myUpchar प्लस+ के साथ पूरेे परिवार के हेल्थ खर्च पर भारी बचत

फाइले‍रिया एक संक्रमित रोग है जो परजीवी गोलकृमि (राउंडवर्म) के कारण होता है। वैसे तो ये बीमारी ज्‍यादा खतरनाक नहीं है लेकिन इसके कारण कई गंभीर स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं हो सकती है। ये बीमारी उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ज्‍यादा होती है।

फाइलेरिया संक्रमण की बीमारी हाथीपांव का रूप ले सकती है जिसमें बाहरी जननांग, हाथ या पांव या शरीर के किसी भी अंग का आकार बढ़ने लगता है। ये रोग एक या दो नेमाटोड्स (सूत्रकृमि या गोलकृमि) के कारण हो सकता है एवं इसे वुचेरेरिया बैनक्रॉफ्टी और ब्रुगिया मलाई के नाम से जाना जाता है।

परजीवी त्वचा में अपने आप या मच्छर के काटने पर घुस सकते हैं। फाइलेरिया के शुरुआती चरण में सिरदर्द, ठंड लगना, बुखार और त्‍वचा पर घाव जैसे लक्षण सामने आते हैं। इस रोग की शुरुआत में कभी-कभी किसी व्‍यक्‍ति पर कोई भी लक्षण देखने को नहीं मिलता है।  

(और पढ़ें - मच्छर के काटने से होने वाली बीमारियां)  

अगर फाइलेरिया का समय पर इलाज न किया जाए तो इस रोग के बढ़ने का खतरा रहता है एवं इसमें पैरों में सूजन, (हाथीपांव), बाहरी जननांगों या शरीर के अन्‍य हिस्‍सों में सूजन और लसीका के प्रवाह में रुकावट उत्‍पन्‍न होती है।

आयुर्वेद में फाइलेरिया के इलाज के लिए विभिन्‍न परजीवी रोधी और कृमिरोधी जड़ी बूटियों का उल्‍लेख मिलता है। इन जड़ी बूटियों में कुटज (कुड़ची), विडंग (फॉल्‍स काली मिर्च), हरीतकी (हरड़), गुडुची (गिलोय), मंजिष्‍ठा शामिल है।

कुछ हर्बल मिश्रण जैसे कि नित्‍यानंद रस और सप्‍तांग गुग्‍गुल फाइलेरिया के इलाज में असरकारी हैं। इसके अलावा कुछ चिकित्‍साएं जैसे कि गर्म लेप (शरीर के प्रभावित हिस्‍से पर औषधि लगाना) और वमन (औषधियों से उल्‍टी करवाने की विधि) फाइलेरिया के लक्षणों में सुधार लाने में प्रभावकारी है।

फाइलेरिया के विशेष उपचार के साथ आयुर्वेद में आहार में जरूरी बदलाव और विशेषत: बुखार में पर्याप्‍त आराम करने की सलाह दी गई है।

  1. आयुर्वेद के दृष्टिकोण से फाइलेरिया - Ayurveda ke anusar Filaria
  2. फाइलेरिया का आयुर्वेदिक इलाज - Filaria ka ayurvedic ilaj
  3. फाइलेरिया की आयुर्वेदिक दवा, जड़ी बूटी और औषधि - Filaria ki ayurvedic dawa aur aushadhi
  4. आयुर्वेद के अनुसार फाइलेरिया होने पर क्या करें और क्या न करें - Ayurved ke anusar Filariasis me kya kare kya na kare
  5. फाइलेरिया के लिए आयुर्वेदिक दवा कितनी लाभदायक है - Filaria ka ayurvedic upchar kitna labhkari hai
  6. फाइलेरिया की आयुर्वेदिक औषधि के नुकसान - Filariasis ki ayurvedic dawa ke side effects
  7. फाइलेरिया की आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट से जुड़े अन्य सुझाव - Filaria ke ayurvedic ilaj se jude anya sujhav
  8. फाइलेरिया की आयुर्वेदिक दवा और इलाज के डॉक्टर

