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि तापमान बढ़ने के साथ, प्रीटर्म डिलीवरी (समय से पहले प्रसव) के मामलों में भी बढ़ोतरी हुई है।

दरअसल किसी बच्चे का जन्म अगर डॉक्टरों द्वारा तय की गई तारीख से 3 हफ्ते पहले होता है तो इस स्थिति को प्रीमैच्योर डिलीवरी या समय से पहले प्रसव कहा जाता है। इस दौरान बच्चे को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, जैसे- वजन धीरे बढ़ना, अपरिपक्व फेफड़े और दूध पीने में असमर्थ होना।

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गर्मी और समय से पहले प्रसव
यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफॉर्निया के इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायरनमेंटल सस्टेनेब्लिटी में एसोसिएट प्रोफेसर एलन बेरेका और क्लेयरमोंट मैककेना कॉलेज के अर्थशास्त्री जेसामाइन शेलर ने मिलकर साल 1969 से 1988 तक तकरीब दो दशकों तक एक लंबी रिसर्च की। जिसमें बदलते तापमान और अपरिपक्व प्रसव (प्रीमैच्योर) के बीच एक संबंध स्थापित करने की कोशिश की गई।

  • रिसर्च के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि जब भी तापमान 33.2  डिग्री सेल्सियस या 90 डिग्री फारेनहाइट तक गया है तो प्रति एक लाख महिलाओं में समय से पहले जन्म दर 0.97 हो गई। वहीं जब तापमान बहुत ज्यादा गर्म नहीं था तो समय से पहले जन्म दर 0.57 प्रतिशत थी।
  • अध्ययन के पूरे 20 साल की अवधि के दौरान, हर साल समय से पहले (प्रीमैच्योर) लगभग 25,000 शिशुओं का जन्म हुआ। इस तरह से साल दर साल पैदा होने वाले बच्चे कुल डेढ़ लाख से ज्यादा दिन गर्भ में कम रहे।

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दूसरी रिसर्च में भी एक जैसी वजह
उत्तरी कैलिफोर्निया में डॉ. लिंडसे ए अवलोस के नेतृत्व में 1 जनवरी 1995 से दिसंबर 2009 के बीच दूसरी रिसर्च की गई। वैज्ञानिकों ने करीब 14 साल की अवधि तक इस रिसर्च पर काम किया, जिसमें प्रीमैच्योर डिलीवरी को लेकर बढ़ते तापमान के प्रभाव को जानने की कोशिश की गई।

  • डॉक्टर लिंडसे की ओर से आयोजित की गई इस रिसर्च के अनुसार गर्मियों के मौसम में तापमान में 5.6 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी के कारण प्रीमैच्योर डिलीवरी के मामलों में 11.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
  • इस स्टडी में शामिल की गई सभी प्रीमैच्योर डिलीवरी 40 सप्ताह ही बजाय 28 से 37 सप्ताह के बीच हुए थे।

प्रीमैच्योर डिलीवरी की अन्य वजह
वैसे तो रिसर्च के दौरान शोधकर्ता प्रीमैच्योर डिलीवरी के सटीक कारण को नहीं बता पाए, लेकिन कुछ कारण हैं जो प्रीटर्म डिलीवरी की वजह हो सकते हैं। जैसे-

  • वैज्ञानिकों का मानना है कि गर्मी के कारण गर्भवती महिला में कार्डियोवस्कुलर स्ट्रैट (हृदय में तनाव) बढ़ जाता है, जो कि जल्दी लेबर पेन (प्रसव पीड़ा) की वजह बना सकता है।
  • वैज्ञानिकों का दूसरा तर्क है कि उच्च तापमान से हार्मोन ऑक्सीटोसिन के स्तर में वृद्धि हो सकती है, जो लेबर पेन को प्रेरित करने में भूमिका निभाता है।
  • तीसरा तर्क है कि गर्मी के कारण गर्भवती महिला ठीक प्रकार से नींद नहीं ले पाती। जिससे महिला में प्रीटर्म लेबर और प्रीक्लेम्पसिया (हाई बीपी के साथ गर्भावस्था में जटिलता) की आशंका बढ़ सकती है।

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डॉक्टर की राय
myUpchar से जुड़ी डॉक्टर अर्चना निरूला के मुताबिक रिसर्च में बताए गए बिंदु प्रीमैच्योर का आधार हो सकते हैं और ये कहा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन के चलते समय से पहले प्रसव की आशंका बढ़ जाती है।

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