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इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम एक ऐसी स्थिति है जो आंतों की गतिशीलता को प्रभावित करती है और दस्‍त एवं कब्‍ज के रूप में सामने आती है। इस बीमारी को आईबीएस भी कहा जाता है एवं इस रोग से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को खाना पचाने में दिक्‍कत होती है जिस वजह से बार-बार मल त्याग करने की जरुरत पड़ती है। इसकी वजह से मल में बदबू आती है और सख्‍त या मुलायम मल आता है।

(और पढ़ें - कब्ज का आयुर्वेदिक इलाज)

आयुर्वेद में आईबीएस को ग्रहणी रोग कहा गया है। ग्रहणी का मतलब होता है भोजन को ग्रहण करके पाचन प्रक्रिया के सभी चरणों को पूरा करना एवं खाने को नीचे जाने से रोकना।

(और पढ़ें - पाचन क्रिया ठीक करने के उपाय)

ग्रहणी के असंतुलित होने पर जो भोजन पच नहीं पता है उसे थोड़े-थोड़े समय में मल निष्‍कासन की जरूरत पड़ती है। इसके लक्षणों में दस्त, कब्‍ज और पेट दर्द शामिल हैं। आईबीएस के मरीज़ों में डिप्रेशन, पेट फूलने, सेक्स में अरुचि, मुंह और गले में सूखापन, कानों में आवाज आने जैसे सामान्‍य लक्षण देखे जाते हैं।

(और पढ़ें - कान में आवाज आने का इलाज)

कुछ खाद्य पदार्थ, हार्मोंस के स्‍तर में उतार-चढ़ाव, स्‍ट्रेस या अन्‍य किसी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍या के कारण ग्रहणी रोग हो सकता है। ग्रहणी रोग में आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों जैसे कि शुंथि (सूखी अदरक) और चित्रक का इस्‍तेमाल किया जाता है। शंख वटी, जातिफलादि चूर्ण और पंचामृत पर्पटी के आयुर्वेदिक मिश्रण ग्रहणी के इलाज में मददगार हैं।

(और पढ़ें - हार्मोन असंतुलन के नुकसान)

आईबीएस से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति में दस्‍त और पेचिश के इलाज में विरेचन कर्म प्रभावकारी है। आईबीएस से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को पौष्टिक, ताजा और ऑर्गेनिक (कीटनाशकों का प्रयोग किए बिना उगाए गए) खाद्य पदार्थ खाने चाहिए। थोड़े-थोड़े समय पर पर्याप्‍त मात्रा में खाना खाएं और तनाव से दूर रहें।

  1. इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम का आयुर्वेदिक इलाज या उपचार - Irritable Bowel Syndrome ka ayurvedic ilaj
  2. इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम की आयुर्वेदिक दवा, जड़ी बूटी और औषधि - Irritable Bowel Syndrome ki ayurvedic dawa aur aushadhi
  3. आयुर्वेद के अनुसार इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम होने पर क्या करें और क्या न करें - Ayurved ke anusar Irritable Bowel Syndrome me kya kare kya na kare
  4. इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम में आयुर्वेदिक दवा कितनी लाभदायक है - Irritable Bowel Syndrome ka ayurvedic upchar kitna labhkari hai
  5. इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम की आयुर्वेदिक औषधि के नुकसान - Irritable Bowel Syndrome ki ayurvedic dawa ke side effects
  6. इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम की आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट से जुड़े अन्य सुझाव - Irritable Bowel Syndrome ke ayurvedic ilaj se jude anya sujhav
  7. आयुर्वेद के दृष्टिकोण से इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम - Ayurveda ke anusar Irritable Bowel Syndrome
  8. इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम की आयुर्वेदिक दवा और इलाज के डॉक्टर
  • निदान परिवर्जन
    • आयुर्वेद के अनुसार अधिकतर रोगों के इलाज के लिए सबसे पहली चिकित्‍सा के रूप में निदान परिवर्जन की सलाह दी जाती है। इस चिकित्‍सा में रोग के कारण को दूर किया जाता है। इस उपचार से रोग को बढ़ने और उसे दोबारा होने से रोका जाता है।
    • रोग के कारण को दूर करने के लिए अनशन (अपर्याप्‍त मात्रा में खाना), वाटिका अन्‍न पान (वात असंतुलित आहार), लंघन (व्रत) और रूक्ष अन्न पान सेवन (सूखे खाद्य पदार्थ खाना) जैसी कुछ चिकित्‍साएं दी जाती हैं।
    • ग्रहणी रोग का प्रमुख कारण कोष्‍ठ विरुद्धआहार (भारी व ज्यादा मल बनाने वाला भोजन) होता है। ऐसे खाद्य पदार्थों के कारण पाचन अग्‍नि खराब होने लगती है।
    • विरुद्ध चेष्‍टा (अनियमित मानसिक और शारीरिक कार्य) का प्रभाव शरीर के सामान्‍य कार्य पर पड़ता है जिसके कारण अग्‍नि असंतुलित होने लगती है।
       
