वायरस छोटे परजीवी होते हैं, जिन्हें प्रजनन चक्र और प्रसार के लिए जीवित कोशिका (मनुष्य या जानवर) की आवश्यकता होती है। ऐसे बहुत से वायरस हैं जो मनुष्यों और जानवरों को संक्रमित कर सकते हैं। यह कोशिकाओं को हल्के से लेकर गंभीर नुकसान पहुंचाकर व्यक्ति को बीमार बना सकते हैं।

जिस समय से वायरस शरीर में प्रवेश करता है और जब तक लक्षण प्रकट नहीं होते हैं, तब तक यह वायरस कोशिकाओं के अंदर अपने जेनेटिक मैटेरियल (डीएनए या आरएनए) की कॉपी बनाता रहता है। ऐसे में शरीर वायरस से लड़ने के लिए विभिन्न रसायनों का उत्पादन करके प्रतिक्रिया करता है और यह रसायन कई ऐसे शुरुआती लक्षणों का कारण बन सकते हैं जो अधिकांश वायरल संक्रमणों के लक्षणों से मिलता-जुलता हो सकता है। वायरल संक्रमण के शुरुआती संकेतों और लक्षणों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं :

अधिकांश वायरल संक्रमण अपने आप ठीक हो जाते हैं और आमतौर पर लक्षणों से राहत देने वाली दवा के अलावा अन्य किसी दवा की आवश्यकता नहीं होती है। उदाहरण के लिए, बुखार होने पर पैरासिटामोल के अलावा अन्य किसी दवा की जरूरत नहीं होती है। हालांकि, कुछ मामलों में वायरल रेप्लीकेशन (अपने जेनेटिक मैटेरियल की कॉपी करना) को कम करने और वायरस के अनियंत्रित रूप से बढ़ने की वजह से विकसित होने वाली जटिलताओं को रोकने के लिए मेडिकल थेरेपी की आवश्यकता होती है।

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  1. एंटीवायरल दवा के प्रकार और उपयोग - Types of antiviral drugs in Hindi
  2. वायरल संक्रमण के खिलाफ टीकों का महत्व - Importance of vaccines against viral infections in Hindi
  3. एंटीवायरल ड्रग्स कब लेनी चाहिए - Indications for antiviral drugs in Hindi
  4. गर्भावस्था में एंटीवायरल ड्रग्स के लाभ - Antiviral drugs in pregnancy in Hindi
  5. एंटीवायरल ड्रग्स और कोविड-19 - Antiviral drugs and COVID-19 in Hindi
  6. एंटीवायरल दवाओं के साइड इफेक्ट - Side effects of common antiviral drugs in Hindi
  7. एंटीवायरल दवाओं का अंतर्विरोध - Contraindications of antiviral drugs in Hindi
  8. एंटीवायरल ड्रग्स के डॉक्टर

एंटीवायरल दवाएं शरीर की संक्रमित कोशिकाओं को ठीक करने और वायरस रेप्लिकेशन को रोकने का कार्य करती हैं। हालांकि, यह एंटीबायोटिक दवाओं की तरह कार्य नहीं करती हैं जो बैक्टीरियल इंफेक्शन के खिलाफ तो प्रभावी हैं, लेकिन यह सर्दी जुकाम जैसे वायरल इंफेक्शन के खिलाफ असरदार नहीं होती हैं। सभी एंटीवायरल दवाएं वायरस में मौजूद जेनेटिक मैटेरियल (जैसे डीएनए या आरएनए) की कॉपी करने की प्रक्रिया को रोकने का काम करती हैं, जिससे वायरस के प्रसार और संक्रमण बढ़ने के खतरे को रोका जा सकता है। जैसा कि ऊपर बताया गया है कि वायरस जिंदा रहने के लिए जीवित कोशिकाओं पर आक्रमण करते हैं और वहीं पनपते हैं। ऐसे में केवल वायरस को लक्षित करने वाली दवाई बनाना मुश्किलभरा हो सकता है। अधिकांश एंटीवायरल दवाइयां खास वायरस को लक्षित (target) करके बनाई जाती हैं और मुख्य रूप से एक विशेष प्रकार के वायरस पर असर करती हैं। हालांकि, इन सभी दवाइयों का असर एक ही सिद्धांत पर आधारित है। एंटीवायरल दवाओं के कुछ प्रकार निम्नलिखित हैं :

