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पैरों में दर्द होना एक सामान्‍य समस्‍या है जिसमें एड़ी या पंजों में पीड़ा महसूस होती है। मोच और फ्रैक्‍चर के कारण पैर में दर्द हो सकता है लेकिन इसके तीन सबसे सामान्‍य कारणों में प्लांटर फेशिया (एड़ी के नीचे दर्द), पैरों के तलवों में दर्द और एड़ी के पीछे (अचिल्लेस टेन्डिनाइटिस) में सूजन शामिल हैं। गठिया, ऑस्टियोआर्थराइटिस और रुमेटाइड आर्थराइटिस की वजह से भी पैरों में दर्द हो सकता है।

(और पढ़ें - पैर में फ्रैक्चर का इलाज)

पैरों में दर्द को कम करने में पंचकर्म थेरेपी में से बस्‍ती (एनिमा की विधि), विरेचन (दस्‍त की विधि), स्‍नेहन (तेललगाने की विधि) और अभ्‍यंग (तेल मालिश) चिकित्‍सा उपयोगी है। अश्वगंधा और अरंडी जैसी जड़ी बूटियों के साथ महायोगराज गुग्‍गुल, महारास्नादि क्‍वाथ एवं कैशोर गुग्‍गल के हर्बल मिश्रण भी पैरों में दर्द के इलाज में इस्‍तेमाल किए जाते हैं।

अपने दैनिक आहार में जौ, घी और मूंग दाल को शामिल कर पैरों में दर्द की शिकायत को दूर किया जा सकता है। इसके अलावा दिन के समय न सोएं, सही मुद्रा में बैठें, गर्म पानी से नहाने और मालिश की मदद से भी पैरों में दर्द को कम किया जा सकता है।

(और पढ़ें - पैरों की मसाज कैसे करें)

  1. पैरों में दर्द की आयुर्वेदिक दवा, जड़ी बूटी और औषधि - Pero me dard ki ayurvedic dawa aur aushadhi
  2. आयुर्वेद के अनुसार पैरों में दर्द होने पर क्या करें और क्या न करें - Ayurved ke anusar pairo me dard hone par kya kare kya na kare
  3. पैरों में दर्द की आयुर्वेदिक औषधि के नुकसान - Per me dard ki ayurvedic dawa ke side effects
  4. पैरों में दर्द के आयुर्वेदिक इलाज से जुड़े अन्य सुझाव - Pero me dard ke ayurvedic ilaj se jude anya sujhav
  5. पैरों में दर्द के लिए आयुर्वेदिक दवा कितनी लाभदायक है - Pairo me dard ka ayurvedic upchar kitna labhkari hai
  6. आयुर्वेद के दृष्टिकोण से पैरों में दर्द क्यों होता है - Ayurveda ke anusar pero me dard kyu hota hai
  7. पैरों में दर्द का आयुर्वेदिक इलाज - Per me dard ka ayurvedic ilaj
  8. पैरों में दर्द की आयुर्वेदिक दवा और इलाज के डॉक्टर

पैरों में दर्द के लिए आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां

  • अरंडी
    • अरंडी एक प्राकृतिक दर्द निवारक और रेचक (दस्त लाने वाली) जड़ी बूटी है जिसे जोड़ों पर लगाने से दर्द से राहत मिलती है। (और पढ़ें - जोड़ों में दर्द के कारण)
    • अरंडी के बीजों से बना काढ़ा साइटिका और लूम्‍बेगो के इलाज में लाभकारी है।
    • अरंडी, कफ और वात शामक गुणों से युक्‍त होती है। इसी वजह से अरंडी रुमेटाइड आर्थराइटिस के इलाज में असरकारी होती है।
    • ऑस्टियोआर्थराइटिस और आर्टिकुलर रुमेटिज्‍म के इलाज में भी उपयोगी है।
    • आप अरंडी को पुल्टिस, पेस्‍ट, काढ़े, अर्क के रूप में या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।
       