आयुर्वेद में फाइलेरिया को श्लीपद कहा गया है और इसका एक ऐसे रोग के रूप वर्णन किया गया है जो ऊतकों में परजीवियों के संक्रमण के कारण होता है। यह बीमारी आमतौर पर पानी और स्थिर जल निकायों वाले स्थानों में होती है।

श्लीपद में होने वाली सूजन का कारण कफ बढ़ाने वाले आहार और जीवनशैली से संबंधित गलत आदतों को माना जाता है। कफ दोष के साथ मम्‍सा (मांसपेशियों) और रक्ता (रक्‍त) धातु का उलझना भी पिंडली एवं पैर के निचले हिस्‍से में सूजन का अन्‍य कारण है जोकि फाइलेरिया में अधिक देखने को मिलता है।

सूजन पैर के सामने वाले हिस्‍से से शुरु होकर धीरे-धीरे कूल्‍हों, पैरों, गर्दन, नाक और कानों तक पहुंचने लगती है। इसमें कभी-कभी बुखार और तेज दर्द भी होता है एवं यह लक्षण सूजन के होने से पहले भी महसूस हो सकते हैं।

ठोस एडिमा के कारण पैर और पंजा किसी पत्‍थर की तरह सख्‍त हो जाता है एवं यह हाथों और अंडकोष की थैली को भी प्रभावित कर सकता है। रोग के बढ़ने के साथ-साथ त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) में भी असंतुलन देखा जाता है।

(और पढ़ें - वात, पित्त और कफ में असंतुलन के लक्षण)

  • वात दोष के खराब होने पर त्‍वचा और श्लेष्मा झिल्लियों पर अल्‍सर होने लगते हैं, इसके साथ ही बहुत तेज दर्द और बुखार भी रहता है।
  • पित्त दोष के खराब होने पर सूजन वाला हिस्‍सा बहुत मुलायम हो जाता है और इसमें जलन महसूस होती है।
  • कफ दोष के खराब होने के कारण हुए फाइलेरिया में सूजन वाला हिस्‍सा सफेद, सख्‍त और चिकना हो जाता है।  

(और पढ़ें - सूजन कम करने के लिए क्या करें)  

  • वमन
    • वमन एक ऐसा उपचार है जिसमें शरीर से कफ दोष को साफ किया जाता है।
    • ये जठरांत्र मार्ग को साफ और अमा (विषाक्‍त पदार्थ) एवं नाडियों से बलगम को हटाता है।
    • अतिरिक्‍त कफ दोष के कारण हुए विकारों या कफ दोष प्रधान रोगों जैसे कि फाइलेरिया के इलाज में वमन चिकित्सा का प्रयोग किया जाता है।
    • कुटज जैसी जड़ी बूटियों का इस्‍तेमाल वमन (उल्‍टी) करवाने के लिए किया जाता है। इसके बाद उल्‍टी लाने वाली जड़ी बूटियों के प्रभाव को बढ़ाने के लिए पिप्‍पली, काला नमक जैसी जड़ी बूटियां और गर्म पानी दिया जाता है।
    • इस प्रक्रिया के बाद मरीज़ को आराम करने, ज्‍यादा बात और चिंता न करने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा हल्‍का भोजन या तरल खाद्य पदार्थ ही लेने की सलाह दी जाती है।
    • वमन थेरेपी के सफल होने पर मरीज़ को आराम और सहज महसूस होता है एवं इससे पाचन के साथ बीमारी के लक्षणों तथा असहजता में भी सुधार देखने को मिलता है। (और पढ़ें - पाचन शक्ति बढ़ाने के उपाय
       
