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मांसपेशियों में दर्द को अंगमर्द या माइएलजिआ के नाम से भी जाना जाता है। ये अपने आप में कोई बीमारी नहीं है बल्कि इससे किसी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍या जैसे कि मांसपेशियों से संबंधित विकार या चोट का पता चलता है। ऑटोइम्‍यून स्थितियां (जिसमें इम्‍यून सिस्‍टम शरीर के अंदर के ऊतकों को नष्‍ट करने लगता है), रक्‍त प्रवाह में अवरोध, नसों से संबंधित बीमारियां, स्‍ट्रेस, मांसपेशियों का अत्‍यधिक इस्‍तेमाल या किसी दवा के साइड इफेक्‍ट की वजह से मांसपेशियों में दर्द हो सकता है।

आयुर्वेद में मांसगत वात या वात को साफ कर मांसपेशियों के दर्द को दूर करके, रक्‍त प्रवाह में सुधार और शरीर से अमा को बाहर निकालने के लिए पंचकर्म थेरेपी में से स्‍नेहन (शरीर को अंदर या बाहर से चिकना करने की विधि), स्‍वेदन (पसीना लाने की विधि) और अभ्‍यंग (तेल मालिश) का उल्‍लेख किया गया है। मांसपेशियों से संबंधित बीमारियों जैसे कि फाइब्रोमाएल्जिया (मांसपेशियों और हड्डियों में दर्द) के कारण हुए मांसपेशियों में दर्द को कम करने के लिए गुग्‍गुल, अश्‍वगंधा और यष्टिमधु (मुलेठी) जैसी जड़ी बूटियों के साथ औषधियों में दशमूलारिष्‍ट जैसे हर्बल मिश्रणों का इस्‍तेमाल किया जाता है।

इनमें मौजूद दर्द निवारक गुण मांसपेशियों के दर्द को कम करने में असरकारी हैं। योग के साथ संतुलित आहार और शारीरिक थेरेपी की मदद से व्‍यक्‍ति को ठीक होने में मदद मिलती है।

  1. आयुर्वेद के दृष्टिकोण से मांसपेशियों में दर्द - Ayurveda ke anusar muscles me dard
  2. मांसपेशियों में दर्द का आयुर्वेदिक इलाज - Muscle ache ka ayurvedic treatment
  3. मांसपेशियों में दर्द की आयुर्वेदिक दवा, जड़ी बूटी और औषधि - Maspeshiyo me dard ki ayurvedic dawa aur aushadhi
  4. आयुर्वेद के अनुसार मांसपेशियों में दर्द होने पर क्या करें और क्या न करें - Ayurved ke anusar muscle pain me kya kare kya na kare
  5. मांसपेशियों में दर्द के लिए आयुर्वेदिक दवा कितनी लाभदायक है - Maspeshiyo me dard ka ayurvedic upchar kitna labhkari hai
  6. मांसपेशियों में दर्द की आयुर्वेदिक औषधि के नुकसान - Muscle ache ki ayurvedic dawa ke side effects
  7. मांसपेशियों में दर्द के आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट से जुड़े अन्य सुझाव - Muscle pain ke ayurvedic ilaj se jude anya sujhav
  8. मांसपेशियों में दर्द की आयुर्वेदिक दवा और इलाज के डॉक्टर

आयुर्वेद के अनुसार सभी प्रकार के दर्द का प्रमुख कारण वात के बढ़ने या असंतुलित होने को माना जाता है। इसके कारण शरीर अति संवेदनशील हो जाता है जिसकी वजह से उस हिस्‍से को छूने पर भी दर्द महसूस होता है। इसलिए मांसपेशियों में दर्द से संबंधित फाइब्रोमाएल्जिया जैसी वात व्‍याधि (वात खराब होने के कारण हुई बीमारी) के इलाज के लिए बढ़े हुए वात और स्रोतोरोध (अवरूद्ध परिसंचरण नाडियों) का उपचार एवं शरीर से अमा को निकालना असरकारी है।

हालांकि, आवरण के आयुर्वेदिक नियम के अनुसार शरीर में दर्द होने के कारण में वात दोष के साथ पित्त और कफ दोष भी शामिल हो सकता है।