  • अश्‍वगंधा
    • अश्‍वगंधा तंत्रिका तंत्र पर कार्य करती है और इसमें शामक एवं नसों को आराम देने वाले गुण होते हैं। सूजन-रोधी जड़ी बूटी होने के कारण अश्‍वगंधा दर्द और सूजन से राहत प्रदान करती है।
    • ये शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है और प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाती है।
    • ये जड़ी बूटी मांसपेशियों में कमजोरी, कमजोरी, रुमेटिज्‍म, थकान, ग्रंथियों में सूजन, ऊतकों में कमी, रुमेटिक सूजन और साइटिका के इलाज में उपयोगी है।
    • आप अश्‍वगंधा को चूर्ण, काढ़े, तेल, हर्बल वाइन के रूप में या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।
       
  • निर्गुंडी
    • निर्गुंडी, मज्‍जा (हड्डियों के भीतर भरा हुआ एक नरम ऊतक) और तंत्रिका तंत्र के ऊतकों पर कार्य करती है। कड़वे और कसैले स्‍वाद वाली इस जड़ी बूटी में  दर्द निवारक, सुगंधक, नसों को आराम देने वाले और शक्‍तिवर्द्धक गुण होते हैं।
    • निर्गुंडी की पत्तियां लगाने से गठिया और जोड़ों में सूजन की समस्‍या से राहत मिलती है।
    • निर्गुंडी ऑस्टियोआर्थराइटिा के इलाज में मदद करती है। इसलिए उपरोक्‍त समस्‍याओं के कारण हुए पैरों में दर्द को निर्गुंडी से दूर किया जा सकता है।
    • ये मोच, सूजन, मूत्राशय से संबंधित समस्‍याओं, सिरदर्द और छालों को ठीक करने में मदद करती है।
    • आप निर्गुंडी को पुल्टिस, काढ़े, अर्क, शहद के साथ पेस्‍ट, पाउडर के रूप में या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।
       
  • शुंथि (सोंठ)
    • शुंथि पाचक, नसों को आराम, उत्तेजक, सुगंधक और दर्द निवारक गुणों से युक्‍त होती है। ये प्रमुख तौर पर श्‍वसन और पाचन तंत्र पर कार्य करती है।
    • अदरक में अनेक औषधीय गुण मौजूद होते हैं।
    • आर्थराइटिस, अस्‍थमा, कब्ज और ह्रदय से संबंधित समस्‍याओं के इलाज में लाभकारी है।
    • शहद के साथ लेने पर अदरक कफ को कम करती है। अगर अदरक को सेंधा नमक के साथ लिया जाए तो वात को कम करने में मदद मिलती है। (और पढ़ें - वात पित्त कफ क्या होता है)
    • सोंठ ऑस्टियोआर्थराइटिस, साइटिका और रुमेटाइड आर्थराइटिस के इलाज में असरकारी है। इन रोगों की वजह से पैरों में दर्द होने पर शुंथि का इस्‍तेमाल किया जा सकता है।
    • आप शुंथि को गोली, काढ़े, पेस्‍ट, अर्क के रूप में या डॉक्‍टर के निर्देशानुसार ले सकते हैं।
       
  • रसना
    • रसना का इस्‍तेमाल रसायन या शक्‍तिवर्द्धक के रूप में किया जाता है। ये तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करने वाले वात रोगों के इलाज में उपयोगी है।
    • इसमें रेचक, बुखार कम करने, नसों को ताकत देने और आराम देने वाले गुण होते हैं।
    • गठिया-रोधी गुण के कारण रसना ऑस्टियोआर्थराइटिस, रुमेटाइड आर्थराइटिस और इनसे जुड़ी दिक्‍कतों के इलाज में प्रभावकारी है। (और पढ़ें - गठिया का आयुर्वेदिक उपचार)
    • रसना गुग्‍गुल का इस्‍तेमाल शमक चिकित्‍सा के लिए किया जाता है। साइटिका के इलाज में रसना का सेवन किया जाता है।

पैरों में दर्द के लिए आयुर्वेदिक औषधियां

  • महायोगराज गुग्‍गुल
    • इसे शुंथि, पिप्‍पलीमूल, चित्रक, जीरक (जीरा), हिंगु (हींग), पिप्पली, त्रिफला(आमलकी, विभीतकी और हरीतकी का मिश्रण), वच, अतिविष, गुग्गुल और अन्‍य विभिन्‍न जड़ी बूटियों से तैयार किया गया है।
    • ये औषधि वात व्‍याधि (वात के बढ़ने के कारण हुए रोग) और पक्षाघात (लकवा) जैसी बीमारियों के इलाज में इस्‍तेमाल की जाती है।
    • ये संधिवात के कारण होने वाले पैरों में दर्द को भी कम करने में मदद करता है।
       
