फंगल इन्फेक्शन, शरीर पर फंगस (कवक) बढ़ने के कारण होता है। फंगस, मानव शरीर के गर्म और नम वातावरण में अच्छे से पनपती है, इसीलिए फंगल इन्फेक्शन हर उम्र के महिलाओं व पुरुषों को प्रभावित करता है। ज्यादातर मामलों में फंगी, त्वचा, नाखूनों और महिलाओं की जननांग प्रणाली (कैंडिडा संक्रमण) को प्रभावित करती है। रिंगवर्म, एथलीट फुट और जॉक खुजली ऐसे कुछ संक्रमण हैं, जो फंगस के कारण होते हैं। फंगल इन्फेक्शन फेफड़ों (निमोनिया), आंखों (केराटाइटिस) और कानों (ऑटोमाइकोसिस) में भी होते हैं।

त्वचा के फंगल इन्फेक्शन, खासकर जोड़ों की त्वचा में बहुत अधिक खुजली होती है। महिलाओं में होने वाले कैंडिडा संक्रमण में बहुत अधिक खुजली के साथ योनि से गाढ़ा रिसाव होता है।

(और पढ़ें - योनि से सफेद पानी आने के कारण)

एलोपथी में, फंगल इन्फेक्शन के लिए डॉक्टर अलग-अलग एंटीफंगल दवाएं देते हैं। हालांकि, फंगल इन्फेक्शन के लिए होम्योपैथिक दवाओं को रोगी के लक्षणों के आधार पर चुना जाता है। होम्योपैथिक उपचार समानताओं पर काम करता है, जिसके अनुसार बीमारी के लक्षणों को ठीक करने के लिए वो ही दवा दी जाती है, जो ये लक्षण पैदा कर सकती है। थूजा ऑक्सिडेंटलिस (Thuja Occidentalis), सेपिया (Sepia), मेज़ेरियम (Mezereum), पेट्रोलियम (Petroleum), सल्फर (Sulphur), काली आयोडेटम (Kali iodatum), सिलेशिया (Silicea) और ग्रेफाइट (Graphites) ऐसी कुछ होम्योपैथिक दवाएं हैं, जिन्हें फंगल इन्फेक्शन का इलाज करने के लिए उपयोग किया जाता है।

  1. होम्योपैथी में फंगल इन्फेक्शन का उपचार कैसे होता है - Homeopathy me fungal infection ka ilaaj kaise hota hai
  2. फंगल इन्फेक्शन की होम्योपैथिक दवा - Fungal infection ki homeopathic medicine
  3. होम्योपैथी में फंगल इन्फेक्शन के लिए खान-पान और जीवनशैली के बदलाव - Homeopathy me fungal infection ke liye khan-pan aur jeevanshaili ke badlav
  4. फंगल इन्फेक्शन के होम्योपैथिक इलाज के नुकसान और जोखिम कारक - Fungal infection ke homeopathic upchar ke nuksan aur jokhim karak
  5. फंगल इन्फेक्शन के होम्योपैथिक उपचार से जुड़े अन्य सुझाव - Fungal infection ke homeopathic treatment se jude anya sujhav
फंगल इन्फेक्शन की होम्योपैथिक दवा और इलाज के डॉक्टर

होम्योपैथिक उपचार समानताओं पर आधारित है। स्वस्थ लोगों को होम्योपैथिक दवाएं दिए जाने पर होने वाले प्रभाव के अनुसार ही उस दवा के असर को समझा जाता है। होम्योपैथिक डॉक्टर, रोगी के लक्षणों को देखकर उनसे मेल खाने वाली दवा रोगी को देते हैं। लक्षणों का सही अवलोकन, टेस्ट और रोगी को कोई बीमारी होने की संभावना आदि जानकारियां डॉक्टर को उसके लिए सही दवा चुनने में मदद करते हैं, जो असरदार तरीके से फंगल इन्फेक्शन का इलाज करती है।

होम्योपैथी के अनुसार, फंगल इन्फेक्शन तब होते हैं जब कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोग ऐसे वातावरण के संपर्क में आते हैं जहां फंगस आसानी से पनप सकती है। फंगल इन्फेक्शन ऐसी समस्याओं से संबंधित होते हैं, जिनमें व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कमजोर हो जाती है, जैसे एचआईवी और कैंसर। होम्योपैथिक दवाएं कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली को ठीक करती हैं और फिर संक्रमण का इलाज करती हैं। इनसे दोबारा बीमारी होने को भी रोका जा सकता है।

