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आयुर्वेद में सिरदर्द को शिर:शूल भी कहा जाता है जोकि शिरोरोग (सिर से संबंधित रोग) का एक प्रकार है। ये किसी बीमारी के लक्षण या स्‍वयं एक रोग के रूप में सामने आ सकता है। कारण और दोष के आधार पर शिर:शूल को आठ प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है।

व्‍यक्‍ति की चिकित्‍सकीय स्थिति और किस दोष के कारण सिर दर्द हो रहा है, इसके आधार पर उपचार निर्धारित किया जाता है। आयुर्वेद में सिर दर्द के इलाज के लिए बस्ती कर्म (एनिमा चिकित्‍सा) नास्‍य कर्म (सूंघने की विधि), लेप (प्रभावित हिस्‍से पर औषधियों का लेप), सेक (सिकाई), स्‍नेहन (घी से शुद्धिकरण की विधि) और शिरोधारा (सिर के ऊपर औषधीय तरल या तेल डालना) जैसी कुछ चिकित्‍साओं का प्रयोग किया जाता है।

(और पढ़ें – एनिमा लेने का तरीका)

सिर दर्द के इलाज के लिए चिकित्‍सक आपको पिप्‍पली, पुदीना, तुलसी, शुंथि (सूखी अदरक), ब्राह्मी और जटामांसी जैसी जड़ी-बूटियों के प्रयोग की सलाह दे सकते हैं।

सिर दर्द के उपचार में महालक्ष्‍मी विलास रस, सितोपलादि चूर्ण, रसोन वटी और ब्रह्मा यादी चूर्ण का इस्‍तेमाल किया जाता है।

  1. आयुर्वेद के दृष्टिकोण से सिर दर्द - Ayurveda ke anusar Headache
  2. सिर दर्द का आयुर्वेदिक इलाज या उपचार - Headache ka ayurvedic upchar
  3. सिर दर्द की आयुर्वेदिक जड़ी बूटी और औषधि - Headache ki ayurvedic dawa aur aushadhi
  4. आयुर्वेद के अनुसार सिर दर्द होने पर क्या करें और क्या न करें - Ayurved ke anusar Headache me kya kare kya na kare
  5. सिर दर्द में आयुर्वेदिक दवा कितनी लाभदायक है - Headache ka ayurvedic upchar kitna labhkari hai
  6. सिर दर्द की आयुर्वेदिक औषधि के नुकसान - Headache ki ayurvedic dawa ke side effects
  7. सिर दर्द की आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट से जुड़े अन्य सुझाव - Headache ki ayurvedic ilaj se jude anya sujhav
  8. सिर दर्द की आयुर्वेदिक दवा और इलाज के डॉक्टर

आयुर्वेद के अनुसार शारीरिक और मानसिक, दोनों कारणों की वजह से सिर दर्द हो सकता है। सिर दर्द के कुछ प्रमुख कारणों में नजर दोष, ब्रेन ट्यूमर, हाई ब्‍लड प्रेशर, तनाव, अपच, कब्‍ज और मौसम में अचानक बदलाव शामिल हैं। इस रोग के लक्षण और संकेत इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि किस दोष की वजह से सिर में दर्द हो रहा है।

आयुर्वेद में सिर दर्द को निम्‍न प्रकार में वर्गीकृत किया गया है:

  • वातज: 
    इस प्रकार का सिर दर्द वात दोष में असंतुलन के कारण होता है। अमूमन, इसके कारण चलने के दौरान व्‍यक्‍ति अपना संतुलन खो देता है।
  • पित्तज: 
    ये पित्त दोष की वजह से होता है और इसमें सिर दर्द के साथ जलन का अहसास भी होता है।
  • कफज: 
    ये कफ के कारण होता है और इसमें जुकाम और खांसी भी रहती है।
  • सन्निपातज: 
    त्रिदोष (वात्त, पित्त और कफ) के असंतुलन के काराण सन्निपातज सिर दर्द हो सकता है और इसमें सिरदर्द के लिए उपरोक्‍त कोई भी एक या सभी लक्षण सामने आ सकते हैं। (और पढ़ें – वात्त पित्त और कफ क्‍या होता है)
  • अनंत वात:
    इस प्रकार के सिर दर्द में जी मिचलाने और चक्‍कर के साथ-साथ पूरे सिर में दर्द महसूस होता है।
  • अर्धावभेदक: 
    इसमें आधे सिर में दर्द होता है। (और पढ़ें – आधे सिर में दर्द क्‍यों होता है)
  • शंखक: 
    सिर दर्द के इस प्रकार में दर्द दाईं और बाईं ओर ही सीमित रहता है और इन हिस्‍सों में लालपन और सूजन रहती है।
  • सूर्यावर्त: 
    ये सिर दर्द सूर्य के पथ की तरह होता है। इसमें दर्द सुबह शुरु होता है, दिन तक दर्द बहुत बढ़ जाता है और सूरज ढलने पर दर्द कम हो जाता है। 
  • बस्‍ती कर्म:
    • बस्‍ती एक औषधीय एनिमा है। इस प्रक्रिया में शरीर से मल को साफ करने के लिए औषधीय तरल का उपयोग किया जाता है।
    • जिस दोष के असंतुलन के कारण सिर दर्द हुआ है, उसी के आधार पर बस्ती कर्म से उपचार के लिए तरल का चयन किया जाता है। उस दोष को शरीर से बाहर निकालकर व्‍यक्‍ति को सिर दर्द से निजात दिलाई जाती है।
    • बादाम तेल के साथ जड़ी-बूटियों के मिश्रण से मल को साफ किया जाता है। वात बढ़ने की स्थिति में बादाम तेल की जगह अरंडी का तेल, पित्त बढ़ने पर मक्‍खन या घी और कफ बढ़ने पर अदरक के पाउडर या शहद का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। इन तीनों दोषों के खराब या असंतुलित होने पर त्रिफला एनिमा का प्रयोग किया जाता है।
  • नास्‍य कर्म:
    • आयुर्वेद के अनुसार नाक ही सिर का द्वार होती है इसलिए सिर, गर्दन और गले से संबंधित रोगों के उपचार के लिए नासिका मार्ग के ज़रिए शरीर में जड़ी-बूटियां डाली जाती हैं।  
    • गर्दन में अकड़न, कॉर्निया और नजर संबंधित रोग, गर्दन, कंधे, नाक, मुंह सिर और खोपड़ी से जुड़े विकारों से राहत पाने के लिए नास्‍य कर्म का प्रयोग किया जाता है।
    • नास्‍य कर्म के लिए विभिन्‍न जड़ी-बूटियों से काढ़ा या तेल तैयार कर उन्‍हें नाक में डाला जाता है। नास्‍य के लिए दोष के आधार पर जड़ी-बूटियों का चयन किया जाता है।
  • लेप:
    • इसमें एक हर्बल पेस्‍ट को सिर पर लगाया जाता है एवं मस्तिष्‍क, सिर और गर्दन से संबंधित विकारों में इसका प्रयोग किया जाता है।
    • पेस्‍ट लगाने से पहले, बालों और सिर की त्‍वचा (स्‍कैल्‍प) पर औषधीय तेल लगाया जाता है।
    • तेल और पेस्‍ट लगाने के लगभग डेढ़ घंटे के बाद भाप चिकित्‍सा दी जाती है। इसके बाद गुनगुने औषधीय बाथ से ये विधि समाप्त होती है। (और पढ़ें – भाप लेने के फायदे)
    • आमतौर पर ये चिकित्‍सा सिर्फ एक बार या आवश्‍यकता होने पर एक दिन छोड़कर एक दिन या एक सप्‍ताह तक रोज ली जा सकती है।
  • विरेचन (शुद्धिकरण) कर्म:
    • इस चिकित्‍सा का प्रयोग प्रमुख तौर पर पित्त दोष के असंतुलन के कारण हुए रोगों के इलाज में किया जाता है।
    • रूबर्ब या सेन्‍ना जैसे विभिन्‍न रेचक (जुलाब वाली औषधि) व्‍यक्‍ति को दिए जाते हैं। इससे शरीर से विषाक्‍त पदार्थों को बाहर निकाल दिया जाता है।
    • अगर आपको हाल ही में बुखार हुआ है या खराब पाचन तंत्र, दस्‍त या गुदा में अल्‍सर के मरीज इस चिकित्‍सा को न लें। बच्‍चों, वृद्धों, कमजोर, गर्भवती महिलाएं और दुर्बल व्‍यक्‍ति को इस चिकित्‍सा से बचना चाहिए। (और पढ़ें – कमजोरी कैसे दूर करें)
  • सेक:
    • ये स्‍वेदन (पसीना निकालने की विधि) का एक प्रकार है जिसमें गर्म कपड़े या धातु की वस्‍तु को शरीर के प्रभावित हिस्‍से पर रखा जाता है।
    • ये वात और कफ दोष में असंतुलन के कारण हुए सिर दर्द के इलाज की सबसे उपयुक्‍त चिकित्‍सा है।
    • हृदय रोग और हाई ब्‍लड प्रेशर से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति को ये चिकित्‍सा नहीं दी जानी चाहिए। (और पढ़ें – हाई ब्‍लड प्रेशर में क्‍या नहीं खाना चाहिए)
    • कमजोर और दुर्बल व्‍यक्‍ति को भी इस चिकित्‍सा से बचना चाहिए। (और पढ़ें - )
  • स्‍नेहन:
    • स्‍नेहन के दौरान अधिक मात्रा में गर्म और औषधीय तेल को पूरे शरीर पर लगाया जाता है और हल्‍के हाथों से धीरे-धीरे तेल मालिश की जाती है।
    • सामान्‍य तौर पर सभी प्रकार के दोषों के लिए तिल के तेल का प्रयोग किया जाता है। ये वात को कम, कफ के असंतुलन के कारण हुए हानिकारक प्रभावों को खत्‍म और पित्त को बढ़ाता है। सिर दर्द के इलाज में दोष के आधार पर आप किसी अन्‍य तेल का प्रयोग भी कर सकते हैं।
  • शिरोधारा:
    • शिरोधारा एक आयुर्वेदिक चिकित्‍सा है जिसमें विभिन्‍न तरल जैसे कि दूध या तेल को जड़ी-बूटियों के काढ़े में मिलाकर लयबद्ध तरीके से सिर के ऊपर डाला जाता है।
    • काढ़ा बनाने के लिए किन जड़ी-बूटियों का इस्‍तेमाल किया जाएगा ये सिर दर्द के कारण पर निर्भर करता है। गुनगुने गाय के दूध के साथ वात का नाश करने वाली जड़ी-बूटियों का इस्‍तेमाल वातज शिरोरोग के लिए किया जाता है जबकि ठंडे दूध और गन्‍ने के जूस का प्रयोग पित्तज शिरोरोग के लिए किया जाता है। (और पढ़ें – गाय या बकरी का दूध)

