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बच्चों को दूध के साथ बिस्कुट आप भी देते होंगे। समोसे, ब्रेड पकोड़े, पराठे के साथ कैचअप और बिना मेयोनेज के सैंडविच में स्वाद नहीं आता। ब्रेड के बिना नाश्ता पूरा नहीं होता और बिना चीज के पिज्जा की कल्पना भी बेकार है। इसके अलावा चिप्स, कॉर्न फ्लेक्स और रेडी टू ईट मील भी हमारे खान-पान का हिस्सा बन चुके हैं। स्वाद के लिए हम इन सबका सेवन करते तो हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं इन सबको खाकर आप अपनी हेल्थ के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

आप घर में जो खाना बनाते हैं उसमें साफ-सफाई का भरपूर ध्यान रखते हैं। हर इंग्रेडिएंट चुन-चुनकर डालते हैं, ताकि आपके परिवार की सेहत दुरुस्त रहे। इसके बावजूद आपका सावधानी से बनाया गया बासी खाना दूसरे या तीसरे दिन खाने लायक नहीं बचता, वह खराब हो जाता है। आखिर पैकेट में मिलने वाले खाने, प्रोसेस्ड फूड में ऐसा क्या होता है जो वह महीनों चलता है, फिर भी खराब नहीं होता। कहीं ऐसा तो नहीं जो प्रिजरवेटिव पैकेट में मिलने वाले खाद्य पदार्थों को महीनों खराब नहीं होने देता, वही आपकी सेहत खराब कर रहा हो। इसके अलावा पैकेज्ड फूड में टेस्ट मेकर भी होता है जिसकी वजह से आप चटखारे लेकर उसका स्वाद लेते हैं। आर्टिफिशियल कलर आपको उस खाने की तरफ खींचते हैं। इसी तरह के दर्जनों इंग्रेडिएंट्स पैकेज्ड फूड और जंक फूड में होते हैं जो आपकी सेहत के लिए बेहद खतरनाक हो सकते हैं। हमने एक आम भारतीय घर में इस्तेमाल होने वाले पैकेज्ड फूड के लेबल की जांच की और देखा कि दावे क्या हैं और उनमें असल में क्या-क्या है?

फूड लेबल पर क्या-क्या जानकारी?
सभी पैकेज्ड फूड के पैक पर एक न्यूट्रिशन टेबल बना होता है। इस न्यूट्रीशन टेबल में स्पष्ट लिखा रहता है कि उस उत्पाद को खाने से क्या-क्या पोषक तत्व आपके शरीर में जाएंगे। उस खाद्य पदार्थ में इस्तेमाल होने वाले तमाम इंग्रेडिएंट्स की कितनी मात्रा का इस्तेमाल किया गया है, इस बारे में भी लेबल पर जानकारी होती है। यह सब इसलिए किया जाता है, ताकि आपको पता चल सके कि आप जो चीज खा रहे हैं उसमें क्या-क्या मिलाया गया है और उसकी पोषक क्षमता कितनी है। अब खुद से एक प्रश्न करें क्या आपने कभी उस न्यूट्रिशन टेबल को ध्यान से पढ़ा है?

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ज्यादातर लोग उस न्यूट्रीशन टेबल की तरफ देखते तक नहीं। बता दें कि किसी भी खाद्य उत्पाद के लेबल पर अच्छी-अच्छी बातें लिखी रहती हैं, जैसे मोर फाइबर, विटामिन डी से भरपूर आदि। कुछ उत्पादों में प्रिजरवेटिव और हाइड्रोजेनेटेड फैट्स के बारे में जानकारी तो होती है, लेकिन वह भी पीछे की तरफ बहुत ही छोटे शब्दों में। कई बार यह जानकारी जहां पैकेट को चिपकाया जाता है उसके पीछे की तरफ होती है, जिसे शायद ही आप कभी पलटकर देखते हों। अब अगर आप उन छोटे-छोटे अक्षरों में लिखी जानकारी को पढ़ने का मन बना चुके हैं तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हाइड्रोजेनेटेड फैट्स कुछ और नहीं बल्कि ट्रांस फैट्स ऑयल ही होते हैं और आपकी सेहत के लिए बहुत खतरनाक भी।