  • महारास्नादि क्‍वाथ
    • इस मिश्रण में गुडूची, अरंडी, वच, अश्‍वगंधा, अतिविष, गोक्षुरा और बाला जैसी कुछ जड़ी बूटियों का इस्‍तेमाल किया गया है।
    • ये औषधि साइटिका, अर्धांगघात (शरीर के एक हिस्‍से में लकवा), संधिवात और अन्‍य रुमेटिक रोगों के इलाज में असरकारी है। अत: इन रोगों के कारण हुए पैरों में दर्द को महारास्नादि क्‍वाथ से कम किया जा सकता है।
    • ये सुन्‍नपन, हर्निया और अवसाद से रा‍हत देता है।
       
  • कैशोर गुग्‍गुल
    • कैशोर गुग्‍गुल को 18 जड़ी बूटियों से तैयार किया गया है जिसमें गुडूची, त्रिकटु (तीन कषाय – पिप्पली, शुंथि और मारीच [काली मिर्च] का मिश्रण), त्रिफला, गाय का घी और विडंग शामिल हैं।
    • ये औषधि त्‍वचा विकारों जैसे घाव और फुट कॉर्न के इलाज में उपयोग की जाती है।  
    • कैशोर गुग्‍गुल पुराने घाव, रुमेटाइड आर्थराइटिस और जीर्ण (लंबे समय से हो रहे) गठिया से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को पैरों में दर्द की शिकायत से छुटकारा दिलाती है।
       
  • मुक्ताशुक्ति भस्म
    • मुक्ताशुक्ति भस्म को सीप और मोती की राख से बनाया गया है। ये दवा पित्त और वात दोष के बीच वापिस संतुलन लाती है। (और पढ़ें - वात, पित्त और कफ असंतुलन के लक्षण)
    • ये अस्थि, मम्‍सा और रक्‍त धातु को पोषण देती है जिससे शरीर को मजबूती मिलती है।
    • ऑस्टियोपोरोसिस के इलाज में प्रमुख तौर पर मुक्ताशुक्ति भस्म का इस्‍तेमाल किया जाता है लेकिन ये सिरदर्द, लू लगने और शरीर में जलन के अहसास को भी कम करती है।

व्‍यक्‍ति की प्रकृति और कई कारणों के आधार पर चिकित्‍सा पद्धति निर्धारित की जाती है। उचित औषधि और रोग के निदान हेतु आयुर्वेदिक चिकित्‍सक से परामर्श करें।

क्‍या करें

क्‍या न करें

कुछ स्थितियों में आयुर्वेदिक उपचार और औषधियों के हानिकारक प्रभाव भी हो सकते हैं, जैसे कि:

  • गर्भवती महिलाएं, वृद्ध व्‍यक्‍ति, बच्‍चों और कमजोर एवं थकान से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को विरेचन कर्म नहीं लेना चाहिए। दस्‍त, मलाशय के आगे की ओर बढ़ने या शरीर के निचले हिस्‍सों में ब्‍लीडिंग आदि से संबंधित समस्‍या की स्थिति में भी विरेचन नहीं करना चाहिए। विरेचन के दौरान अधिक दस्‍त की वजह से बेहोशी और सुस्ती हो सकती है।
  • आंत्र रुकावट, एनीमिया, हैजा या गुदा में सूजन होने पर भी बस्‍ती कर्म नहीं लेना चाहिए।
  • पीलिया, किडनी और पित्त वाहिका से संबंधित रोगों एवं आंतों में संक्रमण होने पर अरंडी नहीं लेनी चाहिए।
  • कफ जमने पर अश्‍वगंधा लेने की सलाह नहीं दी जाती है।

किसी चोट, मोच या रुमेटाइड आर्थराइटिस और गठिया जैसी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के कारण पैर में दर्द हो सकता है। अगर समय पर इसका इलाज न किया जाए तो पैरों में दर्द बढ़ सकता है और रोज़मर्रा के काम करने में भी दिक्‍कत हो सकती है। पारंपरिक दवाओं (क्रीम और खाने की दवा) से दर्द कम तो होता है लेकिन इनके कुछ हानिकारक प्रभाव या एलर्जी भी हो सकती हैं।

