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साइनस को दुष्ट प्रतिश्याय भी कहा जाता है। साइनस हवा से भरी छोटी-छोटी खोखली गुहा रूपी संरचनाएं हैं जो नाक के आसपास वाले हिस्‍से, गाल या माथे की हड्डी के पीछे एवं आंखों के बीच वाले हिस्‍से में पैदा होने लगती हैं।

स्‍वस्‍थ व्‍यक्‍ति में साइनस हवा से भरा होता है लेकिन अगर किसी व्‍यक्‍ति को ऊपरी श्‍वसन मार्ग में संक्रमण हो तो नासिका ऊतकों में सूजन होने लगती है जिसकी वजह से नासिका मार्ग में रुकावट उत्‍पन्‍न हो सकती है। साइनस की वजह से व्‍यक्‍ति को सिरदर्द, भारीपन, बार-बार नींद का टूटना और जठरांत्र संबंधित परेशानियां हो सकती हैं।

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साइनस के इलाज के लिए आयुर्वेदिक चिकित्‍सक प्राचीन और समग्र उपचार की सलाह देते हैं जिसमें वमन कर्म (औषधियों से उल्‍टी करवाने की विधि), नास्‍य कर्म (नासिक मार्ग से औषधि डालना) और विरेचन कर्म (मल निष्‍कासन की विधि) शामिल है।

आमतौर पर साइनस के लिए जिन जड़ी बूटियों और औषधियों की सलाह दी जाती है उनमें बिभीतकी, मारीच (काली मिर्च), उपकुंचिका (कलौंजी), अदरक, हरीद्रा (हल्‍दी), घृत (घी), वच, तुलसी, पिप्‍पली, चित्रक, हरीतकी (हरड़), व्योषादि वटी, कफकेतु रस, लक्ष्‍मीविलास रस और त्रिभुवनकीर्ति रस शामिल है।

  1. आयुर्वेद के दृष्टिकोण से साइनस - Ayurveda ke anusar sinusitis
  2. साइनस का आयुर्वेदिक इलाज - Sinus ka ayurvedic ilaj
  3. साइनस की आयुर्वेदिक दवा, जड़ी बूटी और औषधि - Sinus ki ayurvedic dawa aur aushadhi
  4. आयुर्वेद के अनुसार साइनोसाइटिस होने पर क्या करें और क्या न करें - Ayurved ke anusar sinusitis me kya kare kya na kare
  5. साइनस के लिए आयुर्वेदिक दवा कितनी लाभदायक है - Sinus ka ayurvedic upchar kitna labhkari hai
  6. साइनोसाइटिस की आयुर्वेदिक औषधि के नुकसान - Sinusitis ki ayurvedic dawa ke side effects
  7. साइनस की आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट से जुड़े अन्य सुझाव - Sinus ke ayurvedic ilaj se jude anya sujhav
  8. साइनस की आयुर्वेदिक दवा और इलाज के डॉक्टर

आयुर्वेद के अनुसार प्रमुख तौर पर कफ दोष के कारण साइनस की समस्‍या होती है। कफ के बढ़ने के कारण श्‍वसन मार्ग में मौजूद वात का उप-प्रकार प्राण वात असंतुलित हो जाता है। ये वात और पित्त दोष के असंतुलन के कारण भी हो सकता है।  

(और पढ़ें - वात पित्त कफ क्या होता है)

हालांकि, आयुर्वेदिक ग्रंथों में संक्रामक बैक्टीरिया के संपर्क में आना साइनस का प्रमुख कारण माना जाता है। भोजन से जुड़ी गलत आदतों और जीवनशैली के कारण त्रिदोष या इनमें से किसी एक दोष में असंतुलन होने लगता है जिसकी वजह से साइनस की समस्‍या पैदा होती है।