  • वमन (औषधीय एनिमा)
    • शरीर को साफ करने के लिए वमन चिकित्‍सा की जाती है और इसमें शरीर से अमा (विषाक्‍त पदार्थ) एवं बलगम को बाहर निकाला जाता है। (और पढ़ें - एनिमा के फायदे
    • कई रोगों जैसे कि एलर्जी, साइनस, यूवुलिटिस (गले के पीछे होने वाले यूवुला ऊतक में सूजन), बुखार, मोटापे, डायबिटीज मेलिटस, सोरायसिस, आर्थराइटिस और फोड़े के इलाज में वमन चिकित्‍सा का प्रयोग किया जाता है। वमन के लिए प्रयोग होने वाली जड़ी-बूटियों से अपच और आंत्रशोथ (आंतों का संक्रमण) का इलाज भी किया जाता है। (और पढ़ें - डायबिटीज में क्या खाना चाहिए)
    • ये चिकित्‍सा शरीर से अत्‍यधिक या असंतुलित हुए कफ को हटाती है। इसलिए कफ दोष के असंतुलन के कारण हुए आईबीएस के इलाज में वमन चिकित्‍सा का प्रयोग किया जाता है।
    • आईबीएस में दस्‍त की समस्‍या से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति के लिए वमन सबसे ज्‍यादा लाभकारी होता है। वमन चिकित्‍सा के लिए तीखे या कड़वे गुणों से युक्‍त जड़ी बूटियों का प्रयोग किया जाता है। 
       
  • विरेचन
    • विरेचन शरीर से अत्‍यधिक पित्त को बाहर निकालने में मदद करता है जो कि इसे पित्त के असंतुलन के कारण हुए आईबीएस के इलाज में उपयोगी बनाता है।
    • विरेचन के लिए तीखे गुणों वाली जड़ी बूटियों में सेन्‍ना आदि शामिल हैं। कब्‍ज, दस्‍त, अतिरिक्त पित्त, पेचिश और खून में विषाक्‍त पदार्थ जमने की स्थिति में इन जड़ी बूटियों की मदद ली जाती है।
    • आईबीएस में पेचिश की समस्‍या को दूर करने के लिए प्रमुख उपचार के तौर पर विरेचन कर्म को चुना जाता है।
    • विरेचन के बाद 7 दिनों के लिए संसर्जन (उचित आहार) की सलाह दी जाती है। विरचेन लेने वाले आईबीएस के मरीज़ों को ऐसी जड़ी बूटियां दी जाती हैं जिनका स्वाद खट्टा और तीखा होता है। 
       
  • रसायन
    • रसायन ऊर्जा देने वाली जड़ी बूटियां और मिश्रण होते हैं जिनका प्रयोग संपूर्ण सेहत, प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार और व्‍यक्‍ति की उम्र बढ़ाने के लिए किया जाता है।
    • रसायन शरीर के अंत:स्रावी (एंडोक्राइन) और न्‍यूरोलॉजिकल प्रणाली के कार्य को बेहतर करते हैं एवं याददाश्‍त को बढ़ाते हैं। 
    • इस चिकित्‍सा में प्रयोग होने वाली जड़ी बूटियां सीधा मस्तिष्क पर असर कर शरीर की अन्‍य सभी प्रणालियों को प्रभावित करती हैं। रसायन चिकित्‍सा के लिए सबसे ज्‍यादा मेध्‍य या दिमाग के लिए शक्‍तिवर्द्धक के रूप में जानी जाने वाली ब्राह्मी और अश्‍वगंधा का इस्‍तेमाल किया जाता है। 

इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम के लिए आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां

  • हरीतकी
    • हरीतकी उत्‍सर्जन, तंत्रिका और पाचन तंत्र पर कार्य करती है। इसमें ऊर्जादायक, शक्‍तिवर्द्धक, कृमिनाशक और नसों को आराम देने वाले गुण मौजूद हैं।
    • ये पीलिया, मूत्र संबंधित रोग, ट्यूमर, मसूड़ों में अल्‍सर और अपच जैसी अनेक स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के इलाज में उपयोगी है।
    • ये रक्‍तशोधक (खून साफ करने) और रेचक (जुलाब) के रूप में कार्य करती है। (और पढ़ें - खून साफ होने के लिए क्या खाएं)
    • हरीतकी आंतों से अत्‍यधिक वात को साफ करती है। त्रिफला (आमलकी, विभीतकी और हरीतकी का मिश्रण) चूर्ण में हरीतकी लेने पर आंतों से अमा साफ होता है। ये पुरानी कब्‍ज और आईबीएस से राहत पाने में भी मदद करती है।
    • आप चूर्ण, कैप्‍सूल या चिकित्‍सक के निर्देशानुसार हरीतकी ले सकते हैं।
       
  • अश्‍वगंधा
    • आयुर्वेद में अश्‍वगंधा को मष्तिष्‍क को शक्‍ति देने के लिए जाना जाता है। ये याददाश्त, नींद, त्‍वचा रोगों में सुधार और शक्‍ति प्रदान करती है। (और पढ़ें - याददाश्त बढ़ाने के योग)
    • अश्‍वगंधा अतिरिक्‍त वात को भी खत्‍म करती है। इसलिए वात के असंतुलन के कारण हुए आईबीएस में अश्‍वगंधा उपयोगी है।
    • आईबीएस में कब्‍ज से राहत पाने में अश्‍वगंधा मदद करती है।
    • आप अश्‍वगंधा को काढ़े, पाउडर (घी के साथ या घी के बिना), आसव/आरिष्‍ट (जड़ी बूटियों का अर्क) या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं। (और पढ़ें - काढ़ा बनाने का तरीका)
       
  • मुस्‍ता (नागर मोथा)
    • मुस्‍ता पाचन और परिसंचरण तंत्र पर कार्य करती है। इसमें वायुनाशी, संकुचक (शरीर के ऊतकों को संकुचित करने वाले), कृमिनाशक, फंगलरोधी और उत्तेजक गुण मौजूद होते हैं।
    • मुस्‍ता याददाश्त को बढ़ाता और मूड में सुधार करता है। ये अपच, जठरशोथ, पेचिश और दौरे पड़ने के इलाज में उपयोगी है।
    • ये आंतों के ऊतकों में अवशोषण में सुधार और दस्‍त को रोकता है। इसलिए आईबीएस में दस्‍त के इलाज के लिए इसका इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • आप पाउडर, काढ़े या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार मुस्‍ता ले सकते हैं।
       
  • चित्रक
    • चित्रक उत्तेजक और तीखे यौगिक के रूप में कार्य करती है। इसमें रोगाणुरोधक और परजीवी रोधी गुण पाए जाते हैं।
    • चित्रक पाचन को बेहतर करती है। इससे दस्‍त, अपच और गैस से छुटकारा मिलता है। इसलिए आईबीएस से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति के लिए ये लाभकारी होती है।
    • ये सीलिएक रोग (ग्लूटेन (Gluten) खाए जाने पर प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा दिया गया रिएक्शन), बवासीर, जोड़ों में दर्द और फोड़ों के इलाज में मदद करती है। (और पढ़ें - बवासीर का आयुर्वेदिक इलाज)
    • आप चित्रक अपमिश्रण (एल्‍कोहल में औषधि को घोलकर बनाया गया), पेस्‍ट, गोली, पाउडर या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।
       
