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स्‍तंभन दोष को आयुर्वेद में क्लैब्य कहा गया है। इसमें पुरुषों को यौन संबंध बनाने के लिए लिंग में उत्तेजना पाने या उत्तेजना को बनाए रखने में समस्‍या आती है। इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन का मतलब पुरुषों में नपुंसकता से होता है। पुरुषों को ये समस्‍या किसी भी उम्र में हो सकती है। तनाव, ब्‍लड प्रेशर से संबंधित समस्‍याएं या डायबिटीज की वजह से स्‍तंभन दोष हो सकता है। इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन के पारंपरिक इलाज में विभिन्‍न नरम मांसपेशियों को आराम दिया जाता है एवं आवश्‍यकता होने पर मनोचिकित्सा और तनाव को नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाओं के साथ टेस्‍टोस्‍टेरोन इंजेक्‍शन दिए जाते हैं।

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क्लैब्य को नियंत्रित करने के लिए आयुर्वेद में विरेचन (मल त्‍याग की विधि) और उत्तरा बस्‍ती (एक प्रकार की बस्‍ती) की सलाह दी जाती है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में अश्‍वगंधा, गोक्षुरा, शिलाजीत, च्‍यवनप्राश जैसी जड़ी बूटियों और औषधियों में अश्‍वगंधा लेह, दशमूलारिष्‍ट, सुकुमार घृत एवं शतावर्यादि घृत से क्लैब्य का उपचार किया जाता है।

  1. आयुर्वेद के दृष्टिकोण से स्तंभन दोष - Ayurveda ke anusar Erectile Dysfunction
  2. इरेक्टाइल डिसफंक्शन का आयुर्वेदिक उपचार - Erectile Dysfunction ka ayurvedic ilaj
  3. इरेक्टाइल डिसफंक्शन की आयुर्वेदिक दवा, जड़ी बूटी और औषधि - Erectile Dysfunction ki ayurvedic dawa aur aushadhi
  4. आयुर्वेद के अनुसार स्तंभन दोष में क्या करें और क्या न करें - Ayurved ke anusar Erectile Dysfunction kam karne ke liye kya kare kya na kare
  5. स्तंभन दोष की आयुर्वेदिक दवा कितनी लाभदायक है - Erectile Dysfunction ka ayurvedic upchar kitna labhkari hai
  6. इरेक्टाइल डिसफंक्शन की आयुर्वेदिक औषधि के नुकसान - Erectile Dysfunction ki ayurvedic dawa ke side effects
  7. स्तंभन दोष की आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट से जुड़े अन्य सुझाव - Erectile Dysfunction ke ayurvedic ilaj se jude anya sujhav
  8. इरेक्टाइल डिसफंक्शन की आयुर्वेदिक दवा और इलाज के डॉक्टर

आयुर्वेद के अनुसार नपुंसकता का एक बड़ा कारण इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन भी है। बहुत ज्‍यादा नमकीन, खट्टे, भारी, अनुचित और अनुपयुक्त खाद्य पदार्थों को खाने की वजह से भी ये समस्‍या हो सकती है। अत्‍यधिक मात्रा में पानी पीने की वजह से भी स्‍तंभन दोष हो सकता है।

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क्लैब्य के अन्‍य कारणों में किसी बीमारी की वजह से कमजोरी होना, अनियमित भोजन, बहुत ज्‍यादा दूध या दूध से बने खाद्य पदार्थों का सेवन, पशु के साथ यौन संबंध बनाने, गंदे वातावरण में रहने और शिश्न (पेनाइल) में चोट लगना शामिल है। अनुवांशिक कारणों की वजह से भी क्लैब्य की समस्‍या हो सकती है।

दोष के आधार पर क्लैब्य को पांच प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:

  • वातज: ये वात दोष के खराब होने के कारण होता है और इसमें पेनाइल में अकड़न एवं दर्द तथा लिंग में लालपन जैसे लक्षण सामने आते हैं।
  • पित्तज: पित्त दोष के खराब होने पर पित्तज क्लैब्य होता है। इसमें शिश्‍न में घाव जैसे कि फोड़ा हो जाता है।
  • कफज: इस प्रकार का स्‍तंभन दोष कफ दोष के खराब होने के कारण होता है। इसके प्रमुख लक्षणों में लिंग का आकार बढ़ना, लाल या गहरे रंग का पेनाइल डिस्‍चार्ज, घाव और लिंग की जड़ के पास गोल निशान पड़ना शामिल है।
  • सन्निपातज: त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) के खराब होने के कारण सन्निपातज क्लैब्य होता है। इसमें मूत्राशय तथा वीर्य पुटिका में जलन और अंडकोष के साथ-साथ लिंग से पतला सफेद पानी आना, पेनाइल में अकड़न एवं लिंग में संक्रमण के साथ बदबू आती है। इस रोग के बढ़ने पर पूरे लिंग के मुरझाने और लिंग के आखिरी सिरे के घूमने की समस्‍या हो सकती है। (और पढ़ें - सफेद पानी आने का घरेलू उपचार)
  • रक्‍तज: रक्‍तज क्लैब्य में रक्‍त धातु का असंतुलन होना शामिल है। इसमें जलन, बुखार, सिर चकराना और उल्‍टी आती है। पेनाइल डिस्‍चार्ज में काला, लाल या नीले रंग का पानी आ सकता है।

इन लक्षणों को दबाने की बजाय आयुर्वेदिक उपचार में शरीर की जन्मजात रक्षा प्रणाली में सुधार कर स्‍तंभन दोष को प्राकृतिक रूप से ठीक होने में मदद की जाती है। आयुर्वेदिक औषधियों से समस्‍या को कम या उसे पूरी तरह से ठीक करने के लिए शरीर के ऊतकों से विषाक्‍त को बाहर निकाला जाता है तथा संपूर्ण सेहत में सुधार लाया जाता है। 

(और पढ़ें - वात पित्त और कफ क्या है)

  • विरेचन
    • विरेचन कर्म में औषधीय जड़ी बूटियों से व्‍यक्‍ति को दस्‍त करवाए जाते हैं।
    • विरेचन के लिए स्‍नेहपान (औषधि को पीने की विधि) किया जाता है। इस चिकित्‍सा में जड़ी बूटियों से मिश्रित तेल या घृत (क्‍लैरिफाइड मक्‍खन) का सेवन किया जाता है।
    • एक साथ लेने पर ये चिकित्‍साएं विभिन्‍न अंगों जैसे पित्ताशय, छोटी आंत और लिवर एवं ऊतकों से खराब पित्त तथा अमा (विषाक्‍त पदार्थ) को बाहर निकाल देती है।
    • विरेचन का इस्‍तेमाल खराब हुए कफ के कारण हुए रोगों के इलाज में किया जाता है। ये शरीर से बलगम को साफ करती है। वात के असंतुलन के कारण हुए रोगों में इसकी सलाह नहीं दी जाती है।
    • ये चिकित्‍सा महिलाओं में योनि से संबंधित बीमारियों को नियंत्रित करने में असरकारी है। पुरुषों में इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन, आंत में दर्द, पेट में कीड़े और विषाक्‍तता (जहर) आदि के इलाज में भी इसका इस्‍तेमाल किया जाता है। स्‍तंभन दोष से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति में दस्‍त के लिए त्रिवृत अवलेह का इस्‍तेमाल कर सकते हैं।
       
  • उत्तरा बस्‍ती
    • इस प्रक्रिया में तेल या घी में औषधीय गुणों से युक्‍त जड़ी बूटियों को मिलाया जाता है और फिर इन्‍हें कैथिटर (औषधियों से तैयार एक पतली ट्यूब) के जरिए मूत्राशय में लगाकर शरीर के अंदर दवा को पहुंचाया जाता है।
    • इसके बाद मरीज को 30 मिनट के लिए आराम करने के लिए कहा जाता है और इसके उपरांत उसे अत्‍यधिक मात्रा में तरल जैसे कि गर्म पानी एवं छाछ आदि पीने की सलाह दी जाती है। उत्तरा बस्‍ती के बाद पहली बार किए पेशाब की मात्रा और समय के आधार पर रोग की स्थिति में सुधार का अनुमान लगाया जाता है।
    • इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ति में उत्तरा बस्‍ती के लिए फल घृत का इस्‍तेमाल किया जा सकता है।
    • उत्तरा बस्‍ती कर्म के बाद प्राकृतिक इच्‍छाओं जैसे कि मल त्‍याग, प्‍यास या पेशाब को रोके नहीं।

इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन के लिए आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां

  • अश्‍वगंधा
    • ये जड़ी बूटी तंत्रिका, श्‍वसन और प्रजनन प्रणाली पर कार्य करती है। इसमें कामोत्तेजक, सूजन-रोधी, संकुचक (शरीर के ऊतकों को संकुचित करने वाले), ऊर्जादायक और शरीर को आराम देकर नींद लाने वाले गुण मौजूद हैं।
    • अश्‍वगंधा शुक्राणुओं के उत्‍पादन को बढ़ाती है और स्‍तंभन दोष को नियंत्रित करने में भी ये असरकारी है। ये यौन कमजोरी, बांझपन, कमजोरी, एनीमिया, थकान और ऊतकों की कमी के इलाज में भी उपयोगी है। (और पढ़ें - एनीमिया का आयुर्वेदिक इलाज)
    • अश्‍वगंधा का इस्‍तेमाल तेल, पाउडर, घृत या हर्बल वाइन के रूप में कर सकते हैं।
       
  • गोक्षुरा
    • गोक्षुरा प्रजनन, मूत्र, तंत्रिका और श्‍वसन प्रणाली पर असर करती है। इसमें कामोत्तेजक, शामक (आराम देने वाले), भूख बढ़ाने वाले, कफ निस्‍सारक (बलगम निकालने वाले), दर्द निवारक, ह्रदय को शक्‍ति देने वाले एवं मूत्रवर्द्धक गुण पाए जाते हैं। (और पढ़ें - भूख बढ़ाने का उपाय)
    • गोक्षुरा शरीर से अमा को बाहर निकालती है इसलिए ये मूत्र तंत्र से संबंधित समस्‍याओं के इलाज में इस्‍तेमाल होने वाली प्रमुख जड़ी बूटियों में से एक है।
    • गोक्षुरा से टेस्‍टोस्‍टेरोन का स्‍तर बढ़ता है और इससे शुक्राणुओं की संख्‍या में भी बढ़ोत्तरी होती है। इसे स्‍तंभन दोष और पुरुषों में नपुंसकता को नियंत्रित करने में असरकारी माना गया है। (और पढ़ें - टेस्टोस्टेरोन की कमी के लक्षण)
    • खांसी, एनीमिया, अस्‍थमा और सूजन के इलाज में गोक्षुरा उपयोगी है।
       
  • शिलाजीत
  • शतावरी
    • शतावरी प्रजनन, पाचन, परिसंचरण और श्‍वसन प्रणाली पर कार्य करती है। इसमें कामोत्तेजक गुण होते हैं जो कि पुरुषों और महिलाओं दोनों पर असर करती है।
    • ये प्राकृतिक सूजन-रोधी जड़ी बूटी है जो दस्‍त-रोधी, मूत्रवर्द्धक, पेचिश रोकने वाली और रोगाणुरोधक कार्य भी करती है।
    • शतावरी की जड़ों को ऊर्जादायक, वायुनाशक (पेट फूलने से राहत), पाचक और भूख बढ़ाने वाले गुणों के लिए जाना जाता है। ये तंत्रिका और रुमेटिक रोगों को नियंत्रित करने में मददगार है।
    • इस जड़ी बूटी का इस्‍तेमाल काढ़े, घृत, तेल या पाउडर के रूप में कर सकते हैं।

इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन के लिए आयुर्वेदिक औषधियां

  • च्‍यवनप्राश
    • च्‍यवनप्राश को दशमूल, पिप्‍पली, गुडूची, अश्‍वगंधा, आमलकी, इलायची, भूमि आमलकी, कुश्‍ता की जड़, तिल का तेल, चंदन, पुनर्नवा और शहद से तैयार किया गया है। आमतौर पर च्‍यवनप्राश का मिश्रण खाया जाता है।
    • च्‍यवनप्राश में पाचक, खून में हीमोग्‍लोबिन बढ़ाने वाले, वायुनाशक और स्वास्थ्यप्रद गुण होते हैं। ये रोग प्रतिराधेक क्षमता, सेहत और ताकत को बढ़ाती है। (और पढ़ें - हीमोग्लोबिन बढ़ाने के नुस्खे)
    • विभिन्‍न रोगों जैसे कि ब्रोंकाइटिस, अस्‍थमा, आर्थराइटिस और मेटाबोलिक विकारों के इलाज एवं बचाव में इसका इस्‍तेमाल किया जाता है। यौन दुर्बलता और सामान्‍य कमजोरी को दूर करने में भी इसका उपयोग किया जाता है। इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन का सबसे सामान्‍य कारण कमजोरी ही होती है इसलिए इस स्थिति को नियंत्रित करने में च्‍यवनप्राश प्रभावकारी रहता है। (और पढ़ें - कमजोरी कैसे दूर करें)
       