  • लेप
    • लेप विधि में औषधीय गुणों से युक्‍त विभिन्‍न जड़ी बूटियों से गाढ़ा पेस्‍ट तैयार किया जाता है जिसमें घी या तेल भी मिला होता है। इसे मरीज़ के शरीर के प्रभावित हिस्‍से या पूरे शरीर पर लगाया जाता है। ये उपचार इंफ्लामेट्री सूजन और अधिक कफ (फाइलेरिया का कारण) को हटाने में उपयोगी है। (और पढ़ें - घी के गुण खाने में ही नहीं लगाने में हैं
    • कल्‍क (पत्तियों के रस या पेस्‍ट से तैयार) से बने गर्म लेप से भी फाइलेरिया का उपचार हो सकता है। इस कल्‍क को धतूरा, एरंड और निर्गुण्डी, सहजन की छाल और श्वेत पुनर्नवा को सरसों के तेल में मिलाकर तैयार किया जाता है। इसके बाद गर्म लेप को प्रभावित हिस्‍से पर लगाया जाता है। (और पढ़ें - एरण्ड तेल के फायदे

फाइलेरिया के लिए आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां

  • गुडुची
    • औषधीय गुणों के कारण आयुर्वेदिक और पारंपरिक दवाओं में इस जड़ी बूटी का अधिक इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • गुडुची में एल्केलाइड, लैक्‍टोंस और ग्‍लाइकोसिड्स मौजूद होते हैं जोकि इसे कई रोगों जैसे कि आर्थराइटिस, स्‍ट्रेस, एलर्जी आदि में उपयोगी बनाते हैं।
    • सूजनरोधी, ज्वरहर (बुखार कम करने वाले) और संक्रमणरोधी गुणों के कारण ये फाइलेरिया के इलाज में मदद करती है। (और पढ़ें - बुखार कम करने के तरीके)  
       
  • कुटज
    • पूरे भारत में बड़ी मात्रा में ये जड़ी बूटी पाई जाती है। बीज या छाल के पाउडर, क्‍वाथ (काढ़े), वटी (गोली) या आहार पूरक (सप्‍लीमेंट) के रूप में इसका इस्‍तेमाल कर सकते हैं।
    • डायबिटीज, दस्‍त और ऑक्‍सीकरण (एंटीऑक्सीडेंट) को रोकने वाले गुणों के लिए कुटज को जाना जाता है। (और पढ़ें - एंटीऑक्सीडेंट के फायदे)  
    • फाइलेरिया के इलाज में वमन चिकित्‍सा के दौरान उल्‍टी लाने के लिए इस जड़ी बूटी का इस्‍तेमाल किया जाता है।
       
  • विडंग
    • पारंपरिक औषधियों में प्राचीन समय से ही विंडग का प्रयोग होता आ रहा है एवं आयुर्वेद में शक्‍तिवर्द्धक के रूप में बड़ी मात्रा में इसका इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • आप विडंग का आसव (जड़ी बूटी की पत्तियों को तरल में डुबोकर तैयार किया गया) और अरिष्‍ट (हर्बल वाइन), चूर्ण (पाउडर), लौह (लौह से तैयार) एवं तेल के रूप में इस्‍तेमाल कर सकते हैं।
    • फाइलेरिया में विडंग को विशेष तौर पर उल्‍टी लाने, सूजनरोधी और कृमिनाशक गुणों के कारण इस्‍तेमाल किया जाता है।
       
  • मंजिष्‍ठा
    • यह जड़ी-बूटी मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिम हिमालय, नीलगिरि पर्वत और भारत के अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।
    • इस जड़ी बूटी को रक्‍त शोधक (खून साफ करने वाली) के रूप में जाना जाता है। आयुर्वेदिक औषधियों में इस जड़ी बूटी की जड़ को काढ़े, पेस्‍ट, पाउडर या घी के रूप में ले सकते हैं। (और पढ़ें - खून को साफ करने वाले आहार)  
    • मंजिष्‍ठा कफ विकार जैसे कि फाइलेरिया के कारण हुई सूजन के इलाज में असरकारी है।
       