साइनस के इलाज के लिए आयुर्वेद में कई तकनीकों का इस्‍तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद में पंचकर्म थेरेपी द्वारा शरीर की सफाई, औषधियों और आहार एवं जीवनशैली में कुछ सकारात्‍मक बदलाव कर साइनस का इलाज किया जाता है। 

(और पढ़ें - स्वस्थ जीवन के लिए लाभदायक भोजन के बारे में जानें)

  • वमन कर्म
    • वमन कर्म में विभिन्‍न जड़ी बूटियों और तेलों से उल्‍टी करवाई जाती है। इससे पहले स्‍नेहन (तेल लगाने की विधि) और स्‍वेदन (पसीना निकालने की विधि) द्वारा साइनस से अतिरिक्‍त एवं खराब कफ को ढीला करके उसे पेट में लाया जाता है।
    • इसके बाद वमन कर्म द्वारा कफ को शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है और इस तरह साइनोसाइटिस के लक्षणों से राहत मिलती है।
    • वमन नाडियों और छाती से बलगम को भी साफ करता है एवं अमा (विषाक्‍त पदार्थ) को पेट से बाहर निकालता है।
    • कफ के कारण होने वाला बुखार, बहती नाक, साइनस और मोटापे को नियंत्रित करने में वमन कर्म उपयोगी है।
    • गर्भवती महिलाओं, बच्‍चों और वृद्धों को वमन का इस्‍तेमाल सावधानीपूर्वक करना चाहिए। पेट में ट्यूमर, हाई ब्‍लड प्रेशर और मूत्र प्रतिधारण (मूत्र बंद होना) की समस्‍या से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को भी वमन में सावधानी बरतनी चाहिए। (और पढ़ें - हाई ब्लड प्रेशर में क्या नहीं खाना चाहिए)
       
  • नास्‍य कर्म
    • आयुर्वेद में नाक को सिर का द्वार कहा जाता है। इसलिए गले, सिर, गर्दन और इंद्रियों से संबंधित रोगों के इलाज के लिए विभिन्‍न तरह की जड़ी बूटियों को नाक में डाला जाता है। जड़ी बूटियों के गुणों से युक्‍त तेल या तरल को नासिक गुहा में डाला जाता है और इसी क्रिया को नास्‍य कर्म कहा जाता है।
    • ये कई रोगों जैसे कि गलगुटिकाशोथ (टॉन्सिलाइटिस), माइग्रेन, साइनस और गर्दन, नाक, कान और कंधों से संबंधित विकारों के इलाज में उपयोगी है।
    • इस उपचार में विभिन्‍न प्रकार के तेलों का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन उपचार में व्‍यक्‍ति की परिस्थिति एवं रोग के आधार पर ही तेल का चयन किया जाता है। साइनस के इलाज में प्रयोग होने वाले तेलों में से एक अनु तेल भी है।
       
  • विरेचन कर्म
    • पंचकर्म थेरेपी में से एक विरेचन कर्म है। इसमें शरीर को साफ और अतिरिक्‍त दोष को बाहर निकालने के लिए व्‍यक्‍ति को सेन्‍ना तथा रूबर्ब जैसी जड़ी बूटियां खाने को दी जाती हैं। विरेचन से पहले स्‍नेहन और स्‍वेदन द्वारा साइनस से अतिरिक्‍त और खराब कफ को ढीला किया जाता है एवं उसे पेट में लाया जाता है। इसके बाद विरेचन कर्म द्वारा कफ को शरीर से बाहर निकाला जाता है।
    • पेट में ट्यूमर, बवासीर और कोलाइटिस के इलाज में विरेचन कर्म बेहतरीन उपचार है। (और पढ़ें - ट्यूमर क्या होता है)
    • ये शरीर से अतिरिक्‍त बलगम, वसा और पित्तरस को बाहर निकाल साइनस के इलाज में मदद करता है।
    • दस्‍त, गुदा में अल्‍सर, खराब पाचन और पाचन मार्ग के ब्‍लीडिंग विकारों से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को विरेचन नहीं लेना चाहिए। गर्भवती महिलाओं, वृद्ध, बच्‍चों और कमजोर व्‍यक्‍ति को विरेचन कर्म से बचना चाहिए। (और पढ़ें - पाचन क्रिया कैसे सुधारे)