आयुर्वेद में दर्द निवारक दवाओं के लिए कोई विशेष वर्ग नहीं है। इन्‍हें औषधियों के विभिन्‍न वर्गों में बांटा गया है जैसे कि मादक (नशीली), अंगमर्दप्रस्‍मान (बदन दर्द से राहत दिलाने वाली) और निद्रक (नींद लाने वाली)। आचार्य सुश्रुत ने दर्द निवारक के रूप में भांग के इस्‍तेमाल की सलाह दी है। मांसपेशियों में दर्द के इलाज के लिए आयुर्वेदिक उपायों में वातनाशक (वात खत्‍म करने वाली) दवाएं आवश्‍यक हैं।

(और पढ़ें - वात पित्त और कफ क्या हैं)

मांसपेशियों में दर्द के लिए आयुर्वेदिक उपचार

  • स्‍नेहन कर्म
    • स्‍नेहन कर्म में शरीर को बाहरी और आंतरिक रूप से चिकना करने के लिए स्‍नेहक (चिकना करने वाले पदार्थों एवं तेल) का इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • स्‍नेहन कर्म पंचकर्म थेरेपी का हिस्‍सा है। हालांकि, आमतौर पर वात व्‍याधि के लिए सिर्फ स्‍नेहन चिकित्‍सा ही दी जाती है।
    • शरीर को आंतरिक रूप से चिकना करने के लिए नासिका या मुंह के जरिए या एनिमा के रूप में तेल शरीर के अंदर पहुंचाया जाता है। बाहरी रूप से शरीर को चिकना करने के लिए तेल को त्‍वचा, स्‍कैल्‍प (सिर की त्‍वचा), कानों में और मालिश जैसी तरीकों को अपनाया जाता है।
    • स्‍नेहन के लिए सूखा मक्‍खन, सब्जी का तेल, मछली का तेल, पशु का फैट (एनीमल फैट) जैसे कुछ स्‍नेहक तत्‍वों का इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • फाइब्रोमाएल्जिया के उपचार में भी स्‍नेहन उपयोगी है।
       
  • स्‍वेदन कर्म
    • स्‍वेदन चिकित्‍सा से पसीना लाया जाता है और अमा को पतला करके जठरांत्र मार्ग में लाया जाता है, यहां से उसे आसानी से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
    • ये आयुर्वेद की प्रमुख शोधन (सफाई) चिकित्‍साओं में से एक है। आमतौर पर इसका इस्‍तेमाल वात प्रधान रोगों के इलाज के लिए किया जाता है।
    • ये बीमारी के लक्षणों को दूर करने के साथ-साथ संपूर्ण सेहत में भी सुधार लाती है।
    • आयुर्वेद में वालुका स्‍वेद (गर्म मिट्टी के पैक से पसीना लाना), बाष्प स्वेदन (स्‍टीम चैंबर में मरीज को बिठाना) और परिषेक स्‍वेद (शरीर में पर गर्म औषधीय तरल या तेल डालना) जैसी कुछ स्‍वेदन चिकित्‍साओं का इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • वात को साफ करने का गुण रखने वाली ये थेरेपी मांसपेशियों के दर्द के इलाज में उपयोगी है।
       
  • अभ्‍यंग कर्म
    • अभ्‍यंग चिकित्‍सा में रक्‍त प्रवाह को बेहतर करने के लिए मालिश करने के वि‍शेष तरीकों और त्‍वचा पर तेल लगाया जाता है।
    • इससे शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता में सुधार आता है। इसलिए वायरल स्थितियों जैसे कि श्‍वसन संक्रमणों (सांस से संबंधित संक्रमण) के कारण हुए मांसपेशियों में दर्द को अभ्‍यंग से कम करने में मदद मिल सकती है।
    • अभ्‍यंग चिकित्‍सा नर्व कंडक्‍शन (नसों में इलेक्ट्रिक करंट के प्रवाहित होने की गति) और मस्‍कुलोस्‍केलेटल (ऊतकों और अंगों को एकसाथ रखने और सहायता प्रदान करने वाले संयोजी ऊतक, जोड़, लिगामेंट, टेंडन, कार्टिलेज, मांसपेशियां, कंकाल की हड्डियां) क्रिया में भी सुधार आता है। इस थेरेपी में तेल मालिश की जाती है जिससे अकड़न और भारीपन महसूस होने की शिकायत दूर होती है। ये मांसपेशियों में दर्द के इलाज में मदद करती है।
       