सिर दर्द के लिए आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां

  • पिप्‍पली:
    • पिप्‍पली सिर दर्द के कई मुख्‍य कारणों जैसे कि कफ विकारों, पेट का बढ़ना, खांसी और जुकाम का इलाज करती है।
    • ये शरीर से अमा को बाहर निकालने के लिए भी इस्‍तेमाल की जाती है।
    • अर्क, पाउडर या तेल के रूप में पिप्‍पली का इस्‍तेमाल कर सकते हैं।
    • इसके कारण पित्त दोष बढ़ सकता है इसलिए इसका प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
  • पुदीना:
    • पुदीना उत्तेजक, वायुनाशक (पेट फूलने की समस्‍या को कम करना) और दर्द निवारक गुणों से युक्‍त है।
    • कई रोगों जैसे कि जुकाम, फ्लू, बुखार, साइनोसाइटिस और एलर्जी के इलाज में इसका इस्‍तेमाल किया जाता है। इनमें से किसी भी समस्या की वजह से सिर दर्द होने पर पुदीने का तेल लगाया जाता है।
    • तनाव के कारण हुए सिर दर्द का इलाज भी पुदीने के तेल से किया जा सकता है। ये मस्तिष्‍क और इंद्रियों को खोल देता है और भावनात्‍मक रूप से स्‍वस्‍थ बनाता है।
  • तुलसी:
    • तुलसी एक सुरक्षित और असरकारी जड़ी-बूटी है जिसका इस्‍तेमाल ब्‍लड ग्‍लूकोज के स्‍तर, ब्‍लड प्रेशर और लिपिड प्रोफोइल में सुधार के लिए किया जा सकता है। ये मानसिक और प्रतिरक्षात्‍मक (बीमारियों से बचाव के लिए इम्‍यून का सक्रिय होना) तनाव को नियंत्रित करने में भी मदद करती है। (और पढ़ें – ब्‍लड शुगर लेवल कितना होना चाहिए)
    • तनाव सिर दर्द के प्रमुख कारणों में से एक है लेकिन सिर दर्द किसी अन्‍य बीमारी जैसे कि हाई ब्‍लड प्रेशर की वजह से भी हो सकता है।
    • तुलसी तनाव का स्‍तर कम और शरीर की क्रियाओं को वापिस से संतुलित कर तनाव से राहत दिलाती है। (और पढ़ें – तुलसी के तेल के फायदे)
  • शुंथि:
    • शुंथि दर्द निवारक, पाचक, कफ और वायुनाशक गुणों से युक्‍त चमत्‍कारिक जड़ी-बूटी है।
    • सभी प्रकार के सिर दर्द के इलाज में शुंथि एक उत्तम जड़ी-बूटी है। काले नमक के साथ शुंथि का प्रयोग करने पर वात घटता है, मिश्री के साथ पित्त एवं शहद के साथ शुंथि का प्रयोग करने पर कफ में कमी आती है।
    • खांसी के कारण हुए सिर दर्द को सूखी अदरक के उचित इस्‍तेमाल से नियंत्रित किया जा सकता है।
  • ब्राह्मी:
    • मस्तिष्‍क की कोशिकाओं और नसों को ऊर्जा देने के लिए ब्राह्मी एक उत्तम जड़ी-बूटी के रूप में जानी जाती है। ये रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है और सिर दर्द का कारण बनने वाले नसों एवं आंतों से संबंधित विकारों को नियंत्रित करने में मदद करती है। (और पढ़ें – रोग प्रतिरोधक क्षमता कैसे बढ़ाये)
    • ब्राह्मी का इस्‍तेमाल सावधानीपूर्वक करना चाहिए। ब्राह्मी की अधिक खुराक सिर दर्द को बढ़ा सकती है और इसकी वजह से खुजली भी हो सकती है इसलिए चिकित्‍सक की सलाह के बाद ही ब्राह्मी का इस्‍तेमाल करना चाहिए।
  • जटामांसी:
    • जटामांसी नर्वाइन (आराम देने वाला) टॉनिक और सुगंधित औषधि के रूप में कार्य करती है। ये पाचन को भी बेहतर करती है।
    • ये संपूर्ण स्‍वास्‍थ्‍य को बेहतर, रक्‍त की अशुद्धियों को साफ और नर्वस सिर दर्द (सिर में लगातार दर्द) को ठीक करने का काम करती है। ये श्‍वसन, पाचन और गैस्ट्रिक विकारों के इलाज में भी मदद करती है जोकि सिर दर्द के प्रमुख कारण हो सकते हैं।