  • अश्‍वगंधा लेह
    • इस मिश्रण में अश्‍वगंधा, इलायची, जीरा, गुड़, किशमिश, गाय का घी, भारतीय सरसापैरिला और काली मूसली मौजूद है।
    • ये शरीर को ताकत और मजबूती प्रदान करता है एवं किसी लंबी बीमारी के बाद संपूर्ण स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार लाने में मदद करता है। ये सामान्‍य थकान, दुबलापन और यौन विकारों जैसे कि स्‍तंभन दोष को नियंत्रित करने में भी उपयोगी है।
       
  • दशमूलारिष्‍ट
    • दशमूलारिष्‍ट में दशमूल, गुडूची, आमलकी, हरीद्रा (हल्‍दी), पिप्‍पली, अश्‍वगंधा, किशमिश, गुड़, शहद, चंदन, भारंगी, कुलंजन और मुस्‍ता मौजूद है।
    • इससे शरीर को ताकत, मजबूती और जीवनशक्‍ति मिलती है जो कि इसे इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन की चिकित्‍सा में असरकारी बनाता है। ये औषधि अन्‍य रोगों जैसे कि एनीमिया, खांसी, रुमेटिक विकारों, गैस्ट्रिक विकारों, पेशाब में दर्द और ब्रोंकाइटिस को नियंत्रित करने में भी इस्‍तेमाल की जाती है। (और पढ़ें - खांसी का आयुर्वेदिक इलाज)
       
  • सुकुमार घृत
    • सुकुमार घृत को पुनर्नवा, दशमूल, अश्‍वगंधा, शतावरी, अरंडी, पिप्‍पली, यष्टिमधु (मुलेठी), अश्‍वगंधा, शुंथि (सोंठ), दूध, घृत और गुड़ जैसी सामग्रियों से तैयार किया गया है।
    • सुकुमार घृत में बलवर्द्धक और रेचक गुण होते हैं एवं यह आंतों तथा गैस्ट्रिक विकारों को नियंत्रित करने में मदद करता है।
    • प्रजनन प्रणाली से संबंधित बीमारियों जैसे कि नपुसंकता और इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन को नियंत्रित करने में भी उपयोगी है।
       
  • शतावर्यादि घृत
    • इस मिश्रण को विभिन्‍न सामग्रियों जैसे कि घृत, शतावरी, गोक्षुरा, बकरी के दूध, गुडूची, त्रिकुट (तीन कषाय – पिप्‍पली, शुंथि और मारीच [काली मिर्च] का मिश्रण), दालचीनी की छाल और पत्तियां, शहद एवं इलायची से तैयार किया गया है।
    • ये मूत्र से संबंधित विकारों जैसे कि सिस्टाइटिस (मूत्राशय में सूजन) और मूत्रमार्गशोथ (मूत्रमार्ग में सूजन) को नियंत्रित करने में मदद करता है। पुरुषों की प्रजनन प्रणाली से जुड़े विकारों जैसे कि स्‍तंभन दोष के इलाज में भी इसका इस्‍तेमाल किया जाता है।

क्‍या करें

क्‍या न करें

स्‍तंभन दोष से ग्रस्‍त एक 38 वर्षीय पुरुष पर आयुर्वेदिक चिकित्‍साओं की जांच के लिए एक अध्‍ययन किया गया था। इसमें आयुर्वेदिक चिकित्‍साओं से इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन के लक्षणों को नियंत्रित और संपूर्ण सेहत में सुधार आने के प्रभाव की जांच की गई।