  • विरेचन कर्म
    • पीलिया, त्‍वचा से संबंधि स्थितियों, उन्‍माद (पागलपन), जठरांत्र मार्ग में गड़बड़ी, अस्‍थमा, छाती से संबंधित रोग, मिर्गी, रेक्‍टल प्रोलैप्‍स (मलाशय का बाहर की ओर बढ़ना) और दस्‍त के इलाज के लिए विरेचन की सलाह दी जाती है।
    • विरेचन से पहले शरीर को अंदरूनी रूप से चिकना किया जा सकता है।
    • मृदु विरेचन की प्रक्रिया में कम मात्रा में अरंडी का तेल, द्राक्ष (अंगूर), गर्म दूध या पानी दिया जाता है। ये मम्‍सा गत वात के इलाज में लाभकारी है।
    • इस थेरेपी के लिए जड़ी बूटियों का चयन व्‍यक्‍ति की प्र‍कृति और जड़ी बूटी के रेचक प्रकृति के आधार पर किया जाता है।

मांसपेशियों में दर्द के लिए आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां

  • अश्‍वगंधा
    • इम्‍युनिटी बढ़ाने वाली बेहतरीन जड़ी बूटियों में अश्‍वगंधा का नाम भी शामिल है।
    • इसमें कामोत्तेजक, नसों को आराम देने वाले, शामक (नींद लाने वाले), ऊर्जादायक और शक्‍तिवर्द्धक गुण मौजूद हैं।
    • ये एक कसैली जड़ी बूटी है जिसे मांसपेशियों की मजबूती में सुधार लाने और सूजन को कम करने के लिए जाना जाता है। ये दोनों गुण एक साथ मिलकर फाइब्रोमाएल्जिया के कारण हुए मांसपेशियों में दर्द को दूर करते हैं।
    • अश्‍वगंधा का इस्‍तेमाल अन्‍य स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं जैसे कि अनिद्रा, यौन कमजोरी, लकवा, कमजोरी, एनीमिया, कटिवात (लूम्बेगो) और शराब की लत के इलाज में किया जाता है।
    • अश्‍वगंधा को पाउडर, काढ़े, हर्बल वाइन, घी, तेल के रूप में या चिकित्‍सक के निर्देशानुसार ले सकते हैं।
       
  • यष्टिमधु
    • मीठे स्‍वाद वाली इस जड़ी बूटी में रेचक (दस्त लाने वाले), शक्‍तिवर्द्धक, अल्‍सर ठीक करने वाले, ऊर्जादायक, नसों को आराम देने वाले और नींद लाने वाले गुण होते हैं।
    • ये वात विकारों, गले में खराश, कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द, जुकाम और फ्लू, सूजन एवं पेशाब में जलन होने की समस्‍या के इलाज में लाभकारी है।
    • ये जड़ी बूटी नसों की कार्यक्षमता में सुधार लाती है और बदन दर्द से राहत देती है। ये फाइब्रोमाएल्जिया के कारण होने वाले मांसपेशियों में दर्द को भी कम करने में लाभकारी है।
    • आप घी, काढ़े, दूध के काढ़े के रूप में या चिकित्‍सक के बताए अनुसान यष्टिमधु ले सकते हैं।
  • गुग्‍गुल
    • गुग्‍गुल तंत्रिका, पाचन और श्‍वसन प्रणाली पर कार्य करती है।
    • इसमें ऊर्जादायक, कफ-निस्‍सारक, उत्तेजक और नसों को आराम देने वाले गुण होते हैं।
    • बवासीर, नसों से संबंधित विकारों, गठिया, त्‍वचा रोगों, न्‍यूरोसिस (दुखी रहना), ल्‍यूकोरिया (योनि से सफेद पानी आना), गले में अल्‍सर और सूजन के इलाज में गुग्‍गुल उपयोगी है।
    • ये हड्डी के फ्रैक्‍चर के इलाज में भी लाभकारी है।
    • इस जड़ी बूटी में सूजन-रोधी गुण होते हैं जो कि मांसपेशियों में दर्द को भी दूर करते हैं।
    • वात से संबंधित स्थितियों के इलाज और मेटाबोलिज्‍म को बढ़ाने में गुग्‍गुल असरकारी है।
    • आप गुग्‍गुल को गोली, पाउडर के रूप में या डॉक्‍टर के बताए अनुसार ले सकते हैं।
       