(और पढ़ें - रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के घरेलू उपाय)

फंगल इन्फेक्शन के लिए मौजूद होम्योपैथिक दवाओं पर बहुत से अध्ययन किए गए हैं, ताकि उनका चिकित्सकीय प्रभाव देखा जा सके। एक अध्ययन में कैनडीडा अल्बिकन्स (Candida albicans) के कारण होने वाले फंगल इन्फेक्शन पर होम्योपैथिक दवाओं के एंटीफंगल प्रभाव को देखा गया। इनमें सल्फुरिक एसिड (Sulphuric acid), बेंज़िकम एसिडम (Benzoicum acidum), आज़ादिरिचता इंडिका (Azadirachta indica), सिनकोना ऑफ़िसिनैलिस (Cinchona officinalis), आयोडम (Iodum), फॉस्फोरस (Phosphorus), सेलेनियम (Selenium), सल्फर (Sulphur), जिंकम मेटालिकम (Zincum metallicum) और जिंजिबर ओफिसिनाले (Zingiber officinale) आदि दवाएं शामिल हैं।

फंगल इन्फेक्शन के लिए उपयोग की जाने वाली होम्योपैथिक दवाओं के बारे में नीचे दिया गया है:

  • कैल्केरिया कार्बोनिका (Calcarea Carbonica)
    सामान्य नाम: कार्बोनेट ऑफ़ लाइम (Carbonate of lime)
    ​लक्षण: ये दवा उन लोगों के लिए ज्यादा असरदार है, जिनका रंग गोरा है और थोड़े मोटे हैं। इस दवा को त्वचा व महिलाओं की जननांग प्रणाली के संक्रमण के उपचार के लिए उपयोग किया जाता है। निम्नलिखित लक्षणों में ये दवा असर करती है:
    • बहुत ज्यादा पसीना आना, जिसके कारण त्वचा का फंगल इन्फेक्शन होता है। (और पढ़ें - ज्यादा पसीना आना रोकने के उपाय)
    • गंभीर खुजली और त्वचा में जलन होना, जो सुबह के समय और बेड पर लेटे हुए अधिक होते हैं।
    • चमकदार त्वचा के साथ कलाई, जांघ और टखने के पास फंगल इन्फेक्शन के सफेद दाग होना।
    • योनि से गाढ़ा सफेद पदार्थ निकलना, खाकसार मासिक धर्म के बीच में। (और पढ़ें - योनि स्राव के प्रकार)
    • जननांग क्षेत्र में गंभीर खुजली और जलन, जो सफेद पदार्थ के रिसाव से संबंधित होते हैं।
    • नम मौसम में लक्षण बढ़ जाना। (और पढ़ें - बदलते मौसम की खुजली का आयुर्वेदिक उपचार)
    • सूखे मौसम में लक्षण बेहतर होना।
       
  • मेजेरियम (Mezereum)
    सामान्य नाम: स्पर्ज ओलिव (Spurge olive)
    लक्षण: ये दवा ऐसे लोगों के लिए काफी असरदार है जो शांत रहते हैं और भावनात्मक बदलावों से ज्यादा प्रभावित नहीं होते। ये लोग ज्यादातर ठंडी हवा के प्रति संवेदनशील होते हैं। इस दवा को खासतौर पर त्वचा के संक्रमण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। निम्नलिखित लक्षण अनुभव होने पर इस दवा का उपयोग किया जाता है:

एक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, मेजेरियम से इलाज करने पर कैनडीडा अल्बिकन्स (Candida albicans) के कारण होने वाले मुंह के संक्रमण ठीक होते हैं।