किसी पैकेज्ड फूड में किसी कैमिकल को कितना डाला जाए, इसकी मात्रा फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स ऑफ इंडिया (FSSAI) तय करता है। एफएसएसएआई ने हर कैमिकल और एडिटिव्स की मात्रा तय की हुई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सरकारी एजेंसी ने कह दिया तो यह आपके स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह से सुरक्षित है। सरकार और सरकारी एजेंसी सिर्फ यह तय करते हैं कि किसी कैमिकल को कितनी मात्रा तक खाने-पीने की चीजों में मिलाया जा सकता है, ताकि शरीर पर उसके दुष्प्रभाव कम से कम हों। यहां आपको अपने विवेक का इस्तेमाल करना है और अपने नियमित पौष्टिक भोजन के साथ संयमित तौर पर इनका उपभोग करना चाहिए।

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आप घर में जिन पैकेज्ड फूड का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं उनमें से पांच प्रमुख में क्या-क्या मिलाया जाता है इस पर हमने कुछ रिसर्च की। ये हैं वो पांच फूड और उनमें इस्मेमाल होने वाले इंग्रेडिएं:

प्रोसेस्ड मीट और चीज
किसी भी खाद्य सामग्री को लंबे वक्त तक चलाने के लिए हम ऐसी चीजों का इस्तेमाल करते हैं, जिनसे उसमें किटाणुओं का हमला न हो, बदबू न आए और वह सूख न जाए। इसके लिए हम घर पर अचार, जैम और मुरब्बा बनाते हैं तो तेल, नमक और चीनी का इस्तेमाल करते हैं। दूसरी तरफ जब बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में जब खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं तो वहां पर प्रिजरवेटिव के तौर पर सोडियम सॉल्ट, कैल्शियम, पोटेशियम और बेंजोएट्स या फिर एसिटिक एसिड और सोर्बिक एसिड जैसे ऑर्गेनिक एसिड का इस्तेमाल करते हैं। इन पर हुई रिसर्च के अनुसार ज्यादातर प्रिजरवेटिव का आपकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है।

अमृतसर के एक कॉलेज में केमिस्ट्री विभाग के प्रमुख संजय शर्मा ने साल 2015 में इंटरनेशनल जरनल ऑफ साइंस एंड रिसर्च पब्लिकेशन में छपे अपने एक लेख में सेहत पर बुरा प्रभाव डालने वाले प्रिजरवेटिव की लिस्ट दी है जो आम तौर पर खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होते हैं। इस लिस्ट में नाइट्राइट और नाइट्रेट का भी जिक्र है, जिनका मीट को प्रोसेस करने में इस्तेमाल किया जाता है। एक बार यह आपके सिस्टम में चले जाते हैं तो फिर यह नायट्रस एसिड में बदल जाते हैं और पेट के कैंसर का कारण बन सकते हैं।

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फलों में प्रिजरवेटिव के तौर पर सल्फेट का इस्तेमाल आम बात है। इसकी वजह से घबराहट से लेकर सिरदर्द और एलर्जी तक हो सकती है। चीज और बिस्कुट व ब्रेड जैसे बेकरी उत्पादों में इस्तेमाल होने वाला सोर्बिक एसिड लंबे समय तक इन्हें फफूंद लगने से बचाता है। हालांकि, यह नाइट्राइट की तरह नुकसानदायक तो नहीं होता, लेकिन लंबे समय में इससे त्वचाशोध (dermatitis) और खुजली (urticaria) जैसी समस्याएं हो सकती हैं। 

ब्रेड, बिस्कुट और चिप्स
आम तौर पर ब्रेड, बिस्कुट और चिप्स के पैकेट पर आप लिखा हुआ पाएंगे कि उसमें ट्रांस फैट्स नहीं हैं। शायद यह पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री की तरफ से फैलाया गया सबसे बड़ा झूठ होगा। उसी पैकेट को ध्यान से पढ़ेंगे तो कहीं पर छोटे-छोटे शब्दों में हाइड्रोजेनेटेड ऑइल का जिक्र होगा। यह कुछ और नहीं आर्टिफिशियल ट्रांस फैट्स है, जो आपको दिल से संबंधित बीमारियां (cardiovascular diseases), स्ट्रोक्स और हार्ट अटैक जैसी घातक बीमारियां दे सकता है। 