  • निर्गुण्‍डी
    • निर्गुण्‍डी तंत्रिका और प्रजनन तंत्र पर कार्य करती है।
    • इसमें दर्द निवारक, सुगंधक, नसों को आराम देने वाले और शक्‍तिवर्द्धक गुण होते हैं।
    • निर्गुण्‍डी सूजन, मलेरिया, अल्‍सर, कान से संबंधित विकार, हेमिक्रेनिआ (एक ओर होने वाला सिरदर्द), जोड़ों में सूजन, नील पड़ने, दस्‍त, मांसपेशियों में मोच और सिरदर्द के इलाज में उपयोगी है।
    • ये जड़ी बूटी रूमेटिक और नसों में दर्द के इलाज में भी लाभकारी है। इसलिए इन दोनों स्थितियों के कारण पैदा हुए मांसपेशियों में दर्द को निर्गुण्‍डी से दूर किया जा सकता है।
    • आप निर्गुण्‍डी को तेल, पाउडर या गोली के रूप में या डॉक्‍टर के बताए अनुसार ले सकते हैं।
       
  • दारुहरिद्रा
    • इसमें बुखार कम करने वाले, मूत्रवर्द्धक और भूख बढ़ाने वाले गुण होते हैं। ये परिसंचरण और पाचन तंत्र पर कार्य करती है।
    • ये शरीर से अमा को निकालने और उसे खत्‍म करने एवं लिवर के कार्य को नियंत्रित करने में असरकारी है।
    • इस जड़ी बूटी का इस्‍तेमाल कई स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं जैसे कि बुखार, प्‍लीहा और लिवर बढ़ने, न्यूरेल्जिया (नसों में तेज दर्द), पीलिया, मलेरिया, डायबिटीज, मस्तिष्‍क से संबंधित विकारों, पेल्विक कंजेशन (पेल्विक हिस्‍से में नसों के बढ़ने से उत्‍पन्‍न हुई स्थिति), हाई बीपी और प्रेगनेंसी में उल्‍टी के इलाज के लिए किया जाता है।
    • दारुहरिद्रा में सूजन-रोधी गुण भी होते हैं इसलिए ये रूमेटाइड आर्थराइटिस के कारण होने वाले मांसपेशियों में दर्द से तुरंत राहत दिला सकती है।
    • आप दारुहरिद्रा को औषधीय घी, काढ़े, पेस्‍ट या पाउडर के रूप में या डॉक्‍टर के बताए अनुसार ले सकते हैं।
       
  • त्रिफला गुग्‍गुल
    • इस औषधि को त्रिफला (आमलकी, विभीतकी और हरीतकी का मिश्रण), गुग्‍गुल और त्रिकटु (पिप्‍पली, शुंथि [सोंठ] और मारीच [काली मिर्च] का मिश्रण) को त्रिफला काढ़े में मिलाकर तैयार किया गया है।
    • ये मूत्र से संबंधित स्थितियों जैसे कि साइटिका, वातव्‍याधि, ऑस्टियोआर्थराइटिस, उरुस्‍तंभ (जांघों में दर्दभरी अकड़न) और आमवात (रूमेटाइड आर्थराइटिस) के इलाज में उपयोगी है।
    • ये रूमेटाइड आर्थराइटिस और बढ़े हुए वात के कारण हुए मांसपेशियों में दर्द को कम करने में भी मदद कर सकती है।
       
  • दशमूलारिष्‍ट
    • इसे 65 सामग्रियों से तैयार किया गया है जिसमें मुस्‍ता, शहद, आमलकी, गुड़, पिप्‍पली, हल्‍दी, अश्‍वगंधा, किशमिश, गुडूची और दशमूल शामिल है।
    • ये औषधि रूमेटाइड विकारों के कारण पैदा हुए मांसपेशियों में दर्द को कम कर सकती है। ये शारीरिक मजबूती, जोश और ताकत भी देती है जिससे मांसपेशियों के कार्य में सुधार आता है और दर्द कम होता है।
    • ये कई स्‍वास्‍थ्‍य स्थितियों जैसे कि उल्‍टी, एनीमिया, गैस्ट्रिक विकारों, खांसी, डिस्‍युरिआ (पेशाब में जलन), ब्रोंकाइटिस (श्वासनलियाँ या मुंह और नाक और फेफड़ों के बीच के हवा के मार्ग सूज जाती हैं) और डिस्पेनिया (सांस की तकलीफ) के इलाज में भी असरकारी है।
    • प्रसव के बाद शरीर को ताकत देने के लिए भी दशमूलारिष्‍ट लेने की सलाह दी जाती है।