  • थूजा ऑक्सिडेंटलिस (Thuja Occidentalis)
    सामान्य नाम: आर्बर विटै (Arbor vitae)
    लक्षण: ये दवा उन लोगों के लिए सबसे अच्छी है जिन्हें बार-बार ग्रंथियों की सूजन होती है। इस दवा को ज्यादातर त्वचा व जननांग क्षेत्र के फंगल इन्फेक्शन के लिए उपयोग किया जाता है और ये त्वचा के दाद ठीक करने के लिए बहुत अच्छी दवा है। नीचे दिए गए लक्षणों के लिए इस दवा का उपयोग किया जाता है:
    • गोल आकार का संक्रमित क्षेत्र, जिसमें गंभीर खुजली और काटने की भावना महसूस होती है।
    • त्वचा पर खुजली करने की इच्छा बहुत ज्यादा होना। (और पढ़ें - त्वचा की एलर्जी के लक्षण)
    • खुजलाने से संक्रमित क्षेत्र में खुजली बढ़ जाना।
    • धोने के बाद त्वचा का सूखना और अस्वस्थ हो जाना।
    • महिलाओं में जननांग प्रणाली के फंगल इन्फेक्शन के मामलों में योनि से चिपचिपा, सफ़ेद, हरा या पीले से रंग का रिसाव होना, जिसकी दुर्गंध मछली की तरह होती है।
    • योनि से सफ़ेद पानी के रिसाव से संबंधित गंभीर जलन होना। (और पढ़ें - योनि में जलन का इलाज)
    • सफ़ेद पानी निकलने के साथ जननांग क्षेत्र में गंभीर खुजली।

एक अध्ययन में आंखों के फंगल इन्फेक्शन पर थूजा का एंटीफंगल प्रभाव देखा गया है। इस अध्ययन में थूजा की अलग-अलग खुराक के एंटीफंगल प्रभाव को जांचा गया और उनके नतीजे सकारात्मक निकलने के साथ फंगस की वृद्धि में भी कमी देखी गई। एक अन्य अध्ययन में पौधों में होने वाले फंगल इन्फेक्शन के इलाज में भी थूजा का सकारात्मक प्रभाव देखा गया। एक और अध्ययन में ये साबित हुआ है कि कैनडीडा अल्बिकन्स (Candida albicans) को बढ़ने से रोकने के लिए भी थूजा प्रभावी है।

  • ग्रेफाइट (Graphites)
    सामान्य नाम: ब्लैक लेड (Black lead) और प्‍लंबेगो (Plumbago)
    लक्षण: ये दवा उन लोगों के लिए उपयोगी है जिनका डील-डौल छोटा है और शरीर भारी है। ऐसे लोग गोरे होते हैं, काम करने में धीमे होते हैं, उन्हें ठंड लगती रहती है और बार-बार त्वचा के विकार और कब्ज होते हैं। इस दवा को त्वचा व जननांग प्रणाली के फंगल इन्फेक्शन के लिए उपयोग किया जाता है। कैनडीडा अल्बिकन्स (Candida albicans) के कारण होने वाले मुंह के फंगल संक्रमण के लिए भी ग्रेफाइट उपयोगी है। नीचे दिए गए लक्षण अनुभव होने पर इस दवा का उपयोग किया जाता है:
    • जननांग प्रणाली में संक्रमण के मामले में योनि से बहुत ज्यादा सफ़ेद पदार्थ का रिसाव। (और पढ़ें - जननांग दाद के कारण)
    • पूरे दिन बहुत ज्यादा सफ़ेद पानी निकलने के साथ जननांग क्षेत्र में गंभीर खुजली और जलन।
    • पीला या सफेद रिसाव के साथ दर्द और पीठ में कमजोरी
    • बैठे हुए, चलने पर और सुबह के समय ज्यादा सफेद पानी निकलना।
    • गंभीर खुजली, जो त्वचा के फंगल इन्फेक्शन के मामले में रात को बढ़ जाती है।
    • त्वचा का सूखापन, जिससे पपड़ी और फिशर हो जाते हैं। (और पढ़ें - एनल फिशर के घरेलू उपाय)
    • इन्फेक्शन वाले क्षेत्र में गंभीर खुजली के साथ चिपचिपा पदार्थ निकलना, जिससे जलन होती है। (और पढ़ें - छाती में जलन के लिए क्या करें)
    • गर्म और नमि वाले मौसम में खुजली बढ़ जाना
       