  • एंटी-हर्पीज वायरस : यह दवाई हर्पीज ग्रुप के वायरस के खिलाफ असर करती हैं। इसमें हर्पीज सिम्प्लेक्स वायरस (एचएसवी) 1, हर्पीज सिम्प्लेक्स वायरस 2 और वैरिसेला जोस्टर वायरस शामिल है। बता दें, एचएसवी -1 की वजह से मुंह के चारों ओर कोल्ड सोर्स हो जाते हैं, एचएसवी - 2 की वजह से जेनाइटल हर्पीज हो जाता है और वैरिसेला जोस्टर वायरस की वजह से चिकनपॉक्स और दाद की समस्या हो सकती है। सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले एंटी-हर्पीज ड्रग्स में एसीक्लोविर शामिल है। यह दवा एक विशेष एंजाइम के साथ मिलकर काम करती है जो डीएनए संश्लेषण को रोकता है और प्रभावी रूप से वायरल संक्रमण को समाप्त करता है।
    संक्रमित हिस्से के आधार पर एसीक्लोविर का निर्धारण किया जाता है। इसे कई रूपों में लिया जा सकता है, जैसे इसे मौखिक रूप से ली जाने वाली गोलियों, आंख में डाली जाने वाली दवा और त्वचा पर लगाई जाने वाली मलहम के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। साइड इफेक्ट्स के रूप में जलन, सिरदर्द, मतली, ब्लड प्रेशर और मूत्र उत्पादन में कमी जैसी समस्या हो सकती है। इसके अलावा कंपकपी, मतिभ्रम और भटकाव जैसी समस्या भी दुर्लभ रूप से देखी जा सकती है।
  • एंटी-इन्फ्लूएंजा वायरस : ये विशेष रूप से फ्लू पैदा करने वाले (इन्फ्लूएंजा) वायरस पर काम करती है। यह इन्फ्लूएंजा वायरस के अलग-अलग स्ट्रेन के खिलाफ प्रभावी है। बता दें, वायरस स्ट्रेन का मतलब ऐसे वायरस से है जो एक ही प्रजाति के होते हैं, लेकिन स्थिरता और जैविक लक्षणों के मामलों में अलग-अलग होते हैं।
    ज्यादातर वायरल फ्लू इंफेक्शन 'सेल्फ लिमिटिंग' (जो अपने आप ठीक हो जाते) होते हैं। कुछ मामलों में जैसे एच1एन1 (जिसकी वजह से स्वाइन फ्लू होता है) और एच5एन1 (जिसकी वजह से बर्ड फ्लू होता है), ओसेल्टामीविर (टैमीफ्लू) जैसी दवाओं की आवश्यकता होती है। ओसेल्टामाइविर एक कैप्सूल है जो कि वायरल एंजाइम को रोकने का काम करता है। हालांकि, हर साल इस एंजाइम में उत्परिवर्तन (इसकी जेनेटिक मैटेरियल में बदलाव) होता है और इस वायरस पर दवा का कोई खास असर नहीं होता है। ऐसे मामलों में जेनेमीविर (zanamivir) जैसी दवा लेने पर विचार किया जा सकता है, यह पाउडर के रूप में होती है जो सांस के जरिए ली जाती है। फ्लू के खिलाफ सबसे प्रभावी दवा ओसेल्टामीविर है, इसे टैबलेट के रूप में मौखिक तौर पर लिया जाता है। यदि इसका सेवन समय पर किया जाए, तो संक्रमण से बचा जा सकता है। इसके दुष्प्रभाव में पेट दर्द, मतली, दस्त, बहुत तेज नींद आना और स्वाद में बदलाव आदि शामिल हैं। (और पढ़ें - दस्त की आयुर्वेदिक दवा)