पैरों में दर्द के आयुर्वेदिक उपचार में प्राकृतिक जड़ी बूटियों और मिश्रणों से दर्द को कम किया जाता है। पंचकर्म की चिकित्‍साओं से प्रभावित हिस्‍से में दर्द को दूर करने के साथ-साथ पूरे शरीर में रक्‍तप्रवाह में सुधार लाया जाता है। इस तरह संपूर्ण सेहत बेहतर होती है।

(और पढ़ें - पैर में दर्द के घरेलू उपाय)

मरीज़ को जल्‍दी ठीक करने के लिए उपचार के साथ जीवनशैली और आहर में उचित बदलाव किया जाता है। इससे शरीर को मजबूती मिलती है और इम्‍युनिटी में भी सुधार आता है।

एक अध्‍ययन में एनीमिया से ग्रस्‍त 30 ऐसे मरीज़ों को शामिल किया जिन्‍हें पैरों में दर्द की भी शिकायत थी। पंचतिक्‍त घृत की 60 मि.ली मात्रा से 30 दिनों तक सभी प्रतिभागियों को बस्‍ती चिकित्‍सा दी गई। 30 दिनों के बाद सभी मरीज़ों को पैरों में दर्द से राहत मिली।

(और पढ़ें - सुबह के समय पैरों में दर्द क्यों होता है)

आयुर्वेद में पैरों में दर्द को पदशूल के नाम से जाना जाता हे। पैरों में दर्द के प्रमुख कारणों में गृध्रसी (साइटिका), संधिवात (ऑस्टियोआर्थराइटिस), अस्थिसौषिर्य (ऑस्टियोपोरोसिस), वातरक्‍त (गठिया) और रुमेटाइड आर्थराइटिस शामिल हैं। त्‍वचा विकार जैसे कि वात के खराब होने के कारण पदरिका (तलवों में रूखापन), कदर (गोखरू – त्‍वचा की एक मोटी परत) और अलस (एथलीट फुट - पैरों में फंगल इन्फेक्शन) के लक्षण के रूप में भी पैरों में दर्द हो सकता है। आयुर्वेद जड़ी बूटियों, मिश्रणों और उपचारों द्वारा इन समस्‍याओं को दूर कर पैरों में दर्द को कम किया जा सकता है।

(और पढ़ें - फंगल इन्फेक्शन का आयुर्वेदिक इलाज)

पदभ्‍यंग या पैरों की तेल मालिश से पैरों के दर्द से राहत मिल सकती है। आयुर्वेद के अनुसार सही मुद्रा से भी जोड़ों में लचीलेपन में सुधार और दर्द को कम किया जा सकता है। तनाव को दूर करने के लिए ध्यान (मेडिटेशन), पर्याप्‍त आराम, वजन घटाकर (पैरों में दर्द का एक कारण मोटापा भी है) और ज्‍यादा चलने की आदत से दूर रह कर पैरों में दर्द जल्‍दी ठीक हो स‍कता है। रक्‍त प्रवाह को बेहतर करने और शरीर से अमा या विषाक्‍त पदार्थों को बाहर निकालने में योग महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रकार पैरों में दर्द को कम करने में मदद मिलती है।

(और पढ़ें - वजन कम करने के उपाय)

  • अभ्‍यंग
    • अभ्‍यंग में शरीर को बाहर से चिकना करने के लिए हर्बल तेलों से मालिश की जाती है। इस प्रक्रिया से इम्‍युनिटी बढ़ती है और रक्‍त प्रवाह में सुधार आता है। (और पढ़ें - ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाने के उपाय)
    • ये मस्कुलोस्केलेटल प्रणाली (मांसपेशियों, हड्डियों और लिगामेंट्स) को मजबूती एवं नसों के संचालन में सुधार लाता है। (और पढ़ें - हड्डियों को मजबूत बनाने के घरेलू उपाय)
    • अभ्‍यंग चिकित्‍सा से शरीर को ऊर्जा मिलती है। ये शरीर में अकड़न को कम कर हल्‍कापन महसूस करवाती है।
    • अभ्‍यंग चिकित्‍सा ऑस्टियोआर्थराइटिस, साइटिका और गठिया के इलाज में उपयोगी है। इसलिए, इन रोगों के कारण हुए पैरों में दर्द को अभ्‍यंग से कम किया जा सकता है।
    • ऑस्टियोआर्थराइटिस से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति पर अभ्‍यंग के लिए पंचगुण तेल, सैंधवादि तेल और महामाष तेल जैसे मिश्रणों का इस्‍तेमाल किया जाता है।
       
