आयुर्वेद में माइग्रेन को अर्धावभेदक कहा जाता है। अर्धावभेदक का अर्थ होता है आधे सिर में दर्द होना। माइग्रेन का दर्द सिर में चुभता हुआ महसूस होता है। माइग्रेन का दर्द कभी भी हो सकता है, हर बार इसकी तीव्रता और दर्द की जगह भी अलग हो सकती है।

ये शिरोरोग (सिर का रोग) की दूसरी सबसे आम वजह है। दर्द की तीव्रता और जगह, दर्द का बार-बार होना या कुछ समय के अंतराल में होना, दर्द शुरु होने का समय और समयावधि तथा दर्द शुरु होने या बंद होने के कारण के आधार पर सिर के रोग अलग-अलग होते हैं।  

आयुर्वेद में सेक (सिकाई), विरेचन कर्म (मल त्‍याग द्वारा शुद्धिकरण), रक्‍त मोक्षण (रक्‍तपात), बस्‍ती कर्म (एनिमा चिकित्‍सा), नास्‍य कर्म (सूंघने की चिकित्‍सा), कवल ग्रह (तेल लगाने की विधि), शिरोधारा और लेप (प्रभावित हिस्‍से पर औषधि लगाना) जैसे कई तरीकों से माइग्रेन का उपचार हो सकता है।

आयुर्वेद में माइग्रेन के इलाज के लिए अदरक, तगार, त्रिभुवनकीर्ति रस, गोदंती मिश्रण और सितोपलदी चूर्ण जैसी जड़ी-बूटियों और औषधियों का प्रयोग किया जाता है।

  1. आयुर्वेद के दृष्टिकोण से माइग्रेन - Ayurveda ke anusar Migraine
  2. माइग्रेन का आयुर्वेदिक इलाज या उपचार - Migraine ka ayurvedic upchar
  3. माइग्रेन की आयुर्वेदिक जड़ी बूटी और औषधि - Migraine ki ayurvedic dawa aur aushadhi
  4. आयुर्वेद के अनुसार माइग्रेन होने पर क्या करें और क्या न करें - Ayurved ke anusar Migraine me kya kare kya na kare
  5. माइग्रेन में आयुर्वेदिक दवा कितनी लाभदायक है - Migraine ka ayurvedic upchar kitna labhkari hai
  6. माइग्रेन की आयुर्वेदिक औषधि के नुकसान - Migraine ki ayurvedic dawa ke side effects
  7. माइग्रेन की आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट से जुड़े अन्य सुझाव - Migraine ki ayurvedic ilaj se jude anya sujhav
माइग्रेन की आयुर्वेदिक दवा और इलाज के डॉक्टर

माइग्रेन शिरोरोग का एक प्रकार है जोकि रक्‍त वाहिकाओं के चौड़ा होने के साथ-साथ इन रक्‍त वाहिकाओं के आसपास की नसों में रसायनों के प्रवाह के कारण होता है। इस बीमारी में आधे सिर में सुईं की तरह चुभने वाला दर्द होता है।

आयुर्वेद के अनुसार माइग्रेन के कई कारण हो सकते हैं जिनमें जीवनशैली, आहार, पर्यावरण और जलवायु शामिल है। शुष्‍क खाद्य पदार्थ, अधिक खाने, ठंडी हवा में निकलने, अत्‍यधिक यौन क्रिया, डकार और मल निष्‍कासन जैसी प्राकृतिक इच्‍छाओं को रोकना, धूम्रपान या धूम्रपान कर रहे व्‍यक्‍ति के आसपास रहना, जरूरत से ज्‍यादा व्‍यायाम करना, बहुत ठंडा या गर्म मौसम, अत्‍यधिक पसीना आना, लगातार या ज्‍यादा सोना, अधिक मात्रा में पानी या शराब पीना, आंतों में कीड़े और असामान्‍य गंध के कारण माइग्रेन हो सकता है। (और पढ़ें - खट्टी डकार क्यों आती है)

माइग्रेन की वजह से गर्दन और जबड़े में जकड़न और प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता होती है। इसकी वजह से बहती नाक की समस्‍या भी हो सकती है।

(और पढ़ें - पानी कितना पीना चाहिए)

सिर से संबंधित अन्‍य रोगों की तरह माइग्रेन भी त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) में असंतुलन के कारण होता है जिसमें व्‍यक्‍ति में किसी एक दोष का स्‍तर बढ़ जाता है। हर व्‍यक्‍ति के शरीर में त्रिदोष में से भिन्‍न दोष असंतुलित होता है। आमतौर पर इसमें वात और पित्त असंतुलित हो जाते हैं। 