  • एंटी-हेपेटाइटिस ड्रग्स : ये दवाइयां हेपेटाइटिस या लिवर इंफेक्शन से निपटने के लिए बनाई गई थी। हेपेटाइटिस वायरस के अलावा कई अन्य विभिन्न कारणों से भी हो सकता है। वायरल हेपेटाइटिस आमतौर पर हेपेटाइटिस ए वायरस (एचएवी), हेपेटाइटिस बी वायरस (एचबीवी), हेपेटाइटिस सी वायरस (एचसीवी) और हेपेटाइटिस ई वायरस (एचईवी) के कारण होता है। हेपेटाइटिस ए और ई वायरस दूषित भोजन व पानी का सेवन करने से शरीर में प्रवेश करता है और अल्पकालिक (थोड़े समय के लिए) संक्रमण का कारण बनता है, जो अपने आप ही ठीक हो सकता है। हेपेटाइटिस बी और सी खून के माध्यम से प्रेषित होता है और दीर्घकालिक (लंबे समय के लिए) संक्रमण का कारण बनता है, यह रोगी के जीवन को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है।
    यदि खून में वायरल की वजह से ज्यादा इंफेक्शन हो चुका है तो ऐसे में तत्काल राइबावायरिन कैप्सूल (हेपेटाइटिस सी विशिष्ट) जैसी मौखिक दवाओं के साथ इंटरफेरॉन इंजेक्शन दिया जाता है। हालांकि, कुछ एंटी-एचआईवी दवाओं का उपयोग वायरल हेपेटाइटिस में भी किया जाता है। इंटरफेरॉन इंजेक्शन के साइड इफेक्ट्स में थायराइड ग्रंथि में असामान्यता, फ्लू जैसे लक्षण, कंपकपी, अवसाद और लो बीपी शामिल हैं।
  • एंटी-एचआईवी ड्रग्स : एंटी-एचआईवी या एंटीरेट्रोवायरल ड्रग्स का उपयोग एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) के दौरान किया जाता है, जो एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों में एड्स के खिलाफ काम करता है। ट्रिपल-ड्रग ट्रीटमेंट (तीन दवाओं का संयोजन) प्लान के लिए दवाओं के तीन मुख्य वर्गों का उपयोग किया जाता है। इस ट्रीटमेंट को आजीवन जारी रखा जाता है, लेकिन अगर वायरल लोड (यानी वायरस की मात्रा बढ़ जाना) को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं किया जा रहा है तो दवाओं के संयोजन में बदलाव किया जा सकता है। (और पढ़ें - वायरल लोड टेस्ट क्या है)
    आमतौर पर, शुरुआती ट्रीटमेंट के रूप में, दो न्यूक्लियोसाइड रिवर्स ट्रांसक्रिपटेस इनहिबिटर (NRTIs) जैसे कि जिदोवुडीन (Zidovudine) और लैमिवुडिन (Lamivudine) के संयोजन को नॉन-न्यूक्लियोसाइड रिवर्स ट्रांसक्रिपटेस इनहिबिटर (NNRTI) या तो नेविरापीन (Nevirapine) या एफवीरेन्ज (Efavirenz) के साथ दिया जाता है। एनएनआरटीआई एचआईवी इंफेक्शन और एड्स को ठीक करने में इस्तेमाल की जाने वाली दवा है। हालांकि कुछ मामलों में इसका इस्तेमाल हेपेटाइटिस बी के इलाज के लिए भी किया जाता है।
    यदि खून में वायरस की मात्रा कम नहीं होती है, तो एनएनआरटीआई दवाइयों में बदलाव किए जा सकते हैं और प्रोटीज इनहिबिटर दवाई (protease inhibitor) जैसे कि लोपिनविर (Lopinavir) के साथ रिटोनविर (Ritonavir) लेने का सुझाव दिया जा सकता है। बता दें, प्रोटीज इनहिबिटर का भी इस्तेमाल मुख्य रूप से एचआईवी के ट्रीटमेंट में किया जाता है।