  • हरीतकी
    • हरीतकी पाचन तंत्र, तंत्रिका, श्‍वसन और स्‍त्री प्रजनन प्रणाली से संबंधित रोगों के इलाज में मदद करती है।
    • ये ऊर्जादायक, शक्‍तिवर्द्धक और रेचक (मल क्रिया को नियंत्रित करने वाले) एजेंट के रूप में कार्य करती है।
    • कृमिनाशक गुणों के कारण हरीतकी शरीर से फाइलेरिया के कीड़ों को बाहर निकालने में असरकारी है।
    • हरीतकी के फल के छिलके से बना चूर्ण, अरंडी के तेल में तली हुई हरीतकी गर्म पानी या दूध के साथ दिन में दो बार लेना फाइलेरिया के इलाज में लाभकारी पाई गई है।

फाइलेरिया के लिए आयुर्वेदिक औषधियां

  • सप्‍तांग गुग्‍गुल
    • इस मिश्रण का इस्‍तेमाल प्रमुख तौर पर वटी के रूप में किया जाता है और इसमें मूल सामग्री के रूप में गुग्‍गुल मौजूद है।
    • इसमें त्रिफला (आमलकी, विभीतकी और हरीतकी का मिश्रण) और त्रिकटु (तीन कषाय – पिप्‍पली, शुंथि [सूखी अदरक], एवं मारीच (काली मिर्च) भी मौजूद है।
    • सप्‍तांग गुग्‍गुल की रोज लगभग 500 मि.ग्रा की खुराक ली जाती है और इसके सूजनरोधी प्रभाव फाइलेरिया के मरीज़ों में सूजन को कम करने में लाभकारी हैं।
       
  • नित्‍यानंद रस
    • नित्‍यानंद रस वटी के रूप में उपलब्‍ध एक यौगिक मिश्रण है।
    • इसमें प्रमुख सामग्री के रूप में हरीतकी मौजूद है।
    • ये औषधि फाइलेरिया के प्रमुख लक्षणों में शामिल लिंफोएडिमा, बदन दर्द और असहजता (छूने पर दर्द) को कम करने में मदद करती है।
    • फाइलेरिया में होने वाले बुखार और ठंड लगने की समस्‍या को भी इस औषधि से ठीक किया जा सकता है।

व्‍यक्‍ति की प्रकृति और कई कारणों के आधार पर चिकित्‍सा पद्धति निर्धारित की जाती है इसलिए उचित औषधि और रोग के निदान हेतु आयुर्वेदिक चिकित्‍सक से परामर्श करें।

(और पढ़ें - चोट की सूजन का इलाज)

क्‍या करें

क्‍या न करें

  • कंद वाली सब्जियां जैसे कि आलू न खाएं।
  • दूध और दूध से बने उत्‍पाद, दही, गुड़, खाद्य पदार्थों या द्रव्‍य (औषधियों) के साथ गुरु (भारी), अभिष्यंदी (रेचक) और पिष्टमय (बारीक पिसे हुए आटे से युक्‍त) गुण वाले खाद्य पदार्थों से दूर रहें। फाइलेरिया के मरीज़ों के लिए ये हानिकारक होते हैं।

(और पढ़ें - स्वस्थ जीवन के लिए लाभदायक भोजन)  

चिकत्‍सकीय अध्‍ययन में ये बात साबित हो चुकी है कि नित्‍यानंद रस का नियमित इस्‍तेमाल लिंफोएडिमा,फाइलेरिया से जुड़े दर्द और असहजता (छूने पर दर्द होना) में असरकारी है। ये बुखार और कंपकंपी को भी कम करती है।

अमेरिकी जरनल ऑफ एथनोमेडिसिन में प्रकाशित हुए एक अध्‍ययन के अनुसार मंजिष्‍ठा से बनी पॉलीहर्बल (दो या अनेक जड़ी बूटियों से बनी) पुल्टिस फाइलेरिया के इलाज में बहुत असरकारी है। इस पॉलीहर्बल पुल्टिस में प्रमुख सामग्रियों में से एक मंजिष्‍ठा है। बांग्‍लादेश में फाइलेरिया इलाज के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