साइनस के लिए आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां

  • बिभीतकी
    • बिभीतकी पाचन, श्‍वसन, तंत्रिका और उत्‍सर्जन प्रणाली पर कार्य करती है। इसमें कृमिनाशक (परजीवीरोधी), कफ निस्‍सारक (बलगम निकालने वाले), रेचक (मल त्‍याग की क्रिया को बेहतर करना), रोगाणुरोधक और ऊर्जावर्द्धक गुण मौजूद हैं।
    • ये खांसी, जुकाम, ब्रोंकाइटिस, लेरिन्जाइटिस, साइनस, सिरदर्द और आंखों से संबंधित विकारों के इलाज में उपयोगी है। गले में खराश में बिभीतकी को शहद के साथ मिलाकर लिया जा सकता है।
    • बढ़े हुए वात से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को इसका इस्‍तेमाल सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
       
  • मारीच
    • मारीच पाचन, परिसंचरण और श्‍वसन तंत्र पर कार्य करती है। इसमें उत्तेजक, कफ निस्‍सारक (बलगम निकालने वाले), वायुनाशी (पेट फूलने से राहत दिलाने वाले), बुखार कम करने वाले और कृमिनाशक गुण मौजूद हैं। (और पढ़ें - पेट फूलने के कारण)
    • ये साइनस के जमने और साइनोसाइटिस के इलाज में उपयोगी है। इसके अलावा ये अस्‍थमा, लंबे समय से अपच की समस्‍या, बुखार, गैस्ट्रिक की समस्या और गले की खराश को दूर करने में भी मदद करती है।
    • पाचन मार्ग में सूजन और बढ़े हुए पित्त दोष से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को मारीच का उपयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
       
  • उपकुंचिका
    • इसमें सूजनरोधी, दर्द निवारक, रोगाणुरोधी, कृमिनाशक और ब्रोंकाई को चौड़ा करने जैसे कई औषधीय गुण मौजूद हैं।
    • ये शरीर में वात और कफ को कम और बढ़े हुए पित्त को साफ करने का काम करती है।
    • जुकाम में धूपन (धुआं देना) के तौर पर इसका इस्‍तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिक रूप से ये साबित हो चुका है कि उपकुंचिका पुराने राइनो साइनोसाइटिस के इलाज में असरकारी है। 
       
  • अदरक
    • अदरक श्‍वसन और पाचन तंत्र पर कार्य करती है। इसमें दर्द निवारक, वायुनाशी, पाचक, सलाईवा का स्राव बढ़ाने वाले और कफ निस्‍सारक गुण मौजूद हैं।
    • इसमें अनेक औषधीय गुण मौजूद हैं जोकि इसे कई रोगों के इलाज में लाभकारी बनाते हैं। कफ प्रधान रोगों जैसे कि साइनस के इलाज में इसे शहद के साथ इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • पित्त प्रधान दोषों के इलाज में अदरक का इस्‍तेमाल सावधानीपूर्वक करना चाहिए क्‍योंकि अदरक के कारण पित्त दोष बढ़ सकता है।
       
  • हरीद्रा
    • हरीद्रा में रोगाणुनाशक, जीवाणुरोधी, सड़न रोकने वाले, एलर्जी से बचाने वाले और चिकित्‍सीय गुण मौजूद हैं।
    • ये कई तरह के कफ रोगों (जैसे साइनस) में हिस्‍टामाइन (एलर्जी के दौरान रिलीज़ होने वाला रसायन) के स्‍तर को कम करती है। ये साइनस को नियंत्रित करने में भी मदद करती है।
    • वात दोष वाले व्‍यक्‍ति में इसका प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
       