  • शुंथि
    • आयुर्वेद के अनुसार कई रोगों के इलाज में शुंथि को उपयोगी माना गया है। ऐंठन, पेट में दर्द, अपच, आंतों में दर्द और अस्‍थमा के इलाज में इसका इस्‍तेमाल किया जाता है। (और पढ़ें - अस्थमा की आयुर्वेदिक दवा)
    • शुंथि पाचक अग्‍नि पर कार्य करती है। खाने को पचाने के लिए पाचन अग्‍नि जिम्‍मेदार होती है। इसमें वायुनाशी और पाचक गुण मौजूद होते हैं जो इसे मल त्‍याग की क्रिया और पाचन में सुधार के लिए उपयोगी बनाते हैं। इस तरह ये आईबीएस के इलाज में मदद करती है।
    • शुंथि शरीर में अतिरिक्‍त कफ को हटाने में भी मदद करती है।
    • आप पाउडर, ताजा रस, गोली, काढ़े या पेस्‍ट के रूप में शुंथि ले सकते हैं।
       

इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम के लिए आयुर्वेदिक औषधियां

  • पंचामृत पर्पटी
    • इस मिश्रण को पारद, गंधक, ताम्र भस्‍म (तांबे को ऑक्सीजन और वायु में उच्च तामपान पर गर्म करके तैयार हुई), लौह भस्‍म (लौह को ऑक्सीजन और वायु में उच्च तामपान पर गर्म करके तैयार हुई) और अन्‍य सामग्रियों से तैयार किया गया है।
    • ग्रहणी और राजयक्ष्मा (टीबी) के इलाज में इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
    • इस औषधि में ऐंठन और गैस दूर करने वाले गुण मौजूद होते हैं जोकि इसे आईबीएस के इलाज में उपयोगी बनाते हैं।
    • आप पंचामृत पर्पटी को शहद, पानी या चिकित्‍सक के निर्देशानुसार ले सकते हैं।
       
  • दशमूल घृत
    • दशमूल घृत एक हर्बल मिश्रण है जिसे दशमूल काढ़ा और घृत (घी) इस्‍तेमाल कर तैयार किया गया है।
    • इसमें वायुनाशी और पोषक गुण होते हैं जो कि इसे ग्रहणी रोग में उपयोगी बनाते हैं।
    • आप दशमूल घृत गर्म पानी के साथ या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं। 
       
  • शंख वटी
    • शंख वटी (गोली) को चिंच क्षार (इमली की छाल से तैयार क्षारीय मिश्रण), स्नुही क्षीर (डंडा ठौर से तैयार क्षारीय मिश्रण), शंख भस्‍म (सीपी को ऑक्सीजन और वायु में उच्च तामपान पर गर्म करके तैयार हुई), हिंगु (हींग) और अन्‍य हर्बल सामग्रियों को निर्गुण्डी, अदरक और नींबू के रस जैसे घुलने वाले द्रव्‍यों के साथ मिलाकर तैयार किया गया है।
    • शंख वटी में ऐंठन दूर करने वाले और पाचक गुण मौजूद होते हैं जोकि इसे ग्रहणी रोग में असरकारी बनाते हैं।
    • आप शंख वटी के साथ गर्म पानी या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।
       
  • चित्रकादि वटी
    • चित्रकादि वटी पीपलामूल, त्रिकटु (तीन कषाय का मिश्रण - पिप्‍पली, शुंथि और मारीच [काली मिर्च]), हिंगु, अजमोद और अन्‍य सामग्रियों को अदरक और नींबू के रस जैसे घुलने वाले द्रव्‍यों के साथ मिलाकर तैयार किया गया है।
    • वातज ग्रहणी के उपचार के लिए विशेष तौर पर चित्रकादि वटी का इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • इस औषधि में वायुनाशी गुण होते हैं और ये आंतों को प्रभावित करने वाले विषाक्‍त पदार्थों को दूर करती है।
    • आप गर्म पानी के साथ चित्रकादि वटी या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।
       