  • सेपिया (Sepia)
    सामान्य नाम: इंकी जूस ऑफ़ कैटलफिश (Inky juice of cuttlefish)
    लक्षण: ये दवा सांवले लोगों के लिए अच्छी है, जिनका स्वभाव नरम होता है और उनकी मांसपेशियां मजबूत होती हैं। निम्नलिखित लक्षणों में ये दवा दी जाती है;
    • त्वचा का फंगल संक्रमण, जो हर साल वसंत के मौसम में होता है।
    • चेहरे पर दाद। (और पढ़ें - दाद के उपचार)
    • त्वचा के जोड़ों में नमि और खुजली, जैसे घुटने के पीछे वाले और कोहनी के आगे वाले क्षेत्र में।
    • खुजलाने से खुजली में आराम मिलना और त्वचा का रूखा, खुरदुरा व गुलाबी हो जाना।
    • जननांग प्रणाली के इन्फेक्शन के मामले में योनि से चिपचिपा, लेसदार और पीला रिसाव होना। (और पढ़ें - योनि में यीस्ट संक्रमण के लक्षण)
    • योनि में गंभीर खुजली और घाव की भावना होना, जो योनि के रिसाव से संबंधित होती है।
    • कभी-कभी योनि से गांठ वाला रिसाव होना, जिसकी गंदी दुर्गंध होती है। (और पढ़ें - योनि में गांठ के कारण)
    • पेट में दर्द के साथ भारीपन होना, खासकर सुबह के समय, जो जननांग प्रणाली के फंगल इन्फेक्शन से संबंधित होता है। (और पढ़ें - पेट में दर्द होने पर क्या करना चाहिए)
    • दाद का संक्रमण आंधी-तूफान वाले मौसम के बाद बेहतर होना और रात के समय सफ़ेद रिसाव में सुधार।
    • मुंह में छाले होना, ये भी फंगल इन्फेक्शन के कारण ही होते हैं और इन्हें सेपिया से ठीक किया जा सकता है। (और पढ़ें - मुंह में छाले होने पर क्या करना चाहिए)
       
  • मेडोराइनम (Medorrhinum)
    सामान्य नाम: गोनोरिया बैक्टीरिया (Gonorrhoea bacteria)
    लक्षण: जिन लोगों का विकास पूरी तरह से नहीं हो पाया है, उनके लिए ये दवा असरदार है। ये दवा महिलाओं में त्वचा और जननांगों के फंगल इन्फेक्शन के लिए उपयोग की जाती है। गोनोरिया जैसे यौन संचारित रोगों के लिए भी ये दवा असरदार है। नीचे दिए लक्षण अनुभव करने पर इस दवा का इस्तेमाल किया जाता है:
    • सिर की त्वचा पर फंगल इन्फेक्शन होने की प्रवृत्ति और पपड़ी से दुर्गंध वाला रिसाव होना।
    • गंभीर खुजली, जो खुजलाने से भी ठीक नहीं होती और उसके बारे में सोचने पर व रात के समय बढ़ जाती है। (और पढ़ें - खुजली दूर करने के घरेलू उपाय)
    • योनि के अत्यधिक रिसाव के साथ गंभीर जलन और जननांग क्षेत्र में असहनीय खुजली होना। (और पढ़ें - योनि के बारे में जानकारी)
    • जननांग में खुजली होना, जो खुजलाने से या थोड़ी-थोड़ी देर में गुनगुने पानी से नहाने पर बढ़ जाती है।
       
  • टेल्यूरियम (Tellurium)
    सामान्य नाम: मेटल टेल्यूरियम (Metal tellurium)
    लक्षण: ये दवा उन लोगों को बहुत फायदा पहुंचाती है, जिनके शरीर से बदबूदार रिसाव होते हैं, जैसे पसीना या कान से रिसाव आदि। त्वचा के फंगल के इन्फेक्शन के लिए ये दवा बहुत असरदार है। निम्नलिखित लक्षणों में इसका उपयोग किया जाता है:
    • टांगों में फंगल इन्फेक्शन।
    • बहुत सारे दाद होना, जो कुछ गंभीर मामलों में एक हो जाते हैं और इससे बहुत गंभीर खुजली होती है। (और पढ़ें - दाद के घरेलू उपाय)
    • रात के समय और बेड पर लेटे हुए गंभीर खुजली होना।
    • संक्रमित क्षेत्र बीच में से लाल होना और उसके आस-पास छोटे-छोटे दाने होना। (और पढ़ें - चेहरा लाल होने के कारण)
    • त्वचा के सूखेपन के साथ संक्रमित क्षेत्र में पपड़ी बनना।
    • ठंडी हवा में जाने पर खुजली बढ़ जाना