  • घृत
    • ये एक सुगंधक है जो पाचन अग्‍नि को तेज करती है।
    • एलर्जी के इलाज में इसका इस्‍तेमाल होता है। ये नासिक मार्ग में आ रही रुकावट को दूर करती है।
    • साइनस के लक्षणों को दूर करने के लिए हरीद्रा के साथ इसका इस्‍तेमाल किया जाता है।
       
  • वच
    • इसमें तेज सुगंध होती है और ये कफ निस्‍सारक और बलगम निकालने का काम करती है। सिरदर्द और जोड़ों में दर्द से राहत पाने के लिए पेस्‍ट के रूप में इसका इस्‍तेमाल किया जाता है। ये कफ साफ करती है और जुकाम, बंद नाक एवं नाक का मांस बढ़ने (पॉलिप्स) को नियंत्रित करने में मदद करती है।
    • ब्‍लीडिंग संबंधित विकारों जैसे कि बवासीर में इसका इस्‍तेमाल नहीं करना चाहिए। इसके अत्‍यधिक इस्‍तेमाल के कारण जी मितलाना, उल्‍टी, चकत्ते और अन्‍य पित्त से जुड़ी समस्‍याएं हो सकती हैं। (और पढ़ें - चकत्ते क्या है)
       
  • तुलसी
    • तुलसी म्‍यूकोलिटिक (गाढ़े बलगम को निकालने वाले), कफ निस्‍सारक, सुगंधक, रक्‍तशोधक (खून साफ करने वाले) और रोगाणुरोधक है। ये बलगम को निकालकर एलर्जिक ब्रोंकाइटिस, अस्‍थमा और साइनस का इलाज करती है इसलिए ये श्‍वसन मार्ग से जुड़ी परेशानियों के लिए उपयोगी है। (और पढ़ें - खून को साफ करने वाले आहार)
    • अत्‍यधिक पित्त वाले व्‍यक्‍ति को तुलसी का सेवन सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
       
  • पिप्‍पली
    • पिप्‍पली में दर्द निवारक और बुखार को कम करने वाले गुण मौजूद हैं। ये कफ निस्‍सारक और म्यूकोलाईटिक के रूप में कार्य कर खांसी और जुकाम से राहत दिलाती है।
    • इसकी वजह से पित्त का स्‍तर बढ़ सकता है इसलिए इसका इस्‍तेमाल सावधानीपूर्वक करना चाहिए।

साइनस के लिए आयुर्वेदिक औषधियां

  • चित्रक हरीतकी
    • पाचन तंत्र में सुधार के लिए चित्रक हरीतकी खाने को दी जाती है। ये श्‍वसन तंत्र को भी मजबूत करती है। इसमें वसाका (अडूसा), इला (इलायची), यष्टिमधु (मुलेठी) और अपामार्ग मौजूद है। ये चीज़ें सूजनरोधी, कफ निस्‍सारक और पाचन को उत्तेजित करने का काम करती हैं। इन सबको एकसाथ इस्‍तेमाल करने पर साइनस के इलाज में मदद मिलती है।
    • गर्भवती और स्‍तनपान करवाने वाली महिलाओं को इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। (और पढ़ें - स्तनपान से जुड़ी समस्याएं)
       
  • व्‍योषादि वटी
    • व्‍योषादि वटी (गोली) में सोंठ, काली मिर्च, दालचीनी, जीरा, गुड़ और पिप्‍पली मौजूद है।
    • ये कफ निस्‍सारक के तौर पर कार्य करती है। इसमें इस्‍तेमाल हुई सभी जड़ी बूटियां जुकाम और खांसी के इलाज के लिए जानी जाती हैं।
    • ये प्रतिश्याय (साइनस) को नियंत्रित करने में मदद करती है और दुष्‍ट प्रतिश्याय को रोकती है।
       