  • जातिफलादि चूर्ण
    • ये एक हर्बल मिश्रण है जिसे जातिफल (जायफल), इला (इलायची), पिप्‍पली, आमलकी, लवांग (लौंग), चंदन, हरीतकी, शुंथि, मारीच और अन्‍य जड़ी बूटियों से बनाया गया है।
    • जातिफलादि चूर्ण अतिसार और ग्रहणी रोग के इलाज में प्रभावी है।
    • इस चूर्ण में प्रयोग की गई जड़ी बूटियों में अम्‍ल (गैस) को खत्‍म करने वाले गुण मौजूद हैं और इसी वजह से आईबीएस के लिए ये उत्तम औषधि है।
    • आप जातिफलादि चूर्ण गर्म पानी के साथ या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।

व्‍यक्‍ति की प्रकृति और कई कारणों के आधार पर चिकित्‍सा पद्धति निर्धारित की जाती है इसलिए उचित औषधि और रोग के निदान हेतु आयुर्वेदिक चिकित्‍सक से परामर्श करें।

क्‍या करें

  • स्‍ट्रेस और सम्‍मोहन (हिप्‍नोसिस) को नियंत्रित करने के लिए मस्तिष्‍क एवं शरीर को आराम देने वाली चिकित्‍साएं लें। आंतों की गतिशीलता के इलाज, नसों की प्रतिक्रिया में सुधार और भावनात्‍मक तनाव की पहचान करने वाली अवसादरोधी दवाएं लें।
  • फाइबर-युक्‍त आहार लें।
  • जिन खाद्य पदार्थों से आपको एलर्जी या परेशानी है उनकी पहचान कर उन्‍हें अपने आहार में शामिल न करें।

क्‍या न करें

  • तनाव न लें।
  • बासी, ठंडा, दूषित और भारी भोजन न लें।
  • प्राकृतिक इच्‍छाओं जैसे कि मल त्‍याग या पेशाब न रोकें।
  • पाचन अग्‍नि को कमजोर या कम करने वाले खाद्य पदार्थ न खाएं। 

(और पढ़ें - आंतों में सूजन का इलाज)

वमन चिकित्‍सा के प्रभाव की जांच के लिए आईबीएस से ग्रस्‍त 35 मरीज़ों पर एक अध्‍ययन किया गया था। कुल 35 प्रतिभागियों को दो समूह में बांटा गया था जिसमें से एक समूह को 2 महीने तक वमन चिकित्‍सा दी गई तो वहीं दूसरे समूह के लोगों को वमन चिकित्‍सा के बिना सिर्फ औषधियां दी गईं।

अन्‍य समूह की तुलना में आयुर्वेदिक दवाओं के साथ वमन चिकित्‍सा ले रहे प्रतिभागियों की सेहत में महत्‍वपूर्ण सुधार देखा गया। 

(और पढ़ें - दस्त में क्या खाना चाहिए)

आयुर्वेदिक चिकित्‍सक की सलाह एवं देखरेख में आयुर्वेदिक औषधियां और जड़ी बूटियां लेना सुरक्षित रहता है लेकिन कुछ लोगों में इसके हानिकारक प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं, जैसे कि:

  • कमजोर और पतले व्‍यक्‍ति पर वमन चिकित्‍सा नहीं करनी चाहिए। गर्भावस्‍था में वमन थेरेपी का गलत असर पड़ सकता है। (और पढ़ें - मोटा होने के उपाय
  • चूंकि, विरेचन चिकित्‍सा से पाचन अग्‍नि कमजोर हो जाती है इसलिए जिन लोगों में वात दोष असंतुलित होता है, उन्‍हें वमन चिकित्‍सा नहीं दी जाती है। अगर किसी को हाल ही में बुखार हुआ है या किसी की पाचन शक्‍ति कमजोर है तो उसे भी विरेचन कर्म से बचना चाहिए।
  • अत्‍यधिक कफ की समस्‍या से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को अश्‍वगंधा नहीं लेना चाहिए।
  • गर्भवती महिलाओं को चित्रक का इस्‍तेमाल नहीं करना चाहिए क्‍योंकि इस जड़ी-बूटी के कारण गर्भपात की संभावना रहती है। 

आईबीएस के अंग्रेजी उपचार के सुस्‍ती या आंखों में धुंधलापन जैसे कुछ हानिकारक प्रभाव हो सकते हैं। मल त्‍याग की क्रिया और पाचन में सुधार करने में हर्बल उपचार प्रभावी होता है एवं इससे शरीर को मजबूती भी मिलती है और इसका अंग्रेजी दवाओं की तरह कोई हानिकारक प्रभाव भी नहीं होता है।