उस व्‍यक्‍ति पर विभिन्‍न चिकित्‍साओं और जड़ी बूटियों के साथ फल घृत, दीपन (भूख बढ़ाने वाली) से स्नेहन एवं चित्रकादि वटी से पाचन और त्रिवृत अवलेह से विरेचन कर्म भी किया गया। विरेचन के 15 दिन बाद फल घृत के साथ उत्तरा बस्‍ती भी दी गई। तीन महीने बाद स्‍तंभन दोष के लक्षणों, कामोत्तेजक कार्य, यौन संतुष्टि और यौन इच्‍छा में 66.6 फीसदी सुधार देखा गया।

(और पढ़ें - यौनशक्ति कम होने के कारण)

एक अन्‍य अध्‍ययन में क्लैब्य में आयुर्वेदिक उपचार के प्रभाव की जांच के लिए 21 से 50 साल की उम्र के स्‍तंभन दोष से ग्रस्‍त पुरुषों को शामिल किया गया। सभी प्रतिभागियों को हर्बो-मिनरल (जड़ी बूटियों और खनिज पदार्थों) रस दिया गया जिसमें यंग भस्‍म (टिन को ऑक्सीजन और वायु में उच्च तामपान पर गर्म करके तैयार हुई), अश्‍वगंधा चूर्ण तथा कपिकच्छु चूर्ण शामिल था। इन्‍हें एक निश्चित समय के लिए अन्‍य रस के साथ दिया गया।

अध्‍ययन के पूरा होने के बाद अधिकतर प्रतिभागियों ने इरेक्‍शन में सुधार और इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन के लक्षणों में कमी आने की बात कही। 

(और पढ़ें - लिंग का टेढ़ापन के लक्षण)

व्‍यक्‍ति की प्रकृति के आधार पर सही खुराक में आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों का इस्‍तेमाल सुरक्षित माना जाता है। हालांकि, इनके गलत इस्‍तेमाल या खुद अपनी मर्जी से दवा लेने पर इसके हानिकारक प्रभाव झेलने पड़ सकते हैं।

किसी विशेष रोग के इलाज में इस्‍तेमाल होने वाली जड़ी बूटी या औषधि हर व्‍यक्‍ति के लिए उचित नहीं रहती है। उदाहरण के तौर पर, शतावरी और अश्‍वगंधा का इस्‍तेमाल स्‍तंभन दोष के इलाज में किया जाता है लेकिन छाती में बलगम जमने और बहुत ज्‍यादा खांसी होने पर इसका इस्‍तेमाल नहीं करना चाहिए।

अत: बेहतर होगा कि आप किसी भी हर्बल चिकित्‍सा से पहले आयुर्वेदिक चिकित्‍सक से परामर्श करें। चिकित्‍सक आपकी प्रकृति एवं रोग की स्थिति के आधार पर आपके लिए उचित उपचार निर्धारित करेंगे। 

(और पढ़ें - बलगम की जांच क्या है)

किसी शारीरिक समस्‍या (जैसे कि चोट या बीमारी) या मानसिक कारण (जैसे तनाव और सेक्‍स के दौरान संतुष्‍ट न कर पाने का डर) की वजह से इरेक्‍टाइल डिस्‍फंक्‍शन की समस्‍या हो सकती है। अत्‍यधिक फास्‍ट फूड खाने और गलत आदतों की वजह से भी पुरुषों को इस तरह की दिक्‍कत हो सकती है। अनुभवी चिकित्‍सक की देखरेख में विभिन्‍न जड़ी बूटियों और औषधियों की मदद से आयुर्वेदिक उपचार से स्‍तंभन दोष को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। 

(और पढ़ें - सेक्स थेरेपी के फायदे)

Dr. Ajai Singh Chauhan

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References

  1. Ayurvedic Medical College and Hospital. ROLE OF PANCHAKARMA CHIKITSA IN THE MANAGEMENT OF KLAIBYA: A CASE STUDY Tribhuvan Pareek. September - October 2016, Vol 3
  2. Sanjeev Sarmukaddam et al. Efficacy and safety of Ayurvedic medicines: Recommending equivalence trial design and proposing safety index. Int J Ayurveda Res. 2010 Jul-Sep; 1(3): 175–180. PMID: 21170211
  3. Swami Sada Shiva Tirtha. The Ayurveda Encyclopedia. The Authoritative Guide to Ayurvedic Medicine; [Internet]
  4. Raghav Kumar Mishra. MALE INFERTILITY: LIFESTYLE AND ORIENTAL REMEDIES. Department of Zoology; Journal of Scientific Research