सिर दर्द के लिए आयुर्वेदिक औषधियां

  • महालक्ष्‍मी विलास रस:
    • महालक्ष्‍मी विलास रस में स्‍वर्ण भस्‍म (स्‍वर्ण को ऑक्‍सीजन और वायु में उच्‍च तामपान पर गर्म करके तैयार हुई), रौप्‍य (सिल्‍वर) भस्‍म, अभ्रक भस्‍म, ताम्र (तांबा) भस्‍म, वंग (टिन) भस्‍म, मुक्‍ता (मोती) भस्‍म और नाग (सीसा) भस्‍म जैसी कुछ सामग्रियांं मौजूद हैं।
    • ये रोग प्रतिरोधक क्षमता और शक्‍ति को बढ़ाता है।
    • ये वात दोष में असंतुलन और लंबे समय से किसी वात रोग के कारण हुई कमजोरी की वजह से हो रहे सिर दर्द के इलाज में मदद करता है। इसके अलावा कानों में सीटी बजने के कारण हो रहे सिर दर्द को भी इससे ठीक किया जा सकता है। (और पढ़ें – कान में सीटी बजने के कारण)
  • सितोपलादि चूर्ण:
    • सितोपलादि चूर्ण में विभिन्‍न अनुपात में मिश्री, वंशलोचन, छोटी पिप्‍पली, छोटी इलायची (हरी इलायची) और दालचीनी मौजूद होती है।
    • फ्लू और श्‍वसन विकार से संबंधित बुखार के इलाज में इसका इस्‍तेमाल कर सकते हैं। इससे तीन से चार दिनों में ही लक्षणों से राहत और आठ सप्‍ताह के अंदर ही रोग को पूरी तरह से खत्‍म किया जा सकता है।
    • जुकाम के कारण हुए सिर दर्द के इलाज में भी सितोपलादि चूर्ण का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। (और पढ़ें – जुकाम का रामबाण इलाज)
  • रसोन वटी:
    • रसोन वटी में लहसुन, जीरा, काला नमक, प्रोसेस्‍ड (किसी विशेष प्रक्रिया द्वारा तैयार किया गया) सल्‍फर, सूखी अदरक, काली मिर्च, पिप्‍पली, हींग और नींबू का रस मौजूद है।
    • उपरोक्‍त सभी चीज़ें कफ विकारों को नियंत्रित और सिर दर्द का इलाज करने के लिए जानी जाती हैं।
  • ब्रह्मा यादी चूर्ण:
    • ब्रह्मा यादी चूर्ण में समान मात्रा में ब्राह्मी, शंखपुष्‍पी, जटामांसी, ज्‍योतिषमती, वच और अश्‍वगंधा होता है।
    • ये हाई ब्‍लड प्रेशर और इसके लक्षणों जैसे कि सिर दर्द, अनिद्रा और चक्‍कर को नियंत्रित करने में मदद करता है।