(और पढ़ें - वात पित्त कफ के लक्षण)

लक्षणों को कम करने और बीमारी को दोबारा होने से रोकने के लिए दोष के बढ़ने के आधार पर उपचार निर्धारित किया जाता है।

  • सेक
    • स्‍वेदन (पसीना निकालने की विधि) का ही एक प्रकार है सेक जिसमें गर्म कपड़े या धातु का इस्‍तेमाल कर शरीर के प्रभावित हिस्‍से को गर्माहट दी जाती है। गर्म की गई वस्‍तु को शरीर के प्रभावित हिस्‍से पर सीधा लगाया जाता है।
    • वात और कफ दोष के कारण हुए माइग्रेन के इलाज में ये चिकित्‍सा लाभकारी है।
    • हृदय रोगों और हाई बीपी के मरीज़ों को सेक चिकित्‍सा नहीं लेनी चाहिए।
    • कमजोर और दुर्बल व्‍यक्‍ति पर भी इस उपचार को नहीं करना चाहिए। (और पढ़ें - कमजोरी कैसे दूर करें)
  • विरेचन कर्म
    • ये पचंकर्म चिकित्‍सा में से एक है और कई रोगों के उपचार में ये चिकित्‍सा लाभकारी होती है।
    • उल्‍टी करवाने के लिए व्‍यक्‍ति को रूबर्ब, सेन्‍ना या एलोवेरा जैसे विभिन्‍न रेचक (पेट साफ करने वाले) दिए जाते हैं। इससे शरीर से विषाक्‍त पदार्थों को बाहर निकाला जाता है और शरीर की सफाई की जाती है।
    • माइग्रेन के अलावा पेट के ट्यूमर, बवासीर, अल्‍सर और गठिया आदि में भी विरेचन चिकित्‍सा से इलाज किया जाता है।
    • अगर किसी को हाल ही में बुखार हुआ है या उनकी पाचन शक्‍ति कमजोर है या दस्‍त या गुदा में अल्‍सर है तो उन्‍हें विरेचन चिकित्‍सा की सलाह नहीं दी जाती है। बच्‍चों, वृद्धों, कमजोर, गर्भवती और दुर्बल व्‍यक्‍ति को ये चिकित्‍सा नहीं लेनी चाहिए। (और पढ़ें - पाचन शक्ति बढ़ाने के उपाय)
    • विरेचन चिकित्‍सा के पश्‍चात् चावल और दाल का सूप पीएं। (और पढ़ें - सूप पीने का सही समय)
  • रक्‍त मोक्षण
    • रक्‍त मोक्षण में शरीर के प्रभावित हिस्‍से से विषाक्‍त रक्‍त को निकाला जाता है।
    • विरेचन की शुरुआत में अशुद्ध रक्‍त निकलता है जिसका रंग गहरा या बैंगनी होता है और इसके बाद जब लाल रंग का खून शरीर से निकलता है तब इस प्रक्रिया को पूरा माना जाता है।
    • दर्द से राहत दिलाने के लिए एक विशेष हिस्‍से पर छेद किया जाता है जैसे कि रक्‍त मोक्षण में सिरदर्द के इलाज के लिए भौं पर छेद किया जाता है।
    • तिल्‍ली, लिवर रोग और त्‍वचा विकारों जैसे पित्त विकार और सिरदर्द के इलाज में रक्‍त मोक्षण काफी लाभकारी होती है।
    • गर्भावस्‍था, मासिक धर्म, एनीमिया, एडिमा, ल्‍यूकेमिया और सिरोसिस के मरीज़ों को रक्‍त मोक्षण नहीं करना चाहिए। शिशु, वृद्धों और दुबर्ल व्‍यक्‍ति को भी इस चिकित्‍सा से बचना चाहिए। (और पढ़ें - मासिक धर्म की समस्या)
  • बस्‍ती कर्म
    • इस पंचकर्म चिकित्‍सा में मल को साफ करने के लिए जड़ी-बूटियों के मिश्रण से बना औषधीय काढ़ा या तेल एनिमा के साथ दिया जाता है। (और पढ़ें - काढ़ा बनाने का तरीका)
    • जड़ी-बूटियों के मिश्रण को तरल या तेल में डाला जाता है। जिस दोष में असंतुलन की वजह से बीमारी हुई हो उसी के आधार पर तेल लिया जाता है।
    • त्रिदोष के असंतुलित होने पर त्रिफला एनिमा का इस्‍तेमाल किया जाता है।
  • नास्‍य कर्म
    • आयुर्वेद के अनुसार नाक ही सिर का प्रवेश द्वार है। इसलिए नासिक मार्ग के ज़रिए जड़ी-बूटियों से सिर, गले और गर्दन के रोग को ठीक किया जाता है।
    • नास्‍य कर्म में जड़ी-बूटियों से बना काढ़ा या तेल नाक के अंदर डाला जाता है। जिस दोष में असंतुलन की वजह से बीमारी हुई हो उसी के आधार पर जड़ी-बू‍टी निर्धारित की जाती है।
    • गर्दन में अकड़न, कॉर्निया और दृष्टि संबंधित समस्‍या, गर्दन में दर्द, शरीर के ऊपरी हिस्‍सों जैसे मुंह, सिर, कंधों, कान, नाक और खोपड़ी में विकार आदि से निजात पाने के लिए नास्‍य कर्म उपयोगी है।
  • कवल ग्रह
    • शरीर को प्रभावी तरीके से साफ करने में कवल ग्रह बहुत उपयोगी है और इसीलिए कई रोगों के आयुर्वेदिक इलाज में इसका इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • इस प्रक्रिया में तेल से कुछ मिनट के लिए व्‍यक्‍ति को कुल्‍ला करने के लिए कहा जाता है। इस चिकित्‍सा में मुंह की सफाई के लिए विभिन्‍न तेलों का इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • कवल ग्रह में चंदनादि तेल और महानारायण तेल का इस्‍तेमाल किया जाता है।
  • शिरोधारा
    • सिरदर्द को नियंत्रित करने के लिए शिरोधारा काफी प्रभावी आयुर्वेदिक प्रक्रिया है। इस तकनीक में दूध या तेल जैसे कई तरल पदार्थों को हर्बल काढ़े के साथ मिलाकर सिर के ऊपर ये लयबद्ध तरीके से डाला जाता है।
    • शिरोधारा में काढ़ा बनाने के लिए जड़ी-बूटियों का चयन माइग्रेन के कारण के आधार पर किया जाता है। वतज (वात दोष के कारण) शिरोरोग को नियंत्रित करने के लिए वात दोष को कम करने वाली जड़ी-बूटियों के साथ गाय का गुनगुना दूध दिया जाता है। वहीं पित्तज (पित्त के कारण) शिरोरोग को नियंत्रित करने में गन्‍ने के जूस और ठंडे दूध का इस्‍तेमाल किया जाता है।
  • लेप
    • लेप में हर्बल पेस्‍ट को सिर पर लगाया जाता है। मस्तिष्‍क, सिर और गर्दन से संबंधित विकारों के इलाज में प्रमुख तौर पर लेप चिकित्‍सा का प्रयोग किया जाता है। माइग्रेन के इलाज के लिए पेस्‍ट तैयार करने में हरीद्रा (हल्‍दी), सारिवा, विडंग (फॉल्‍स काली मिर्च) और मरीछा (काली मिर्च) जैसी जड़ी-बूटियों का इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • सिर पर पेस्‍ट लगाने से पहले बालों और सिर की त्‍वचा (स्‍कैल्‍प) पर औषधीय जड़ी-बूटियों से बना तेल लगाया जाता है। एक से डेढ़ घंटे के बाद गुनगुने औषधीय बाथ द्वारा भाप चिकित्‍सा दी जाती है। (और पढ़ें - भाप लेने के फायदे)
    • आमतौर पर केवल एक बार या एक दिन छोड़कर एक दिन या एक सप्ताह तक रोज इस चिकित्‍सा का प्रयोग कर सकते हैं।  