(और पढ़ें - हर्पीज सिम्पलेक्स वायरस टेस्ट क्या है)

वायरस मानव शरीर की कोशिकाओं पर आक्रमण कर सकते हैं और इनकी वजह से व्यक्ति संक्रमित व बीमार हो सकता है। वायरस की रेप्लीकेशन की जांच करने के लिए एंटीवायरल दवाइयों का उपयोग किया जाता है। हालांकि, इलाज से बेहतर बचाव माना जाता है। फिलहाल, वायरस की मात्रा बढ़ने पर ऐसी वैक्सीन दी जाती है, जिसमें या तो कुछ मात्रा में इनैक्टिवेटेड या ऐटेन्यूटेड (attenuated) वायरस होते हैं, जो व्यक्ति में इम्युनिटी को मजबूत करते हैं, इससे आगे होने वाले किसी जानलेवा संक्रमण से बचने में मदद मिलती है। हालांकि, सामान्य वायरल रोग जैसे पोलियो, खसरा, रूबेला, हेपेटाइटिस, इन्फ्लूएंजा, चिकनपॉक्स या दाद के खिलाफ टीकाकरण उपलब्ध है।

(और पढ़ें - दाद का होम्योपैथिक इलाज)

इन्फ्लुएंजा : फ्लू के ज्यादातर मामले सिम्टोमेटिक ट्रीटमेंट (ऐसी थेरेपी जो लक्षणों को प्रभावित करती है, न कि अंतर्निहित कारण को) और मरीज के आराम करने से ठी​क हो जाते हैं, लेकिन निम्नलिखित मामलों या स्थितियों में दवा करना आवश्यक होता है :

  • 2 साल या उससे कम उम्र के बच्चे
  • 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र लोग
  • गर्भवती महिलाएं
  • प्रसवोत्तर महिलाएं (बच्चे की डिलीवरी के 2 सप्ताह बाद)
  • जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो (एचआईवी पॉजिटिव, कैंसर से ग्रस्त व इसके लिए उपचार लेने वाले)
  • गंभीर बीमारी से ग्रस्त (जैसे हृदय रोग आदि)
  • 19 वर्ष से कम आयु और लंबे समय से एस्पिरिन लेने वाले व्यक्ति
  • मोटापे से ग्रस्त (और पढ़ें - मोटापा कम करने के लिए क्या खाना चाहिए)
  • वृद्धाश्रम या नर्सिंग होम में रहने वाले व्यक्ति

वायरल हेपेटाइटिस : क्रोनिक वायरल हेपेटाइटिस (हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी) वाले सभी लोगों में लिवर रोग नहीं होता है और ना ही दवाओं की आवश्यकता होती है, लेकिन लिवर कैंसर (हेपाटोसेलुलर कार्सिनोमा / हेपाटोमा) का जोखिम रहता है। एंटीवायरल दवाएं निम्नलिखित स्थितियों में शुरू की जा सकती हैं :

  • लिवर फंक्शन टेस्ट रिपोर्ट में यह पता चले कि लिवर एंजाइम और एएलटी (एलानिन एमिनोट्रांस्फरेज) का स्तर बढ़ा हुआ है।
  • खून में वायरल एचबीवी डीएनए जरूरत से ज्यादा होने पर
  • लिवर बायोप्सी या फाइब्रोस्कैन सिरोसिस (लिवर रोग में बदलाव) के लक्षण दिखने पर
  • एहतियाती तौर पर वायरल हेपेटाइटिस से संबंधित रोगियों में लिवर ट्रांसप्लांट (दोबारा होने से रोकने के लिए) होना

एचआईवी-एड्स : निदान होते ही एचआईवी का इलाज शुरू कर देना चाहिए। व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य की स्थिति और खून में वायरस की मात्रा से कोई फर्क नहीं पड़ता, रोगियों को आजीवन दैनिक रूप से कई दवाइयों का संयोजन लेने वाले उपाय की आवश्यकता होती है। एचआईवी वायरस मानव आनुवंशिक कोशिकाओं के साथ अपने आनुवंशिक पदार्थ को एकीकृत करता है। इसलिए, इसे खत्म नहीं किया जा सकता है, लेकिन उपचार के तौर पर सबसे अच्छी रणनीति वो होगी यदि आप प्रतिरक्षा प्रणाली को टूटने से रोकने के लिए और वायरस की मात्रा को कम करने के लिए उचित दवाओं का सेवन करें। इसके लिए आपको डॉक्टर से परामर्श करने की आवश्यकता होगी।