व्‍यक्‍ति की प्रकृति और कई कारणों के आधार पर चिकित्‍सा पद्धति निर्धारित की जाती है। उचित औषधि और रोग के निदान हेतु आयुर्वेदिक चिकित्‍सक से परामर्श करें। 

क्‍या करें

क्‍या ना करें

सिर दर्द का ही एक प्रकार है माइग्रेन जिसमें बहुत तेज और समय-समय पर दर्द होता है। माइग्रेन के दर्द को नियंत्रित करने के लिए योग के साथ आयुर्वेदिक चिकित्‍सा के प्रभाव की जांच हेतु एक चिकित्‍सकीय अध्‍ययन किया गया था। 

(और पढ़ें – माइग्रेन में क्‍या खाना चाहिए)

86 प्रतिभागियों में से 30 लोगों को आयुर्वेद-योग के समूह में डाला गया और इन्‍हें 90 दिनों तक योग के बाद विरेचन चिकित्‍सा दी गई। अध्‍ययन में पाया गया कि शरीर की प्रकृति और प्रबल दोष के बावजूद अधिकतर प्रतिभागियों को सिर दर्द से राहत मिली।

इसलिए आयुर्वेद के साथ योग चिकित्‍सा द्वारा माइग्रेन के दर्द को नियंत्रित किया जा सकता है और इससे संपूर्ण जीवन के स्‍तर में भी सुधार लाया जा सकता है।

तनाव के कारण होने वाले सिर दर्द में पुदीने के तेल लगाने के प्रभाव की जांच के लिए एक अन्‍य अध्‍ययन किया गया। पुदीने के तेल के प्रभाव की तुलना कृत्रिम दवा पैरासिटामोल से की गई थी। इन दोनों का लगभग एक जैसा ही प्रभाव पाया गया। 6 साल या इससे अधिक उम्र के व्‍यक्‍ति में तनाव के कारण हुए सिर दर्द से तुरंत राहत पाने के लिए इस चिकित्‍सा की सलाह दी जाती है। 

(और पढ़ें – तनाव के लिए योगासन)

उपरोक्‍त जड़ी-बूटियां और औषधियां सिर दर्द के इलाज में असरकारी होती हैं लेकिन फिर भी आयुर्वेदिक चिकित्‍सक की सलाह पर ही इनका इस्‍तेमाल करना चाहिए। इनमें से कुछ दवाओं के हानिकारक प्रभाव हो सकते हैं।

उदाहरणार्थ: पिप्‍पली के कारण पित्त का स्‍तर बढ़ सकता है और ब्राह्मी की अधिक खुराक (ओवरडोज) के कारण इलाज की जगह सिर का दर्द बढ़ सकता है।

(और पढ़ें – सिर दर्द का घरेलू उपचार)

सिर दर्द एक सामान्‍य समस्‍या है जो‍ कि कई कारणों से हो सकता है। कभी सिर दर्द अपने आप या किसी रोग के लक्षण के रूप में सामने आ सकता है। इसके कारण जीवनस्‍तर भी प्रभावित होता है एवं इसे उचित रूप से नियंत्रित करने की जरूरत है।

स्‍नेहन, नास्‍य कर्म आदि जैसी कुछ आयुर्वेदिक चिकित्‍साओं द्वारा दर्द से राहत पाई जा सकती है और इससे व्‍यक्‍ति अपने रोजमर्रा के कार्यों पर भी ध्‍यान दे पाता है।

इसके अलावा प्राचीन समय से ही प्रभावी तरीके से रोग के इलाज में जड़ी-बूटियों और औषधियों जैसे कि पुदीने का तेल और अदरक का इस्‍तेमाल किया जाता रहा है। वैज्ञानिक रूप से ये जड़ी-बूटियां सिर दर्द को नियंत्रित करने के लिए असरकारी साबित हो चुकी हैं।

(और पढ़ें – सिर दर्द में क्‍या खाना चाहिए)

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