होम्योपैथिक दवाओं को बहुत ही कम मात्रा में दिया जाता है, जिसके कारण तेज गंध वाली चीजों और सीधी धूप के संपर्क में आने से उनके कार्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। नीचे कुछ सावधानियां दी गई हैं, जो होम्योपैथिक उपचार के साथ अनिवार्य हैं:

क्या करें:

  • उन सब चीजों से दूर रहें जो होम्योपैथिक दवाओं के कार्य पर बुरा असर कर सकती हैं, जैसे तेज पेय पदार्थ या फ्लेवर। (और पढ़ें - शराब पीने के नुकसान)
  • अपनी जीवनशैली को शांतिपूर्ण रखें और पर्सनल हाइजीन, अपनी नींद तथा खान-पान का ध्यान रखें।
  • रोगी को वे कपडे पहनने दें जो उन्हें सुविधाजनक लगते हैं।
  • स्वस्थ व पौष्टिक आहार लें, जिसमें आर्टिफिशल फ्लेवर या कलर न हों।
  • रोजाना सैर और थोड़ी एक्सरसाइज करके शारीरिक तौर पर फिट रहें।

क्या न करें:

  • कॉफी, फ्लेवर वाली ड्रिंक्स और परफ्यूम से दूर रहें।
  • डाइट में ज्यादा नमक, मसाले और चीनी न लें। (और पढ़ें - काले नमक के फायदे और नुकसान)
  • ऐसे सूप और ड्रिंक न लें जिनके औषधीय प्रभाव होते हैं।
  • ऐसे कमरे में या जगह में न रहें जो गर्म, नम और अस्वच्छ हो।
  • ऐसे कपडे न पहनें जो मौसम के अनुसार अनुचित हों।
  • गर्म मौसम में ऊनी कपड़े पहनने की जगह कॉटन या लिनन के कपड़े पहनें।
  • प्रजनन प्रणाली में फंगल इन्फेक्शन के उपचार के चलते सेक्स करने से बचें।

(और पढ़ें - फंगल इन्फेक्शन में क्या खाएं)

सही खुराक में दी जाने वाली उचित होम्योपैथिक दवाओं का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है। एक योग्य होम्योपैथिक डॉक्टर द्वारा दी गई दवा को सही तरीके से लेने पर ये उचित असर करती हैं। हालांकि, दवा को सही खुराक में न लेने से इसके कुछ दुष्प्रभाव हो सकते हैं।

होम्योपैथिक दवाएं हर उम्र के लोग, प्रेग्नेंट महिलाएं और बच्चे को दूध पिला रही महिलाएं आदि बिना किसी चिंता के ले सकते हैं। ये दवाएं अलग-अलग प्रकार की एलर्जी होने पर भी काम आ सकती हैं, खासकर उन लोगों के लिए जिनकी त्वचा नाज़ुक है या जिन्हें अन्य उपचार का असर नहीं होता या उनके दुष्प्रभाव अनुभव होते हैं। अन्य दवाओं से ठीक न हो पाने वाली एलर्जी और फंगल इन्फेक्शन को होम्योपैथी से बिना किसी दुष्प्रभाव के ठीक किया जा सकता है।

(और पढ़ें - फंगल संक्रमण के घरेलू उपाय)

प्रयोगशाला में हुए एक अध्ययन से ये साबित हुआ है कि लाइकोपोडियम क्लैवाटम (Lycopodium Clavatum), सल्फर (Sulphur), सेपिया (Sepia) और टेल्यूरियम (Tellurium) जैसी होम्योपैथिक दवाओं को अलग-अलग खुराक में देने से एस्परगिलस नाइजर (Aspergillus niger) नामक फंगस को पनपने से रोका जा सकता है। ये फंगस आमतौर पर बिंदी जैसे श्रृंगार के सामान से संबंधित होता है।

फंगल इन्फेक्शन के लिए किए जाने वाले आम उपचार से ज्यादा असरदार व सुरक्षित होम्योपैथिक उपचार को माना जाता है। होम्योपैथिक दवाएं न केवल बीमारी का इलाज करती हैं, बल्कि बीमार व्यक्ति का भी उपचार करती हैं। ये शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को उत्तेजित करती हैं ताकि शरीर संक्रमण से लड़ सके। ऐसा करने से फंगल इन्फेक्शन पूरी तरह से ठीक होता है और बार-बार इन्फेक्शन होने की समस्या भी ठीक होती है।

(और पढ़ें - रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपाय)

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संदर्भ

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