व्‍यक्‍ति की प्रकृति और प्रभावित दोष जैसे कई कारणों के आधार पर चिकित्‍सा पद्धति निर्धारित की जाती है। उचित औषधि और रोग के निदान हेतु आयुर्वेदिक चिकित्‍सक से परामर्श करें।

चूंकि, दर्द वात प्रधान लक्षण है इसलिए इलाज के साथ-साथ निम्‍न बातों का ध्‍यान रखकर मांसपेशियों में दर्द को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

क्‍या करें

क्‍या न करें

  • मानसिक तनाव से दूर रहें।
  • प्राकृतिक इच्‍छाओं जैसे कि मल त्‍याग और पेशाब आदि को रोके नहीं। (और पढ़ें - 
  • काले चने, गरिष्‍ठ चीजें, दही, मछली और अनुचित खाद्य पदार्थ जैसे दूध के साथ मछली न खाएं।

डिलीवरी के एक महीने बाद रूमेटाइड आर्थराइटिस से ग्रस्‍त हुई महिला पर पंचकर्म थेरेपी और आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों के प्रभाव की जांच के लिए एक अध्‍ययन किया गया। मरीज को दशमूल कटुत्रय क्‍वाथ मिश्रण के साथ शुंथि, गुडूची और अन्‍य आयुर्वेदिक दवाएं 4 महीने के लिए दी गईं। 10 दिन तक बाष्‍प स्‍वेद और अभ्‍यंग कर्म भी किया गया है।

उपचार के 75 दिनों के बाद लक्षणों में महत्‍वपूर्ण सुधार देखा गया। अध्‍ययन के अनुसार स्‍तनपान करवाने की वजह से पारंपरिक दवाओं के विकल्‍प बहुत कम हैं जबकि आयुर्वेदिक सिद्धांत बेहतरीन परिणाम देते हैं।

(और पढ़ें - मांसपेशियों में दर्द के घरेलू उपाय)

वैसे तो आयुर्वेदिक औषधियां और उपचार प्राकृतिक एवं सुरक्षित होते हैं लेकिन अगर इनके इस्‍तेमाल के दौरान उचित देखभाव एवं सावधानी न बरती जाए तो इनके दुष्‍प्रभाव भी झेलने पड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए,

  • गर्भवती महिलाओं, कमजोर और थकान से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति, बच्‍चों एवं बुजुर्गों को विरेचन कर्म नहीं देना चाहिए।
  • दारुहरिद्रा से ऊतकों की कमी हो सकती है।
  • कफ से पीडित व्‍यक्‍ति को अश्‍वगंधा नहीं लेनी चाहिए।

मांसपेशियों में दर्द का संबंध कई स्‍वास्‍थ्‍य स्थितियों से है एवं यह एक लक्षण के रूप में सामने आता है। ये मोच या चोट की वजह से हो सकता है। पारंपरिक दर्द निवारक दवाएं दर्द को कम करने में असरकारी होती हैं, हालांकि, इनसे लंबे समय तक दर्द से राहत नहीं मिलती है और इनके हानिकारक प्रभाव भी होते हैं।

आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों और औषधियों के दर्द निवारक और सूजन-रोधी गुण होते हैं जो बिना किसी साइड इफेक्‍ट के बिना मांसपेशियों में दर्द से राहत मिलती है। अभ्‍यंग, स्‍नेहन और स्‍वेदन जैसी चिकित्‍साएं खराब वात और अमा को शरीर से बाहर निकालती हैं। इस प्रकार ये दर्द की जड़ी को दूर करती हैं और उसे दोबारा होने से रोकती हैं।

(और पढ़ें - मांसपेशियों की कमजोरी के लक्षण)

Dr. Jyoti Kumbar

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आयुर्वेदा

Dr. Bibin M. V.

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आयुर्वेदा

Dr. Ashwini Ghogale

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References

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