  • पादाभ्यंग
    • इस चिकित्‍सा में पैरों में रूखेपन, दरारे, थकान, खुरदरेपन और सुन्‍नपन को रोका जाता है।
    • ये साइटिका और पैरों की मांसपेशियों एवं लिगामेंट्स के बीच संकुचन के इलाज में लाभकारी है।
    • पैरों में अभ्‍यंग करने से पूरे शरीर की रंगत भी निखरती है।
    • इससे नींद भी अच्‍छी आती है और ये नेत्र एवं कान से संबंधित विकारों को होने से रोकता है एवं ठीक करता है। (और पढ़ें - अच्छी गहरी नींद आने के घरेलू उपाय)
    • सोने से पहले तिल के तेल से अभ्‍यंग करने पर सबसे ज्‍यादा बेहतर परिणाम मिलते हैं।
       
  • विरेचन
    • विरेचन कर्म प्रमुख तौर पर गुदा मार्ग के ज़रिए शरीर से अत्‍यधिक पित्त को निकालने के लिए किया जाता है। ये जीर्ण (लंबे समय से हो रहे) पीलिया, उन्‍मांदता, जठरांत्र समस्‍याओं, त्‍वचा विकारों और अस्‍थमा के इलाज में उपयोगी है।
    • इस चिकित्‍सा से पहले गर्म तरल, मीट का सूप और वसायुक्‍त आहार दिया जाता है। (और पढ़ें - सूप पीने का सही समय)
    • रोग की स्थिति और जड़ी बू‍टी की प्रकृति के आधार पर विरेचन के लिए जड़ी बूटियों और खुराक को चुना जाता है।
    • साइटिका और गठिया के कारण हुए पैरों में दर्द को दूर करने में विरेचन असरकारी है।
    • मृदु विरेचन और स्निग्‍ध विरेचन चिकित्‍सा संधिवात के इलाज में उपयोगी है।
       
  • बस्‍ती
    • पंचकर्म थेरेपी में से एक बस्‍ती कर्म में गुदा मार्ग के ज़रिए व्‍यक्‍ति को औषधीय काढ़ा, तेल और पेस्‍ट दिया जाता है। (और पढ़ें - काढ़ा बनाने की विधि)
    • रसना, वच, कुटज और देवदारु जैसी कुछ जड़ी बूटियों का इस्‍तेमाल बस्‍ती कर्म में किया जाता है।
    • काढ़े या तेल से बने एनिमा से बस्‍ती कर्म किया जा सकता है।
    • ये चिकित्‍सा मूत्रजननांगी विकारों, लकवाग्रस्त समस्‍याओं, अश्मरी (पथरी), खून की उल्टी और दौरे जैसे कई रोगों के इलाज में उपयोगी है।
    • बस्‍ती कर्म न्यूरोमस्कुलर सिस्टम पर असर करता है और गठिया एवं साइटिका को नियंत्रित करने में भी बस्‍ती प्रभावशाली होता है।
    • ऑस्टियोआर्थराइटिस के लिए निरुह बस्‍ती एवं रुमेटाइड आर्थराइटिस के इलाज के लिए वैतर्ण एवं क्षार बस्‍ती की सलाह दी जाती है।
       
  • स्‍नेहन
    • स्‍नेहन कर्म में शरीर को बाहरी और अंदरूनी रूप से चिकना कर के जमे हुए अमा को पतला कर बाहर निकाला जाता है।
    • स्‍नेहन में नाक या मुंह से औषधि डाली जाती है।
    • ये चिकित्‍सा अत्‍यधिक वात से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति के लिए लाभकारी है। प्रमुख तौर पर इसका इस्‍तेमाल त्‍वचा से संबंधित समस्‍याओं के इलाज में किया जाता है।
    • स्‍नेहन कर्म साइटिका, गठिया, ऑस्टियोआर्थराइटिस और रुमेटाइड आर्थराइटिस में उपयोगी है। अत: ये इन रोगों के कारण हुए पैरों में दर्द को कम करने में मदद कर सकता है।
Dr. Hariom Verma

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