  • कफकेतु रस
    • इसमें शोधिता वत्‍सनाभ (गोमूत्र से शुद्ध करन), शोधिता टंकण (सुहागा), पिप्‍पली, शंख भस्‍म (शंख को ऑक्सीजन और वायु में उच्च तामपान पर गर्म करके तैयार हुई) और अदरक का रस मौजूद है।
    • एलर्जी और सूजन संबंधित विकारों (जैसे साइनस) के दौरान शरीर में हिस्‍टामाइन नामक रसायन रिलीज़ होता है। कफकेतु रस की प्रकृति हिस्‍टामिन रोधी (हिस्‍टामिन के प्रभाव को खत्‍म करने वाले) है और ये इंफ्लामेट्री कफ विकारों जैसे कि ब्रोंकाइल अस्‍थमा एवं साइनस को नियंत्रित करने में मदद करती है।
       
  • लक्ष्‍मीविलास रस
    • लक्ष्‍मीविलास में मौजूद विभिन्‍न आयुर्वेदिक मिश्रणों में अलग-अलग जड़ी बूटियां और सामग्रियां शामिल हैं। इनमें से कुछ सामान्य घटक अभ्रक भस्‍म, शुद्ध पारद, शुद्ध गंधक और लौह भस्‍म हैं।
    • ये शरीर से खराब कफ को साफ और खत्‍म करता है। ये प्राकृत (स्‍वस्‍थ) कफ के उत्‍पादन को बढ़ावा देता है।
    • इसलिए सिर से जुड़ कई रोगों, साइनस और अस्‍थमा के इलाज में लक्ष्‍मीविलास रस का इस्‍तेमाल किया जाता है।
       
  • त्रिभुवनकीर्ति रस
    • ये एक हर्बो-मिनरल औषधि है जिसमें कई जड़ी बूटियां और मिनरल घटक मौजूद हैं। त्रिभुवनकीर्ति रस में शुंथि (सोंठ), मारीच (पिप्‍पली), पिप्‍पलीमूल और तुलसी, धतूरा और अदरक का रस आदि है।
    • विभिन्‍न भस्‍म जैसे कि गोदंती भस्‍म, श्रृंग भस्‍म, अभ्रक भस्‍म आदि का इस्‍तेमाल त्रिभुवनकीर्ति रस के साथ किया जाता है। जिस दोष के कारण रोग हुआ है उसी के आधार पर भस्‍म का चयन किया जाता है।
    • बुखार, पसीना लाने और दर्द से राहत पाने के लिए ये उत्तम औषधि है। ये कई प्रकार के रोगों जैसे कि साइनस, माइग्रेन, इंफ्लुएंजा, लेरिन्जाइटिस, ग्रसनीशोथ (गले की नली में सूजन), निमोनिया, ब्रोंकाइटिस और टॉन्सिलाइटिस को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है।

व्‍यक्‍ति की प्रकृति और कई कारणों के आधार पर चिकित्‍सा पद्धति निर्धारित की जाती है इसलिए उचित औषधि और रोग के निदान हेतु योग्य आयुर्वेदिक चिकित्‍सक से परामर्श करें।

(और पढ़ें - कैवर्नस साइनस थ्रोम्बोसिस के लक्षण)

क्‍या करें

क्‍या न खाएं

त्रिभुवनकीर्ति रस के प्रभाव की जांच के लिए एक चिकित्‍सीय अध्‍ययन किया गया था। इस अध्‍ययन में लंबे समय से साइनस की समस्‍या से ग्रस्‍त 30 प्रतिभागियों को रोज़ दिन में दो बार 250 मि.ग्रा त्रिभुवनकीर्त‍ि रस के साथ दशमूल क्‍वाथ की भाप और अनु तेल के साथ नास्‍य कर्म दिया गया।

(और पढ़ें - भाप लेने के फायदे)

उपचार के दो सप्‍ताह के बाद प्रतिभागियों को सिरदर्द, जबड़े में दर्द और नाक बहने जैसे लक्षणों से राहत मिली। उपचार को 90 दिनों तक जारी रखा गया था लेकिन इस दौरान पाया गया कि इस रोग को 46 दिनों के अंदर ही ठीक किया जा सकता है।