(और पढ़ें - माइग्रेन क्यों होता है)

माइग्रेन के लिए आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां

  • अदरक
    • कइ रोगों के इलाज में अदरक का इस्‍तेमाल किया जाता है और ये पाचक, दर्द-निवारक यौगिक, उत्तेजक और कफ निस्‍सारक के रूप में कार्य करती है।
    • वात, पित्त और कफ दोष के कारण पैदा हुए रोगों का इलाज करने में अदरक चमत्‍कारिक असर दिखाती है। काले नमक के साथ अदरक लेने पर वात में कमी आती है और मिश्री के साथ लेने पर पित्त और शहद के साथ अदरक लेने पर कफ दोष शांत होता है।
    • माइग्रेन के अलावा सिरदर्द, जी मिचलाना और उल्‍टी और डायबिटीज जैसे कई रोगों के इलाज में भी अदरक उपयोगी है।
  • तगार (चीनी का बूरा)
    • वात विकारों के इलाज के लिए बेहतरीन जड़ी-बूटी है तगार। ये शरीर से अमा (विषाक्‍त पदार्थ) को हटाने और साफ करने का कार्य करती है।
    • माइग्रेन के अलावा तगार खांसी, थकान और मानसिक तनाव का भी इलाज करती है।
    • तगार के सेवन में अत्‍यधिक सावधानी बरतनी चाहिए क्‍योंकि इसकी अधिक खुराक लेने की वजह से लकवा मार सकता है।