मनोरोगी के सोचने (संज्ञान) तथा उसके व्यवहार पर ध्यान केन्द्रित करने वाली थेरेपी और योगासनों का आईबीएस के मरीज़ों पर सकारात्‍मक प्रभाव देखा गया है। इन तरीकों से तनाव को कम करने में मदद मिलती है जोकि आईबीएस का प्रमुख कारण है। खानपान से संबंधित उचित नियमों के साथ-साथ आयुर्वेदिक उपचार की मदद से संपूर्ण सेहत और जीवन स्‍तर में सुधार लाने में मदद मिलती है। 

(और पढ़ें - तनाव दूर करने के नुस्खे

शरीर में किसी दोष के असंतुलित होने के कारण पाचन शक्‍ति कमजोर हो जाती है और शरीर खाने को पचाने में असक्षम हो जाता है। इस वजह से न पचने वाला खाना मल निष्‍कासन द्वारा बाहर निकलने लगता है।

आंशिक रूप से पचा हुआ खाना नीचे या ऊपर की ओर चला जाता है। इस खाने के नीचे की ओर जाने पर ग्रहणी गदा (छोटी आंत या ड्यूडोनम का खराब होना) की समस्‍या पैदा होने लगती है जो ग्रहणी का प्रमुख लक्षण है।

जिन लोगों को हाल ही में दस्त की समस्या से राहत मिली हो या जिनकी पाचन अग्नि कमजोर हो, उन्‍हें आईबीएस का खतरा अधिक रहता है। अगर ऐसे व्‍यक्‍ति पौष्टिक आहार नहीं लेते हैं और नियम से खाना नहीं खाते हैं तो उनमें विशेष तौर पर ये समस्‍या देखी जाती है।

(और पढ़ें - पौष्टिक आहार के लाभ)

कुछ लोगों को त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) या इनमें से किसी एक दोष के असंतुलित होने के कारण ग्रहणी रोग हो सकता है।

(और पढ़ें - वात, पित्त और कफ में असंतुलन के लक्षण)

दोष के आधार पर ग्रहणी को निम्‍न तरीके से वर्गीकृत किया गया है:

वातज ग्रहणी:
ये वात के असंतुलित होने के कारण होता है। अत्‍यधिक व्रत रखने, बासी या ठंडा खाना खाने, प्राकृतिक इच्‍छाओं को दबाने, खट्टी या तीखी चीज़ें खाने, लंबे समय तक चलने और अत्‍यधिक सेक्‍स करने की वजह से वातज ग्रहणी हो सकता है। (और पढ़ें - सेक्‍स कब और कितनी बार करें)

कफज ग्रहणी:
इस प्रकार के आईबीएस के लिए कफ जिम्‍मेदार होता है। ठंडा खाना खाने, भारी या तैलीय खाद्य पदार्थ खाने, ज्‍यादा खाने और खाने के तुरंत बाद सोने के कारण कफज ग्रहणी हो सकता है। (और पढ़ें - खाना खाने का सही समय)

पित्तज ग्रहणी:
एसिडयुक्त, तीखे, खट्टे और भारी खाद्य पदार्थ खाने की वजह से पित्तज ग्रहणी रोग हो सकता है।

फूलगोभी, शराबयुक्‍त पेय पदार्थ, दूध, फल, पत्ता गोभी और चॉकलेट एवं स्‍वास्‍थ्‍य से संबंधित समस्‍याएं जैसे कि तनाव, आंत्रशोथ, दस्‍त के कारण हुए संक्रमण और बैक्‍टीरिया के अधिक विकास के कारण ग्रहणी रोग हो सकता है। हार्मोंस के स्‍तर में उतार-चढ़ाव के कारण भी आईबीएस हो सकता है एवं इस वजह से पुरुषों की तुलना में महिलाएं आईबीएस का शिकार ज्यादा होती हैं। 

Dr. Rajesh Mishra

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आयुर्वेदा

Dr. Abhishek Singh Sagar

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आयुर्वेदा

Dr. Prateek Agrawal

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References

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