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वनस्पति घी, कृत्रिम मक्खन, वेजिटेबल शॉर्टनिंग में हाइड्रोजेनेटेड ऑयल पाया जाता है। लगभग सभी बेक्ड पैकेज्ड फूड में इस ऑयल का इस्तेमाल होता है, जिनमें ब्रेड, बिस्कुट और चिप्स के अलावा रेडी टू मेक प्रोडक्ट शामिल हैं। कई उत्पादों में बड़े-बड़े शब्दों में ट्रांस-फैट-फ्री लिखा होता है, इसके धोखे में न आएं। उसे बनाने में किन चीजों का इस्तेमाल हुआ है, उनके बारे में पढ़ें। क्योंकि अगर किसी उत्पाद में 0.5 ग्राम या उससे कम ट्रांसफैट हो तो उसे ट्रांस-फैट-फ्री लिखा जा सकता है। एक व्यक्ति रोजाना अधिकतम 4 ग्राम तक ट्रांस फैट का सेवन कर सकता है।

मेयोनेज और ब्रेड
पानी और तेल को आप जितना मर्जी मिलाने की कोशिश कर लें, यह दोनों अलग-अलग हो ही जाते हैं। एक तरीका है, जिसमें दोनों ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। जी हां, मेयोनेज की बात हो रही है। इन्हें मिलाने के लिए इमल्सीफायर्स का इस्तेमाल होता है। क्रीम, चॉकलेट और मेयोनेज को एक जैसा गाढ़ापन इमल्सीफायर्स ही देते हैं। इनकी मदद से ब्रेड सॉफ्ट रहती है। हालांकि, हाल में हुई रिसर्च बताती हैं कि आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले इमल्सीफायर्स खासतौर पर कार्बोक्सीमेथायलसेल्यूलोज (CMC) और पॉलीसोर्बेट में 80 तरह के नेगेटिव गट बैक्टीरिया, जलन व वजन बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं। इनसे एंग्जाइटी भी बढ़ती है।

कैचअप और कॉर्नफ्लेक्स
टॉफी, सोडा और फ्रोजन व प्रीपैक्ड फूड्स में आर्टिफिशियल स्वीटनर से रूप में आम तौर पर हाई फ्रक्टोज कॉर्न सिरप (HFCS) का इस्तेमाल होता है। इसमें ग्लूकोज और फ्रक्टोज की 50-50 प्रतिशत मात्रा होती है। बता दें कि फ्रक्टोज वह शुगर है जो फलो में प्राकृतिक रूप से पायी जाती है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि आपका शरीर ग्लूकोज को पचाकर ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल नहीं करता। अधिक मात्रा में ऐसी शुगर लेने पर यह सीधे लीवर में जाकर फैट के रूप में जमा हो जाती है। इससे फैटी लीवर जैसी बीमारी हो सकती है। आगे चलकर इससे मोटापा भी बढ़ सकता है। स्टडी में पता चला है कि एचएफसीएस आपके शरीर को इंसुलिन रोधी बना सकता है, जो आगे चलकर डायबिटीज का कारण बन सकता है। इसके ज्यादा उपभोग से भविष्य में हृदय संबंधी रोग हो सकते हैं।

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आम तौर पर घर में किसी भी भोजन में रंग लाने के लिए हम केसर, देगी मिर्च, हल्दी जैसे प्राकृतिक उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि टॉफी, सोडा, आइसक्रीम अन्य उत्पादों को मोहक रंग देने के लिए सिंथेटिक कलर का इस्तेमाल होता है। एफएसएसएआई ने कई तरह से सिंथैटिक कलर इस्तेमाल करने की इजाजत दी है, जिनमें एरीथ्रोसिन (गुलाबी), एलूरा रेड (लाल), सनसेट येलो (नारंगी), टारट्राजिन (पीला), ब्रिलियंट ब्लू (नीला) और इंडिगोटाइन (गहरा नीला) शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन सभी में कुछ न कुछ ऐसे तत्व जरूर पाए जाते हैं जो शरीर के अलग-अलग अंगों को नुकसान पहुंचाते हैं। 

उदाहरण के लिए ब्रिलियंट ब्लू आपकी किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है तो टारट्राजिन से अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टीविटी डिसऑर्डर हो सकता है। इन सभी सिंथेटिक रंगों के नियमित उपभोग से लीवर पर असर पड़ने के साथ ही हीमोग्लोबिन और रेड ब्लड सेल भी कम हो सकते हैं।

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