हालांकि, इसके प्रभाव और कार्य की जांच के लिए अभी और अध्‍ययन किए जाने की जरूरत है लेकिन फिर भी इसके प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है।

(और पढ़ें - नसों में सूजन के लक्षण)  

वैसे तो आयुर्वेदिक उपचार और हर्बल औषधियों के कोई हानिकारक प्रभाव नहीं होते हैं लेकिन इनके इस्‍तेमाल से पहले कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। जैसे कि:

  • बहुत ज्‍यादा ठंड लगने या वात दोष के बढ़ने की स्थिति में मंजिष्‍ठा के इस्‍तेमाल से बचना चाहिए क्‍योंकि इस जड़ी बूटी को वात दोष बढ़ाने के लिए जाना जाता है।
  • अधिक मात्रा या लंबे समय तक कुटज के इस्‍तेमाल के कारण हाइपरग्‍लाइसेमिया और हेपटोटोक्सिसिटी (लिवर को नुकसान) की समस्‍या हो सकती है। (और पढ़ें - लिवर रोग के कारण)  
  • गर्भवती महिलाओं, अत्‍यधिक वात विकार से ग्रस्‍त, पतले वृद्ध व्‍यक्‍ति या बच्‍चों और ह्रदय से संबंधित रोगों तथा हाइपरटेंशन से पीडित व्‍यक्‍ति को वमन चिकित्‍सा नहीं लेनी चाहिए। कमजोरी, बढ़े हुए प्‍लीहा, पेट फूलने, अंधापन या यूरिनरी रिटेंशन (मूत्राशय का पूरी तरह से खाली न हो पाना) से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को भी वमन चिकित्‍सा नहीं देनी चाहिए। अकेले कफ दोष में असंतुलन होने या कफ दोष प्रधान रोगों के इलाज में वमन चिकित्‍सा दे सकते हैं लेकिन पित्त या वात दोष के बढ़ने पर वमन कर्म नहीं किया जाना चाहिए। (और पढ़ें - मोटा होने के लिए क्या खाना चाहिए)  
  • किसी भी रोग के इलाज एवं लक्षणों से राहत पाने के लिए चिकित्‍सक की सलाह पर ही उचित खुराक में औषधीय जड़ी बूटियों का सेवन करना चाहिए। आयुर्वेदिक चिकित्‍सक व्‍यक्‍ति की प्रकृति और रोग की पूरी तरह से जांच करने के बाद ही सही औषधि एवं इलाज निर्धारित करते हैं।

फाइलेरिया एक संक्रमित रोग है जोकि नेमाटोड्स वुचेरेरिया बैनक्रॉफ्टी और ब्रुगिया मलाई के कारण होता है। ये बीमारी व्‍यक्‍ति को न केवल शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाती है बल्कि उसे आर्थिक स्‍तर पर भी कमजोर बना देती हैं क्‍योंकि इस रोग का इलाज काफी महंगा होता है।

अगर फाइलेरिया का इलाज न किया जाए तो ये एडिमा की खतरनाक स्थिति का रूप ले लेती है जिसे हाथीपांव के नाम से जाना जाता है। फाइलेरिया के आयुर्वेदिक उपचार में लेप और वमन चिकित्सा के साथ-साथ परजीवीरोधी एवं कृमिनाशक जड़ी बूटियों तथा हर्बल मिश्रणों का इस्‍तेमाल किया जाता है।

प्रभावकारी उपचार और संपूर्ण सेहत में सुधार के लिए पर्याप्‍त आराम और आहार में जरूरी बदलाव जैसे कि ज्‍यादा से ज्‍यादा रसोनम के इस्‍तेमाल की सलाह दी जाती है।

(और पढ़ें - पौष्टिक आहार के लाभ)  

Dr. Hariom Verma

Dr. Hariom Verma

आयुर्वेदा

 Dr. Sarita Singh

Dr. Sarita Singh

आयुर्वेदा

Dr. Amit Kumar

Dr. Amit Kumar

आयुर्वेदा

और पढ़ें ...