माइग्रेन के लिए आयुर्वेदिक औषधि

  • त्रिभुवनकीर्ति रस
    • अनेक सामग्रियों से युक्‍त यह एक हर्बो-मिनरल मिश्रण है। इस औषधि के कुछ घटकों में शुंथि (सूखी अदरक), मरीछा, पिप्‍पली, तुलसी, धतूरा और अदरक जैसी जड़ी-बूटियां मौजूद हैं।
    • दोष के आधार पर विभिन्‍न भस्‍मों जैसे कि गोदंती भस्‍म, श्रिंगा (हिरण का सींग) भस्‍म और अभ्रक भस्‍म के साथ इसका इस्‍तेमाल किया जाता है।
    • बुखार, पसीना लाने और दर्द से राहत दिलाने में त्रिभुवनकीर्ति रस का प्रयोग किया जाता है। ये माइग्रेन, इंफ्लुएंजा, लेरिन्‍जाइटिस (स्‍वर तंत्र में होने वाल सूजन), फैरिन्जाइटिस (गले की सूजन), निमोनिया, टॉन्सिलाइटिस (टॉन्सिल का संक्रमित होना) और ब्रोंकाइटिस (श्‍वसनीशोथ) जैसे विभिन्‍न रोगों को नियंत्रित करने में मदद करती है।
  • गोदंती मिश्रण
    • इसमें गोदंती भस्‍म, जहर मोहरा पिष्टि (शरीर से जहर को निकालने वाली) और रसादि वटी होती है।
    • माइग्रेन के इलाज में गोदंती मिश्रण को अकेले या अन्‍य चिकित्‍सा उपचार के साथ इस्‍तेमाल कर सकते हैं।
  • सितोपलादि चूर्ण
    • सितोपलादि चूर्ण में विभिन्‍न सामग्रियां जैसे मिश्री, वंशलोचन, छोटी पिप्‍पली, छोटी इलायची और दालचीनी निश्चित अनुपात में होते हैं।
    • माइग्रेन के अलावा ये बुखार, फ्लू और श्‍वसन विकारों के इलाज में भी असरकारी है। इस दवा से तीन से चार दिनों में भी रोग के लक्षणों से राहत पाने में मदद मिलती है और आठ सप्‍ताह के अंदर रोग पूरी तरह से ठीक हो जाता है।
    • कभी-कभी जुकाम से ग्रस्‍त होने पर, अत्‍यधिक कफ के सिर तक पहुंचने पर सिरदर्द हो जाता है। ऐसी स्थिति में सिरदर्द का इलाज करने के लिए सितोपलादि चूर्ण का इस्‍तेमाल किया जाता है। (और पढ़ें - सिरदर्द के लिए घरेलू नुस्खे)

कई कारणों और व्‍यक्‍ति की प्रकृति के आधार पर चिकित्‍सा प्रक्रिया अलग हो सकती है। रोग के निदान हेतु उपयुक्‍त औषधि एवं उपचार के लिए आयुर्वेदिक चिकित्‍सक से परामर्श करना जरूरी है।

क्‍या करें 
अपने नियमित आहार में निम्‍न चीजों को शामिल करें:

क्‍या ना करें

  • चावल की कुछ किस्‍में जैसे कोद्रव और सामक आदि ना खाएं।
  • हरे चने, छोले, तूर दाल और मटर खाने से बचें।
  • सुपारी और करेला ना खाएं।
  • अत्‍यधिक भारी भोजन ना करें और पहले खाए हुए खाने के पचने के बाद ही दोबारा खाएं। (और पढ़ें - संतुलित आहार तालिका)
  • अत्‍यधिक व्‍यायाम, प्राकृतिक इच्‍छाओं को दबाने, दिन में सोने और रात को लगातार जागने से बचें।