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गर्भावस्था के दौरान बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य के लिए महिला की प्रतिरक्षा, हृदय और श्वसन प्रणाली में कुछ जरूरी बदलाव होते हैं। इससे मां की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है और वह इन्फ्लूएंजा जैसे वायरल संक्रमणों की चपेट में आ सकती है। इसलिए, इन्फ्लूएंजा वायरस से होने वाले संक्रमण का संदेह होते ही फ्लू का ट्रीटमेंट (48 घंटों के भीतर) तुरंत शुरू कर देने की सलाह दी जाती है। चूंकि प्रसव के बाद दो हफ्तों तक महिला की प्रतिरक्षा प्रणाली पूरी तरह से ठीक नहीं होती है, इस दौरान कई उपायों की आवश्यकता होती है। इस स्थिति में ओसेल्टामीविर टैबलेट और जेनेमीविर इनहेलेशन पाउडर का उपयोग सुरक्षित माना जाता है और व्यापक रूप से इसका इस्तेमाल किया जाता है।

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ऐसी मां जो हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव हैं और जिनमें वायरस की मात्रा बहुत अधिक है, उन्हें बच्चे को संक्रमण से बचाने के लिए तीसरी तिमाही में एंटीवायरल ट्रीटमेंट दिया जाना चाहिए। यदि वे पहले से ही चिकित्सा प्राप्त कर रही हैं, तो उन्हें टेनोफोविर नामक दवा दी जा सकती है, जो गर्भावस्था में क्रोनिक वायरल हेपेटाइटिस के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाती है। बच्चे को जन्म के 12 घंटे के भीतर हेपेटाइटिस बी इम्युनोग्लोबुलिन (HBIG) के साथ हेपेटाइटिस बी का टीका लगाया जाना चाहिए। प्रसव के बाद के छह महीनों में हेपेटाइटिस बी वायरस मां में सक्रिय हो सकता है। इसलिए, लिवर एंजाइम के स्तर की जांच करने के लिए लिवर फंक्शन टेस्ट को नियमित रूप से कराना चाहिए।

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कोविड-19 के इलाज के लिए एफडीए (यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) द्वारा मान्यताप्राप्त एकमात्र एंटीवायरल दवा, रेमडेसीविर है। एफडीए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन, आइवरमेक्टिन, एजिथ्रोमाइसिन और लोपिनवीर जैसी दवाओं का इस्तेमाल न करने की सलाह देता है। रेमडेसिविर का मूल रूप से इस्तेमाल एंटी-एचआईवी ड्रग के रूप में किया जाता है। इसके अलावा यह वायरल रेप्लीकेशन को रोकने का भी कार्य करता है। इसलिए सीओवीआईडी 19 के उपचार में इस दवा का उपयोग किया जाता है, ताकि लक्षणों को गंभीर होने से रोका जा सके।

इस दवा के सुरक्षात्मक प्रभाव का अब भी विश्व स्तर पर मूल्यांकन किया जा रहा है, इसे संभावित हेपेटोटॉक्सिक ड्रग (लिवर के लिए हानिकारक) माना जाता है। यही वजह है कि गर्भवती महिलाओं को इस दवा का सेवन न करने की सलाह दी जाती है। चूंकि कोरोना वायरस महामारी एक उभरती हुई स्थिति है, इसलिए दवा के साइड इफेक्ट और सुरक्षात्मक प्रभावों के बारे में अभी तक पर्याप्त अध्ययन नहीं हुए हैं।

(और पढ़ें - एचआईवी टेस्ट क्या होता है)