इस अध्‍ययन के दौरान मरीज़ों में किसी भी तरह का कोई हानिकारक प्रभाव सामने नहीं आया था। अध्‍ययन में कहा गया कि त्रिभुवनकीर्ति रस पीने के साथ-साथ नास्‍य कर्म और भाप, पुरुषों और महिलाओं दोनों में ही साइनस के इलाज के लिए प्रभावकारी है।

जीर्ण (पुराने) साइनस पर प्रधमन नस्य और त्रयोदशांग क्‍वाथ के प्रभाव की जांच के लिए अन्‍य अध्‍ययन किया गया था। इसमें पाया गया कि त्रयोदशांग क्‍वाथ से 10 प्रतिशत प्रतिभागियों को साइनस से पूरी तरह राहत मिली जबकि प्रधमन नस्‍य के साथ त्रिकटु और त्रिफला चूर्ण लेने पर 81.82% प्रतिभागियों को राहत मिली।

इन दोनों चिकित्‍साओं को एकसाथ देने पर 60 प्रतिशत लोगों को साइनस से राहत मिली। इससे पता चलता है कि त्रिकटु और त्रिफला चूर्ण के साथ नास्‍य कर्म जीर्ण साइनोसाइटिस के इलाज में असरकारी है। 

(और पढ़ें - साइनस के घरेलू उपाय)

आयुर्वेद में इस्‍तेमाल होने वाली सभी औषधियां और जड़ी बूटियां प्राकृतिक रूप से उत्‍पन्‍न होती हैं। किसी भी रोग के इलाज के लिए इन जड़ी बूटियों और औषधियों के इस्‍तेमाल की उचित प्रक्रिया और खुराक निर्धारित है।

उदाहरण के तौर पर, वमन और विरेचन कर्म में अधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है। गर्भवती महिलाओं में इन उपचारों का इस्‍तेमाल नहीं करना चाहिए जबकि कुछ औषधियों जैसे कि चित्रक हरीतकी का सेवन गर्भवती और स्‍तनपान करवाने वाली महिलाओं को नहीं करना चाहिए।

(और पढ़ें - साइनस के लिए जूस रेसिपी)

साइनोसाइटिस को नियंत्रित करने के लिए उपरोक्‍त किसी भी उपचार से पहले आयुर्वेदिक चिकित्‍सक की सलाह लेनी चाहिए। रोग की स्थिति और व्‍यक्‍ति की प्रकृति के आधार पर चिकित्‍सक उचित इलाज की सलाह देंगे। 

(और पढ़ें - साइनस में क्या खाना चाहिए)

प्रदूषण साइनस की गुहा संरचनाओं पर लगातार आक्रमण करता रहता है। इससे दोष असंतुलित होते हैं और साइनस का रूप ले लेते हैं।

आयुर्वेद में साइनस को नियंत्रित करने के लिए विभिन्‍न जड़ी बूटियों जैसे कि तुलसी, वच, पिप्‍पली, मारीच और औषधियों में कफकेतु रस, त्रिभुवनकीर्ति रस का उल्‍लेख किया गया है। आयुर्वेदिक चिकित्‍सक विभिन्‍न चिकित्‍साओं जैसे कि वमन और विरेचन कर्म से साइनस को नियंत्रित करने की सलाह देते हैं।

साइनस की वजह से सिरदर्द और जुकाम जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं जोकि व्‍यक्‍ति के रोज़मर्रा के कार्यों को प्रभावित करते हैं। आयुर्वेदिक उपायों और स्‍वस्‍थ जीवनशैली की मदद से लक्षणों को नियंत्रित, रोग का इलाज कर लंबे समय तक साइनस को दोबारा होने से रोका जा सकता है। 

(और पढ़ें - साइनस के लिए योग)

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