माइग्रेन से ग्रस्‍त मरीज में लघु सूतशेखर रस और बृहत् दशमूल तेल के साथ नास्‍य कर्म के प्रभाव की जांच के लिए 44 प्रतिभागियों पर एक चिकित्‍सकीय अध्‍ययन किया गया था। इन दोनों चिकित्‍सा उपचारों के बीच तुलना की गई थी। दोनों ही चिकित्साओं में रोग की गंभीरता, समयावधि और बार-बार हो रहे दर्द, मितली, उल्‍टी, वर्टिगो (सिर घूमना या चक्‍कर आना) और आभा में सुधार पाया गया। एक चिकित्‍सा लेने वाले प्रतिभागियों की तुलना में दोनों चिकित्‍सा लेने वाले लोगों में ज्‍यादा अच्‍छे परिणाम पाए गए।

निंबादि गुग्‍गुल और मशादि कषाय के साथ नास्‍य कर्म सहित शताहवादि तेल के प्रभाव की जांच के लिए 30 प्रतिभागियों पर अध्‍ययन किया गया। लगभग 60 प्रतिशत प्रतिभागियों को माइग्रेन से पूरी तरह से निजात मिल गई ज‍बकि बाकी बचे 40 प्रतिशत लोगों की हालत में सुधार आया। इस चिकित्‍सकीय अध्‍ययन से ये साबित हो चुका है कि दोनों चिकित्‍साओं को एकसाथ देने पर सफलतापूर्वक माइग्रेन का इलाज किया जा सकता है।

गुंज तेल नास्‍य और पत्‍यादि घन वटी के प्रभाव की जांच के लिए हुए अन्‍य अध्‍ययन में पता चला कि मरीज़ की हालत में सुधार लाने के लिए इन उपचारों का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। अध्‍ययन के मुताबिक माइग्रेन को नियंत्रित करने में ये मिश्रण असरकारी, सुरक्षित और विश्‍वसनीय है।

(और पढ़ें - माइग्रेन में क्या खाना चाहिए)

माइग्रेन के इलाज के लिए जड़ी-बूटियों का इस्‍तेमाल तभी प्रभावकारी और सुरक्षित है जब इन्‍हें पूरी सावधानी और आयुर्वेदिक चिकित्‍सक की सलाह पर लिया जाए।

आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी की खुराक की मात्रा और खुराक कितनी बार लेनी है, ये सब चिकित्‍सक ही आपकी परिस्थिति के अनुसार बता सकते हैं। अधिक खुराक के कारण सेहत को नुकसान हो सकता है और ये आपके लिए खतरनाक भी साबित हो सकता है जैसे कि तगार के ओवरडोज़ की वजह से केंद्रीय पक्षाघात (मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी को घाव लगने के कारण हुआ पक्षाघात) हो सकता है।

बच्‍चों, वृद्धों और गर्भवती महिलाओं के इलाज में अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है। किसी भी चिकित्‍सा का परामर्श देने से पहले व्‍यक्‍ति की चिकित्‍सकीय परिस्थिति को ध्‍यान में रखना जरूरी है। उदाहरणार्थ: गर्भवती महिलाओं, बच्‍चों और रक्‍तस्राव (ब्‍लीडिंग) से संबंधित विकारों से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति पर रक्‍त मोक्षण चिकित्‍सा का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। 

(और पढ़ें - ब्लीडिंग होने पर क्या करें)

हर किसी को अपने जीवन में कभी ना कभी सिर में दर्द जरूर होता है और माइग्रेन सिरदर्द का दूसरा सबसे सामान्‍य कारण है जबकि सिरदर्द का प्रमुख कारण तनाव है। सिरदर्द से कुछ समय के लिए राहत पाने के लिए कई कृत्रिम दर्द निवारक दवाओं का इस्‍तेमाल किया जाता है।

आयुर्वेद में रोग की मूल जड़ का पता लगाकर उससे संबंधित दोष का इलाज किया जाता है। कई वर्षों से माइग्रेन को नियंत्रित और इस रोग को दोबारा होने से रोकने के लिए सफलतापूर्वक आयुर्वेदिक तकनीकों का प्रयोग किया जाता रहा है। ना सिर्फ माइग्रेन से राहत पाने बल्कि अपने संपूर्ण जीवन स्‍तर को बेहतर बनाने के लिए आयुर्वेदिक चिकित्‍सक से परामर्श करें और हर्बल नुस्‍खें अपनाएं।

(और पढ़ें - माइग्रेन के लिए योग)

Dr. Gurpreet Virmani

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Dr. Tanushri Yeole

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संदर्भ

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