एंटी हर्पीज ड्रग्स : एसीक्लोविर लिवर एंजाइम में बढ़ोतरी
मूत्र उत्पादन में कमी और किडनी स्टोन का कारण बन सकता है (इस स्थिति को पर्याप्त पानी के सेवन और उचित दवाओं की मदद से रोका जा सकता है)
पाचन तंत्र की समस्याएं : मतली, पेट दर्द
बाल झड़ना
त्वचा पर पिन और सुइयों का चुभन महसूस होना
व्याकुल होना
मांसपेशियों में दर्द
सिरदर्द
एंटी-इन्फ्लुएंजा ड्रग्स : ओसेल्टामीविर और जेनेमीविर

ऊपरी श्वसन पथ के संक्रमण (URTI): गले में खराश, छींकना, बंद नाक, सांस लेने में तकलीफ आदि
पाचन तंत्र की समस्याएं : मतली, उल्टी, सूजन
सिरदर्द
स्वाद बदल जाना
अधिक लार आना
चेहरे की सूजन
तेज या अनियमित दिल की धड़कन
कर्कश आवाज
असामान्य रूप से वजन कम होना
आंखों से बहुत अधिक आंसू आना (खासकर बच्चों में)
नींद न आना
त्वचा पीली होना

एंटी-हेपेटाइटिस ड्रग्स : इंटरफेरॉन-अल्फा फ्लू जैसे लक्षण जैसे बुखार, बदन दर्द, सिरदर्द, ठंड लगना और भूख कम लगना
बोन मैरो सप्रेशन : रक्त कोशिकाओं के उत्पादन में कमी होने से एनीमिया, संक्रमण (श्वेत रक्त कोशिका की गिनती में कमी के कारण) और ब्लीडिंग (प्लेटलेट्स कम होने के कारण) का खतरा बढ़ता है। (और पढ़ें - प्लेटलेट्स बढ़ाने के घरेलू उपाय)
कंपकपी, दौरे
अवसाद
बाल झड़ना
मतली और उल्टी
मांसपेशियों में दर्द
एंटी-हेपेटाइटिस ड्रग्स : रिबाविरिन (हेपेटाइटिस सी में इस्तेमाल होने वाली) टेराटोजेनिक ड्रग्स (गर्भावस्था में लिए जाने पर बच्चे को नुकसान पहुंचा सकता है)
हेमोलिटिक एनीमिया (लाल रक्त कोशिकाओं का टूटना और उनमें कमी आना) सेडेशन, चक्कर आना
मतली, उल्टी
दस्त
सुनने में दिक्कत
बदला हुआ स्वाद
वजन में कमी / वजन बढ़ना
धुंधला दिखना
एंटी-रेट्रोवायरल (एंटी-एचआईवी ड्रग्स): लामिवुडिन समसामयिक पाचन तंत्र की समस्याएं : मतली, पेट दर्द, भूख में कमी
सिरदर्द
थकान
चकत्ते
एंटी-रेट्रोवायरल दवा : जिदोवुडिन खून की कमी
न्यूट्रोपेनिया (सफेद रक्त कोशिकाओं में कमी)
सिरदर्द
एंटीरेट्रोवायरल ड्रग्स : नेविरापीन एफवीरेंज हेपेटोटॉक्सिक (लिवर को नुकसान पहुंचा सकती है)
कोविड-19 दवा : रेमेडेसीविर  संभावित हेपेटोटॉक्सिसिटी
गर्भावस्था में परहेज (इस दवा के सुरक्षात्मक प्रभाव का अब भी अध्ययन किया जा रहा है)

ऐसीक्लोविर

किडनी फेलियर
दवा के प्रति अतिसंवेदनशीलता (एलर्जी)
एचआईवी / एड्स के मरीजों की तरह प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होना

ओसेल्टामीविर

क्रोनिक किडनी डिजीज
आत्महत्या करने जैसे विचार आना
इस दवा के प्रति गंभीर एलर्जी

इंटरफेरॉन अल्फा

थायरॉयड ग्रंथि का अतिसक्रिय होना
डायबिटीज
स्व-प्रतिरक्षित रोग
डिप्रेशन
आत्महत्या करने जैसे विचार आना

रिबावेरिन

गर्भावस्था
हृदय रोग का अस्थिर होना
दवा के प्रति एलर्जी
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संदर्भ

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